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Thursday, December 29, 2022

वाह रे "भइया"

बहुत भारी भरकम शब्द है "भइया" इसको बोलकर लोग डूबा देते है "नइया" काम रहता है तभी भइया सबको याद आते है वरना भइया बराबर चूतिया ही तो होते है। अगर बड़े भइया हाल चाल लेने के लिए फोन कर दे तो लोग भइया प्रणाम की जगह बोलते है "क्या काम है?" क्या ही बोला जाय जीवन में बहुत कुछ घट जाय चलेगा पर किसी लड़की ने भइया बोल दिया तो धज्जियां उड़ जाती है खासकर जब वो कॉलेज में आपके क्लास की ही हो...! भइया को कुछ आता जाता नही हैं क्योंकि वो सफलता हासिल नही कर पा रहे है कही.. जिम्मेदारियों के बोझ तले भइया दबकर संघर्ष करके आगे तो निकल जाते है पर रहते भइया ही हैं..! भइया को मईया भी बहुत मानती है पर भइया को लगता है भइया बराबर चूतिया ही होवे है...! भइया समझते है बड़े घर के वही हैं सबका ख्याल रखना उन्ही को हैं इसीलिए मईया के प्यारे भइया है..।
एक हैं राजनीति वाले भइया इनको तो इनकी पत्नी भी भइया कहकर संबोधित करती है सार्वजनिक मंचों पर। वाह..! क्या जमाना आ गया है राजनीति  ने सईया को भइया बना दिया।
एक होते है सब्जी वाले भइया ठेला लेकर एक दम सुबह ही मोहल्ले में हाजिर हो जाते है। भइया की इज्जत की धज्जियां तब उड़ जाती है जब उसी मोहल्ले में पूर्व प्रेमिका से नजरे मिल जाती है और इंतकाम लेने की सोचने वाले भइया उसके पति के थैले में धनिया मिर्च फ्री में ठेलकर निकल लेते है। हमारे एक मित्र ने क्या गजब कहा है...

"उसकी रकीबियत का किस्सा मुझसे मत पूछों 
महबूब के मोहल्ले की हटरी में सब्जियां बेचता है।
मासूका की बातें अब और क्या कहूँ, 
ये बात सुनो उसके पति के थैले में 
धनिया मिर्च फ्री में ठेलता है।"

इन सबके बीच यूपीएससी वाले भइया को भूल जाना महापाप होगा जो दिन भर में दसियों बार चाय और सिगरेट पी लेते है.. कहते हैं इससे कंसंट्रेशन बना रहता है। खैर ये तो तो पढ़ते भी जम के है लेकिन इनको देखकर गांव से आए कुछ नए लड़के सिर्फ पीते ही है पढ़ना तो भूल ही जाते है... भइया कही ना कही सिलेक्शन लेकर निकल लेते है और ये रह जाते है वही तथाकथित संघर्ष के जंजाल में..! भइया का बढ़िया काम कोई नही करता बुरा सब देखते है। अब छात्र नेताओं वाले भइया का कवनों भौकाल नही रह गया है आजकल हर दूसरा छात्र विश्वविद्यालय में खुद को छात्र नेता ही समझता है..। पहले के तो ठेकेदारी का काम पा भी जाते थे अब तो बस दो चार हजार भइया का पेट जाता है मुर्गा दारू लेकर अब तो गाना भी आ गया है भोजपुरी में "खाके मुर्गा पीके बियर बोला हैप्पी न्यू ईयर"।

"भइया" होना आसान काम नही है भइया...राम राम भइया...!

Thursday, November 3, 2022

सोशल मीडिया पर सब ज्ञानी है

गजब का तमाशा देखने को मिल रहा है देश में। हर दिन कोई न कोई न कोई नया बखेड़ा खड़ा हो ही जाता हैं। सोशल मीडिया के जमाने में कोई खबर किसी से छिपी नही रहती है देर सबेर गलत सही लोगो के पास पहुंच ही जाता है। तमाम फैक्ट चेकर भी है जो फैक्ट चेक करके के बताते रहते है खबर की सच्चाई अपने चैनलों के माध्यम से लेकिन क्या हो जब फैक्ट चेकर ही चोकर निकले यानी फर्जी तथ्यों को सामने रखकर उलूल जुलुल खबरों को हवा दे? 
अब जबसे से डिजिटल क्रांति हुआ है तब से देखा जाए तो लगभग हर सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भारत की जनता ने भीड़ लगाकर रखा हुआ है। सब कलाकार बनने लग गए है, घर बैठे पैसे कमाने के होड़ गंध से गंध भरी कलाकारी का प्रदर्शन कर रहे है। नाचना भी एक कला है ढंग से सीखने वाला ही कलाकार कहलाता है, वर्ना सारी जिंदगी भांड का तमगा माथे पर टिका रहना है...!
किताबें पढ़ो, अखबार पढ़ो, अपने आसपास का माहौल परखो, लोगों के दुःख सुख उनकी परेशानियों को समझो, प्रबोधन वहां से मिलेगा। तरस आता है उन लोगों की सोच पर जो सोशल मीडिया पर ज्ञान के लिए भटक रहे हैं। असल जीवन में बगल वाला पड़ोसी ही काम आने वाले है ये सोशल मीडिया के मित्र सिर्फ एक छलावा है। सोशल मीडिया पर कुछ पत्रकार भी मिल जाएंगे मोबाइल हईये कैमरा का क्या जरूरत उठाए मुंह चल दिए गांव के किसी सरकारी स्कूल में मैडम पढ़ा रही है बच्चो को इनको कोई फर्क नही पड़ने वाला ये उसी बीच में अपना अर्धज्ञान लेकर कूद पड़ेंगे और पूरे कक्षा माहौल खराब कर देंगे। इन्हे भले पत्रकारिता का "प" भी न पता हो फिर भी स्वतंत्र पत्रकार बनेंगे..! अरे इतना ही नही सरकारी अस्पतालों में भी घुसकर बकैती करने लग जाते है चिल्ला चिल्ला कर मानो वो एमबीबीएस करके बैठे डॉक्टर साहब कुछ जनबे नही करते है..! ये तथाकथित स्वघोषित स्वतंत्र पत्रकार सोशल मीडिया के गंदी नाली के कीड़े और कुछ नही हैं।

