क्रांति का स्तर तो इतना बढ़ गया है की अब ट्रैक्टर खेतो की बजाय सड़को पर करतब दिखाने लगा है। क्रांति का मुख्य फैक्टर अब ट्रैक्टर हैं। वो एक बीता जमाना था जब हरित क्रांति होती थी अब हर क्रांति के लिए ट्रैक्टर की आवश्यकता पड़ती है। वो कैसे इसकी जानकारी तो कोई बढ़िया फैक्ट चेकर ही दे सकता है। मैं तो बस यहीं कहूंगा की बिना ट्रैक्टर के जोताई नही होगी और जोताई नही होगी तो बोवाई कैसे होगी...! इस्तेमाल तो हल का भी होता था पर ये लोग बैलों पर अत्याचार नही करते बेचारा बेजुबान पशु है। आधुनिकता का जमाना है और जमाने के साथ चलना चाहिए। एक ही जीवन है कब क्या हो जाए कोई इसका ठिकाना है... कुछ लोग यही सोचकर कहते है पूरा जीवन हमे आंदोलन करते हुए बिताना है। क्रांति के बीज बोने वालों के आगे हमारे आपकी क्या बिसात? अरे कौन जात? कौन जात?.. अरे कौन जात वाला पत्रकार याद आ गया बिना इसके जिक्र के तो क्रांति की कहानी अधूरी मानी जाएगी.....! खैर मुझे क्या लेना देना मै तो ठहरा संघी जन्मजात..!
Monday, May 8, 2023
मरने से अच्छा करो धरना
जंतर मंतर पहुंचने से सारा काम हो जाता है। ना जाने कौन सा तंत्र किया हुआ है उधर पूरी भीड़ उमड़ी रहती है... अरे यार दिल्ली देश की राजधानी है इधर काम ना हुआ तो समझो कही ना होगा... हा वही कांड की ही बात कर रहा हूं एक कांड को छिपाने के लिए दूसरा कांड किया जाता है जिसको नाम दिया जाता है "आंदोलन"। तथाकथित उमड़ी भीड़ दिल्ली में जाकर बास- बल्ली गाड़कर या बम्बू के सहारे तंबू लगाकर बैठ जाती है। खाने पीने की व्यस्था भी हो जाती है। बकायदा कूलर पंखा एसी टीवी और तो और जरूरत पड़ने पर आर्केस्ट्रा का भी प्रबंध कर दिया जाता है। अब क्रांति ऐसे ही हो जायेगी क्या ? लाखो करोड़ो का खर्चा होता है भाई क्रांतिकारी ऐसे ही थोड़ी पैदा हो जाते है..!
Friday, April 14, 2023
देश के ऊपर के पंथ को रखेंगे तो आजादी खतरे में पड़ जायेगी !
26 जनवरी,1950 को भारत एक स्वतंत्र देश होगा। उसकी स्वतंत्रता का क्या होगा? क्या वह अपनी स्वतंत्रता बनाए रखेगा या फिर इसे खो देगा? यह पहला विचार है, मेरे दिमाग में आता है। ऐसा नहीं है कि भारत कभी भी एक स्वतंत्र देश नही था। मुद्दा यह है कि उसने एक बार अपनी स्वतंत्रता खो दी थी।क्या वह इसे दूसरी बार खो देगा ? यही सोच मुझे भविष्य के लिए सबसे ज्यादा चिंतित करती है। जो बात मुझे बहुत परेशान करती है, वह यह है कि न केवल भारत ने पहले एक बार अपनी स्वतंत्रता खोई है, बल्कि उसने इसे अपने ही कुछ लोगों की बेवफाई और विश्वासघात से खो दिया है। मोहम्मद-बिन-कासिम द्वारा सिंध के आक्रमण में, राजा दाहर के सैन्य कमांडरों ने मोहम्मद-बिन-कासिम के एजेंटों से रिश्वत स्वीकार की और अपने राजा के पक्ष में लड़ने से इनकार कर दिया। यह जयचंद ही थे, जिन्होंने मोहम्मद गोरी को भारत पर आक्रमण करने और पृथ्वीराज के खिलाफ लड़ने के लिए आमंत्रित किया और उन्हें अपनी व सोलंकी राजाओं की मदद का वादा किया। जब शिवाजी हिंदुओं की मुक्ति के लिए लड़ रहे थे, तो अन्य मराठा कुलीन और राजपूत राजा मुगल सम्राटों की तरफ से लड़ाई लड़ रहे थे। जब अंग्रेज सिख शासकों को नष्ट करने की कोशिश कर रहे थे, तो उनके प्रमुख सेनापति गुलाब सिंह चुप हो गए और सिख साम्राज्य को बचाने में मदद नहीं की।