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Thursday, December 23, 2021

हाथी जितना सुस्त होगा कमल उतना ही खिलेगा।

लेखक: कृष्णकांत उपाध्याय

मैं खुद को चुनाव विशलेषक नहीं मानता, लेकिन अभी कुछ दिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर अवध और पूर्वांचल के क्षेत्रों में जाना हुआ, तो मालूम पड़ा की भाजपा वापसी कर रही है लेकिन जैसी वापसी भाजपा के लोग बता रहे हैं। भाजपा वैसी वापसी नहीं कर रही है जैसी 2017 में प्रचंड बहुमत थी, वापसी 230+ सीटों के साथ कर रही है क्योंकि तथाकथित किसान आंदोलन का खामियाजा उठाना पड़ेगा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में बाकी पूर्वांचल, अवध और बुंदेलखंड में भाजपा मजबूत नजर आ रही है और यहां जौनपुर और आजमगढ़ को छोड़ दें तो भाजपा हर जगह से एकतरफा निकल रही है।

भाजपा के वापसी का कारण एक नहीं अनेक प्रमुख कारण हैं जैसे-  
               
गावों में 18 घंटे बिजली का रहना, गावों तक सड़कों का जाल बिछना (कुछ क्षेत्रों को छोड़कर), कोरोना काल से ही मुफ्त राशन, लाकडाउन के समय महिलाओं के जनधन अकाउंट में तीन माह तक ₹500 तक देना, किसानों के अकाउंट में सलाना ₹6000 का वितरण, अयोध्या दिपोत्सव, अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि का निर्माण, काशी में बाबा काशी विश्वनाथ जी का कारीडोर, मुफ्त कोरोना वैक्सीन, इत्यादि। ये सारी चीजें भाजपा को जमीनी स्तर तक पहुंचने में मदद की हैं। 

योगी आदित्यनाथ की छवि

सबसे अधिक अगर भाजपा को जमीन से जोडने का काम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बुलडोज़र चलाने वाली छवि ने कार्य किया है। 
इस सब से प्रदेश के लोगों को लगा की उत्तर प्रदेश में कोई पहला मुख्यमंत्री है जो बाहुबलियों को घुटने टेकने पर मजबूर किया है। शहर में किसी को लगे या ना लगे लेकिन गावों में लोग इससे प्रभावित हुए हैं।

विपक्ष के बयान वीरों के घातक बयान- 

भाजपा को मजबूती देने का कुछ काम तो विपक्ष में बैठे बयान वीरों ने ही किया है जैसे - अखिलेश यादव का कोरोना वैक्सीन पर दिया गया ज्ञान, अखिलेश यादव का जिन्ना के प्रति दिया गया ज्ञान भी इस कड़ी में भाजपा को आगे कर रहा है और अभी हाल ही में कई सपा नेताओं द्वारा लडकियों के शादी की उम्र को लेकर दिया गया बयान भी भाजपा को मजबूती देने का काम किया है।

इस बयान वीरों की श्रृंखला में केवल समाजवादी पार्टी के बयान वीर नहीं है बल्कि इस देश के सबसे बड़े बयान वीर माननीय श्री राहुल गांधी जी भी आगे ही हैं। उनका हिंदू और हिंदुत्व पर हर तीसरे दिन दिया जाने वाला बयान प्रियंका वाड्रा के मंदिर दर्शन और तिलक को तिरस्कृत कर रहा है। एक तरफ प्रियंका वाड्रा मंदिर में जाकर कांग्रेस को प्रदेश में तीसरे नंबर की पार्टी बनाने की कोशिश कर रही हैं तो राहुल गांधी अपने हिंदू-हिंदुत्व ज्ञान से कांग्रेस को और नीचे धकेल रहे हैं।

औवैसी फैक्टर - 

वैसे तो असुद्दीन औवैसी को विपक्ष की पार्टियां भाजपा की B टीम कहती हैं और उनका ये कहना गलत नहीं है क्योंकि औवेसी जहाँ भी चुनाव लड़ते हैं वहां मुस्लिम मतों में बिखराव कर भाजपा को मदद ही करते हैं। उदाहरण के तौर पर सबसे पहले महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया फिर उसके पश्चात बिहार में आरजेडी और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया। अब जहां मुस्लिम मतों का बिखराव होगा वहां विपक्षी पार्टियों को नुकसान तो होगा ही और यही नुकसान भाजपा को फायदा पहुंचाता है। 

बसपा का जमीनी स्तर पर कमजोर होना - 

भाजपा के जीत का आखिरी कारण और मजबूत कारण बसपा का जमीनी स्तर पर कमजोर होना है। हाथी जितना सुस्त होगा कमल उतना ही खिलेगा। क्योंकि बसपा का कोर वोटर समाजवादी पार्टी को कभी वोट नहीं करता है और ना ही कभी करेगा। इसका उदाहरण 2019 के लोकसभा चुनावों में देखा जा चुका है सपा- बसपा गठबंधन के बावजूद बसपा का कोर वोटर सपा को वोट नहीं किया और नतीजा सपा अपने घर की सीटें भी हार गई। बसपा के न जीतने की स्थिति में बसपा के वोटर भाजपा को वोट करेंगे और भाजपा मजबूत होती जाएगी...

ऐसा नहीं है कि सपा मजबूत नहीं है लेकिन अभी की सपा कमजोर हो गई है। 2012 में जब सपा प्रचंड बहुमत से सरकार में आई थी तो वो वक्त अलग था। उस समय मुलायम सिंह यादव, आजम खां, शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल यादव जैसे नेता का जमीन पर पकड़ और अपने मतों को जोड़े रखने की राजनीतिक कौशल मजबूत थी। उस समय नरेन्द्र मोदी गुजरात से बाहर नहीं निकले थे। नरेन्द्र मोदी का लहर नहीं था। उस समय योगी आदित्यनाथ जी का प्रदेश राजनीति में जन्म नहीं हुआ था वो एक लोकसभा और आस पास तक ही सीमित थे। लेकिन आज अखिलेश यादव अकेले हैं ना मुलायम सिंह यादव सक्रिय हैं ना आजम खां जो अपने पारम्परिक मतों के बिखराव को रोक लें। शिवपाल सिंह यादव का दल तो अखिलेश यादव से मिल गया लेकिन दिल मिलने में वक्त लगेगा क्योंकि ये चुनावी मिलन है पारिवारिक मिलन नहीं और इसीलिए दल मिले हैं दिल नहीं। और जब तक दिल मिलेंगे तब तक देर हो गई होगी....

बाकी समय का इंतजार करें। 

( लेखक  इलहाबाद विश्वविद्यालय से आधुनिक इतिहास एंव हिंदी विषयों में स्नातक और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से शिक्षा शास्त्र में स्नातक हैं। हिन्दी एंव शिक्षाशास्त्र से परास्नातक किया हैं।)
 

Monday, December 13, 2021

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से शिव के कॉरिडोर तक

 संस्कृति से सरोकार न रख कर सर्वांगीण विकास का सपना देखने वाले राष्ट्र कालांतर में बरबाद गये। भारत में भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को वर्षों तक उपेक्षित किया गया। देश का सौभाग्य है कि इसके महत्व को समझने वाला भारत माता का एक ऐसा सच्चा सपूत नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी के रूप में अवतरित हुआ। जिसने अपने सांस्कृति राष्ट्रवाद के विचारों को अमली जामा पहनाते हुए पूरे विश्व में इसकी धाक जमा दी है। समाज की समझ जरूरी है, भारत जैसे विशाल देश की समझ सामान्य नागरिक के बस की बात नहीं हैं। मैं मोदी को तो एक एक परिपक्व समाजशास्त्री मानता हूं और उसका की परिणाम है कि भारत पूरी तेजी से विकास की राह पर अग्रसर है। पूरा विश्व भारत के नेतृत्व को स्वीकार करने को मानसिकता बना रहा है।
भारत सदियों अनेक बाह्य एवं आंतरिक आक्रमणों एवं कुचक्रो के बाद भी एक जीवंत राष्ट्र बना रहा, उसका मूल धारणा उसकी संस्कृति एवं संस्कृति की निरंतरता रही है।भारत का प्राण उसकी संस्कृति है और उसकी प्राण वायु प्रदान करने वाली 135 करोड़ देशवासियों की विशाल फौज देश के प्रति अगाध श्रद्धाभक्ति भागौलिक राष्ट्रवाद की संकल्पना नही ला सकती है । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा ज्यादा महत्वपूर्ण है। भारत ऋषि मुनियों एवं अनेकानेक वैदिक ग्रंथों ने संपूर्ण सृष्टि के कल्याण कि जो कल्पना की वह अन्यत्र देश में नहीं मिलती है। हम संस्कृति के पोषक पुजारी हैं संस्कृति हमारी पहचान है। संस्कृति हम सभी को आपस में प्रेम एवं बंधुत्व का सटीक पाठ कराते हुए न केवल दिल से जोड़ती है अपितु मानवीय गुणों की समस्त आवश्यकताओं एवं संभावनाओं से युक्त बनाती है। औपनिवेशिक शक्तियों एवं दुर्दांत मुगल आक्रमणकारियों ने जितना हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ करने का प्रयास किया ,उतना ही वें असफल हुए। यह सही है कि हमारी पहचान मिटाने की कोशिश की गई और इसी क्रम में हमारे धार्मिक व सांस्कृतिक धरोहरों एवं आस्था के केंद्रों को ध्वस्त कर दिया गया। हमारा मनोबल टूटा लेकिन यह बहुत दिनों तक निम्न रहा। ऐसा नेतृत्व आया जिसने टूटे मनोबल को पुनर्जीवित किया और सम्मान की ज्योति आकाश को छूने लगी है। 

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत की सांस्कृतिक, भौगोलिक, प्रजातीय इत्यादि विविधताओं को एकता में परिवर्तित करता है। इसमें हमें जो बल प्राप्त होता है वह राष्ट्रवाद की भावना को प्रबल करता है। इस भावना की प्रबलता को बनाए रखना देश की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। हमें अपने सांस्कृतिक आधारों को मजबूती प्रदान करना है ताकि राष्ट्रप्रेम की भावना अक्षुण हो और देशभक्ति की अलख पूर्ण सम्मान के साथ निरंतर जलती रहे। हमारे प्रधानमंत्री जी ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जो अलख जलायी, उसके अंतर्गत संपूर्ण भारत में विविध कार्य सम्पादि किये जा रहे हैं। एकता के नैतिक प्रतीक सरदार वल्लभ भाई पटेल का स्मारक एक सफल प्रयास है। 
देश की सांस्कृतिक एकता का संभावना शिव है जो काशी के अधिष्ठता हैं। काशी भारतीय धर्म एवं संस्कृति का जीवंत संग्रहालय हैं। यह देवाधिदेव महादेव विश्वनाथ की ऐसी नगरी है जिसके कण- कण में विद्यमान है। शिव की महिमा अपरंपार है। वे परम ब्रह्म हैं। काशी संपूर्ण भारत में पूजनीय है। काशी का जीवन शिव के विराट व्यक्तित्व की छवि है। द्रविड़ सभ्यता हो या देश की कोई भी सभ्यता और सभी ने शिव की इस नगरी को अपने तीर्थ स्थली के रूप में अंगीकार किया है तथा काशी विश्वनाथ के दर्शन को प्राप्त करने के सुयोग की कामना की है। प्रत्येक हिंदू काशी आने को अपना सौभाग्य मानता है और शिव दर्शन को अहोभाग्य। यह शिव के कारण ही अनेकता में एकता का अद्भुत परिवेश दिखाई पड़ता है। एकात्मकता जो दर्शन होता है वह संपूर्ण काशी के अधिवास के प्रतिरूप को देखकर समझा जा सकता है। काशी लघु भारत है। विश्वनाथ की नगरी में क्षेत्रीय था एवं प्रांतीय था कि संकीर्ण में भावना नदारद है। इसी का परिणाम है कि सर्वत्र काशी की भी पूछ होती है, वह सर्वत्र पूजनीय और वंदनीय होता है। शिव शंकर और गंगा से युक्त काशी सर्व समर्थ है लेकिन वर्षो से विश्वनाथ दरबार का एक ऐसा स्वरूप भी है जो सब को कष्ट देता रहा है तथा मंदिर की छवि को धूमिल करता रहा है। वह है, इसके आसपास संकरी तंग गलियां, अपर्याप्त दर्शन, भीड़ भाड़ व अव्यवस्था तथा गंगाजी तक की कष्टकारी पहुंच। श्री विश्वनाथ मंदिर हिंदू एकता का एक ऐसा अद्वितीय विशाल आस्था का केंद्र है, जहां ही नहीं विदेशों से भी हिंदू भक्त प्रति वर्ष श्रद्धा पूर्वक आते हैं। शिव प्रदत्त सांस्कृतिक एकता में जो सबसे बड़ी बाध थी, वह मंदिर में प्रवेश से लेकर ज्योति स्वरूप लिंग के संगम दर्शन पूजन तक की रही। किसी जमाने में मां गंगा जो वहीं पास से बहती रही, श्रद्धालु उनमें स्नान कर मंदिर में प्रवेश करते रहे। सरकारें आयी और गई किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। अंततः वर्ष 2014 में मां गंगा ने नरेंद्र मोदी जी को बुला ही लिया। भगवान शिव का आशीर्वाद ना केवल मोदी जी को ही प्राप्त हुआ अपितु काशी वासियों एवं संपूर्ण देशवासियों को भी प्राप्त हुआ। हमारा आत्म सम्मान पुनः प्रतिष्ठित हुआ है। सनातन धर्म सत्यम शिवम सुंदरम पर आधारित है। ऐसे सनातन धर्म की शाश्वत मोदी जी के प्रयास से और भी सुदृढ़ एवं सुगम हुई है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की यह पहल राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करेगी और भारत को विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठापित करेगी।

( प्रस्तुत लेख काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर अरविंद कुमार जोशी जी का है । लेख का का स्रोत "राष्ट्रीय सहारा अखबार"। )


Monday, November 15, 2021

प्रधानमंत्री के कुशल नेतृत्व में जनजाति के हितों का संरक्षण

लेखक:- शिवराज सिंह चौहान

स्वाधीनता के लिए जनजातीय संघर्ष के महानायक भगवान बिरसा मुंडा जी की जयंती पर उन्हें शत शत नमन। भगवान बिरसा मुंडा गरीबों के सच्चे भगवान थे। उन्होंने शोषित और वंचित वर्ग के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष किया। स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान और सामाजिक सद्भावना के लिए किए गए प्रयास हम सभी को सदैव प्रेरित करते हैं। बिरसा मुंडा ने अपने सुधारवादी आंदोलनों से लोगों के लिए आदर्श प्रस्तुत किया। भगवान बिरसा मुंडा ने नैतिक आत्म-सुधार ,आचरण की शुद्धता और एकेश्वरवाद का उपदेश दिया। ऐसे  ही क्रांतिवीर नायक का स्मरण करने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने आज  दिन जनजातीय गौरव दिवस मनाने का फैसला लिया है। मुझे बेहद खुशी है कि माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने 15 नवंबर को देश में जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है। इसके के लिए मैं माननीय प्रधानमंत्री जी को धन्यवाद देता हूं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी जनजातीय लोगों के विकास को लेकर कितने संवेदनशील है, इसका आंकलन इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए जनजातीय भाई-बहनो के विकास से जुड़े कई  अहम फैसले लिए। कई मुश्किलें आई, लेकिन राज्य ने नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में इन तमाम मुश्किलों को अवसर में बदल दिया। मोदी जी कहते हैं कि विकास की गति को तेज करने का हमारा  दृढ़ संकल्प है, ताकि गरीब से गरीब व्यक्ति भी इस विकास यात्रा का सक्रिय भागीदार बन सके। उन्हीं के नेतृत्व में राज्य ने जनजातीय समुदाय के विकास के नवीन आयामों को छुआ। गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी जी ने आदिवासी समुदाय के सर्वांगीण विकास के लिए वर्ष 2007 में 10 सूत्रीय वनबंधु योजना शुरू की। इसमें वनवासी बच्चों के उच्च शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं, पीने का शुद्ध जल, सिंचाई सहित स्थानीय स्तर पर रोजगार से जुड़ी योजनाओं का सीधा लाभ जनजाति लोगों को मिला। संकलित डेयरी विकास योजना के तहत 1 लाख 42 हजार लोगों को दुधारू पशु दिए गए। यही नहीं, राज्य की साक्षरता दर को 45.7% से बढ़ाकर 62.5% पहुंचाया। दूध संजीवनी योजना के तहत 11 लाख छात्रों को पोस्टिक तो दूध दिया गया। सिकल सेल के लिए एक करोड़ से अधिक जनजाति लोगों की स्क्रीनिंग कर उन्हें स्वस्थ बनाया। आवासीय योजना से 6 लाख 30 हजार लोगों के घर का सपना पूरा किया।