सोशल मीडिया पर लोग बहस करते हुए मोबाइल नंबर तो ऐसे मांगते है मानो पांच मिनट में पूरी राजनीति और अर्थव्यवस्था समझा देंगे..! एक से एक विद्वान मिल जाते है क्या ही बोला जाय जब गलत खबरों को पढ़े लिखे लोग ही हवा देने लग जाय तो..!  हद तो तब हो जाती है जब वही सोशल मीडिया का ज्ञान भोले भाले बच्चो के ऊपर थोपी जाती है। खैर बच्चों के हाथ में भी स्मार्ट फोन आ ही गया है तो क्या फर्क पड़ता है आने वाली नस्ले बिगड़े या बने किसी कोई फर्क नही पड़ता है। सब अपने घिसे-एजेंडे को लेकर चल रहे है जो बहुत ही घातक है। सोचने समझने की शक्तियों का प्रयोग बंद हो चुका है लोगो द्वारा अब जो होता है वो गूगल बाबा के माध्यम से होता है। अब किसी के पास जानकारी की कमी नही हैं। किसी भी मुद्दे पर चर्चा हो रही हो लोग घुस जाते है भले उसके बारे में रत्ती भर ना पढ़े हो पर सोशल मीडिया का ज्ञान उन्हे एक्सपर्ट बना ही देता है..! अब जैसे एक लड़का मेरे ख्याल से हाई स्कूल में रहा होगा वो मेरे मित्र के पोस्ट पर कॉमेंट करता है की "भईया जी आपको क्या पता है मुलायम सिंह यादव जी का देन है सेना के जवानों को पेंशन मिल रहा है" अब इसका क्या ही जवाब दिया जाय ? उदहारण के तौर पर भारत- चीन सीमा विवाद को लेकर बस ये पाँच सात नाम याद करने हैं गलवान, पैंगोंग सो, दौलत बेग ओल्दी, हॉटस्प्रिंग्स,श्योक रिवर,फिंगर 4-8, शिरिझप ओर आप भी इधर 'स्ट्रेटेजिक अफेयर एक्सपर्ट' ओर 'लीडिंग डिफेंस एंड सिक्योरिटी एनालिस्ट' बन जाएंगे..! बाकी सोशल मीडिया एक ऐसा रंगमंच बन चुका है जहा सब नंगा नाच कर रहे है और उसी में बुलबुल है। 

Tuesday, September 6, 2022

आराम

आराम= आम ,राम और आरा 
यानी इस शब्द से फल भगवान और एक जिला निकलता है.... गर्मियों में घाम चाहे जितना लगे लोग आम दबाकर चूसते है खाते है बिना रुके थके .... हापुस चौसा लंगड़ा दशहरी, खाईब पूरा दोपहरी...

रही बात आरा जिला की तो एक नवयुवती के "लिपस्टिक" लगाने पर हिलने लगती है ... भोजपुरी के महान कलाकार पवन सिंह के गाएं है "जब लगावे लू लिपिस्टिक हिलेला आरा डिस्ट्रिक" इतना ही नही पूरा जिला हिलेगा तो भूकंप आ जाएगा न लेकिन फिर भी उस नवयुवती को जिला टॉपर बनाया जाता है... आदरणीय नीतिश कुमार जी को "लिपिस्टिक" पर प्रतिबंध लगाना चाहिए था ना की शराब पर....... इस बात को लेकर झूमने और चूमने वाले युवा क्रांतिकारियों में जबरदस्त भिड़ंत देखी गई है.....

एक आते है "राम" भगवान इनको कवनो फर्क ही नही पड़ा काटे कंकड़ पत्थर जंगल झाड़ी नग्न पैर चलते रहे है , जहा जहा गए छाप अपनी छोड़ते रहे ... बिना रुके बिना थके समुद्र से याचना किया , चाहते तो पहले ही तीर निकालकर चीर देते समुद्र को... लेकिन दिव्य शक्तियों का प्रयोग हर वक्त करने से मनुष्य "मरा" सिद्ध होता है, "राम" बनने के लिए पौरुष बल ही बड़ा होता है....सब्र और प्रतीक्षा बांध टूट गया जब "राम" के सामने तो ...प्रश्न उठता है यहां हम क्यों चले "आराम" करने।

ये शब्द "आराम" सुनने में ही अच्छा लगता है अब तो🙂


©शिवम कुमार पाण्डेय

Friday, August 19, 2022

इनकी हैवानियत का कोई अंतिम बिंदु नही है

क्या हो रहा है भारत में? जो हो रहा है वो बिलकुल भी सही नही हो रहा है। सिर तन से जुदा करने वाले कठमुल्लों ने देश में अशांति और अराजकता का माहौल पैदा कर दिया है। हाथ में छुड़ा चाकू लेकर निकल पड़ते है काफिरों का गर्दन उड़ाने के लिए। धमकी या चेतावनी क्या ये खुल्लमखुल्ला घोषणा कर के अपने घृणित कार्य को अंजाम दे रहे है। अभी हाल ही की घटना है कर्नाटक में उर्दू न बोल पाने के चलते की गयी थी हिंदू युवक की हत्या। उदयपुर  में 2 और हिंदू व्यापारियों को मिली जान से मारने की धमकी। बरेली में सातवी कक्षा में पढ़ने वाली हिंदू बालिका का उवैस, नदीम और उनके 2 और साथियों ने किया था बलात्कार । प्रधानमंत्री के आगामी बिहार दौरे में गड़बड़ी फैलाने की तैयारी कर रहा नूरुद्दीन गिरफ्तार हुआ। और नाटक ऐसा बना रखा है कि इनको हिंदुस्तान में रोज प्रताड़ित किया जा रहा हो।

नूपुर शर्मा के बयान को लेकर किस तरह का बवाल हुआ था देश भर में ये तो किसी से छिपा हुआ नही है। जगह- जगह आगजनी और पत्थरबाजी की गई थी जिहादियों द्वारा। इतना ही नही नुपुर शर्मा के समर्थको के ऊपर जानलेवा हमला किया जा रहा है। नूपुर जी को खुद जान से मारने की धमकी दी जा रही है। ऐसे अपशब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है एक स्त्री के लिए मैं उसको यहां लिख नही सकता बाकी आप सब खुद ही समझदार है। भारत की भूमि पर जो बीज जहर का बोया जा रहा है उसको नष्ट करना ही पड़ेगा वरना पनपते ही पूरी हिंदू सभ्यता और संस्कृति का विनाश निश्चित है। 
स्वतंत्रता दिवस से दो दिन पहले यूपी एटीएस ने आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद और अन्य आतंकवादी संगठनों से जुड़े आतंकी मोहम्मद नदीम को शुक्रवार को सहारनपुर से गिरफ्तार किया था। एटीएस के मुताबिक नदीम किसी बड़े फिदायीन हमले की तैयारी कर रहा था। उसे भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा की हत्या का टास्क भी सौंपा गया था। 
इससे पहले आजमगढ़ से आईएसआईएस का आतंकी एटीएस के हत्थे चढ़ा था। यूपी पुलिस के आतंकी निरोधक दस्ते ने आगामी 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आतंकी हमला करने के मकसद से विस्फोट करने की योजना बना रहे एक जिहादी धर दबोचा था।  इसने बहुत खुलासे किए है। कितने बड़े स्तर पर ये योजना बनकर अंजाम देने की कोशिश करते है और लोग सेकुलर बनने के चक्कर में कहते है आतंकियो का कोई धर्म या मजहब नही होता..!