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा? यह चिंता इस तथ्य की अनुभूति से और भी गहरी हो जाती है कि जातियों और पंथों के रूप में हमारे शत्रुओं के अलावा हमारे पास विविध और विरोधी राजनीतिक पंथों वाले कई राजनीतिक दल होने जा रहे हैं। क्या भारतीय अपने देश को अपने पंथ से ऊपर रखेंगे?मुझे नहीं पता। लेकिन यदि पार्टियां देश के ऊपर पंथ को रखेंगी, तो हमारी आजादी दूसरी बार खतरे में पड़ जाएगी। इस घटना से हम सभी को सख्ती से बचना चाहिए। हमें अपने खून की आखिरी बूंद से आजादी की रक्षा करने के लिए दृढ़ संकल्पित होना चाहिए।
26 जनवरी, 1950 को भारत इस अर्थ में एक लोकतांत्रिक देश होगा कि उस दिन से भारत में लोगों की, लोगों द्वारा और लोगों के लिए सरकार होगी। लेकिन उसके लोकतांत्रिक संविधान का क्या होगा? क्या वह इसे बनाए रख पाएगा या खो देगा। यह दूसरा विचार है, जो मेरे दिमाग में आता है और मुझे पहले की तरह चिंतित करता है। ऐसा नहीं है कि भारत को पता नहीं था कि लोकतंत्र क्या है। एक समय था, जब भारत गणराज्यों से भरा हुआ था, और जहां राजतंत्र थे, वे या तो निर्वाचित थे, या सीमित थे। वे कभी निरपेक्ष नहीं थे। ऐसा नहीं है कि भारत संसदीं या संसदीय प्रक्रिया को नहीं जानता था। बौद्ध भिक्षु संघों के एक अध्ययन से पता चलता है कि न केवल संसदें थीं- क्योंकि संघ और कुछ नहीं, बल्कि संसदें थीं- बल्कि संघ आधुनिक समय में ज्ञात संसदीय प्रक्रिया के सभी नियमों को जानते और उनका पालन करते थे। यह भारत जैसे देश में बहुत संभव है कि यहां लोकतंत्र के तानाशाही को जगह देने का खतरा है। इस नए जन्मे लोकतंत्र के लिए यह काफी संभव है कि वह अपने स्वरूप को बरकरार रखे, लेकिन वास्तव में तानाशाही की जगह दे। यदि भूस्खलन होता है, तो दूसरी आशंका के वास्तविकता बनने का खतरा कहीं अधिक होता है।
~डॉक्टर भीमराव आंबेडकर
( बाबा साहब द्वारा 25 नवंबर ,1949 को संविधान सभा में दिए गए भाषण का संपादित अंश , स्रोत: अमर उजाला अखबार)
Thursday, March 30, 2023
कोई नही है मेरे राम सा..(भाग-1)
यदि राम सा संघर्ष हो तो
कहा तक टिक सकूंगा
ये सोचना जरूर
मेरे राम जैसा नग्न पैरो से चलना
पग पग पैरो से रक्त निकलना
उस रक्त से काटो की जगह
फूल पंखुड़ियों और
औषधियों का पनपना....!
आह धन्य हो गई धरती भी
प्रभु के चरण स्पर्श से...
कर दिया मुक्त देवी अहिल्या को
शीला से सुंदर स्त्री बन गई
मात्र इस दिव्य आत्मा के
चरणों के धूल स्पर्श से....
(१)
रख मान सम्मान निकले
राज पाट को त्याग कर
"रघुकुल रीति सदा चली आई
प्राण जाई पर वचन न जाई"
सिद्ध किया इस कथन को
पांव छू माता कैकयी के
साथ में सीता लक्ष्मण
निकले वनवास को..!
पिता ने प्राण त्याग दिया
दुख से व्यथित पुत्र मोह में
हाय रे दशा मेरे राम की
ना हाथी घोड़ा ना पालकी
पैदल ही निकल पड़े
वचन निभाने को...!
(२)
भरत खोजने निकले
बड़े भ्राता को वन में
बुद्धि मारी गई माता की
फस गई थी मंथरा के जतन में..!
देख भरत को वन में
लिया हाल चाल राम ने
भरत ने कहा लौट चलो
भैया राज पाट तुम्हारा है
पिता ने भी प्राण त्याग दिया
अब कौन आपके सिवाय हमारा है...!
सुन समाचार पिता का
दुख से व्याकुल हो गए
राम ने पिता का पिंड दान कर
भरत को लौट जाने का आदेश दिया..