जनजातीय लोगों की विकास कार्य कार्य गुजरात तक ही सीमित नहीं रहा। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी जी ने इस प्रक्रिया को सतत जारी रखा। आज भारत दुनिया के बड़े जनजाति समाज के विकास के इस कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहा है। 11 करोड़ से अधिक जनजाति समाज के हितों को संरक्षण प्रदान करने का कार्य नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने जनजातीय वर्ग के कल्याण के लिए वनबंधु कल्याण योजना, आदिवासी शिक्षा ऋण योजना,सावधि ऋण योजना, आदिवासी महिला सशक्तिकरण, स्वयं सहायता समूह के लिए सूक्ष्म ऋण योजना, एकलव्य मॉडल आवासीय विकास जैसी कई योजनाएं शुरू की। जिनका सीधा लाभ जनजाति वर्ग को मिल रहा है। प्रधानमंत्री जी का संकल्प है कि पूरे जनजातीय समाज की जल, जंगल और जमीन पर आंच नहीं आएगी। आज जनजाति समाज स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस कर रहा है। जनजाति समाज जितना मजबूत होगा, देश उतना ही मजबूत बनेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश विकास की नई करवट ले रहा है। प्रधानमंत्री जी के संकल्प 'सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास' से ही प्रेरित है प्रदेश की जनजाति विकास और कल्याण की योजनाएं। जनजाति समाज के चहुंमुखी विकास, स्थान और मान-सम्मान की रक्षा के लिए राज्य सरकार प्रतिबद्ध हैं। पिछले 17 वर्षों से हमने जनजातीय समाज को बराबर के अधिकार सुनिश्चित करने की दिशा में कई ऐतिहासिक फैसले लिए हैं। वर्ष 2003-04 में जनजातियों के विकास के लिए महज 746.60 करोड़ रुपए का बजट था, जिसे हमने बढ़ाकर 8085.99 करोड़ तक पहुंचाया।
पं. दीनदयाल उपाध्याय जी कहते थे  दरिद्र ही हमारा नारायण है और उसकी सेवा ही हमारी पूजा, उनके इस विचार  से हमको  प्रेरणा मिलती है।  हमने जनजातीय क्षेत्रों में 24 घंटे  घरेलू बिजली और 10 घंटे कृषि कार्यों के लिए बिजली देने का इंतजाम किया। यही नहीं, जल जीवन मिशन के माध्यम से वनवासी अंचलों  के अलावा पूरे प्रदेश में पीने का शुद्ध पानी हर घर में नल से प्रदान किया जा रहा है। पिछले  17 वर्षों में 2 लाख किलोमीटर से अधिक सड़को का जाल बिछाया गया है। प्रदेश में अनुसूचित जनजाति ऋण विमुक्ति अधिनियम 2020 लागू किया गया है जो आज से (15 नवंबर 2021) से पूरे प्रदेश में प्रभावशील होगा। प्रदेश सरकार ने जनजातीय समाज को उनकी उपज का सही मूल्य मिले इसके लिए  समर्थन मूल्य निर्धारित किया है। तेंदूपत्ता बेचने का कार्य जनजातियों की वन समिति द्वारा किया जायेगा। तेंदूपत्ता संग्रहित करने वाली जनजातियों को मध्यप्रदेश सरकार द्वारा चरण पादुकाएं प्रदान की जा रही है।

वनवासी अंचलों का तेजी से विस्तार करना मध्यप्रदेश सरकार की प्राथमिकता है। पिछले चार वर्षो में मुख्यमंत्री मेधावी विद्यार्थी योजना से 5 हजार 500 से अधिक जनजातीय छात्र-छात्राएं लाभान्वित हुए हैं। शैक्षणिक  सत्र 2020-21 एवं 2021-22 में 27 नए एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों का निर्माण किए जाने की योजना है। 1 वर्ष के भीतर बैकलॉग के पदों को भरने की योजना है। छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम राजा शंकर शाह विश्वविद्यालय किया गया। वनवासी अंचल  की संस्कृति आनंद की संस्कृति है। इसीलिए हमने फैसला किया है कि हर वर्ष झाबुआ उत्सव मनाया जायेगा।
ग्राम सभा को सामुदायिक संसाधनों की सुरक्षा और संरक्षण का अधिकार देने के लिए पेसा एक्ट लागू करने का ऐतिहासिक कदम उठाया है।  वनाधिकार अधिनियम के अंतर्गत 34 हजार परिवारों के दावे मान्य किए गए। स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध हो सके इसके लिए देवाण्य योजना शुरू की गई। जनजाति लोगों को सिकल सेल एनीमिया बीमारी से बचाव के लिए नि:शुल्क इलाज की व्यवस्था की गई है। इसके लिए आज से सिकल सेल मिशन शुरू किया जाएगा। राशन आपके द्वार योजना से जनजातीय  भाई-बहनों को अब राशन लेने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ेगा। इन दोनों ही योजनाओं का शुभारंभ आज माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी करने जा रहे हैं।
मैं दोनो बाहें फैलाकर जनजातीय समाज का आह्वान करता हु की वे अपनी जिंदगी बदले। विकास की दौड़ में जो पीछे और नीचे रह गए है उन्हें आगे लाने के लिए मैं  सब कुछ करूंगा। जनजातीय समुदाय जितना सशक्त होगा, आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश निमार्ण की हमारी संकल्पना उतना ही मजबूत होगी। जनजातीय समुदाय के विकास के लिए मैं और मेरी सरकार समर्पित थे, समर्पित है और हमेशा समर्पित रहेंगे।

(लेखक मध्यप्रदेश के  मुख्यमंत्री है।  प्रस्तुत लेख राष्ट्रीय सहारा में छपा था जिसे राष्ट्रचिंतक ब्लॉग पर प्रकाशित किया गया है।)

Friday, November 5, 2021

को अतिभारः समर्थानाम।

जम्मू-कश्मीर के नौशेरा में दिवाली के अवसर पर भारतीय सशस्त्र बलों के सैनिकों के साथ प्रधानमंत्री ने बातचीत की।  मोदी जी ने जोरदार भाषण दिया जिसे  राष्ट्रचिंतक ब्लॉग पर प्रकाशित किया गया है।

भारत माता की जय!

भारत माता की जय!

भारत माता की जय!

दीवाली का आज पावन त्‍योहर है और हर किसी का मन करता है कि दिवाली अपने परिवार के लोगों के बीच में मनाये। मेरा भी मन करता है कि मैं दिवाली मेरे परिवारजनों के बीच में मनाओं और इसीलिए हर दिवाली मैं मेरे परिवारजनों के बीच में मनाने के लिये आता हूं क्‍योंकि आप मेरे परिवारजन हैं, मैं आपके परिवार का साथी हूं। तो मैं यहां प्रधानमंत्री के रूप में नहीं आया हूं। मैं आपके परिवार के एक सदस्‍य के रूप में आया हूं। आप सभी के बीच आना, जो भाव अपने परिवार के बीच जाकर के होता है, वही भाव मेरे मन में होता है और जब से मैं इस संवैधानिक जिम्‍मेदारी को संभाल रहा हूं, आज उसको 20 साल से भी अधिक समय हो गया है। बहुत लंबे अरसे तक मुझे देशवासियों ने इस प्रकार की सेवा का मौका दिया। पहले गुजरात वालों ने दिया, अब देशवासियों ने दिया। लेकिन मैंने हर दिवाली सीमा पर तैनात आप मेरे परिवारजनों के बीच बितायी है। आज मैं फिर आपके बीच आया हूं, आपसे नई ऊर्जा लेकर के जाऊंगा, नया उमंग लेकर के जाऊंगा, नया विश्‍वास लेकर के जाऊंगा। लेकिन मैं अकेला नहीं आया हूं। मैं मेरे साथ 130 करोड़ देशवासियों के आर्शीवाद आप के लिए लेकर के आया हूं, ढेर सारा आर्शीवाद लेकर के आया हूं। आज शाम को दीवाली पर एक दीया, आपकी वीरता को, आपके शौर्य को, आपके पराक्रम को, आपके त्‍याग और तपस्‍या के नाम पर और जो लोग देश की रक्षा में जुटे हुए हैं, ऐसे आप सब के लिए हिन्‍दुस्‍तान के हर नागरिक वो दिये की ज्‍योत के साथ आपको अनेक-अनेक शुभकामनाएं भी देता रहेगा। और आज तो मुझे पक्‍का विश्‍वास है कि आप घर पर बात करेंगे, हो सकता तो फोटो भी भेज देंगे और मुझे पक्‍का विश्‍वास है आप कहेंगे हां यार इस बात तो दिवाली कुछ और थी, कहेंगे ना। देखिये आप रिलैक्‍स हो जाईये, कोई आपको देखते नहीं है, आप चिंता मत कीजिए। अच्‍छा आप ये भी बताएंगे ना कि मिठाई भी बहुत खाई थी, नहीं बतायेंगे?

साथियों,

आज मेरे सामने देश के जो वीर हैं, देश की जो वीर बेटियां हैं, वो भारत मां की ऐसी सेवा कर रहे हैं, जिसका सौभाग्य हर किसी को नहीं मिलता है, किसी किसी को ही मिलता है। जो सौभाग्‍य आपको मिला है। मैं देख रहा हूँ, मैं महसूस कर रहा हूँ आपके चेहरे के उन मजबूत भावों को मैं देख रहा हूं। आप संकल्‍पों से भरे हुए हैं और यही आपके संकल्‍प, यही आपके पराक्रम की पराकाष्‍ठा की भावनाएं, चाहे हिमालय हो, रेगिस्‍तान हो, बर्फीली चोटियां हों, गहरे पानी हों, कहीं पर भी आप लोग मां भारती का एक जीता-जागता सुरक्षा कवच हैं। आपके सीने में वो जज्‍बा है जो 130 करोड़ देशवासियों को भरोसा होता है, वो चैन की नींद सो सकते हैं। आपके सामर्थ्य से देश में शांति और सुरक्षा एक निश्‍चिंतता होती है, एक विश्‍वास होता है। आपके पराक्रम की वजह से हमारे पर्वों में प्रकाश फैलता है, खुशियां भर जाती हैं, हमारे पर्वों में चार चांद लग जाते हैं। अभी दीपावली के बाद गोवर्धनपूजा, फिर भैयादूज और छठ पर्व भी बिल्‍कुल गिनती के दिनों में सामने आ रहा है। आपके साथ ही मैं सभी देशवासियों को नौशेरा की इस वीर वसुंधरा से, इन सभी पर्वों के लिए देशवासियों को भी बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। देश के अन्य हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग आज दिवाली का जब दूसरा दिन होता है तो नववर्ष की भी शुरुआत करते हैं और हमारे यहां तो हिसाब-किताब भी दिवाली से पूरा होता है और दिवाली के दूसरे दिन से शुरू होता है। खासकर के गुजरात में कल नया साल होता है। तो मैं आज नौशेरा की इस वीर भूमि से गुजरात के लोगों को भी और जहां-जहां नववर्ष मनाते हैं उन सबको भी अनेक-अनेक मंगलकामनाएं उनके लिये देता हूँ।

साथियों,

जब मैं यहां नौशेरा की पवित्र भूमि पर उतरा, यहां की मिट्टी का स्पर्श किया तो एक अलग ही भावना, एक अलग ही रोमांच से मेरा मन भर गया। यहाँ का इतिहास भारतीय सेना की वीरता का जयघोष करता है, हर चोटी से वो जयघोष सुनाई देता है। यहाँ का वर्तमान आप जैसे वीरजवानों की वीरता का जीता-जागता उदाहरण है। वीरता का जिंदा सबूत मेरे सामने मौजूद है। नौशेरा ने हर युद्ध का, हर छद्म का, हर षड्यंत्र का माकूल जवाब देकर कश्मीर और श्रीनगर के प्रहरी का काम किया है। आज़ादी के तुरंत बाद ही दुश्मनों ने इस पर नज़र गड़ा कर के रखी हुई थी। नौशेरा पर हमला हुआ, दुश्मनों ने ऊंचाई पर बैठकर इस पर कब्जा जमाने की कोशिश की और अभी जो मुझे विडियो देखकर सारी चीजें मुझे देखने-समझने का मौका मिला और मुझे खुशी है कि नौशेरा के जाबाजों के शौर्य के सामने सारी साजिशें धरी की धरी रह गईं ।

दोस्‍तो,

भारतीय सेना की ताकत क्या होती है, इसका अहसास दुश्मन को शुरूआत के दिनों में ही लग गया था। मैं नमन करता हूँ नौशेरा के शेर, ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को, नायक जदुनाथ सिंह को जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। मैं प्रणाम करता हूँ लेफ्टिनेंट आरआर राणे को जिन्होंने भारतीय सेना की जीत का रास्ता प्रशस्त किया था। ऐसे कितने ही वीरों ने नौशेरा की इस धरती पर गर्व की गाथाएँ लिखी हैं, अपने रक्‍त से लिखी हैं, अपने पराकम से लिखी हैं, अपने पुरुषार्थ से लिखी हैं, देश के लिए जीने-मरने के संकल्‍पों से लिखी हैं। अभी मुझे ये मेरा सौभाग्‍य था कि दिवाली के इस पवित्र त्‍यौहार पर मुझे आज दो ऐसे पहापुरुषों का आर्शीवाद प्राप्‍त करने का सौभाग्य मिला, वो मेरे जीवन में एक प्रकार से अनमोल विरास्‍त है। मुझे आर्शीवाद मिले श्री बलदेव सिंह और श्री बसंत सिंह जी, ये दोनों महापुरुष बाल्‍यकाल में मां भारती की रक्षा के लिए फौज के साथ-साथ कंधे से कंधा मिलाकर साधनों के आभाव के बीच भी और आज जब मैं सुन रहा था उनको वही जज्‍बा था भई, वही मिजाज था और वर्णन ऐसे कर रहे थे जैसे आज ही, अभी से लड़ाई के मैदान से आएं हैं, ऐसा वर्णन कर रहे थे। आज़ादी के बाद हुए युद्ध में ऐसे अनेकों स्थानीय किशोरों ने ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के मार्गदर्शन में बाल सैनिक की भूमिका निभाई थी। उन्होंने अपने जीवन की परवाह न करते हुए उतनी कम उम्र में देश की सेना के साथ कंधे से कंधा मिलकार के काम किया था, सेना की मदद की थी। नौशेरा के शौर्य का ये सिलसिला तबसे जो शुरू हुआ, ना कभी रूका है, ना कभी झुका है, यही तो नौशेरा है। सर्जिकल स्ट्राइक में यहाँ की ब्रिगेड ने जो भूमिका निभाई, वो हर देशवासी को गौरव से भर देता है और वो दिन तो मैं हमेशा याद रखूंगा क्‍योंकि मैं कुछ तय किया था कि सूर्यास्‍त के पहले सब लोग लौट कर के आ जाने चाहिए और मैं हर पल फोन की घंटी पर टिक-टिका कर के बैठा हुआ था कि आखिर से आखिर का मेरा जवान पहुंच गया क्‍या और कोई भी नुकसान किये बिना ये मेरे वीर जवान लौट कर के आ गए, पराक्रम करके आ गए, सिद्धि प्राप्‍त करके आ गए। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद यहाँ अशांति फैलाने के अनगिनत कुत्सित प्रयास हुए, आज भी होते हैं, लेकिन हर बार आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब मिलता है। असत्य और अन्याय के खिलाफ इस धरती में एक स्वाभाविक प्रेरणा है। माना जाता है और मैं मानता हूं ये अपने आप में बड़ी प्रेरणा है, ऐसा माना जाता है कि पांडवों ने भी अज्ञातवास के दौरान अपना कुछ समय इसी क्षेत्र में व्यतीत किया था। आज आप सबके बीच आकर, मैं अपने आपको यहाँ की ऊर्जा से जुड़ा हुआ महसूस कर रहा हूँ।
साथियों,