अरे अमेरिका में जो हुआ वो कम है क्या? या किसी से छिपा हुआ है  लेखक सलमान रुश्दी को 12 अगस्त को उस समय चाकू मार दिया गया, जब वह अमेरिका के न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम में बोलने के लिए तैयार थे। वह जीवन और मृत्यु के बीच जूझ रहे हैं।  सलमान रुश्दी  अपने उपन्यास 'मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' (1981) के लिए बुकर पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके हैं। 1983 में उनकी किताब 'शेम' आ आई थी और फिर पांच साल बाद 1988 में आई 'द सैटेनिक वर्सेज़' ने पूरे इस्लामिक जगत में हलचल मचा दी थी । 1989 में उनके उपन्यास, सैटेनिक वर्सेज के प्रकाशन के बाद, जिसे कुछ मुसलमानों ने ईशनिंदा माना, तत्कालीन  ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी ने रुश्दी की हत्या के द लिए एक फतवा जारी किया था। उस दुनिया भर में दंगा भी हुआ था रुश्दी के ऊपर करोड़ो का इनाम तक रखा गया।  अब सोचिए जरा 32-33 साल बाद जब रुश्दी जैसे लोग नही बख्से जा रहे है तो नूपुर शर्मा की जान तो हमेशा के लिए आफत में ही रहेगी। सिर तन से जुदा वाले घृणित मानसिकता वालों को पनपने से पहले खत्म करना होगा। ये जिसे चाहे जो बोल दे इनके बारे में कुछ बोल दो तो इनके भीतर आग आग लग जाती है और वो उस आग में लोगो को लपटने से नही कतराते है। इनके लिए इनका जिहाद ही सबकुछ है ये मानवता वाली बाते कचड़े के ढेर में ये हैवान है जिनकी हैवानियत का कोई अंतिम बिंदु नही है।

(तस्वीर का श्रोत: DNA हिंदी )

Saturday, August 6, 2022

स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी साहित्य का अवदान

"किसी समाज अथवा देश को पहचानने के लिए उस समाज अथवा देश के साहित्य से परिचित होने की परमावश्यकता होती है, क्योंकि समाज के प्राणों की चेतना उस समाज के साहित्य में प्रतिच्छवित हुआ करती है।"

उपरोक्त कथन मां भारती के महान सपूत एवं  युवा क्रांतिकारी भगत सिंह का है। इस कथन की सत्यता का इतिहास साक्षी है। जिस देश में साहित्य तथा साहित्यिक जागृति पैदा ना हो उस देश चाहकर भी उत्थान नही हो सकता है। जब देश गुलामी के घनघोर साये में जी रहा था और चारो तरफ अंधेरा ही अंधेरा था तब हिन्दी साहित्य के राष्ट्रवादी कलमकारों ने अपने कलम से ज्वलंत प्रतिक्रिया दी। देश को अंधेरे के के आवरणों से निकालकर उजाला प्रदान किया। सोए भारत के नींद से उठाने का कार्य किया हिंदी साहित्य ने। 
स्वंत्रता आंदोलन भारतीय इतिहास का वह युग है, जो पीड़ा कड़वाहट, दंभ, आत्मसम्मान , गर्व गौरव और बलिदानियों के रक्त से लाल से हैं। इस युग में हिंदी साहित्यकारों ने ब्रिटिश साम्राज्य जड़ों को हिलाने में कोई कसर नही छोड़ी थी। कलम के ताकत से पूरा जोर लगा दिया। जयशंकर प्रसाद की कलम बोल उठी-
   "हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती,
   स्वयंप्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती।"

प्रेमचंद की रंगभूमि, कर्मभूमि उपन्यास हो या भारतेंदु हरिश्चंद्र का "भारत दर्शन", नाटक सब देश  प्रेम की भावना से भरी पड़ी हैं। कथा। सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने स्वतंत्र संग्राम या आंदोलन में अपनी लेखनी के दम पर अपना अभूतपूर्व योगदान दिया। अपनी भागीदारी निभाने में पीछे नहीं रहे और मृतप्रायः भारतीय जनमानस में उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए एक नई ताकत और उर्जा का संचार किया। प्रेमचंद की कहानियों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक तीव्र विरोध दिखा ही, इसके अलावा दबी-कुचली शोषित व अफसरशाही से के बोझ से दबी जनता के मन में कर्तव्य-बोध का  एक ऐसा बीज अंकुरित हुआ जिसने सबको आंदोलित कर दिया। प्रेमचंद ने जन- जागरण एक ऐसा अलख जगाया की जनता हुंकार उठी। सरफरोशी का जज्बा जगाती प्रेमचंद की बहुत सारी रचनाओं को ब्रिटिश राज के रोष का शिकार होना पड़ा न जाने कितनी रचनाओं पर रोक लगा दी गई और उन्हें जब्त करके जला दिया गया। इन सबकी परवाह न करते हुए वे अनवरत लिखते रहे। इनकी रचना "सोजे वतन" पर अंग्रेज अफसर ने आपत्ति जताई और उन्हें पूछताछ के लिए तलब किया। अंग्रेजी शासन का खुफिया विभाग अंत तक उनके पीछे लगा रहा। प्रेमचंद की कलम ने आग उगलना बंद नही किया बल्कि और प्रखर होकर स्वतंत्रता आंदोलन में विस्फोटक का काम करती रही। उन्होनें लिखा-
"मैं विद्रोही हू  जग में विद्रोह करने आया हूं 
क्रांति-क्रांति का सरल सुनहरा राग सुनाने आया हूं।"

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने जिस युग का प्रारंभ किया उसकी जड़े स्वतंत्रता संग्राम में ही थी। भारतेंदु और भारतेंदु मंडल के साहित्यकारो ने चेतना को गद्य और पद्य दोनो में अभिव्यक्ति दी। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने स्वतंत्र आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेजो द्वारा निरीह भारतीय जनता जुल्मोसितम व लूट- खसोट का उन्होंने ने बढ़- चढ़कर विरोध किया। उन्हे इस बात का क्षोभ  कि अंग्रेज यहां से सारी संपत्ति लूटकर विदेश ले जा रहे थे। इस लूटपाट और भारत की बदहाली पर उन्होंने काफी कुछ लिखा। "अंधेर नगरी चौपट राजा" नामक व्यंग्य के माध्यम से भारतेंदु ने तत्कालीन राजाओं की निरंकुशता, अंधेरगर्दी और मूढ़ता का सटीक वर्णन किया है। अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए उन्होंने ने लिखा है-
" भीतर - भीतर सब रस चुसै,
  हंसी - हंसी के तन मन धन मुसै।
जाहिर बातिन में अति तेज,
क्यों सखि साजन , न सखि अंग्रेज।"