कुलगुरु वसिष्ठ के साथ
माताएँ भी आ गईं
जिद पर अड़े भरत चलो भईया
हा लौट चलो राम कहती मईया..
कुलगुरु वसिष्ठ ने भी बोला-
बड़े पुत्र का धर्म निभाओ राम
वापस लौट चलो अयोध्या
कुल परंपरा को निभाओ
देखो राज पाट का काम...!!
रघुनाथ का मन नही माना
पिता के वचन को तोड़कर
कैसे आखिर लौटे चले
चौदह वर्ष के वनवास को छोड़कर...
बोले भरत जाओ संभालो
अयोध्या का ताना बाना
मुझको है महाराज का वचन निभाना..!!
लिया वचन भरत से
माता कैकेयी के प्रति
कोई दुर्भाव ना रखना
भरत बोले-
देदो भईया अपनी चरण पादुका
यही हकदार है राज सिंहासन का..!
फिर परस्पर प्रेम से मिल कर
सबने आपस में विदा लिया।।
क्या है कोई इस धरा पर मेरे राम सा
टिक सकेगा अगर संघर्ष हो मेरे राम सा !!
शिवम कुमार पाण्डेय
Wednesday, March 22, 2023
जमने जमाने की बात
इन सबके बीच तो एक बात तो ही भूल ही गए जो गांव देहात में स्टाइल मारने वाले हर लौंडे पर सटीक बैठता है " बाप जिए अंधेरा में लइका बने पॉवर हाउस" वाह रे जिंदगी का कवनो ठिकाना कब कौन बाजी मार जाय..!
एक फिल्मबाज चचा मिल गए राह चलते हुए लगे अपनी कहानी बया करने की एक जमाना था जब सिनेमा हॉल में कवनो फिलम नही छोड़ता था आज देखो दो वक्त की रोटी के लिए जद्दो-जेहद करना पड़ रहा है। मास्टर जी कहते थे बेटा पढ़ लो लेकिन हमको हमारे बड़का घराने के होने का घमंड था लेकिन जमाना एक सा नही रहता बदल जाता है। हमहु बोले अरे चचा छोड़ो सब ना तो वो अब सिनेमा हाल ही रहा वो पार्टी का दफ्तर बन गया दुकान खुल गई और और ना ही मास्टर साहब मास्टर रह गए मास्टर साहब तो अब प्रिंसिपल बन गए है। बाकी आप अपने बाप दादाओं की जायदाद पाकर अय्याशी किए जिंदगी भर और अभी कौन सा आप किसी से कम खेत परती छोड़कर और अधिया देकर नल्ले घूमेंगे तो भूखे ही मरेंगे न.... इतना कहना ही था कि चचा ताव में बोल पड़े का जमाना आ गया है आजकल का लड़का सब जबान लड़ाने लग गए है बात करने का लहजा भुला गए है..। अब सच तो कड़वा ही लगता है लोगो को चाहे इस जमाने के हो या उस जमाने के अपनी काली हकीकत सबको बुरी लगती है। चचा तो फिलमबाज थे पर आजकल के लौंडो को क्या हो गया है वो तो एक दम से "चिलमबाज" हो गये है और जाते फिरते है "दम मारो दम मिट गए हम, लगाओ सुबह शाम दस बोतल रम" जमाना है भइया जमाना क्या सकते है ..! एक जमाना तो "पुरब के ऑक्सफोर्ड" का भी था जब यहां से कलेक्टर निकलते थे लेकिन आज चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बनने की होड़ लगी हुई है..! पहले कहा पीसीएस का फॉर्म भरना ही बेइज्जती मानते थे सब भरते भी तो तो छुप छिपाकर आईएएस से नीचे बात ही नही होती थी। लेकिन तब का ऑक्सफर्ड अब खस्ताहाल हो गया है। मरे हुए शहर की रंगत थी तो यूनिवर्सिटी से ही वर्तमान में तो विरान हो चला है। ये भी एक जमाना है जहां छात्रों को सिर्फ सरकारी नौकरी से ही कमाना है। हमारा क्या है हमे तो पहले से ही जमाने ने ठुकराया है बाकी बचा खुचा जो उससे था उसने भी औकात दिखा दी बोली दूर रहो मुझसे मैने भी कह दिया अगर तुम मिल जमाना छोड़ दूंगा मैं....!