इस समय देश अपनी आजादी के 75 वर्ष का पर्व मना रहा है। आजादी का अमृत महोत्‍सव गुलामी के लंबे कालखंड में असंख्य बलिदान देकर हमने ये आजादी हासिल की है। इस आज़ादी की रक्षा करने का दायित्व हम सभी हिन्‍दुस्‍तानियों के सर पे है, हम सबकी जिम्‍मेवारी है। आज़ादी के अमृतकाल में हमारे सामने नए लक्ष्य हैं, नए संकल्प हैं, नई चुनौतियाँ भी हैं। ऐसे महत्‍वपूर्ण कालखंड में आज का भारत अपनी शक्‍तियों को लेकर भी सजग है और अपने संसाधनों को लेकर भी। दुर्भाग्य से, पहले हमारे देश में सेना से जुड़े संसाधनों के लिए ये मान लिया गया था कि हमें जो कुछ भी मिलेगा विदेशों से ही मिलेगा! हमें technology के मामले में झुकना पड़ता था, ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते थे। नए हथियार, नए उपकरण खरीदने होते थे तो प्रक्रिया सालों-साल चलती रहती थी। यानी एक अफसर फाईल शुरू करे, वो retire हो जाए, तब तक भी वो चीज नहीं पहुंचती थी, ऐसा ही कालखंड था। नतीजा ये कि जरूरत के समय हथियार आपाधापी में ख़रीदे जाते थे। यहाँ तक कि spare parts के लिए भी हम दूसरे देशों पर निर्भर रहते थे।

साथियों,

डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता का संकल्प उन पुरानी स्थितियों को बदलने का एक सशक्त मार्ग है। देश के रक्षा खर्च के लिए जो बजट होता है, अब उसका करीब 65 प्रतिशत देश के भीतर ही खरीद पर खर्च हो रहा है। हमारे देश ये सब कर सकता है, करके दिखाया है। एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए अब भारत ने ये भी तय किया है कि 200 से ज्यादा साजो-सामान और उपकरण अब देश के भीतर ही खरीदे जाएंगे। आत्‍मनिर्भर भारत का यही तो संकल्‍प है। अगले कुछ महीनों में इसमें और सामान जुड़ने वाले हैं, देश को आत्मनिर्भर बनाने वाली ये पॉजिटिव लिस्ट और लंबी हो जाएगी। इससे देश का डिफेंस सेक्टर मजबूत होगा, नए नए हथियारों, उपकरणों के निर्माण के लिए निवेश बढ़ेगा।

साथियों,

आज हमारे देश के भीतर अर्जुन टैंक बन रहे हैं, तेजस जैसे अत्याधुनिक लाइट कॉम्बैट एयर-क्राफ़्ट बन रहे हैं। अभी विजयदशमी के दिन 7 नई डिफेंस कंपनियों को भी राष्ट्र को समर्पित किया गया है। हमारी जो ऑर्डिनेन्स फ़ैक्ट्रीज़ थीं, वो अब specialized सेक्टर में आधुनिक रक्षा उपकरण बनाएँगी। आज हमारा प्राइवेट सेक्टर भी राष्ट्र रक्षा के इस संकल्प का सारथी बन रहा है। हमारे कई नए डिफेन्स start-ups आज अपना परचम लहरा रहें हैं। हमारे नौजवान 20, 22, 25 साल के नौजवान क्‍या-क्‍या चीजें लेकर के आ रहे हैं जी, गर्व होता है।

साथियों,

उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में बन रहे डिफेंस कॉरिडोर इस स्पीड को और तेज करने वाले हैं। ये सारे कदम जो आज हम उठा रहे हैं, वो भारत के सामर्थ्य के साथ-साथ डिफेंस एक्सपोर्टर के रूप में हमारी पहचान को भी सशक्त करने वाले हैं।

साथियों,

हमारे शास्त्रों में कहा गया है-

को अतिभारः समर्थानाम।

यानि जो समर्थ होता है उसके लिए अतिभार मायने नहीं रखता, वो सहज ही अपने संकल्पों को सिद्ध करता है। इसलिए आज हमें बदलती दुनिया, युद्ध के बदलते स्वरूप के अनुसार ही अपनी सैन्यशक्ति को बढ़ाना है। उनको नए ताकत के साथ ढालना भी है। हमें अपनी तैयारियों को दुनिया में हो रहे इस तेज़ परिवर्तन के अनुकूल ही ढालना ही होगा। हमें मालूम है किसी समय हाथी-घोड़े पर लड़ाईयां होती थी, अब कोई सोच नहीं सकता हाथी-घोड़े की लड़ाई, रूप बदल गया। पहले शायद युद्ध के रूप बदलने में दशकों लग जाते होंगे, शताब्‍दियां लग जाती होंगी। आज तो सुबह एक तरीका होगा तो शाम को दूसरा तरीका होगा लड़ाई का, इतनी तेजी से technology अपनी जगह बना रही है। आज की युद्धकला सिर्फ ऑपरेशन्स के तौर-तरीकों तक ही सीमित नहीं है। आज अलग-अलग पहलुओं में बेहतर तालमेल, technology और hybrid tactics का उपयोग बहुत बड़ा फर्क डाल सकता है। संगठित नेतृत्व, एक्शन में बेहतर समन्वय आज बहुत ज़रूरी है। इसलिए बीते समय से हर स्तर पर लगातार रिफॉर्म्स किए जा रहे हैं। Chief of Defence Staff की नियुक्ति हो या Department of Military Affairs का गठन, ये हमारी सैन्यशक्ति को बदलते समय के साथ कदमताल करने में अहम रोल निभा रहे हैं।

साथियों,

आधुनिक बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर भी हमारी सैन्य ताकत को और मजबूत करने वाला है। सीमावर्ती इलाकों की कनेक्टिविटी को लेकर पहले कैसे काम होता था, ये आज देश के लोग, आप सभी भली-भांति जानते हैं। अब आज लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक, जैसलमेर से लेकर अंडमान निकोबार द्वीप तक, हमारे बॉर्डर एरियाज़ में जहां सामान्य कनेक्टिविटी भी नहीं होती थी, आज वहां आधुनिक रोड, बड़ी-बड़ी सुरंगें, पुल और ऑप्टिकल फाइबर जैसे नेटवर्क बिछाए जा रहे हैं। इससे हमारी डिप्लॉयमेंट कैबेबिलिटी में तो अभूतपूर्व सुधार हुआ ही है, सैनिकों को भी अब बहुत अधिक सुविधा हो रही है।

साथियों,

नारीशक्ति को नए और समर्थ भारत की शक्ति बनाने का गंभीर प्रयास बीते 7 सालों में हर सेक्टर में किया जा रहा है। देश की रक्षा के क्षेत्र में भी भारत की बेटियों की भागीदारी अब नई बुलंदी की तरफ बढ़ रही है। नेवी और एयरफोर्स में अग्रिम मोर्चों पर तैनाती के बाद अब आर्मी में भी महिलाओं की भूमिका का विस्तार हो रहा है। मिलिट्री पुलिस के द्वार बेटियों के लिए खोलने के बाद अब महिला अफसरों को परमानेंटट कमीशन देना, इसी भागीदारी के विस्तार का ही हिस्सा है। अब बेटियों के लिए नेशनल डिफेंस एकेडमी, राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूल और राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज जैसे देश के प्रीमियर मिलिट्री संस्थानों के दरवाज़े खोले जा रहे हैं। इसी वर्ष 15 अगस्त को मैंने लाल किले से ये भी घोषणा की थी कि अब देशभर के सभी सैनिक स्कूलों में बेटियों का भी पढ़ाई का अवसर मिलेगा। इस पर भी तेजी से काम शुरू हो गया है।

साथियों,

मुझे आप जैसे देश के रक्षकों की वर्दी में केवल अथाह सामर्थ्य के ही दर्शन नहीं होते, मैं जब आपको देखता हूँ, तो मुझे दर्शन होते हैं अटल सेवाभाव के, अडिग संकल्पशक्ति के और अतुलनीय संवेदनशीलता के। इसीलिए, भारत की सेना दुनिया की किसी भी दूसरी सेना से अलग है, उसकी एक अलग पहचान है। आप विश्व की शीर्ष सेनाओं की तरह एक professional force तो हैं ही, लेकिन आपके मानवीय मूल्य, आपके भारतीय संस्कार आपको औरों से अलग, एक असाधारण व्‍यक्‍तित्‍व के धनी बनाते हैं। आपके लिए सेना में आना एक नौकरी नहीं है, पहली तारीख को तनख्‍वाह आएगा, इसके लिये नहीं आये आप लोग, आपके लिये सेना में आना साधना है! जैसे कभी ऋषि-मुनि साधना करते थे ना, मैं आपके हर एक के भीतर वो साधक का रूप देख रहा हूं। और आप माँ भारती की साधना कर रहे हैं। आप जीवन को उस ऊंचाई पर ले जा रहे हैं कि जिसमें 130 करोड़ देशवासियों की जिन्‍दगी जैसे आपके भीतर समाहित हो जाती है। ये साधना का मार्ग है और हम तो भगवान राम में अपने सर्वोच्च आदर्श खोजने वाले लोग हैं। लंका विजय करने के बाद भगवान राम जब अयोध्या लौटे थे तो यही उद्घोष करके लौटे थे-

अपि स्वर्ण मयी लंका, न मे लक्ष्मण रोचते।
 जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥

यानि, सोने और समृद्धि से भरपूर लंका को हमने जीता जरूर है, लेकिन हमारी ये लड़ाई हमारे सिद्धांतों और मानवता की रक्षा के लिए थी। हमारे लिए तो हमारी जन्मभूमि ही हमारी है, हमें वहीं लौटकर उसी के लिए जीना है। और इसीलिए, जब प्रभु राम लौटकर आए तो पूरी अयोध्या ने उनका स्वागत एक माँ के रूप में किया। अयोध्या के हर नर-नारी ने, यहाँ तक कि पूरे भारतवर्ष ने दीवाली का आयोजन कर दिया। यही भाव हमें औरों से अलग बनाता है। हमारी यही उदात्त भावना हमें मानवीय मूल्यों के उस अमर शिखर पर विराजमान करती है जो समय के कोलाहल में, सभ्यताओं की हलचल में भी अडिग रहती है। इतिहास बनते हैं, बिगड़ते हैं। सत्ताएँ आती हैं, जाती हैं। साम्राज्य आसमान छूते हैं, ढहते हैं, लेकिन भारत हजारों साल पहले भी अमर था, भारत आज भी अमर है, और हजारों साल बाद भी अमर रहेगा। हम राष्ट्र को शासन, सत्ता और साम्राज्य के रूप में नहीं देखते। हमारे लिए तो ये साक्षात् जीवंत आत्मा है। इसकी रक्षा हमारे लिए केवल भौगोलिक रेखाओं की रक्षा भर नहीं है। हमारे लिए राष्ट्र-रक्षा का अर्थ है इस राष्ट्रीय जीवंतता की रक्षा, राष्ट्रीय एकता की रक्षा, और राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा! इसीलिए, हमारी सेनाओं में आकाश छूता शौर्य है, तो उनके दिलों में मानवता और करुणा का सागर भी है। इसीलिए, हमारे सेनाएँ केवल सीमाओं पर ही पराक्रम नहीं दिखातीं, जब देश को जरूरत पड़ती है तो आप सब आपदा, विपदा, बीमारी, महामारी से देशवासियों की हिफाज़त के लिए मैदान में उतर जाते हैं। जहां कोई नहीं पहुंचे, वहां भारत की सेनाएं पहुंचे, ये आज देश का एक अटूट विश्वास बन गया है। हर हिन्‍दुस्‍तानी के मन में से ये भाव अपने आप प्रकट होता है ये आ गए ना अरे चिंता नहीं अब हो गया, ये छोटी चीज नहीं है। आप देश की अखंडता और सार्वभौमिकता के प्रहरी हैं, एक भारत-श्रेष्ठ भारत के संकल्प के प्रहरी हैं। मुझे पूरा भरोसा है कि आपके शौर्य की प्रेरणा से हम अपने भारत को शीर्ष ऊंचाइयों तक लेकर जाएंगे।

साथियों, 

दिपावली की आपको भी शुभकामना है। आपके परिवारजनों को शुभकामना है और आप जैसे वीर बेटे-बेटियों को जन्‍म देने वाली उन माताओं को भी मेरा प्रणाम है। मैं फिर एक बार आप सबको दिपावली की अनेक-अनेक शुभकामनाएँ देता हूं। मेरे साथ पूरी ताकत से बोलिये भारत माता की जय! भारत माता की जय भारत माता की जय!

धन्यवाद!


Sunday, October 3, 2021

किस्मत के मारे बेचारे

विकलांग जिन्हे प्रधामंत्री मोदीजी दिव्यांग कहकर संबोधित करते है। पैदायशी विकलांग होने से बड़ा दुख कुछ भी नही है।  एक बच्चा जिसके हाथ की उंगलियां ना हो या पैर लगड़ाते हुए चले , गूंगा बहरा या अंधा हो उसकी पीड़ा वही समझ सकता है। स्कूल में बच्चे चिढ़ाते है और बाहर आओ तो लोग हाथ देखकर बार बार पूछते है अरे ये कैसे हुआ तुम्हारे साथ? चारे के मशीन में हाथ डाल दिए थे क्या? जब लड़का बताता है नही पैदा हुआ था तो इसी तरह था तो कुछ कहते है ज़रूर इसकी मां ने ग्रहण के दौरान प्याज काटा होगा होगा या इसके पिछले जन्म के कर्मों का परिणाम है, कुछ लोग सीधा लंगड़ा लूला कहकर उपहास करते है मजाक उड़ाते है आदि बकवास की बाते सुनकर बच्चा मानसिक पीड़ा से गुजरता है की उसका मन आत्महत्या करने का करता है वो अंदर ही अंदर ही तड़पकर रह जाता है।

हालात ऐसे रहते है की ऐसे लोग लोगो से बोलना ही छोड़ देते है या कम बोलते है। जो बोलते है तो वो गुस्से में उनका चिढ़चिड़ापन बाहर निकल आता हैं।  वो अकेले रहते है तो आंखे में आंसू आ जाता है उनके , वे खुद से ही घृणा करने लग जाते है। पुरषों का तो चलिए ठीक है कैसे भी दिन गुजर जाता है पर महिलाओं कि तो दुर्गति हो जाती है। सरकार भले विशेष सुविधा प्रदान कर रही हो लेकिन उसका लाभ क्या दिव्यांगजन सही से उठा पाते है ? ये सोचने वाली बात है।जिला अस्पताल में प्रमाण पत्र बनवाना भी किसी झंझट से कम  नही है। प्रमाण पत्र में जिसका 40% या इससे अधिक होता है वही सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा सकता है। पर उनका क्या जो जिनका जो पैदायशी विकलांग है उनकी विकलांगता पर सीएमओ साहब 40% से कम प्रमाण पत्र जारी कर देते है उनकी तो जिंदगी झंड हो जाती है बेचारे ना इधर के होते है ना उधर के। यह गंभीर समस्या है सरकार को इसपर ध्यान देना चाहिए। चलिए सरकारी नौकरीयो में दे सकते है मत दीजिए शिक्षा के क्षेत्र उसका कोटा खत्म मत कीजिए।  सरकार क्या उन लोगो का भी जातीय आरक्षण खत्म करेगी जो बड़े - बड़े पदों पर बैठे है? हिम्मत ही नहीं है सब वोट खिसक जायेगा वोट तो बात की बात है देश में आगजनी और दंगा  होने लगेगा । यही सत्य है जो कुछ नही कर सकते है और हालात से लाचार है इस देश का संविधान और इसको चलाने वाले लोग उसी पर अपना जोर लगाते है।

Thursday, September 16, 2021

मादर-ए-वतन सब हिन्दू हैं


सभी का ख़ून हैं शामिल यहाँ की मिट्टी में, किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी हैं,
सही तो कह गए मियाँ इंदौरी, आख़िर बाप तुम्हारा ग़ज़नी, अब्दाली या क़ासिम थोड़ी है, 

जिन माताओं की अस्मतें लूटीं उन आठसौ सालों में, वो नृशंसता बादशाह या सुल्तानों की थोड़ी हैं,
कहीं मूर्ति तोड़ी तो कहीं मंदिर तोड़े, फ़िर भी ये इतिहास काला थोड़ी हैं,

गज़वा-ए-हिन्द के गाज़ी आए और निपट गए, फ़िर भी ये सोच हारी थोड़ी है,
हिन्दू से नफ़रत सीने में दबाए, आज भी आतंकी जिहादी थोड़ी हैं,

कौन-सी ग़ैरत है तुम्हें यह मानने से, की तुर्कों-अरब से तुम्हारा रिश्ता थोड़ी हैं,
जिस संस्कृति ने अपनाया, उसी को काफ़िर मानते, ये जहालत भी तुम्हारी अपनी थोड़ी हैं,

कब तक छुपाओगे अपनी पहचान, आख़िर मानने में कोई हर्ज़ थोड़ी हैं,
सभी का ख़ून एक ही हैं मियाँ इंदौरी, मादर-ए-वतन सब हिन्दू हैं!!