द्विवेदी युग के साहित्यकारो ने भी स्वाधीनता संग्राम में अपनी लेखनी द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिली शरण गुप्त, श्रीधर पाठक, माखनलाल चतुर्वेदी भारतीय स्वाधीनता हेतु अपनी तलवार रूपी कलम को पैना किया। इन कवियों ने आम जनता में राष्ट्र प्रेम की भावना जगाने तथा उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनने हेतु प्रेरित किया। मैथिली शरण गुप्त ने भारतवासियों को स्वर्णिम अतीत की याद दिलाते हुए कहा -

" हम क्या थे, क्या हैं, क्या होंगे अभी
आओ विचारे मिलकर ये समस्याएं सभी।"

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने  "भरत भारती" में लिखा -
 "जिसको न निज गौरव तथा
 न निज देश का अभिमान है।
  वह नर नही, नर पशु निरा है 
और मृतक समान है।।"

सुभद्रा कुमारी चौहान की "झांसी की रानी" कविता ने अंग्रेजो को ललकारने का काम किया -

"चमक उठी सन् सत्तावन में 
वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह 
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
 झाँसीवाली रानी थी ।।"

सुमित्रानंदन पंत  ने ज्योति भूमि , जय भारत देश तो बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' ने विपल्व गान लिखा। इन सबके अलावा बंकिम चन्द्र चटर्जी का देशप्रेम से ओत-प्रोत गीत "वंदेमातरम्" ने लोगो के रगों में उबाल ला दिया। अब किसी कीमत पर देश के लोगो को पराधीनता स्वीकार नही थी।

वंदेमातरम् !
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यशामलां मातरम् ।
 वंदेमातरम् !

देशभक्ति से ओत - प्रोत माखनलाल चतुर्वेदी की रचना पुष्प की अभिलाषा ने मातृभूमि पर बलिदान वीर सपूतों के प्रति अगाध श्रद्धा दिखाई है और बलिदानों को सर्वोपरि बताया है।
एक फूल के माध्यम से उन्होंने अपनी बातों को जिस सशकत्ता व उत्कृष्टता के था कहा है  वह बेहद सराहनीय है।

चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक!
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जावें वीर अनेक!

कविवर रामधारी सिंह दिनकर भी कहां खामोश रहने वाले थे। मातृभूमि के लिए हंसते-हंसते प्राणोत्सर्ग करने वाले बहादुर वीरों व रणबांकुरो की शान में उन्होंने कहा-

कलम, आज उनकी जय बोल
जला अस्थियाँ बारी-बारी
छिटकाई जिनने चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर 
लिए बिना गर्दन का मोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।

इसी तरह स्वतंत्रता संग्राम  में अपनी रचनाओं के माध्यम से भूमिका निभाने वाले साहित्यकारो की लंबी फेहरिस्त है। इससे यह पता चलता है कि स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी साहित्य का कितना महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।

Thursday, July 28, 2022

तन मन से अखण्ड भारत

मेरी कलम है घायल 
जैसे वैश्या के पैरों में पायल
घुटन महसूस होती है
तड़प तड़प कर कट रहा जीवन
शांति की बात और शीतल पवन
बहुते शर्म आती है
भारत माता टुकड़े टुकड़ों में बट जाती है
अरे वाह देखो कैसे आजादी की मिठाई बाटी जाती है..
हर्षों उल्लास मनाया जाता है मां के टुकड़े करकर 
क्या ये वही भारत है जिसके कण कण में शंकर ...
क्या मिला आजाद को गोली खाकर ?
 भगत सिंह के सपनो का भारत 
बन गया फांसी चढ़कर ?

लाल किले से आई आवाज
 सहगल ढिल्लो शाहनवाज, 
तीनों की उम्र हो दराज ।
 'लाल किले को तोड़ दो, 
आजाद हिन्द फौज को छोड़ दो।'

नेताजी कहा गए ? 
उनको देता रहता हू आवाज 
गुमनामी में जीवन बिता 
क्यों कहते हो की उनको खा
गया हवाई जहाज...
आजाद हिंद फौज ने दिया बलिदान 
फिर भी हो गया "चरखा" महान
वाह! रे.. हिंदुस्तान...

इनके बलिदानों की तुलना चरखो से की जाती है
हो भी क्यों ना जब जवानी कापुरुषता के क्रोड़ में सो जाती है...

काला पानी का काल कूट पीकर 
वीर सावरकर का चेहरा और निखर जाता है
दुख तब होता है जब गलफत के नींद में पड़ा बेखबर 
कोई युवा "कायर" कह जाता है...
भारत माता के टुकड़े कर
 अपनी अपनी सरकार बनाई जाती है
एक जिहाद फैलाता है
एक शांति का श्वेत कबूतर उड़ाता है

खंडित भारत की तस्वीर 
मेरे मन को नहीं भाता है
 तन में आग लग जाता है
फिर अटल जी के शब्दो को 
मुख बार बार दोहराता है_

"दूर नहीं खण्डित भारत को, पुन: अखण्ड बनायेंगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक, आजादी पर्व मनायेंगे।

उस स्वर्ण दिवस के लिए, आज से कमर कसें, बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएं, जो खोया उसका ध्यान करें॥"

~शिवम कुमार पाण्डेय

Saturday, July 16, 2022

लोग पूछते है तुम इसे मां क्यों कहते हो?


नदी वो है जिसने सभ्यता को जन्म दिया 

और लोग पूछते है तुमइसे मां क्यों कहते हो? 

असंख्य अनगिनत लोगो की प्यास बुझाई, 

क्या मनुष्य? क्या जीव जंतु? 

सबने इसमें आस्था की डुबकी लगाई।

जिसके गहराइयों में गोते लगाते

ना जाने कितने तरूणाई

लेते हुए अंगड़ाई

जिसके जल से फसल लहराई

ना जाने कितने नस्लों ने भूख मिटाई

नदी वो हैं जिसने जीवन दिया और 

लोग पूछते है तुम इसे मां क्यों कहते हो?