Tuesday, February 21, 2023
कोटली के अमर बलिदानी
'हंस के लिया है पाकिस्तान, लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान' की पूर्ति के लिए नवनिर्मित पाकिस्तान ने 1947 में ही कश्मीर पर हमला कर दिया। देश रक्षा के दीवाने संघ के स्वयंसेवकों ने उनका प्रबल प्रतिकार किया। उन्होंने भारतीय सेना, शासन तथा जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह को इन षड्यन्त्रों की समय पर सूचना दी। इस गाथा का एक अमर अध्याय 27 नवम्बर, 1948 को कोटली में लिखा गया, जो इस समय पाक अधिकृत कश्मीर में है। युद्ध के समय भारतीय वायुयानों द्वारा फेंकी गयी गोला-बारूद की कुछ पेटियां शत्रु सेना के पास जा गिरीं। उन्हें उठाकर लाने में बहुत जोखिम था। वहां नियुक्त कमांडर अपने सैनिकों को गंवाना नहीं चाहते थे, अतः उन्होंने संघ कार्यालय में सम्पर्क किया। उन दिनों स्थानीय पंजाब नैशनल बैंक के प्रबंधक श्री चंद्रप्रकाश कोली में नगर कार्यवाह थे। उन्होंने कमांडर से पूछा कि कितने जवान चाहिए ? कमांडर ने कहा- आठ से काम चल जाएगा। चंद्रप्रकाश जी ने कहा एक तो मैं हूं, बाकी सात को लेकर आधे घंटे में आता हूं।
चंद्रप्रकाश जी ने जब स्वयंसेवकों को यह बताया, तो एक-दो नहीं, 30 युवक इसके लिए प्रस्तुत हो गये। कोई भी देश के लिए बलिदान होने के इस सुअवसर को गंवाना नहीं चाहता था। चंद्रप्रकाश जी ने बड़ी कठिनाई से सात को छांटा; पर बाकी भी जिद पर अड़े थे। अतः उन्हें 'आज्ञा' देकर वापस किया गया। सबने अपने आठों साथियों को सजल नेत्रों से विदा किया। सैनिक कमांडर ने उन आठों को पूरी बात समझाई। भारतीय और शत्रु सेना के बीच में एक नाला था, जिसके पार वे पेटियां पड़ी थीं। शाम का समय था। सर्दी के बावजूद स्वयंसेवकों ने तैरकर नाले को पार किया तथा पेटियां अपनी पीठ पर बांध लीं। इसके बाद वे रेंगते हुए अपने क्षेत्र की ओर बढ़ने लगे, पर पानी में हुई हलचल और शोर से शत्रु सैनिक सजग हो गये और गोली चलाने लगे। इस गोलीवर्षा के बीच स्वयंसेवक आगे बढ़ते रहे।
इसी बीच श्री चंद्रप्रकाश और श्री वेदप्रकाश को गोली लग गयी। उस ओर ध्यान दिये बिना बाकी छह स्वयंसेवक नाला पारकर सकुशल अपनी सीमा में आ गये और कमांडर को पेटियां सौंप दी। अब अपने घायल साथियों को वापस लाने के लिए वे फिर नाले को पार कर शत्रु सीमा में पहुंच गये। उनके पहुंचने तक उन दोनों वीर स्वयंसेवकों के प्राण पखेरू उड़ चुके थे। स्वयंसेवकों ने उनकी लाश को अपनी पीठ पर बांधा और लौट चले। यह देख शत्रुओं ने गोलीवर्षा तेज कर दी। इससे एक स्वयंसेवक और मारा गया।
उसकी लाश को भी पीठ पर बांध लिया गया। तब तक एक अन्य गोली ने चौथे स्वयंसेवक की कनपटी को बींध दिया। वह भी मातृभूमि की रक्षा हित बलिदान हो गया। इस दल के वापस लौटने का दृश्य बड़ा कारुणिक था। चार बलिदानी स्वयंसेवक अपने चार घायल साथियों की पीठ पर बंधे थे। जब उन्हें चिता पर रखा गया, तो 'भारत माता की जय' के निनाद से आकाश गूंज उठा। नगरवासियों ने फूलों की वर्षा की।
इन स्वयंसेवकों का बलिदान रंग लाया। उन पेटियों से प्राप्त सामग्री से सैनिकों का उत्साह बढ़ गया। वे भूखे शेर की तरह शत्रु पर टूट पड़े। कुछ ही देर में शत्रुओं के पैर उखड़ गये और चिता की राख ठंडी होने से पहले ही पहाड़ी पर तिरंगा फहराने लगा। सेना के साथ प्रातःकालीन सूर्य ने भी अपनी पहली किरण चिता पर डालकर उन स्वयंसेवकों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
स्रोत: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
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