- गौरव राजमोहन नारायण सिंह (हृतिक सिंह)

Friday, August 6, 2021

स्वराज स्मृति

ऐसा कहा जाता है कि जब समय अपनी चलायमान गति से आगे बढ़ता है, तो लोग उन महान विभूतियों को इतिहास और यादों के किसी अस्पृश्य हिस्से में समेट लेते हैं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी 'नए भारत' के निर्माण में समर्पित कर दी।

श्रीमती स्वराज कई युवा भारतीयों के लिए एक माँ की तरह थीं, जो उन्हें मानवीय भावनाओं के विभिन्न पक्षों के प्रति संवेदनशील और अपने आदर्शों के प्रति समर्पित व्यक्तित्व के रूप में देखते थे। देश उन्हें आज भी एक मज़बूत नेत्री के रूप में देखता हैं, क्योंकि वह उस संघर्षकाल से निकली नेत्री हैं, जब राजनीति में महिलाओं के भागीदारी ना-मात्र की थी। उस काल खंड से आज के युवा भारत की सोच के बीच श्रीमती सुषमा स्वराज का जीवन एक परिवर्तनात्मक सेतुबंध हैं, जिसने समाज की दशा और दिशा बदलने में एक अकल्पनीय योगदान दिया है।

वह अपनी विचारधारा और 'अंत्योदय' को समाज में विकास का मार्ग मानती थीं। एक संघर्षरत जीवन व कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता की मिसाल बनी सुषमा स्वराज आम जन-मानस के हृदयस्पर्शी विषयों को लोकतंत्र में एक सशक्त प्रतिनिधित्व देने हेतु हमेशा जानी जाती थी, और इसीलिए जानता से उनका सीधा जुड़ाव आज भी महसूस किया जा सकता हैं। उनका स्पष्ट व संवाद कौशल राजनीतिक मतांतरों के बावजूद सभी विरोधियों कायल होने पर मजबूर कर देता था और आज भी करता हैं। यह सम्मान व सद्भाव अर्जित करना आज के राजनैतिक परिदृश्य में देख पाना बहुत मुश्किल हैं। विभिन्न भारतीय भाषाओं में उनकी विद्वत्ता व संस्कृत के प्रति उनका समर्पण आज भी याद किया जाता हैं। भारतीय संस्कृति में रमी एक ऐसी जन-नायिका शायद ही इस देश में कोई होगी, जिसका कोई राजनैतिक कुल नहीं रहा।

वे भारतीय संसद के दोनों सदनों में लंबे समय तक एक संसद सदस्य, वाजपेयी जी की सरकार में विभिन्न पदों पर मंत्री, दिल्ली के मुख्यमंत्री, लोकसभा में विपक्ष की नेता, और अंत में, मोदीजी के नेतृत्व में एक उत्कृष्ट विदेश मंत्री के रूप में उनकी राजनैतिक यात्रा बहुत शानदार और स्मरणीय रही हैं।

उनके जीवन की उपलब्धियों से पता चलता है कि जब आप अपने आपको सार्वजनिक सेवा के लिए समर्पित करते हैं, तो निश्चित ही आपका संकल्प अपने निहित लक्ष्यों को प्राप्त करेगा, जो आपने समाज कल्याण हेतु परिलक्षित किया है। श्रीमती स्वराज का जीवन अनुभव हम जैसे कई हिंदुस्तानियों को हमेशा वाजपेयी जी और डॉ कलाम की तरह एक मूल्यवान सबक देता है, जो यह हैं कि, लोक सेवा एक महान आह्वान है, जिसका सम्मान राष्ट्रीय हित व विकास में बेहद महत्वपूर्ण हैं।

आज लोग सार्वजनिक पद और लोक सेवा के बीच रेखित अंतर नहीं समझ पाते हैं, लेकिन जब हम स्वराज जी जैसे दिग्गजों व्यक्तित्व को याद करते हैं, तो हमें अपनी आस्था और निष्ठा को नेक और आवश्यक सार्वजनिक सेवा के लिए दोहराना चाहिए और राष्ट्र निर्माण में जीवन आहूत करने हेतु संकल्प लेना चाहिए।

सुषमा जी की स्मृति में

लेखक
गौरव राजमोहन नारायण सिंह

Wednesday, July 7, 2021

इस्लामिक कट्टरपंथियों को मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी है

बहुत दिनों से लिखने का कुछ मन ही नही कर रहा था क्या लिखूं क्या नही लिखूं? बड़ा ही गजब का माहौल चल रहा है देश में। श्रीराम को काल्पनिक कहने वाले उन्हे न्याय दिलाने का झूठा ढकोसला करने लगे है।  तरह-तरह के प्रपंच रचे जा रहे है। सत्ता की तड़प इतनी है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता को तहस नहस करने की साजिश रची जा रही है। देश के विकास मार्ग में बाधा बन रहे शत्रुओं का विनाश जरूरी हो गया है। आखिर कब तक भारत विरोधी एजेंडा चलता रहेगा और मौन होकर देखते रहेंगे? कोई आदिल आदित्य बनकर लव जिहाद करता है हिंदू लड़कियों की जिंदगी बर्बाद हो जाती है इसके खिलाफ किसी ने बोला तो पूरा विपक्ष हाय हाय करके लोकतंत्र की दुहाई देने लग जाता है और सेक्युलरिज्म का ढोंग रचता है। इन तथाकथित लोगो को एक लड़की की इज्जत नहीं दिखती है ये सिर्फ अपना मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने में लगे हुए है। धर्मांतरण का नंगा नाच चल रहा है जहा हिन्दू लड़कियों के साथ आए दिन लव जिहाद हो रहा है। पहले नाम छिपाकर शादी की जाती है और बाद में जबरन इस्लाम कबूल करवाया जाता है।
मदरसों में क्या कम धूमगजड़ मची है वहा तो आए दिन खबर निकलती है की 45 साल मौलवी ने 12 साल के बच्चे या बच्चियों का रेप किया। यह कैसी मजहबी  शिक्षा दी जा रही है मदरसो में जहा ये  हैवान मासूमों की जिंदगी बर्बाद कर रहे है। यहां कोई लिबरल क्रांतकारी पत्रकार  क्यों नही दिख रहे है ? क्यों नही इनकी सच्चाई दुनिया के सामने ला रहे है? वैसे देखा जाय तो मदरसों में बम बनाने ट्रेनिंग दी जाती है। सांप्रदायिक शिक्षा के नाम पर देशभर में संचालित मदरसे केवल अपनी कट्टरवादी तालीम के लिए ही बदनाम नहीं है, बल्कि हिंसक गतिविधियों एवं विस्फोटक सामग्री के भंडारण केंद्र होने के आरोप पहले भी मदरसों पर लगते रहे हैं। खबरों में सत्य तो दिख ही जाता है जब बम बनाते हुए मदरसे में ब्लास्ट हो जाता है जिसकी गूंज सबको सुनाई और चीथड़ो में पड़ी जिहादियो की लाश दिखाई देती है और । इन अवैध प्रयोगशालाओं के ऊपर जितना जल्दी हो  प्रतिबंध लगा देना चाहिए सरकार को  नही तो ये इसी तरह की आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते रहेंगे।

वहा कश्मीर में बैठा अब्दुल गजवा ए हिन्द की साजिश रचता है। रेहड़ी लगाने वाला अब्दुल खुद को बॉम्ब से उड़ा देने का
दम भरता है क्योंकि उसे यकीन है कि मरने के बाद  जन्नत नसीब होगी और बहत्तर हूरो से मुलाकात। अब्दुल का लड़का भी इसी नक्शे कदम पर चलता है और इनका जो लीडर होता है वातानुकूलित कमरे में बैठकर मजा लेते है। इनके बच्चे विदेश घूमते है और अब्दुल का लड़का सड़क पर पंचर ही बनाता है जिन्दगी भर जबतक उसे आका का फरमान ना आ जाय की कुर्बनी देनी है। अब्दुल जिहाद करता है उसके जीवन का एक ही मकसद है सिर्फ जिहाद और जिहाद! कहा जाता है की आतंकवाद का कोई धर्म या मजहब नहीं होता है तो फिर आंतकियो को मरने के बाद दफनाया क्यों जाता है ? क्या इनको समुद्र में नही फेंक देना चाहिए ताकि ये जलजीवो का निवाला बन सके ! 

 जब से अनुच्छेद 370 और 35A निष्क्रिय हुआ है जम्मू कश्मीर में तब से कुछ लोगो का दुकान ही बंद हो गया है। ऐसा लग रहा है कि भूखों मर रहे है और कोई पानी तक ना दे रहा है इनको। कुछ दो कौड़ी के नेता 370 को वापस लागू करने की बात करते है जिसकी जितनी कड़ी भर्त्सना की जाए कम है। सिर्फ निंदा करने से कुछ नही होगा इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए । कुछ तो ऐसे है जो चीन की मदद से 370 की बहाली की बात कर रहे थे क्या ऐसे लोगो का मुंह नही तोड़ देना चाहिए? कुछ रद्दी लोग 370 को रद्द करने से नाराज है और पाकिस्तान से बात करने की बाते करते है। इनकी छटपटाहट साफ देखी जा सकती है जो लूट मचाकर रखा था इन लोगो सब बंद हो गया। पत्थरबाजी और आगजनी कश्मीर में खुलेआम होती थी सुरक्षा बलो पर और हाथ में राइफल होते हुए भी जवान पत्थर का जवाब गोली से नहीं दे सकता था। पत्थरबाजो को भटका हुआ नौजवान कहा जाता था जो पैसे लेकर ये सब करते थे। जब से 370 हटा है इन पत्थरबाज जिहादियों नामो निशान मिट गया है।तथाकथित लेफ्ट विंग मीडिया ,पत्रकार और विपक्ष के नेताओ ने कोई कसर नही छोड़ी है भारत और भारतीय सेना को बदनाम करने में। क्या-क्या आरोप नही लगा सुरक्षा बलो और सेना के जवानों पर कोई हत्यारा कहता तो कोई बलात्कारी। चुल्लू भर पानी डूब मरना चाहिए ऐसे नीच लोगो को जो देश के रक्षकों के ऊपर सवाल उठाते रहे है ऐसे लोगो के जीने का कोई अधिकार नही है।

सांप फुफकार रहा है तो उसके फन कुचल देना चाहिए वरना ऐसा विष फैलेगा की सांस लेने का भी वक्त नही मिलेगा और प्राण पखेरू उड़ जायेंगे। जैसे तो तैसा करने में ही भलाई है। बहुत हो चुकी है शांति और अमन की आशा वाली बाते। जो बोली से नही सुधरेगा उसे गोली से जवाब से देना चाहिए।

Wednesday, June 9, 2021

वैक्सीन पर राजनीति

क्यों रे गोलू ! बड़ा भोलू बन रहा है। वैक्सीन लगवाया की नही? गोलू- लगवा लिया भइया अभी दूसरा डोज लेना बाकी है। वाह तू तो बड़ा चालू निकला गोलू बिल्कुल ठीक किया यही एकमात्र विकल्प है कोरोना से लड़कर जितने के लिए। कुछ लोग तो कह रहे थे की हम नही लगवाएंगे भाजपा की वैक्सीन है! अब वैक्सीन भी राजनीतिक दल वाले बनाने लग गए क्या? हद होती हैं किसी चीज की अफवाह फैलाए की इसको लगाते ही इंसान नपुंसक होय जावेगा। 
देश के वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को भी इन तथाकथित लोगो ने नही छोड़ा। जब पूरी दुनिया इस महामारी से जूझ रही है तब यही भारत देश के वैज्ञानिकों और चिकित्सको ने मोर्चा संभाला है कोई राजनीतिक दल का कार्यकर्ता इलाज नही कर रहा है। दो चार बैनर और पोस्टर लगाकर समाजवाद का नारा देने वाले लोगो के रगो में जातिवाद का जहर दौड़ता हैं। तभी तो वैक्सीन को लेकर तपाक से बोले पड़े "बीजेपी वैक्सीन लगाएगी  उसका भरोसा करू मैं ? अपनी सरकार आएगी सबको मुफ्त में वैक्सीन लगेगी। हम बीजेपी का वैक्सीन नही लगवा रहे है।" भला बताओ जरा ये उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके है  बाते मूर्खो वाली करते है।

खैर बाप ही के पास बेटे का इलाज है। पूर्व रक्षा मुलायम सिंह यादव ने टीका लगवा लिया हैं और अपने पुत्र को ये संदेश दिया है कि टीका लगवा लो जिंदा रहे तो बहुत राजनीति होगी। बाप के टीका लगवाने और प्रधानमंत्री के भाषण के बाद फिर इसपर साहब का बयान आया की- "जनाक्रोश को देखते हुए आख़िरकार सरकार ने कोरोना के टीके के राजनीतिकरण की जगह ये घोषणा करी कि वो टीके लगवाएगी। हम भाजपा के टीके के ख़िलाफ़ थे पर 'भारत सरकार' के टीके का स्वागत करते हुए हम भी टीका लगवाएंगे व टीके की कमी से जो लोग लगवा नहीं सके थे उनसे भी लगवाने की अपील करते हैं ।"
शायद इसी को थूककर चाटने वाली राजनीति कहते है। समाजवाद के नाम पर जातिवादी मानसिकता को बढ़ावा देने वाले समाजवादियों का झंडा फट कर चरर  हो चु जीका है। इनका काम नही कारनामा बोलता है। इनके युवा समर्थक कहते है "कहा हो अखिलेश यूपी बुलाती है" और तो और नारा लगाया जाता है "22 में बायसाइकिल" का जो महज एक ख्याली पुलाव है।

 इतना ही नही सपा के सांसद एसटी हसन का बेतुका बयान देते है की बीते 7 वर्षों में शरीयत में छेड़छाड़ हुई, तभी आई आसमानी आफत..! एसटी हसन ने कहा कि "इन सात सालों में जनता का जो हश्र हुआ है, वो किसी से छिपा नहीं है।पिछले सात सालों में भाजपा सरकार ने कई कानून बनाये हैं. जिनमें शरीयत के साथ छेड़छाड़ की गई। नागरिकता कानून बना दिया गया, जिसमें सिर्फ मुसलमान को नागरिकता नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि इस सरकार के ऐसे कामों से जो नाइंसाफियां हुई हैं, इसके चलते ही देश में 10 दिन के अंदर दो बार बड़े तूफान आए। आसमानी आफत आई और कोरोना के चलते हजारों लोगों की मौत हो गई।" ये सब  बकवास सुनकर तो यही लगता है की समाजवादी पार्टी का नाम बदलकर नमाजवादी पार्टी कर देना चाहिए हद से हद क्या होगा सपा से नपा कहलाएंगे बाकी नप तो ये वैसे भी गए है।  

Tuesday, June 1, 2021

कुछ लोगो का तो काम ही है ज्ञान झाड़ना


कुछ लोगो को कुछ नही मिलता हैं तो ज्ञान झाड़ने लगते है दूसरो के सामने मानो जिस विषय के बारे में बता रहे है उसमे Phd करके बैठे हो। दुनिया में कोई भी घटना घट जाय ये हर विषय के एक्सपर्ट बनते है चाहे अर्थव्यस्था का मुद्दा हो , युद्धनीति हो या विदेश नीति हर मुद्दे पर ज्ञान झाड़ते है। ये लोग हर जगह मिल जायेंगे चाय वाले के दुकान से लेकर विश्वविद्यालय की कक्षा में यहां तक कि शादी समारोह में भी खाने के समय पूछ देते है ये जो सलाद खा रहे हो इससे कौन सा विटामिन मिलता है? मतलब जीव विज्ञान के भी जानकार बनने लग जायेंगे या कह लीजिए डॉक्टर से कम जानकार  थोड़ी न समझते है खुद को !  चावल उठाकर प्लेट में डालने ही वाला रहता हु की तभी कोई पूछ देता है धान का कटोरा किसे कहते है? अरे इस सरकार की  दाल नही गलने वाली अगले चुनाव में। पुड़िया कम  खाओ वरना वजन बढ़ जाएगा ये कहने वाले भी मिल जाते हैं मानो वो बहुत बड़े एथलीट हो।