Thursday, July 7, 2022

"दो धर्मों की संक्षिप्त व्याख्या"

इस देश में धर्म केवल एक ही है, भावनाएँ भी केवल एक ही धर्म की आहत होती हैं, अपमान केवल एक ही धर्म का होता है, बात भी उसी धर्म की होती है, वोट भी वही धर्म देता है, बुद्धिजीवी वर्ग, राजनीतिक लोग, मिडिया, न्यायालय भी उसी धर्म के अपमान को अपमान मानता है, इस धर्म का अपमान होने पर गला काटना, जुबान कटना जायज ठहरा दिया जाता है, और तो और जब इस धर्म की बात होती है तो देश में बेरोजगारी, महंगाई, अर्थव्यवस्था, विकास, शिक्षा सब कुछ ठीक रहता है और वो धर्म है "इस्लाम"

इसके उलट इस देश में एक और धर्म है जिसकी भावनाएं आहत नहीं होती, उस धर्म का अपमान करने पर आप "प्रगतिशील व्यक्तित्व" के धनी माने जाते हैं, इस धर्म का अपमान करना "अभिव्यक्ति की आजादी" माना जाता है, बुद्धिजीवी वर्ग, राजनीतिक लोग, मिडिया, न्यायालय भी इस धर्म के अपमान को अपमान नहीं मानता है, इस धर्म के आराध्यों को काल्पनिक कह दिया जाता है, इस धर्म के अपमान पर गला या जुबान नहीं काटा जाता है, इस धर्म के बारे में वो भी ज्ञान दे सकता है जिसने कभी इस धर्म में विश्वास भी नहीं किया हो, इस धर्म के बारे में बात करने पर देश में महंगाई, बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था सब बढ़ने और गिरने लग जाते हैं और यह धर्म है "हिंदू"

वैसे भी हिंदू धर्म का अपमान होना ही चाहिए, इस धर्म के लोग अपने भगवान के नाम पर ही शराब से लेकर बहुत सारी नशा कर जाते हैं तो इस देश में "मां काली के अपमान" से भावनाएं आहत हो भी जाएं तो क्या?

पहले आप बंद कीजिए भगवान के नाम पर नशा करना फिर आपकी भावनाएँ आहत करने का प्रयास कोई नहीं कर पाएगा और हो सके तो अपने संस्कृति, धर्म को थोड़ा जानिए, समझिए और बचाइए वरना आप भी "तलवारों की नोक पर सलवारें" पहनना शुरू कर देंगे.....

सबको जागईए...

लेखक:- कृष्णकांत उपाध्याय 

Tuesday, June 21, 2022

इनकी बाते भी हवा हवाई रह गई है...!


वो बड़ा क्रांतिकारी बन रहा था। जब तक विश्वविद्यालय में था तब तक त्याग और संघर्ष की बाते करता था। गरीबों और पिछड़ों की बात रखता था। कहता था मैं अपने विचारो से समझौता नहीं करूंगा। खैर , बोलने को तो व्यक्ति अपनी प्रेमिका से यह भी बोल देता है कि मैं तुम्हारे लिए चांद सितारे तोड़ लाऊंगा। चले थे संघ के विचारधारा को खत्म करने इनकी खुद की ही पहचान मिट गई। आजकल खुद को युवा नेता कहने वालो की कमी नही है हर गांव गली मोहल्ले में मिल जायेंगे। अंदर से खोखले हो चुके इन तथाकथित युवा नेताओ का कोई अस्तित्व नहीं रह गया है। वो जमाना गया जब संघर्ष होता था आजकल तो हड़बड़ी मची हुई है सबसे आगे निकलने की भले उसके लिए थूककर चाटना पड़े। स्तर इतना नीचे गिर गया है की कुछ संभव हैं आज की राजनीति में। अभी हाल में ही एक युवा नेता जो प्रधानमंत्री के विचारो का रत्ती भर भी समर्थन नही करता था आज भाजपा में शामिल होकर प्रधामंत्री का छोटा सिपाही बना फिर रहा है। वही बात है न आजकल के युवा करते है प्रेम में वादा और वादा का उलटा होता है दावा ... बड़े बड़े दावों का पोल खुल जाता है जब निभाने की बात आती है तो। बाकी युवा का उलटा भी तो वायु होता है वायु का मतलब हवा अर्थात इनकी बाते भी अब हवा हवाई रह गई है।

जिस वाशिंग मशीन का विरोध होता आ रहा था आज उसी वाशिंग मशीन में दाग धुलकर चमकती सफेदी लाई जा रही है।
सांप, बिच्छू, नेवला लोमड़ी आदि सब के सब शेर के साथ मिलकर सत्ता में बने रहना चाहते है बाकी शेर फितरत थोड़ी न बदलेगा भले खाने को कुछ ना मिले भूखा रह लेगा पर घास- फूस नही खाएगा। विश्वविद्यालय हो या कोई महविद्यालय का परिसर छात्र नेता सब जमीन पर लोटकर वोट मांगते है, पार्टी देते है खिलाने पिलाने का कार्यक्रम चलता हैं जब तक वोटिंग ना हो जाय। जीतने के बाद यही छात्र नेता अपने साथी छात्रों के साथ खलीफई बतियाने लग जाते हैं।  ये तथाकथित युवा छात्र नेता किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े रहते हैं पर बोलते हुए दिखेंगे की हम स्वतंत्र आवाज़ है।  झुक जाते है ये इनके भीतर आत्मसम्मान और प्रतिष्ठा जैसी कोई बात ही नही रह गई है। जमीन पर रेंगते हुए सर्प से हीन कौन हो सकता है? पर मजाल किसी की उसके ऊपर लात रख दे और रखने का मतलब मृत्यु को दावत देना। कहने का तात्पर्य यह है कि अपना आत्मसम्मान मत बेचो और इस सर्प से कुछ सीखो। 

Friday, May 27, 2022

वजूद

तुम्हारा वजूद क्या है ?
 जब भी आईने में शक्ल देखता हूं 
तो यह प्रश्न उठता है!
बिना मेहनत संघर्ष के कुछ नही मिलता है!
 तुम्हारा वजूद क्या है?
जब भी मैं अपनी आत्मा से बात करता हु तो प्रश्न उठता है! 
ईमानदारी और सच्चाई का दामन कभी मत छोड़ना
बिकने को तो हर दिन दो पैसे में भड़वा बिकता है!
तुम्हारा वजूद क्या है ?
स्नान करता हु सर पर जब ठंडा पानी गिरता है, 
यह प्रश्न उठता है!
सूरज के उगने से पहले जागो,
 तलवे चाटने के बाद तो 
कुत्ता भी दिनभर सोता है।

Saturday, May 14, 2022

साक्ष्यों के बल पर हिन्दू अपना हक ले रहा है

लोग रामायण, महाभारत, गीता जैसे धर्मग्रंथों से ही सीखते हैं और आज के लोग उसको फालो भी कर रहे हैं... 