विश्वविद्यालय में तो कहिए ही मत बहुत से छात्र अपने को क्रांतिकारी  समझने लगते है जबतक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का क्लास चलता है। खुद को भगत सिंह समझने लग जाते हैं सब भले ही उनके बारे में कुछ ना पढ़े हो। वही सुनी सुनाई बातो पर विश्वास कर लेना एक बहुत बड़ी बीमारी है। एक लेख है भगत सिंह का "मैं नास्तिक क्यों हूं?" बस इसके बारे में सब जान गए और सब खुद को जी जान से नास्तिक बनाने  में लग जाते है। कोई कह दिया भगत सिंह तो मार्क्सवादी थे तो फिर मार्क्सवादी बन गए। अरे भगत सिंह तो लेनिन की किताब पढ़ रहे थे हम भी लेनिन के सिद्धांतो पर चलेंगे और वामपंथी बनेंगे। इन मूर्खो को कौन बताए की भगत सिंह तो गीता और रामायण भी पढ़ते थे। कुछ अपने को माओ और चे ग्वेरा समझते है। स्टालिन बनने की ख्वाहिश में पूरा जिंदगी बर्बाद कर लेते है। ये सब के सब ज्ञान देते है दूसरो को की तुम सोए हुए युवा हो या नागरिक हो और खुद गांजा फूंकते हुए कैंपस में मिल जायेंगे।

अपना काम तो होता नहीं है इन लोगो से पर दुनिया भर का ज्ञान झाड़ते है। दो चार लेख और अखबारों को पढ़कर ये रक्षा
विशेषज्ञ बनते है। पूरा इतिहास और भूगोल का ऐसा ज्ञान देंगे की मानो इन्हे लड़ने के लिए भेज दिया जाए तो जीतकर आएंगे। वो अलग बात है कि सौ मीटर दौड़ने में हाफ जाते है। उलुल- जुलूल ज्ञान झाड़ना अलग बात है और काम करना अलग बात है। मुझे तो ये बात आजतक नहीं पता चला कि की इतना ज्ञान लाते कहा से है? गलत और अधूरी जानकारी को ये ग्रहण करके अपने सामने दूसरों को ये तुच्छ समझते हैं। इनकी जानकारी जाकारी और सामने वाले की महामारी!
हद है! दूसरो की सत्य बाते इनसे पचती कहा  है?  कुछ तो ऐसे इतिहास के जानकार मिलते है जिनका कहना है कि हिंदुओ ने भी नरसंहार किया है ! ज्ञान झाड़ने की इस लड़ाई में कोई किसी से पीछे नहीं रहता है। वाद-विवाद का एक अलग ही दौर चल पड़ा है इस इंटरनेट के जमाने में।कोई जानकारी लेनी है इंटरनेट पर आसानी से मिल जाता है कुछ एक क्षणों में। वही से दो चार लाइन जान जाते है और कोई मिल जाता है तो उसके सामने झाड़ने लग जाते हैं। सोशल मीडिया का नशा सबके सर चढ़ कर बोल रहा हैं जहा झूठ कपास और अफवाह सिवाय कुछ नही है। जो पक्ष में है वही सही है बाकी सब गलत है। एक दूसरे को ज्ञान देते देते बोल पड़ते हैं आप हमशे ज्यादा जानते हैं क्या? नही तू मुझसे ज्यादा जानता है! चल निकल यहां से! तुझे बोलने का शहूर नही है? जाओ पढ़ो लिखो बच्चे हो मेरे सामने! बच्चा किसको बोल रहे हो खड़े खड़े बेच दूंगा आपको! चलो जाओ रास्ता नापो अपना। बिना जानकारी के बहस नही करते!

Friday, May 28, 2021

कोरोना से लड़ना है तो दवाई नही ईसाई बनो!

  
तस्वीर के बारे ज्यादा जानने के लिए डूपॉलिटिक्स पर जाए

क्या हो रहा है देश में आजकल ? किसी से कुछ छिपा नहीं हैं। बड़े ही भोले और ईमानदार समझा जाता है उन्हे। वो पढ़े लिखे होते है ऐसा बोलकर सम्मान दिया जाता है। कहा ये पंडा ,पुजारी और पाखंडी ब्राह्मण लोगो लूटकर सिर्फ अपना झोला भरते है। ऐसा बोलकर हिंदुओ धर्म की बुराई बतियाने वाले लम्पटो से पूछना चाहता हू की कौन सा हिंदू संगठन आपदा को अवसर बनाकर धर्म परिवर्तन करवा रहा है ? धर्मांतरण का नंगा नाच गांव गांव गली गूचो तक चल रहा है। निशाने पर आदिवासी इलाके और दलितों की बस्ती रहती है। ये कम है ईसाई मिशनरियों का प्रचार प्रसार करने में पढ़े लिखे डॉक्टरों का नाम आ रहा है। मध्य प्रदेश में एक महिला डॉक्‍टर पर 'किल कोरोना अभियान' के दौरान ईसाई धर्म के प्रचार का आरोप लगा है। आरोप है कि वह घर-घर जाकर लोगों को दवाओं और भोजन के बारे में समझाने के साथ ईसाई धर्म का प्रचार कर रही थीं।  डाइट प्लान वाले पर्चे के पीछे हाथों से प्रभु यीशू की प्रार्थना लिख कर दे रही थीं। वह लोगों को समझा रही थीं कि ईसा मसीह की प्रार्थना करो तो कोरोना से बचे रहोगे। इस तथाकथित महिला डॉक्टर का नाम संध्या तिवारी हैै। खबरों के मुताबिक सर्वे  टीम  के साथ बाजना में जब स्थानीय लोगों ने इस पर आपत्ति जताई तो डॉ संध्या ने अपनी गलती मानने से इनकार कर दिया। हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं से उन्होंने कहा कि वे कुछ गलत नहीं कर रही हैं। उनके काम से किसी को नुकसान नहीं पहुंच रहा है। शनिवार को मामले की हिंदू संगठनों द्वारा शिकायत के बाद डॉ संध्या से थाने में पूछताछ की गई। तहसीलदार बीएस ठाकुर की जांच के बाद कलेक्टर ने सीएमएचओ को कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बाद उन्हें पद से हटा दिया गया है।
नर्स को ईसाई धर्म का प्रचार करते पकड़ा गया जो कोविड-19 ड्यूटी पर है (छवि: ट्विटर/ वायरल वीडियो का स्क्रीनग्रैब)

ये महिला चिकित्सक अकेले थोड़ी है इस काम में IMA प्रमुख डॉ. जॉनराज ऑस्टिन जयलाल खुलेआम ईसाई धर्म का प्रचार कर रहे है। स्वास्थ मंत्री हर्षवर्धन जी इनपर कार्यवाही नहीं किए पर बाबा रामदेव से माफी मंगवाने पर अड़ गए। जयलल ने 1000 हजार करोड़ का मानहानि का दावा ठोका है। सच में IMA का  फुलफॉर्म अब इंडियन मिशनरी एसोसिएशन कर दिया जाय तो कुछ गलत नही है। आपदा को अवसर बनाना कोई इनसे सीखे। आयुर्वेद से डॉ जयलाल इतना चिढ़ते है की पूछिए मत। सरकार ने कुछ आयुर्वेद वालो को सर्जरी करने के लिए मंजूरी दे दी थी तो ये अनाप-शनाप बकने लगे थे। जबकि आयुर्वेद के ज्ञाता बनारस में जन्मे आचार्य सुश्रुत को शल्य (सर्जरी) चिकित्सा का जनक माना जाता है। काशिराज दिवोदास धन्वंतरि के सात शिष्यों में प्रमुख आचार्य सुश्रुत को 'फादर आफ प्लास्टिक सर्जरी' यानी प्लास्टिक सर्जरी का पितामह भी कहते हैैं। उन्हें 2500 वर्ष पहले भी प्लास्टिक सर्जरी एवं इसमें इस्तेमाल होने वाले यंत्रों की जानकारी थी।

 डॉ.जयलाल ने क्रिश्चियनिटी टुडे के साथ अपने साक्षात्कार में बिल्कुल चौंकाने वाले और विचित्र बयान दिए, जब उन्होंने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को और अधिक ईसाई डॉक्टरों को लगाने की अपनी योजना के बारे में बात की।
इस इंटरव्यू में डॉ. जयलाल द्वारा की गई कुछ चौंकाने वाली टिप्पणियों में शामिल हैं:

‘वास्तविक विज्ञान’ की वकालत करने के लिए एक अभियान चलाने वाले डॉक्टर ने कहा, “यह केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर की कृपा है जो हमें संकट से उबरने और सुरक्षित रहने में मदद करती है और यह उनकी कृपा थी जिसने हमारी रक्षा की।”

उन्होंने क्रिश्चियनिटी टुडे को बताया, “मैं देख सकता हूँ, उत्पीड़न के बीच, कठिनाइयों के बीच, यहाँ तक कि सरकार के नियंत्रण के बीच, खुले तौर पर अपने संदेश की घोषणा करने में हमारे सामने आने वाले प्रतिबंधों के बीच भी ईसाई धर्म बढ़ रहा है।” क्रिश्चियनिटी टुडे ने बाद में इस हिस्से को एडिट किया।
जयलाल ने कहा कि सरकार आयुर्वेद में आस्था रखती है क्योंकि उसका सांस्कृतिक मूल्य और हिंदुत्व में पारंपरिक विश्वास है। डॉ. जयलाल ने कहा, “भारत सरकार, हिंदुत्व में अपने सांस्कृतिक मूल्य और पारंपरिक विश्वास के कारण, आयुर्वेद नामक एक प्रणाली में विश्वास करती है। पिछले तीन-चार सालों से उन्होंने आधुनिक चिकित्सा को इससे बदलने की कोशिश की है। अब 2030 से आपको आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी, योग और प्राकृतिक चिकित्सा के साथ इसका अध्ययन करना होगा।”

जयलाल का तर्क है कि संस्कृत भाषा पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करना एक ऐसा तरीका है जिसके माध्यम से सरकार हिंदुत्व की भाषा को लोगों के दिमाग में लाना चाहती है। डॉ. जयलाल ने क्रिश्चियनिटी टुडे को दिए एक साक्षात्कार में कहा था, “यह (आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी, योग आदि) भी संस्कृत भाषा पर आधारित है, जो हमेशा पारंपरिक रूप से हिंदू सिद्धांतों पर आधारित होती है। यह सरकार के लिए लोगों के मन में संस्कृत की भाषा और हिंदुत्व की भाषा को पेश करने का एक अप्रत्यक्ष तरीका है।”
एक इंटरव्यू में, जब पूछा गया कि ईसाई समुदाय का हिंदू राष्ट्रवादियों के साथ क्या संबंध है, तो डॉ. जयलाल ने सुझाव दिया कि हिंदुओं को यीशु और मुहम्मद को अपने भगवान के रूप में स्वीकार करना चाहिए क्योंकि उनका धर्म बहुदेववाद पर आधारित है। चूँकि हिंदू कई भगवानों में विश्वास करते हैं, इसलिए डॉ. जयलाल का मानना ​​है कि उनके लिए सहिष्णुता प्रदर्शित करना और ईसाई एवं इस्लामी प्रथाओं को आत्मसात करना मुश्किल नहीं है।

डॉ. जयलाल ने कहा, “हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि हिंदू धर्म या हिंदुत्व, बहुदेववाद के कारण अन्य धर्मों से अलग है। वे विभिन्न देवताओं को स्वीकार करते हैं। उन्हें यह स्वीकार करने या घोषित करने में कोई कठिनाई नहीं है कि यीशु देवताओं में से एक हैं या मुहम्मद देवताओं में से एक हैं। इसलिए अन्य देशों की प्रणालियों के साथ तुलना करने पर धार्मिक प्रतिबंध कम होते हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि भारत में यह उतना मुश्किल नहीं है।”

क्या ऐसे लोगों का पद पर बना रहना कही से भी उचित है। क्या इन जैसो को तत्काल बर्खास्त नही करना चाहिए सरकार को? ये सरकार की नौकरी कर रहे है या इसाई मिशनरी का प्रचार? ये डॉक्टर है या पादरी? इन जैसे का इलाज करना बहुत जरूरी है।
ज्यादा जानने के लिए क्लिक करे HAGGAI Internationl  पर ।

फंडिंग कहा से होती है?
देखा जाए तो गांव गांव में झोला लेकर घूमने वाले ये मिशनरी वाले पैसा देकर तो कभी इंडिया गेट बासमती चावल का बोड़ीया देकर धर्म परिवर्तन करवा देते है। आंध्र प्रदेश का की स्थिति किसी से छिपी नहीं है की वहा किस तरह धर्मांतरण का नंगा नाच हो रहा हैं। इन सबमे वहा के मुख्यमंत्री जगमोहन रेड्डी जो मिशनरीयो को बढ़ावा दे रहे है। सुनने में तो ये भी आ रहा है की मंदिरों का लूटा हुआ धन ये मिशनरी के मिशन में लगा रहे है। 
चर्च को मिल रहे पैसा कहां से आ रहा है, किस लिए आ रहा है तथा इसका उपयोग कैसे हो रहा है इस बात की पूरी जांच होनी चाहिए। विदेश से जो आर्थिक सहायता दे रहे हैं उनका राजनीतिक उद्देश्य क्या है इस बात की भी जांच होनी चाहिए। इस जांच रिपोर्ट के आधार पर सरकार को चर्च के राष्ट्रविरोधी गतिविधि पर आवश्यकीय रोक लगाने चाहिए। सरकार को यह कार्य जल्द से जल्द करना चाहिए, अन्यथा काफी देर हो सकती है। 

(स्रोत: डूपॉलिटिक्स, आप इंडिया, नवभारत टाइम्स आदि )

Tuesday, May 25, 2021

नेपाल: संसद भंग के बाद किस राह पर सियासत

जनसत्ता संवाद
भारत के लिए राहत: ओली की अपनी पार्टी के ही लोग जिस तरह उनका इस्तीफा चाहते थे, उसे देखते हुए चीन के लिए भी ओली के पक्ष में हस्तक्षेप करना संभव नहीं रह गया था । नेपाल का यह नाटकीय राजनीतिक घटनाक्रम जहां चीन के लिए बड़ा झटका है, वहीं भारत के लिए यह राहत का अवसर है, क्योंकि भारत विरोधी ओली सत्ता से बाहर हो चुके हैं।

नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने वहां की संसद भंग कर दी है और इसी साल नवंबर में चुनाव कराने का फैसला किया है। नेपाली कांग्रेस ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का एलान किया है। इससे पहले राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा था कि न तो प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली कार्यवाहक सरकार और न ही विपक्ष यह साबित कर पाया कि सरकार बनाने के लिए उनके पास बहुमत है। राष्ट्रपति ने इसी तरह का कदम पिछले साल दिसंबर में भी उठाया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द  कर दिया था। भारत के पड़ोसी देश में इस बड़ी सियासी कवायद को लेकर कोई टिप्पणी नहीं आई है,लेकिन 
कूटनीतिज्ञ समूचे घटनाक्रम पर निगाह रख रहे है।
चीन के समर्थन व भारत विरोधी एजंडे के जरिए नेपाल की सत्ता संभालने वाले ओली के तीन साल के प्रधानमंत्री काल का 21 मई को तब अचानक अंत हो गया, जब राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने संसद भंग कर दी। मध्यावधि चुनाव कोविड संकट के बीच होंगे। टीकाकरण न कर पाने के कारण नेपाल में कोरोना की स्थिति पहले ही सरकार के नियंत्रण के बाहर है। संविधान विशेषज्ञों ने राष्ट्रपति के फैसले की आलोचना की है। विपक्ष ने उनके निर्णय को असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक, निरंकुश और प्रतिगामी बताया है। 149 विपक्षी सांसदों ने राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाने का फैसला किया है, जो कि 275 सदस्यीय संसद में बहुमत के लिए जरूरी 137 की संख्या से कहीं अधिक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति को तीन दलों वाले विपक्ष यानी नेपाली कांग्रेस, प्रचंड के नेतृत्व वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और उपेंद्र यादव के नेतृत्व वाली जनता समाजवादी को सरकार बनाने का अवसर देना चाहिए था। सीपीएन-यूएमएल के माधव नेपाल व झलानाथ खनाल धड़े का भी विपक्ष को समर्थन था । नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व में विपक्ष ने राष्ट्रपति के सामने बहुमत के लिए जरूरी सांसदों के दस्तखत के साथ सरकार बनाने का दावा भी पेश किया, लेकिन भंडारी ने उस पर विचार नहीं किया । विपक्ष के दावे को ध्वस्त करने के लिए ओली ने राष्ट्रपति के सामने 153 सांसदों के समर्थन का दावा किया था, इसके बावजूद वह विश्वास मत नहीं जीत पाए। हालांकि राष्ट्रपति का कहना है कि चूंकि ओली और विपक्ष-किसी के भी पास बहुमत नहीं है, इसलिए उन्हें संसद भंग करने का फैसला लेना पड़ा । नेपाल में 2023 में आम चुनाव प्रस्तावित है।

विश्वास मत खोने के बाद ओली खुद संसद भंग कर मध्यावधि चुनाव कराने की बात कर रहे थे। हिंदू वोट पाने के लिए ओली पहले ही भगवान राम और सीता के जन्मस्थान के बारे में टिप्पणी कर विवाद खड़ा कर चुके हैं। ओली ने अयोध्या के नेपाल में होने का भी दावा किया है, जिसका भारत ने हालांकि तीखा विरोध किया, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान ओली नेपाल के हिंदुओं को अपने पाले में करने के लिए एक बार फिर अपना यह दावा दोहराएंगे। इसके अलावा नेपाल के नए और विवादित नक्शे का प्रचार करते हुए ओली खुद को आक्रामक राष्ट्रवादी के रूप में पेश करते हुए जताएंगे कि भारत विरोधी रुख के लिए ही उन्हें जाना पड़ा।

( स्रोत: प्रस्तुत लेख  जनसत्ता  अखबार  से  साभार)

Friday, May 21, 2021

जीवन का सार है वंदेमातरम!


                 (1)  
 मातृभूमि पर मेरा सबकुछ अर्पण 
इससे ही होगा मेरे पूर्वजों का तर्पण
निश्चल प्रेम छिपा है राष्ट्र की माटी में
लहराएगा भगवा तिब्बत की आज़ादी में
लाहौर कराची में परचम फहरा देंगे
सिंधु की प्यास रक्त से बुझा देंगे।।
गिलगिट से गारो पर्वत तक सिर्फ
भारत माता की जय के नारे होंगे...
खंडित भारत माता,स्वतंत्रता अधूरी है
महादेव का रुद्र अवतार जरूरी है।।

                (2)
हिंदू हु राजनीति का केंद्रबिंदु हु...
सदियों से लहूलुहान मेरे मां का आंचल..
क्या उत्तरांचल क्या हिमाचल...
खूनी संघर्षों से जूझता हिमालय
क्या मंदिर क्या देवालय...
काकोरम से कन्याकुमारी!
किसने पूछी हालत हमारी...
वो देखो रोती रक्त के 
आंसू माता हमारी...

          (3)
 हम कोई वक्त नहीं जो बदल जाएंगे
हे भारत माता तेरे ही गीत गाएंगे।
रक्त की एक-एक बूंद है वंदेमातरम
जीवन का सार है वन्देमातरम।।

Tuesday, May 18, 2021

तथाकथित एजेंडो का पिटारा "टूलकिट"

आज बहुत बढ़िया बारिश हुई मानो बहुत दिनों बाद सुकून मिला हो। तीन चार दिन से उमस भरी गर्मी ने हाल बेहाल कर दिया था। इस लॉकडाउन में घर से बाहर निकलना खतरे से खाली नही। सबकुछ रुक सा गया है। पढ़ाई लिखाई तो एक तरह से बर्बाद ही हो चुकी है। इस वुहान वायरस ने झकझोर कर रख दिया है। कुछ तथाकथित न्यूज मीडिया वाले भी कम नही है इसको "इंडियन वेरिएंट" नाम से प्रचारित कर रहे है। बताइए भला जिसकी उत्पत्ति चीन में हुई हो उसे इंडियन वेरिएंट कहना कहा तक ठीक है? बात यही तक नही रह जाती कोई इस कोरोना वायरस को वुहान वायरस कह देता है तो उल्टा उसपर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं।
लाशों की तलाश में निकले पत्रकार आजकल चमक रहे है। सोशल मीडिया के माध्यम से उलूल-जुलूल तथ्यों को लोगो के सामने परोस रहे है। दूसरी लहर ने इनके सूखे जीवन में बरखा कर दी और फिर से जीवन हरा-भरा हो गया है। कुछ मिल भी नही रहा था एजेंडा चलाने के लिए कुछ नही तो यही सही। अब श्मशान घाट के मुर्दे तो बोलेंगे नही कोई तो चाहिए न जो इनकी आवाज बने। पिछले साल करोड़ों भारत में लोग मर रहे थे इनके अनुसार इस बार कुछ नही तो बीस-पच्चीस लाख तो ये मार ही दिए होंगे अपने जादुई आंकड़े का हवाला देकर। देखिए क्या क्या करते है ये लोग इनको ऐसे ही थोड़ी न विदेशियों द्वारा "कोरोना पत्रकार" के टाइटल से नवाजा जा रहा है। 

अफवाह फैलाया जा रहा है की सरकार वुहान वायरस से मरने वालों के आंकड़ों को छिपा रही है। अगर सरकार को छिपाना होता चार हजार से ज्यादा लोगो की मृत्यु हो रही इसे ही न छिपा देती। लाशों को समुद्र या सागर में फेंक दिया जाता जल जीवो का आहार बनने के लिए किसी को खबर ही नहीं लगती। लाशों का तमाशा करके रोजी रोटी चलाया जा रहा है इसके विरोध में बोल दो तो "डर का माहौल है" अब कोई आजाद देश में  पत्रकारिता भी नही कर सकता क्या? पत्रकारों की आजादी छीनी जा रही है!  नकारात्मक खबर दिखाकर वाहा-वाही लूटी जा रही है दुनिया भर से कि "अरे देखो कितना बेहतरीन पत्रकार है सत्य को दिखा रहा है!" 
अफवाह क्या सरासर झूठ बोला जा रहा है इन तथाकथित पत्रकारों द्वारा। गांव समाज से  जुड़ा हुआ  व्यक्ति देखेगा इसको टेलीविजन या सोशल मीडिया पर वो यहीं मानेगा न की इतने बड़े पत्रकार है झूठ थोड़ी बोलेंगे। कुछ नही सब वामपंथी, तथाकथित लिबरलो का एजेंडा है।

कांग्रेसियों का तो टूलकिट वायरल हो रहा है सोशल मीडिया पर जैसे किसान आंदोलन में विदेशी लड़की ग्रेटा थर्नबर्ग का हुआ था। टूलकिट एक माध्यम बन गया है भारत विरोधी एजेंडा चलाने का। भाजपा नेताओं का कहना है कि ये वो दस्तावेज है, जिसके माध्यम से कॉन्ग्रेस ने अपने नेताओं को कोरोना काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कुम्भ मेला को बदनाम करने के तरीके समझाए हैं। ये टूलकिट दिखाता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी किस तरह एक महामारी के वक़्त भी राजनीति का घिनौना खेल खेलने से बाज़ नहीं आती है।इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने और देश की संस्कृति को निशाना बनाने के निर्देश दिए गए हैं। ईद की भीड़ पर चुप रहने के विशेष निर्देश भी दिए गए हैं। कॉन्ग्रेस के ‘माननियों’ द्वारा इसमें अपने आईटी सेल को ईद और कुम्भ की तुलना करने से बचने की भी सलाह दी गई है।
टूलकिट में कार्यकर्ताओं से आस-पास के अंतिम संस्कार स्थलों से ‘शवों और अंत्येष्टि की तस्वीरों का नाटकीय रूप से उपयोग’ करने के लिए भी कहा गया है। इसके अलावा, स्थानीय कॉन्ग्रेस नेताओं को अस्पतालों में बेड ‘रोकने’ के सुझाव दिए गए हैं, जिसे कॉन्ग्रेस के इशारे पर ही मरीजों को दिया जाएगा। टूलकिट में गुजरात को कोविड के खिलाफ लड़ाई में असफल राज्य बताने के साथ ही कॉन्ग्रेस नेताओं को PM CARES पर भी सवाल उठाने का निर्देश दिए गए हैं। इतना ही नही कुछ भारतीय मीडिया संस्थानों के ‘मित्र पत्रकारों’ से कोरोना के नए स्ट्रेन को ‘इंडियन स्ट्रेन’ लिखवाने के निर्देश दिए गए है ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि खराब हो और इसका नतीजा मोदी को चुनाव में उठाना पड़े।
इन सब से एक बात समझ में तो आही गई होगी की कौन कितना बड़ा दूध का धुला हुआ है। खैर गिद्धों का काम ही क्या है? 

Friday, May 14, 2021

लाशों पर पत्रकारिता

आजकल बड़ा सुर्खिया बटोर रही है अनगिनत अनजान लाशे। कुछ तो माइक और लेकर बैठ जा रहे है श्मशान घाट पर फिर होता लाइव कवरेज जलती हुई लाशों का। देश विकट परिस्थितियों से जूझ रहा और ये मनहूसियत फैला रहे है अपने खूनी खबरों से। कुछ लोग कह रहे है सत्य दिखाना गलत है क्या? नही सत्य दिखाना गलत नही है पर किसी अनजान व्यक्ति के लाश को दिखाना कितना सही है? क्या ये अपमान नही है? श्मशान घाट पर रोज लाश जलती है लोग विभिन्न कारणों से अपने प्राण गवा देते है। जितना जीवन सत्य है उतना मृत्यु भी इस बात कोई झुठला नहीं सकता है। लेकिन असल मुद्दा तो ये है कि आजकल लोग वुहान वायरस से मर रहे है। सरकार को बदनाम करने के लिए लाशों को फुटेज मिल रहा है भले ही देश का नाम खराब हो इन तथाकथित लोगो कि पत्रकारिता चलनी चाहिए।

देखा जाए तो विदेशो में भारत से ज्यादा लोगो की मृत्यु हुई है इस वुहान वायरस से। अमेरिका को ही ले लीजिए उसकी स्थिति देखिए आपको खुद पता चल जायेगा कितनी भयावह स्थिति हो गई है पर वहा की मीडिया क्या अपने आम जनता की लाशों कवरेज दे रही है? अमेरिका छोड़िए यूरोप का ही उदारहरण ले लीजिए। एक तरह से अपना एजेंडा ही चला रहे है ये लोग इनका काम सिर्फ और सिर्फ भारत की छवि बिगाड़नी है। मोदी घृणा में ये कुछ भी करने को तैयार है।विपक्षी दलों नेता वैक्सीन न लगवाने का अपील कर रहे थे कुछ दिन पहिले तक। कुछ नेता तो वैक्सीन लगवाने से नपुंसक हो रहे थे। अब क्या हो रहा है ? अब लाशों का  ढिढोरा पीटा जा रहा है की सरकार गलत कदमों की वजह से मौतें हो रही है। वैक्सीन का उत्पादन क्यों नही हो रहा है? ऑक्सीजन को लेकर भी लोग बवाल खड़ा किए थे।

अब तो गंगा में लाशों के प्रवाह कि खबरे आना शुरू हो गई है। मानो ये घटना लिबरल मीडिया के लिए वरदान साबित हुई है। अब भारत की छवि और धूमिल करेंगे ये तथाकथित पत्रकार। निश्चिंत ही ये सरकारों की जवाबदेही है की आखिर लोग लाश को जल में प्रवाहित क्यों कर रहे है? क्या मामला है की दाह संस्कार करने वाले जगहों पर जल प्रवाह किया जा रहा है? कोरोना संक्रमित लाशो के लोग नजदीक नही चाहते है कही संक्रमण फैल ना जाय पर इसका मतलब ये भी नही की उस मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी ढंग से ना हो। किसी का भी परिवार हो चाहे निर्धन असहाय ही क्यों ना हो वो अपने जिगर के टुकड़े का शव क्षत- विक्षत तो नही होने देगा। कुंठित मानसिकता वालो का कुछ कहा नहीं जा सकता उनके लिए अपने जान और माल से बढ़कर कुछ भी नही हैं भले उनका पुत्र उनके सामने क्यों ना दम तोड़ दे। कोई तो पिता की लाश ही नही लेने जा रहा है मजबूरी में अस्पलताल वाले लाश को सामाजिक संस्थाओं के हवाले कर दे रहे है। गंगा में शव बहाना कोई आज की परंपरा नहीं है बहुत पुरानी है पर जल प्रदूषण के रोकथाम के लिए इसपर सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाया गया है। जो श्मशान में बैठकर लाइव कवरेज दे सकता है मानो पिकनिक मन रहा हो उनके लिए तो ये बहती गंगा में लाशे किसी अमृत से कम थोड़ी है !

Thursday, May 13, 2021

युद्ध कहा तक टाला जाय

क्या मोनू इतना शोर क्यों मच रहा है? कुछ नही भैया सब मातम मना रहे है! आय कैसा मातम यार? कवनो कोरोना से मर गया क्या ? नही , इजराइल ने गाजा पट्टी फिलिस्तीन पर हमला कर दिया। वाह! गजब के लोग पड़े हुए है भारत में जो इजराइल भारत के साथ खड़ा रहता है उसका विरोध चल रहा है। क्या किया जाय ये ये जिहादी मजहबी किसी के नही होते है। फिलिस्तीन पर हमला क्या हुआ मानो इनकी अम्मा मर गई हो। पर इजराइल में रह रही भारतीय महिला सौम्य संतोष की इसी फिलिस्तीन हमास के आतंकी हमले में मृत्यु हो गई इसपर कोई नही बोला। बोलेंगे कैसे? शांतिप्रिय समुदाय वाले जो ठहरे!
शुरुआत में हमास ने दागे थे 130 रॉकेट, जवाबी कार्रवाई में इजराइल ने कर दिया 50 से  ज्यादा आतंकियों का सफाया।इजराइल का साफ संदेश हैं जब तक शत्रुओं का सफाया नही हो जाता शांत नही बैठेंगे, जंग जारी रहेगी। भारत में दो कौंड़ी के लोग इजराइल की विरोध बात करते है जो हमारा मदद कर रहा है इस कोरोना काल में। इस्लामी कट्टरपंथियो का भड़काऊ भाषण देख सकते है इन्हे अपने देश प्यार नही है। ये जिस देश में रहते हैं वहा बस इस्लामिक राज कायम करना चाहतें है। इन्हे बस अपना मजहब दिखता है और कुछ नही। वरना भारत में रहने वाले मुस्लिमो से क्या मतलब की इजराइल फिलिस्तीन में क्या कर रहा है?

पिछले साल ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड का कमांडर सुलेमानी को अमेरिकी सेना ने मार गिराया था इसको भी लेकर भारत के करगिल में  जुलूस निकाला जाता है, अमेरिका के खिलाफ नारेबाजी होती है। इसका क्या अर्थ निकाला जाय ? अगर कल को किसी मुस्लिम राष्ट्र से भारत का युद्ध हो गया तो तो भारत में रह रहे  तथाकथित मुसलमान क्या भारत के साथ  रहेंगे? गजवा ए हिंद का खतरनाक इरादा लेकर चलते है ये तथकथित घृणित मानसिकता वाले पंचर पुत्र जिनका सफाया होना बहुत जरूरी है। बाकी भारत और इजराइल एक दूसरे का समर्थन करते है और करते रहेंगे।

Monday, May 10, 2021

10 मई का शुभ का दिन

आजादी की पहली जंग
[अप्रैल, 1928 में 'किरती' के 1857 के गदर सम्बन्धी अंक में '10 मई का शुभ दिन' नाम से लेख छपा। इसके लेखक का नाम तो नहीं दिया गया, लेकिन यह शहीद भगत सिंह के साथियों का ही लेख है। सम्भवतः भगवतीचरण वोहरा का। वे बहुत 'अच्छे लेखक थे और 'किरती' से गहरे रूप में जुड़े हुए थे। मार्च, 1925 से लेकर जुलाई, 1928 तक भगत सिंह ने 'किरती' के सम्पादकीय विभाग में बहुत ही लगन से काम किया था। यह लेख उसी समय छपा था।.]