महाभारत में जब पांडव का बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास खत्म हुआ तो उन्होंने अपना राज्य इंद्रप्रस्थ को कौरवों से मांगा, और इसके लिए पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण को अपना दूत बना कर भेजा, भगवान श्रीकृष्ण युद्ध नहीं चाहते थे और पांडव भी युद्ध नहीं चाहते थे। 
भगवान श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र की भरी सभा में शांति का प्रस्ताव रखते हैं और पांडवों का इंद्रप्रस्थ मांगते हैं लेकिन दुर्योधन कहता है कि वह इंद्रप्रस्थ नहीं देगा और पूरी हस्तिनापुर की धृतराष्ट्र सभा मौन रहते हैं। इस पर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ठीक है दुर्योधन पांडवों को केवल पांच गांव ( अविस्थल, वकरास्थल, मकांडि, वरणाव्रत और एक कोई भी गांव) लेकिन दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण के इस शांति प्रस्ताव को ठुकराते हुए बोलता है कि “मैं पांडवों को एक सई की नोक के बराबर भी भूमि नहीं दूंगा”। दुर्योधन के इस जवाब पर भगवान श्रीकृष्ण उठकर जाते हैं तब दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का आदेश देता है फिर भगवान अपना विराट रूप दिखाते हैं।

फिर महाभारत का युद्ध होता है और पांडव इंद्रप्रस्थ के साथ साथ पूरा हस्तिनापुर हासिल करते हैं। धर्म ग्रंथ में उलेखित इस पंक्तियों का सार इतना ही है कि युद्ध कोई नहीं चाहता है सभी शांति चाहते हैं। 

अब इस दौर में अयोध्या आंदोलन के नायक रहे स्वर्गीय डॉक्टर अशोक सिंघल जी भी महाभारत का मर्म जानते थे इसीलिए उन्होंने उस समय मुस्लिम समाज से अपिल की थी आप हिंदूओं को उनका केवल तीन स्थल “अयोध्या, मथुरा, काशी” दे दीजिए, हिंदू तीन लाख मंदिरों को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों पर अपना दावा कभी नहीं करेगा लेकिन मुस्लिम समाज और उनके तथाकथित बुद्धिजीवी सेकुलर गिरोह ने वही काम किया जो धृतराष्ट्र की सभा में दुर्योधन ने किया कि “हम सुई के नोक के बराबर भी भूमि नहीं देंगे” 

मुस्लिम समाज और उनके पैरोकार सेकुलर हिंदू भी वही काम किया और दावा नहीं छोड़ा, उन्होंने दावा अयोध्या पर भी नहीं छोड़ा, वो दावा काशी और मथुरा पर भी नहीं छोडऩे को तैयार हैं जबकि काशी में तो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है कि वो मंदिर ही है। नंदी की मूर्ति, ज्ञानवापी कुआं से लेकर के श्रृंगार गौरी माता की मंदिर तक सारे साक्ष्य उपलब्ध हैं। फिर भी मुस्लिम समाज दावा नहीं छोड़ रहा है। 

जो शांति चाहता है वह रास्ता ढूंढने का काम करता है लेकिन मुस्लिम समाज हठधर्मिता नहीं छोड़ रहा है। यही कारण है कि हिंदू समाज को सुप्रीम कोर्ट से 400 साल बाद अपने आराध्य के लिए हक लेकर आना पड़ा है। यही सब कार्य पिछले कई सालों से हिंदू समाज को अंदर ही अंदर संगठित करने का काम कर रहा था और आज हिंदू समाज संगठित हो चुका है कुछ सेकुलर हिंदुओं को छोड़कर करके। 
          जो महाभारत में भी थे जो जानते थे कि पांडव सच के साथ हैं, धर्म के मार्ग पर हैं फिर भी उन्होंने अधर्म का साथ दिया। जिनमें भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, महारथी कर्ण और नारायणी सेना।

जो काम भगवान श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र की सभा में किया था आज वही काम हिंदू समाज कर रहा है अपना विराट रुप दिखा रहा है उसी का नतीजा है काशी के बाबा विश्वनाथ धाम में जो कोर्ट का फैसला आया है। 

 मुस्लिम समाज ने बाबा धाम के सर्वे को रोक दिया था इसीलिए कोर्ट ने कहा अब सर्वे केवल श्रृंगार गौरी मंदिर का ही नहीं बल्कि पूरे मस्जिद का भी होगा। 
         चार दिन के अंदर रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल होगा। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि पीएसी लगाकर सर्वे कराया जाए और अगर कोई सर्वे में बाधा उत्पन्न करता है तो उस पर एफआईआर दर्ज किया जाए और उसको जेल भेजा जाए। सर्वे अंदर बैरिकेडिंग हटाकर होगा। सर्वे के दौरान अगर कहीं ताला बंद है तो उसे तोड़कर सर्वे पूरा किया जाएगा। 

तो आज हिंदू समाज जागृत हो चुका है इसीलिए वह अब केवल इंद्रप्रस्थ या पांच गांव लेकर संतुष्ट नहीं होगा उसे अब पूरा हस्तिनापुर भी चाहिए और यही कारण है कि मथुरा, काशी दोनों स्थलों का केस कोर्ट में है और कुतुबमीनार से लेकर कश्मीर के मार्तंड मंदिर तक सब पर हिंदू समाज ने अपना दावा किया है। हिंदू समाज की जागृति ही है जो आपको कोर्ट लेकर जा रही है क्योंकि वहाँ युद्ध से नहीं बल्कि साक्ष्यों के बल पर हिंदू अपना हक ले रहा है। 

हिंदू जागृति का ही फल है कि आज के दौर में सेकुलर राजनीतिक दल प्रत्यक्ष रूप से हिंदू समाज के खिलाफ और मुसलमानों का खलीफा बनने की कोशिश भी नहीं कर रहा है और जिसने किया भी है उसका हश्र पिछले कई सालों से क्या है रहा है वो भी किसी से छुपा नहीं है। 

इसलिए मुस्लिम समाज और तथाकथित सेकुलर गिरोह भविष्य में इस तरह के और स्थलों के लिए तैयार रहे क्योंकि देश में तीन लाख से अधिक मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है ( सुब्रमण्यम स्वामी और स्वर्गीय डाँ अशोक सिंघल जी के अनुसार)। दो मंदिर तो बनारस में ही हैं जिनको तोड़कर मस्जिद बनाया गया है। 

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन।
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय।।

बोल डमरू वाले की जय....

 लेखक: कृष्णकांत उपाध्याय

Saturday, April 23, 2022

सिस्टम को समझने के ताजा तारीन तथ्य

लेखक: कृष्णकांत उपाध्याय

भाजपा सरकार बनाती हैं, कांग्रेस और लेफ्ट सिस्टम बनाते हैं जो उनके सत्ता में ना रहने पर भी अपना काम बखूबी कर सके और आज वही सिस्टम अपना काम कर रहा है, 
यह सिस्टम ही है जो रामनवमी और हनुमान जयंती के शोभायात्रा पर पथराव के बाद मौन हो जाता है और जैसे ही इन उपद्रवियों पर कार्यवाही होती है तो कोर्ट स्वतः संज्ञान लेते हुए रोक लगा देता है। यह सिस्टम ही है जो हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार के समय कोर्ट स्वतः संज्ञान नहीं लेता है। 
यह सिस्टम ही है जो करौली, खरगौन, जहांगीरपुरी में हिंदुओं पर हमला होने के बाद दौरा करने नहीं जाता है लेकिन जैसे ही दंगाइयों पर कार्यवाही होती है तो पंहुचना शुरू हो जाता है। ( औवैसी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, लेफ्ट आज दौरा करने जा रहे हैं जहांगीरपुरी)इनमें से कोई भी करौली, खरगौन, लोहरदगा का दौरा नहीं किया। 
 
यह सिस्टम ही है जो हिंदुओं पर अत्याचार को मिडिया में बहस का हिस्सा नहीं बनने देता है बल्कि बहस इस पर शुरू कर देता है कि “बुलडोजर चलाना वैध या अवैध”। 
यह सिस्टम ही है जो हिंदूओं पर हुए पथराव पर सामने नहीं आता है तब सामने आता है जब पता चलता है कि शोभायात्रा की अनुमति ही नहीं ली गई है। यह सिस्टम ही है जो दिल्ली को बेवजह बंधक बनाए रखता है और कोर्ट मौन रहता है। 
यह सिस्टम ही है जो राणा अयूब जैसी पत्तलकारिता करनेवाली को देश के बाहर जाकर देश के खिलाफ बोलने के लिए आदेश दे देता है यह कहकर कि 10-12 करोड़ की चोरी कोई बड़ी चोरी नहीं होती है।

यह सिस्टम ही है जो हिंदुओं के पलायन पर मौन रहती है।
यह सिस्टम ही है जो कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर विधानसभा में ठहाके लगाकर मजाक उड़ाता है।
यह सिस्टम ही है जो मिडिया को दंगाइयों के साथियों का बयान चैनलों पर दिखाती है लेकिन दंगाइयों के जुल्म के शिकार हुए लोगों को चैनलों पर नहीं दिखाते हैं।
यह सिस्टम ही है जो हिंदुओं की गंगा और यमुना दोनों हैं जो पूज्यनीय हैं उन्हीं को सेक्लुरिजम के नाम पर गंगा-जमुनी तहजीब सिखाती है। यह सिस्टम ही है जो बहुत चालाकी से जयकारों(भारत माता की जय, जय श्री राम, वंदेमातरम) को नारों में तब्दील कर देती है। 

यह सिस्टम ही है जो यह बताती है कि यूपी में ब्राह्मण नाराज है लेकिन यह नहीं बताती कि मुस्लिम सपा को एकतरफा वोट कर रहे हैं जिससे हिंदुओं का वोट एकजुट हो जाए। 
यह सिस्टम ही है जो अयोग्यताओं से परिपूर्ण व्यक्तियों को पद देकर सिस्टम का हिस्सा बनाता है और अंत में यही सिस्टम हिंदू समझ नहीं पाते हैं और हिंदू का विरोध करते हैं, साथ नहीं देते हैं, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित या सहयोग करना तो दूर उनकी टांग खिंचकर गिराते हैं, जातियों में बंटकर लड़ते हैं और कटते है।

 कल राजस्थान की कांग्रेस सरकार के कुकृत्य ने यह साबित भी कर दिया कि सिस्टम के संदर्भ में मेरा विचार सही है, कल राजस्थान के अलवर जिले में एक 300 साल पुराना शिव मंदिर तोड़ दिया गया बल्कि मंदिर तोड़ा ही नहीं गया है पहले भगवान शिव के शिवलिंग को ड्रिल मशीन से उखाड़ा गया, अन्य मूर्तियों को तोड़कर कचरे में फेका गया फिर मंदिर को तोड़ा गया। 
अलवर में शिव मंदिर तोड़ा गया - फोटो : Social Media

अब इसी घटना को देखिए और अपने विचारों के तराजू में तौलिए जहांगीरपुरी में अवैध कब्जों पर बुलडोजर चला तो सिस्टम का एक एक सैनिक अपने अपने काम पर लग गया क्योंकि वहां मामला मुसरिम का था लेकिन राजस्थान के अलवर में जो कांग्रेस सरकार ने किया उस पर सिस्टम का एक एक सैनिक शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह डालकर बैठ गया क्योंकि यहां बात हिंदुओं की थी। यह वही सिस्टम है जो मस्जिद की अवैध दीवार पर कोर्ट तक चला जाता है और शिव मंदिर को तोडऩे पर खामोश हो जाता है। यह वही सिस्टम है जो जहांगीरपुरी में अवैध कब्जे पर चले बुलडोजर पर स्वतः संज्ञान लेता है लेकिन अलवर के शिव मंदिर पर मौन है। 

यह वही सिस्टम है जो मिडिया में जहांगीरपुरी का “बुलडोजर वैध या अवैध” पर बहस कराना शुरू कर देता है लेकिन 300 साल के धरोहर के रूप में खड़े शिव मंदिर को तोड़ने पर कोई बहस नहीं होती। यह वही सिस्टम है जो जहांगीरपुरी में दौरा पर दौरा ( ओवैसी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधि मंडल) करता है, लेकिन अलवर का 300 साल पुराना शिव मंदिर तोडें जाने पर कोई नहीं जाता।
यह वही सिस्टम है जो जहांगीरपुरी पर फेसबुक, ट्विटर, मिडिया में आकर “अल्पसंख्यकों पर अत्याचार”, “संविधान खतरे में”, “लोकतंत्र की हत्या” बताता है लेकिन 300 साल धरोहर रूपी शिव मंदिर पर सिस्टम अंधा, बहरा, लूला, लंगडा, गूंगा तक हो जाता है। 
इस सिस्टम से निपटने के लिए हर किसी को आदत डाल लेनी चाहिए। क्योंकि जब तक आप केवल सरकार बनाएंगे तब तक आप कोई भी वैचारिक लड़ाई नहीं जीत पाएंगे लेकिन जिस दिन आप सिस्टम बनाना शुरू कर देंगे उस दिन आप बड़े से बड़ा वैचारिक युद्ध जीत जाएंगे। 
वैसे भी इस सिस्टम के रहते हुए अब इस देश में किसी गजनी, खिलजी, बाबर, औरंगजेब की जरूरत नहीं है जो अयोध्या में राम मंदिर की जगह बाबरी, काशी में विश्वनाथ मंदिर की जगह ज्ञानवापी, मथुरा में जन्मस्थान से लगाकर मस्जिद खड़ी कर दे, उसके लिए इस देश का सेक्लुरिजम से ग्रसित हिंदू ही काफी हैं....!