"ओ दर्दवाले दिल, दर्द हो चाहे हजार
दस मई का दिन भुलाना नहीं,
इसी रोज छिड़ी 'आजादी की जंग'
वक्त खुशी का गमी लाना नही।"

10 मई वह शुभ दिन है जिस दिन कि 'आजादी की जंग' शुरू हुई थी। भारतवासियों का गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए यह प्रथम प्रयास था। यह प्रयास भारत के दुर्भाग्य से सफल नहीं हुआ, इसीलिए हमारे दुश्मन इस 'आज़ादी की जंग' को 'गदर' और बगावत के नाम से याद करते हैं और इस 'आज़ादी की जंग में लड़नेवाले नायकों को कई तरह की गालियाँ देते हैं। विश्व के इतिहास में ऐसी कई घटनाएँ मिलती हैं, जहाँ आज़ादी की जंग को कोई बुरे शब्दों में याद किया जाता है। कारण यही है कि वह जंग जीती न जा सकी। यदि विजय हासिल होती तो उन जंगों के नायकों को बुरा-भला न कहा जाता, बल्कि वे विश्व के महापुरुषों में माने जाते और संसार उनकी पूजा करता।
आज दुनिया गैरीबाल्डी और वाशिंगटन की क्यों बड़ाई व इज्जत करती है, इसलिए कि उन्होंने आज़ादी की जंग लड़ी और उसमें सफल हुए। यदि वे सफल न होते तो वे भी ''बागी' और 'गदरी' आदि भद्दे शब्दों में याद किए जाते। लेकिन वे सफल हुए, इसलिए वे महापुरुषों में माने जाने लगे। इसी तरह यदि 1857 की आज़ादी की जंग में तात्या टोपे, नाना साहिब, झाँसी की महारानी, कुमार सिंह (कुँवर सिंह) और मौलवी अहमद साहिब आदि वीर जीत हासिल कर लेते तो आज वे हिन्दुस्तान की आज़ादी के देवता माने जाते और सारे हिन्दुस्तान में उनके सम्मान में राष्ट्रीय त्यौहार मनाया जाता।

हिन्दुस्तान के मौजूदा इतिहासों को, जो कि हमारे हाथों में दिए जाते हैं, पढ़कर हिन्दुस्तानियों के दिलों में उन शुर-वीरों के लिए कोई अच्छी भावनाएँ पैदा नहीं होतीं, क्योंकि उन 'आजादी की जंग' के नायकों को कातिल, डाकू, खूनी, धार्मिक जनूनी व अन्य कई बुरे-बुरे शब्दों में याद किया गया है और उनके विरोधियों को राष्ट्रीय नायक बनाया गया है। कारण यह है कि 1857 की "आजादी की जंग" के जितने इतिहास लिखे गए हैं, वे सारे के सारे ही या तो अंग्रेजो ने लिखे हैं जो कि जबरदस्ती तलवार के जोर पर, लोगों की मर्जी के खिलाफ हिंदुस्तान पर कब्जा जमाए बैठे है और या अंग्रेजो के चाटुकारों ने। जहां तक हमे पता है, इस आजादी की जंग का एकमात्र स्वतंत्र इतिहास लिखा गया, जो कि बैरिस्टर सावरकर ने लिखा था और जिसका नाम "1857 की आजादी की जंग"(The history of the Indian war of Independece 1857) था। यह इतिहास बड़े परिश्रम से लिखा गया था और इंडिया ऑफिस  की लायब्रेरी से छान-बिनकर, कई उद्धरण दे देकर सिद्ध किया गया था कि यह राष्ट्रीय संग्राम था और अंग्रेजो के राज से आजाद होने के लिए लड़ा गया था । लेकिन अत्याचारी सरकार ने इसे छपने ही नही दिया और अग्रिम रूप से जब्त कर लिया। इस तरह लोग सच्चे हालात पढ़ने से वंचित रह गए।

इस जंग की असफलता के बाद जो जुल्म और अत्याचार निर्दोष हिंदुस्तानियों पर किया गया, उसे लिखने की ना तो हमारे में हिम्मत है और न ही किसी और में। यह सब कुछ हिंदुस्तान के आजाद होने पर ही लिखा जाएगा। हां, यदि किसी को इस जुल्म, अत्याचार, और अन्याय का थोड़ा सा नमूना देखना हो तो उन्हें मिस्टर एडवर्ड थॉमसन की पुस्तक, "तस्वीर का दूसरा पहलू" ( The other side of the medal) पढ़नी चाहिए, जिसमें सभ्य अरे जो की करतूतों को उधाड़ा है और जिसमें बताया गया है कि किस तरह नील हैवलॉक, हॉट्स,हडसन कूपर और लॉरेंस ने निर्दोष हिंदुस्तानी स्त्री-बच्चों तक पर ऐसे- ऐसे कह रहे थे कि सुनकर रोए खड़े हो जाते हैं और शरीर कांपने लगता है।

इस बात का ख्याल कर के स्वतंत्र व्यक्तियों को शर्म आएगी की यह लोग भी, जिनके बुजुर्ग इस जंग में लड़े थे, जिन्होंने हिंदुस्तान की आजादी की भाजी पर सब कुछ लगा दिया था और जिन्हें इस पर गर्व होना चाहिए था, वे भी, जंग को आजादी की जंग कहने से डरते हैं। कारण्य की अंग्रेजी अत्याचार ने उन्हें इस कद्र दबा दिया था कि यह सर छुपा कर ही दिन काटते थे। इसलिए उन बुजुर्गों की यादगार मनानी जा स्थापित करनी तो दूर, उनका नाम लेना भी गुनाह समझा जाता था।

लेकिन हालात कुछ ऐसे बन गए कि विदेशों में बसे हिंदुस्तानी नौजवान 10 मई के दिन को राष्ट्रीय त्योहार बनाकर मनाने लगे। और कुछ हिनी (हिंदुस्तानी) नौजवान यहां भारत में भी त्योहार मनाने की कुछ कोशिशें करते रहे हैं। सबसे पहले, जहां तक पता चलता है, त्यौहार इंग्लैंड में "अभिनव भारत" बैरिस्टर सावरकर के नेतृत्व में सन 1907 में मनाया। इस त्यौहार को मनाने का खयाल कैसे आया, कथा इस तरह है (गुलामों में खुद तो ऐसे यादगारी दिन मनाने के ख्याल कम ही पैदा होते हैं)-

"1907 में जब अंग्रेजों ने विचार किया कि 18 57 के गदरियो पर जीत हासिल करने की पचासवीं वर्षगांठ बनानी चाहिए। सो 57 की याद ताजा करने के लिए हिंदुस्तान और इंग्लैंड के प्रसिद्ध अंग्रेजों के अखबारों ने अपने-अपने विशेषांक निकाले, किए गए और लेक्चर दिए और हर तरह के इन कथित ग दरियों को बुरी तरह कोसा गया। यहां तक की जो कुछ भी इनके मन में आया, सब ऊल- जलूल इन्होंने गदरियों के खिलाफ कहा कई कुफ्र किए। इन गालियों और बदनाम करने वाली कार्रवाई के विपरीत सावरकर ने 1857 स्तानी नेताओं-नाना साहिब, महारानी झांसी, तात्या तोपे, कुंवर सिंह, मौलवी अहमद साहिब की याद मनाने के लिए काम शुरू कर दिया, ताकि राष्ट्रीय जंग के सच्चे-सच्चे हालात बताएं जाएं। यह बड़ी बहादुरी का काम था और शुरू भी अंग्रेजी राजधानी में किया गया। आम अंग्रेज नाना साहिब और तान के अक्टूबर को शैतान के वर्ग में समझते थे, इसलिए लगभग सभी हिंदुस्तानी नेताओं ने इस आजादी की जंग को आने वाले दिन में कोई हिस्सा ना लिया। लेकिन मि. सावरकर के साथ सभी नौजवान थे। हिंदुस्तानी घर में एक बड़ी भारी यादगारी मीटिंग बुलाई गई। खवास किए गए और कश्मीर ली गई कि उन बुजुर्गों की याद में एक हफ्ते तक कोई अय्याशी की चीज इस्तेमाल नहीं की जाएगी। छोटे-छोटे पैंफलट 'ओ शहीदों' (Oh! Martyrs) से इंग्लैंड और हिंदुस्तान में बांटे गए। छात्रों ने ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज और उच्च कोटि के कॉलेजों में छातियों पर बड़े-बड़े, सुंदर- सुंदर बैज लगाए जिन पर लिखा था, "1857 के शहीदों की इज्जत के लिए!" गलियों -बाजारों में कई जगह झगड़े हो गए। कॉलेज में एक प्रोफेसर आपे से बाहर हो गया और हिंदुस्तानी विद्यार्थियों ने मांग की कि वह माफी मांगे, क्योंकि उसने उन विद्यार्थियों के राष्ट्रीय नेताओं का अपमान किया है और विरोध में सारे के सारे विद्यार्थी कॉलेज से निकल आए। कई की छात्रवृत्तिया मारी गई, कईयों ने उन्हें खुद ही छोड़ दिया। कईयों को उनके मां-बाप ने बुलवा लिया। इंग्लिश तान में राजनीतिक वायुमंडल बड़ा गर्म हो गया और हिंदुस्तानी सरकार बड़ी हैरान हो गई चैन हो गई।"
    (बैरिस्टर सावरकर का जीवन पृष्ठ 45-46, चित्रगुप्त रचित)
इन हालात की खबर जहाँ भी पहुँची, विदेशों में वहाँ-वहाँ दस मई का दिन बड़ी सज-धज से मनाया गया और लोगों में बड़ा जोश आ गया कि अंग्रेज किस प्रकार हमारे राष्ट्रीय वीरों को बदनाम करते हैं। उन्होंने रोष के रूप में मीटिंगें कीं और उनकी याद में 10 मई का दिन हर वर्ष मनाना शुरू कर दिया। काफी समय बाद अभिनव भारत सोसायटी टूट गई और इंग्लैंड में यह दिन मनाना बन्द हो गया, लेकिन कुछ समय बाद अमेरिका में हिन्दुस्तान गदर पार्टी स्थापित हो गई और उसने उसे हर बरस मनाना शुरू कर दिया गदर पार्टी के स्थापित होने के दिन से लेकर अब तक अमेरिका में यह दिन सज-धज से मनाया जाता है। बड़ी भारी मीटिंग होती है, जिसमें सब हिन्दुस्तानी एकत्र होते हैं। उसमें इन 1857 के शूर-वीरों के जीवन और कारनामे बताए जाते हैं। इस तरह इन शहीदों की याद साल-दर-साल ताजा की जाती है और ऐसी कविताएँ-

'ओ दर्द-मन्द दिल, दर्द दे चाहे हजार 
दस मई का दिन भुलाना नहीं।
इस रोज छिड़ी जंग आज़ादी की
बात खुशी की गमी लाना नहीं।'

आदि पढ़ी जाती हैं। विशेषतः 1914-15 में यह पंक्तियां प्रत्येक पुरुष की जीभ पर चढ़ी हुई थी, क्योंकि उस समय भी एक और आजादी की जंग लड़कर हिंदुस्तान को आजाद करवाना चाहते थे। लेकिन यह प्रयास भी असफल हुआ, जिसमें हजारों नौजवानों ने भारत माता फौजी स्वार्थी है लेकिन हमारी गुलामी को न काटा जा सका।
10 मई का दिन क्यों मनाया जाता है? इसका कारण क्या है कि 10 मई के दिन ही अपनी जंग शुरू हुई थी। 10 मई को मेरठ छावनी के 85 वीरों ने चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया था। उनका कोर्ट मार्शल किया गया और प्रत्येक जवान को 10 साल सख्त कैद की सजा दी गई। बाद में 11 सिपाहियों की कैद पर कर 5 साल कर दी गई थी। लेकिन यह सारी कार्रवाई थी इस तरीके से की गई थी कि जिसमें हिंदुस्तानी सिपाहियों के गर्व और मान को भारी चोट पहुंचती थी, वह दृश्य बड़ा दर्दनाक था। देखने वालों की आंखों से टप टप आंसू गिरते थे। सारे के सारे भूत बने हुए थे। वे 85 जो उनके भाई थे, सभी दुखों-सुखों में शरीक थे, उनके पैरों मैं बेड़ियां डाली हुई थी उनका अपमान सहज करना मुश्किल था, लेकिन कुछ बन नहीं सकता था।
अगले दिन "घुड़सवार और पैदल सेना ने जाकर जेल तोड़ दी, अपने साथियों को छुड़ा लिया, करो के घरों को फूंक डाला। वी जिस यूरोपीय को पकड़ सके, उसे मार डाला और दिल्ली की ओर चढ़ाई कर दी। ग़दर का आरंभ हुई इसी दिन हुआ और 10 मई से ही खेला जाता है।"

गदर आंदोलन को जानने के लिए यहां क्लिक करे-

सो पाठकों ने ऊपर लिखी घटनाओं से देख लिया है कि दस मई का दिन क्यों और कब से मनाना शुरू किया गया। पाठक यह सब हाल पढ़कर देख सकते हैं कि उनका क्या फर्ज है। क्या उन्होंने उस आज़ादी के लिए, जिसलिए कि हजारों-लाखों हिन्दुस्तानियों ने लगा दिए थे और हजारों लगाने के लिए तैयार बैठे थे, आज तक कुछ किया है या नहीं? यदि आज तक उन्होंने कुछ नहीं किया तो वे कौन-सा मुहूर्त देख रहे हैं? आज़ादी की जंग में शामिल होने के लिए तो साल के 365 दिनों में से 365 ही पवित्र हैं। हर पल भारत माता तुम्हारा इन्तजार कर रही है कि तुम उसकी जंजीरें तोड़ने के लिए अपना फर्ज़ पूरा हो या नहीं। क्या इनसान बनकर आज़ादी हासिल करोगे? इसी सवाल के जवाब से भारत का भविष्य निर्भर करता है।

(इस लेख को "भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज" नामक पुस्तक में छपा है । जिसे ब्लॉग पर  पाठको के लिए प्रकाशित के प्रकाशित किया गया है।)


Tuesday, May 4, 2021

बंगाल "बांग्लादेश" बन गया है

       (तस्वीर का स्रोत :- डूपॉलिटिक्स )

अभी अभी बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित हुआ है। ईवीएम हैक की शिकायत करने वाली तृणमूल कांग्रेस दल 200 से ज्यादा सीटों के साथ भारी बहुमत के  साथ सत्ता में आई है। पर इतना जोश और उत्साह के साथ उल्लास मनाया जा रहा है इनके कार्यकर्ताओं द्वारा की पूछिए ही मत। लोगो का घर फूंक दिया गया, बीजेपी कार्यालाओ पर तोड़ फोड़ आगजनी देखने को मिली है। भाजपा के समर्थको की हत्या, महिलाओं के रेप की खबरे आ रही है, इतना ही नही बूढ़ी औरतों को घसीट के मार जा रहा है टीएमसी के गुंडों द्वारा और बंगाल प्रशासन मौन पड़ी हुई है। हिंसा की तस्वीरे ऐसी की झकझोर कर रख दे। मानव अधिकार संस्थाएं और तथकथित गांधीवादी, लिबरल समाज के लोग नजर नही आ रहे है। कभी-कभी तो लगता हैं की आतंकियों को फांसी पर लटकाना और जिहादियों का कश्मीर में सेना द्वारा एनकाउंटर ही लोकतंत्र की हत्या है! क्रांतिकारी पत्रकार ऐसे शोर मचाकर रोते है की आतंकी का बाप पूछ बैठता है बेगम लौंडा मेरा मरा है या इनका?
कहा गए जीत की बधाई देने वाले वो तथकतिथ राजनेता जो बड़ा खुश हो रहे थे की भाजपा हार गई। भाजपा की हार जश्न मनाने वाले ममता  से क्या सवाल करेंगे हिंसा को लेकर? जिनका अस्तित्व ही नहीं बचा है वो भी भाजपा के हारने पर हंस रहे थे पर हिंसा पर चुप्पी साध ली है इन लोगो ने मानो कुछ हुआ ही नहीं है। इन मूर्खो को पता होना चाहिए कि भाजपा की सरकार भले ना बनी हो पर एक मजबूत विपक्ष बनकर खड़ा हुआ है! कही ममता नंदीग्राम से हार गई है उसका बदला तो नही उतारा जा रहा है सोचने वाली बात है ये महिला कहा तक गिरेगी।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी के नेता दिलीप घोष ने दावा किया कि इलेक्शन के बाद 24 घंटे में बंगाल में 9 बीजेपी कार्यकर्ताओं की जान गई है। वहीं, एक अन्य दावे में 6 बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या की गई है। इन बीजेपी कार्यकर्ताओं के नाम भी सार्वजनिक किए गए हैं। इनमें जगद्दल से शोवा रानी मंडल, राणाघाट से उत्तम घोष, बेलाघाट से अभिजीत सरकार, सोनारपुर दक्षिण से होरोम अधिकारी, सीतलकुची से मोमिक मोइत्रा और बोलपुर से गौरब सरकार शामिल हैं।
 मौन कब तक साधा जाए ? चुप आखिरकार कब तक रहा जाए? घरों में घुसकर महिला इज्जत उतारी जा रही है और बूढ़े लोगों को लात मारी जा रही है। क्या नया बांग्लादेश बनाने की बारी है? हाय रे ! हिंदुओ की कैसी लाचारी है अपने ही घर में अपने ही लोगों के मौत का तमाशा जारी है।
कई जगहों पर मंदिरो को तोड़ा गया है और हिंदुओ को निशाना बनाया जा रहा है।  हिंदू पलायन करने को मजबूर  हो गया है।बंगाल में चुनाव नतीजों के आते ही राजनीतिक गुंडों का आतंक चारों ओर नजर आ रहा है। ये राजनीतिक गुंडे सिर्फ भाजपा कार्यालय और कार्यकर्ताओं के घरों को ही राख नहीं कर रहे, बल्कि हिन्दू मंदिरों, उनकी दुकानों और महिलाओं को भी हिंसा का शिकार बना रहे हैं। देखा जाय तो हत्या का नंगा नाच हो रहा है।

 यकीन मानिए अब बंगाल राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनो तरह से कंगाल हो चुका है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की धरती अब जिन्ना के नाजायज औलादों के भेंट चढ़ गई है। पहले वामपंथियों ने बंगाल को लहूलुहान किया फिर ममता बनर्जी आ आई उसने तो रक्त की नदी ही बहा दी है। देखने वाली बात हैं की केंद्र में भाजपा की सरकार है प्रधामंत्री मोदी जी और  गृहमंत्री अमित शाह इसपर क्या एक्शन लेते है?  अब शांति - वांति से लोगो का पेट भर गया है! घर में घुसकर खुलेआम हत्या करने वालो का सफाया करना जरूरी हो गया है।  अभी जिन्हे मासूम जनता पर अत्याचार नही दिख रहा है तो वो चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाय ! बंगाल पुलिस मौन खड़ी ये सब देख रही है तो हिंदू संगठनों को एक होकर मोर्चा अपने हाथ में लेना  ही होगा।

Saturday, May 1, 2021

क्यों लाशनऊ तो हो सकता हैं, मगर मृत्युगढ़', 'मौत-राष्ट्र' और 'श्मशानस्थान' नहीं?


लेखक:- गौरव राजमोहन नारायण सिंह (हृतिक सिंह)


जब कोई व्यक्ति कुंठा में किसी की मृत्यु पर अपने बंद पड़े छापखाने को चलाने के निम्नस्तरीय प्रयासों में संवेदनशीलता की सारी सीमा पार कर दें, तब हम जैसे परेशान मगर स्वाभिमानी, ऐसे पुरस्कृत बकैताधिश्रेष्ठ को उन्हीं के स्तर पर उतर कर जवाब देने आना पड़ता हैं। सम्मानाधिपति, प्रत्रकार-श्रेष्ठ बकैत, जिन्होंने अपने दैवीय कधों पर राष्ट्रीय चिंतन व चेतना का सम्पूर्ण भार वहन करने का कष्ट लिया हैं, उनके लिए किसी भी शहर की अस्मिता को अपने शब्दकोशिय-ज्ञान के भंडार से चुनें, किसी निम्नस्तरीय व वीभत्सकारी शब्द से अलंकृत करना, कोई आश्चर्यजनक बात नहीं। महामारी के इस विनाशकारी प्रकोप से दूर, घर की चारदीवारी से बाहर न निकलनेवाले, अपनी गिद्ध-दृष्टि से किसी शहर के लाचार व्यक्ति की कहानी पर राजनीतिक घृणा व विष्ठा का मरहम लगाते है, तो हर उस व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के स्नातक को इस सागर-सी समावेशी भावना में संकीर्णता दिखाई देती हैं। 

अपनी संकुचित विचारधारा के मद में चूर बकैत-राज नें, लखनऊ का नाम बदल कर 'लाशनऊ' कर दिया। तर्क में बकैत-पुरुष, शुरुआत में एक बुज़ुर्ग पत्रकार की लाचारियों भारी मृत्यु से करते हैं, जिसका शोक हमें भी हैं, मगर उसमें बकैत-राज अपना प्रपंच ना जोड़े, ऐसा संभव कहाँ। पूरे देश में महामारी के इसी कठिन अवसर पर अपनी अवसादग्रस्त वैचारिक विपन्नता का प्रदर्शन, किसी की लाश से करना, क्या कोई भी सभ्य समाज में सोच सकता हैं! मगर जहाँ के पत्रकारिता जगत में स्वयंभू-श्रेष्ठाधिपति श्री बकैत-राज, अपनी दैवीय आभा से पूरे जगत को अलंकृत कर रहे हों, वहाँ न सिर्फ इसकी उम्मीद की जा सकती हैं, बल्कि इसे समाज में एक विशेष वर्ग की स्वीकारिता भी प्राप्त हो जाती हैं।

हमें मालूम हैं की कुछ चरमपंथी, नामपंथी, वामी-दंगाइयों के मसीहा पर एक व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी वाला इतना कुछ लिख दें, तो ज़ाहिर हैं, मसिहा-प्रेमियों की कुंठा कितनी होगी, राम ही जाने ! एक आम व्यक्ति अपने भावों के शब्द तभी देता है, जब किसी भी चीज़ की अति होती हैं। मानवीय मूल्यों व संवेदनाओं को बेचकर अपने हित साधना बिकुल भी सही नहीं हैं। आख़िर महामारी पूरे देश में फ़ैली है, तो फ़िर सिर्फ लखनऊ, भोपाल और अहमदाबाद ही क्यों? सिर्फ़ इनका ही नामकरण क्यों किया हैं, क्यों नहीं मुंबई का 'मुर्दाबई' नहीं हो सकता, मगर लखनऊ का 'लाशनऊ' हो सकता हैं !

हमें याद है वो दिन जब इस देश में पहली महामारी की लहर आयी थी तब देश के तथाकथित 'बेस्ट सीएम' वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों व उनकी तथाकथित रणनीति की बकैत तारीफ़ करते नहीं थकते थे। रोज़ अपने बिगहा-भर लेख और रात की पंचायत में प्रपंच ! आंकड़े हो या फ़िर आखों-देखा हाल, कौन इस बात को झुठला सकता हैं की संक्रमण महानगरों से ही फैला चाहें धारावी हो या आनंद विहार, तस्वीरें तो झूठ नहीं बोलती। हम कैसे वो दिन भूल सकते हैं, जब इन्हीं महानगरों के सर्वेसर्वाओं के 'सु-राज' में भूखे-प्यासे मज़दूर मिलों का सफ़र पैदल तय करने पर मजबूर हुए थे। उस फेक न्यूज़ को कौन भूल सकता हैं जब बकैताधिराज ने सूरत से सीवान की रेल गाड़ी को नौ दिन में पहुँचा दिया था। आज जो संक्रमण तेज़ी से फैल रहा है उसकी ज़िम्मेदारी क्या इनकी नहीं थी, सवाल तो होना ही चाहिए। आज देश में संक्रमण से सबसे ज़्यादा मृत्यु दर जिन राज्यों की हैं, वहाँ संक्रमित व्यक्ति की पुकार और समस्या पर लाशनाऊ जैसे शब्द क्यों नहीं गढ़े जाते। क्यों उन प्रभावित राज्यों की मार्मिक चर्चा नहीं होती जहां 68,000 और 16,000 से ज़्यादा मृत्यु सिर्फ सिस्टम के फ़ेल होने के कारण चली गई। हॉस्पिटल में आग लगने और हादसों पर क्यों बकैत-राज की चर्चा और दृष्टि सिर्फ कुछ राज्यों पर ही पढ़ती है। इन गैर-मामूली सवालों का उत्तर सिर्फ इतना हैं की, क्योंकि बकैत-राज को भी तो किसी की गोदी में इठलाना हैं। आख़िर इसीलिए तो 'मृत्युगढ़', 'मौत-राष्ट्र' और 'श्मशानस्थान' जैसे अलंकरण नहीं इस्तेमाल किए गए जाते। 

धूर्त और कपटी होने की एक सीमा होती है। मग़र उसकी भी सीमा लांघ चुके बकैत-राज को इस विकट परिस्थितियों में 3,693 करोड़ रुपये 43 मुनिसिपल करपोर्टरों के बंगले पर ख़र्च करनेवाली सरकार से सवाल करने से परहेज़ क्यों होता हैं। क्यों वो विज्ञापन वाली सरकार से ये नहीं पूछते की 3 दिन में ऐसा क्या हुआ की ऑक्सिजन और बेड खत्म हो गए, क्यों आखिर 8 की जगह सिर्फ 1 ही पीएसए ऑक्सीजन प्लांट लगा, क्यों पिछले 6 साल से 30,000 बेड बढ़ानेवाले, एक भी बेड न बढ़ा सकें? क्या ये आंकड़े और तथ्य नहीं? अगर आज ये महानगरों के 'बेस्ट सीएम' जो फ़िर से अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए तालाबंदी कर रहे हैं, क्या उससे जो पुनः पलायन की स्थिति हो रही है, क्या वो संक्रमण नहीं फैला रहा हैं? इसका जिम्मेदार कौन हैं? 

जिस 'लहसुन बाघ' की सोच से कुंभ और भाजपा की रैलियों पर सवाल खड़े करते हैं, क्यों नहीं यही सवाल डकैत और उनके झुंड से पूछे जाते है की संक्रमण-काल में दिल्ली बॉर्डर पर क्यों बैठे हों, वहां दो गज़ की दूरी नहीं दिखती? क्यों दीदी की रैलियों की भीड़ में कोरोना नहीं होता? आख़िर मुनाफ़क़त क्यों बकैताधिश्रेष्ठ? 

लेकिन हमें लगता हैं की इसमें बकैत-श्रेष्ठ की गलती नहीं, क्योंकि जिसकी दिलचस्पी एक राज्य के चुनावों में भी केंद्र की एन्टी-इनकम्बेंसी को ढूढ़ने की हो, उसकी पत्रकारिता भी तो 'सु-सु दर्ज़े' की ही होगी। ऐसा बौद्धिक स्तर भगवान इसी गिरोह के प्रतिपादकों और उनके शुभचिन्तकों को ही दे। सवालों से बचकर अपने मफ़ाद की खबरों चलाकर पत्रकारिता का निष्पक्ष स्तंभ बताने का ढोंग बंद करो बकैताधिराज। किसी की मृत्यु पर अपना एजेंडा ठेलने से अपना ही चहरा मलीन करते हुए कब तक अपनी निम्न पत्रकारिता करोगें। हम इस बात से कभी इनकार नहीं करते कि परेशानी में हम सभी हैं, बहुत विकट परिस्थितियों से पूरा देश परेशान हैं। मग़र इस परिस्थिति में अपनी बंद पड़ी दुकान के लिए अवसर तलाश करना ये बिल्कुल भी सही नहीं है। आज ये जो स्तिथि बानी है इसका जिम्मेदार हर कोई हैं, खुले बाज़ार में नीचे होते मास्क और भीड़-भाड़, रैलियों में जाने वाले लोगो और उनको कवर करनेवाले पत्रकार, सभी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। ज़िम्मेदार तो वो भी है जिनके ऊपर ज़िम्मेदारी थी की न सिर्फ दूसरों को उनकी जिम्मेदारी बताए बल्कि उसके लिए कुछ कठोर क़दम भी उठाए, मगर जब उनकी प्राथमिकता ही आंदोलनों के अधिकार और दूसरी अन्य गैर-जरूरी मसलों पर हो, तो आज जागने से कोई फायदा नहीं। 

आज परिस्थितियों ऐसी नहीं है जिसपर सियासत की जा सके और ना ही किसी आम आदमी के पास इतना समय हैं की वो इन सवालों से वार-पलटवार कर ऐसे बकैतो को सारे बाज़र शर्मशार करे। मगर जब सभ्य समाज में मानवीय मूल्यों की संवेदनशीलता पर 'लाशनऊ' जैसा तंज, राजनैतिक द्वेष से किया जाए, तब इसको ना तो बर्दाशत किया जा सकता हैं और ना ही भुलाया जा सकता हैं। इसलिए समाज के ऐसे धूर्त व कपटी शकुनियों की बकैती का जवाब देना आवश्यक हैं, क्योंकि खुद महात्मा गांधी जी भी इस बात पर विश्वास करते थे की शिक्षा ही मानव के सर्वांगीण विकास व अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हैं। इसीलिए हम जैसे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के स्नातकों पर ये ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती हैं ।

नोट:-  व्यंग्य शैली में लिखे इस लेख में किसी भी व्यक्ति, समाज या समूह का अपमान का आशय नहीं हैं। यह एक भाव-अभिव्यक्ति अतः आप इसे उसी परिपेक्ष्य में लें।

(लेखक  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक और हिंदी पत्रकारिता में डिप्लोमा  है।)

Friday, April 23, 2021

ये वुहान वायरस से भी ज्यादा खतरनाक है..!

देश और दुनिया में गजब का माहौल चल रहा है। हर कदम पर मौत नजर आ रही है। कोरोना वायरस एक ऐसी महामारी जिसने लोगो की तबाह कर के रख दी है। इसे वुहान वायरस कहकर बुलाया जाए  तो ज्यादा सही है। देश एम इस वायरस को लेकर खूब राजनीति हुई कुछ ने कहा ये अफवाह है! कुछ ने कहा हम वैक्सीन नही लगवाएंगे ये लोगो को नपुंसक बना देगी! कुछ लोग तो इस वायरस के सहारे सरकार बना रहे थे कह रहे थे हमारी सरकार आएगी तब हम मुफ्त में वैक्सीन लगवाएंगे ये भाजपा की वैक्सीन पर भरोसा नही हमे। जब दूसरी लहर चली तो सबकी अकल ठिकाने आ गई।
सोशल मीडिया पर लोग मोदी विरोध में इतना गिर गए हैं की देश विरोधी गतिविधियों से भी बाज नही आ रहे है। खैर इसमें कौन सा नया बात है ये रोज का हो गया है। कई लोगो की मां 3 घंटे से तड़पकर मर गई यकीन नही होता न तो देखिए इस तस्वीर में...

 गौर से देखिए कैसे एक ही पोस्ट को  कॉपी पेस्ट करके सब छापे जा रहे है। एक बहुत बड़ा एजेंडा चलाया जा रहा है देश को नीचा गिराने की जिसका मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी हो गया है। देश में जहा भाजपा की सरकार है वहा भाजपा के मुख्यमंत्रियों की  बुराइयां निकाली जा रही है और जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकार है वहा प्रधामंत्री  मोदी जी को गलत ठहराया जा रहा है की ये कोरोना को रोकने में नाकाम साबित हुए है अगर पूरी लेफ्ट लिबरल मीडिया द्वारा । पर सत्य तो यही है कि झूठ पर झूठ बोला जा रहा है तथ्य को गलत बताया जा रहा है मोदी घृणा में कुछ मुट्ठी भर लोगों ने पूरे देश को भटकाने की कोशिश की है इस महामारी के दौर में। वुहान वायरस से भी खतरनाक वायरस तो ये तथाकथित मुट्ठी भर लोग है जिन्होंने देश को कई सालो से अंदर से खोखला करने में कोई कसर नही छोड़ी है।
लाशों पर राजनीति करने से विपक्ष तनिक संकोच नहीं कर रहा है।भले ही ये विपक्ष वाले खुद संक्रमित क्यों ना जाए पर इनकी सत्ता पाने की लालसा कभी नही जायेगी। ये घटिया लोग बस देश में आराजकता फैलाने के सिवाय और किए ही क्या है?