Saturday, February 26, 2022

सत्ता के खातिर ना जाने कहा तक गिरेंगे

आज ही के दिन 2019 में "एयर स्ट्राइक" करके भारतीय वायुसेना ने पुलवामा हमले में वीरगति को प्राप्त हुए सीआरपीएफ के जवानों का बदला लिया था। 14 फरवरी को 2019 को पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने दक्षिण कश्मीर में पुलवामा के पास जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर सीआरपीएफ के काफिले को निशाना बनाया था, जिसमें 40 सीपीआरएफ के जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे । यह एक आत्मघाती हमला था। इसके कुछ दिनों के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनवा प्रांत के बालाकोट में एक शिविर पर हवाई हमला किया था और पाक स्थित आतंकी कैंपों का खात्मा कर दिया था। यह समय था सेना के पीछे एकजुट होने का तो विपक्षी पार्टी के नेता लोग घटिया बयान देकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे थे। 

जरा उस समय के कुछ बयानों पर गौर फरमाएं-

ममता बनर्जी -
मोदी बाबू, हमलेे के समय आप कहां थे?, आपको पहले से पता था कि यह घटना होगी। आपके पास पहले से जानकारी थी। केंद्र सरकार केेेेेेे पास इस संबंध में खुफिया जानकारी थी। फिर जवानों को उस दिन हवाई मार्ग से क्यों नहीं जानेे दिया गया? काफिले के मार्ग की नाका जांंच क्यों नहीं की गई ? जवानों को मरने केेे लिए क्यों छोड़ दिया गया ?  इसलिए कि आप चुनावों से पहलेे मामले का राजनीतिकरण करनाा चाहते थे। हमारेेे जवानों के खून का इस तरह राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। मोदी शांति के संदेशवाहक होने का नाटक करते हैं। वही उनकी पार्टी गुप्त रूप से देश में युद्ध समान परिस्थितियां पैदा करना चाहती है और दंगा करना शुरू देती है।

अरविंद केजरीवाल- देश शहीदों के गम में रो रहा था, देश गुस्से में था अपमानित महसूस कर रहा था। मंगलवार को देश ने सख्त संदेश पाकिस्तान को दिया, पर दोबारा देश की आत्मा रो पड़ी। जब देश और जवान नहीं बचेगा तो बूथ कहां से बचेगा। आखिर, चुनाव जीतने के लिए पीएम मोदी को कितनी लाशें चाहिए।

पी. चिदंबरम- भारतीय वायुसेना के वाइस एयर मार्शल ने हताहतों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया कि कोई नागरिक या सैनिक हताहत नहीं हुआ। तो, हताहतों की संख्या 300-350 किसने बताई? एक नागरिक के तौर मैं अपनी सरकार पर भरोसा करने के लिए तैयार हूं लेकिन अगर हम चाहते हैं कि दुनिया को भरोसा हो तो सरकार को विपक्ष को कोसने की बजाय इसके के लिए प्रयास करना चाहिए।

दिग्विजय सिंह- हमें हमारी सेना पर और उनकी बहादुरी पर गर्व है व संपूर्ण विश्वास हैं। किंतु पुलवामा दुर्घटना के बाद हमारी वायुसेना द्वारा की गई एयर स्ट्राइक के बाद कुछ विदेशी मीडिया में संदेह पैदा किया जा रहा है, जिससे हमारी सरकार की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिह्न लग रहा है।

कपिल सिब्बल-  मोदी जी! क्या इंटरनेशनल मीडिया... न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, डेली टेलीग्राफ, द गार्जियन, रॉयटर्स ने बालाकोट में आतंकियों को किसी  तरह का नुकसान न होने का सुबूत दिया है? आप,आतंक का राजनीतीकरण करने के लिए दोषी हैं? 

बसपा सुप्रीमो मायावती- भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दावा करते हैं कि एयर फोर्स की स्ट्राइक में 250 आतंकवादी मारे गए हैं लेकिन उनके गुरु जो हमेशा हर बात पर क्रेडिट लेते हैं, इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं।

नवजोत सिंह सिद्धू- वहां आतंकियों को मारने गए थे या पेड़ उखाड़ने। क्या  मुट्ठी भर लोगो के लिए एक पूरे देश को या किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराया जा सकता है। आतंकवाद का कोई देश नहीं होता , ना आतंकियों का कोई मजहब।

बीके हरिप्रसाद- पुलवामा हमले के बाद के घटनाक्रम पर यदि आप नजर डालेंगे  तो पता चलता है कि यह पीएम मोदी और पाकिस्तान के प्रधामंत्री इमरान खान के बीच मैच फिक्सिंग थी।

सपा नेता राम गोपाल यादव ने दावा किया था कि पुलवामा आतंकवादी हमला वोट हासिल करने के लिए रचा गया ‘‘षड्यंत्र'' था।

सेना के एक पूर्व अधिकारी का कहना है जब बिना जांचे-परखे न्यूज फैलाई जाती है तो उसका फायदा चीन और पाकिस्तान और उन तत्वों को होता है, जो हमारे देश को बर्बाद करना चाहते हैं।पिछले 3 साल में कई राजनीतिक दल एयर स्ट्राइक के सबूत मांग चुके हैं।

इसी तरह 2016 में जब उड़ी हमले के बाद भारतीय थल सेना ने 28 -29 सितंबर 2016 को पीओके में दाखिल होकर पाकिस्तान के कई आतंकी अड्डों को ध्वस्त किया। सेना की इस कार्रवाई में भी बड़ी संख्या में आतंकवादी मारे गए थे। बाद पाकिस्तान ने माना कि पीओके में भारतीय सेना दाखिल हुई और ऑपरेशन किए । लेकिन राहुल गांधी सहित विपक्ष के कई नेताओं ने सेना के पराक्रम पर सवाल उठाते हुए हमले के सबूत मांगे थे। सेना ने वीडियो जारी कर इन लोगो के मुंह पर झन्नाटेदार तमाचा भी मारा है।