Tuesday, November 24, 2020

उड़ता सिनेमा।

लेखक: शिवम कुमार पाण्डेय
अरे क्या हुआ? इतना हंस काहे रहे हो?_ हंसे नहीं तो का करे भैया खबर ही ऐसी है। कौन सी खबर जरा हमें भी बताओ? लीजिए अखबार देखिए  सेलिब्रिटीज लोगो का हाल है दूसरों को ज्ञान देते है फिरते है और अपने नशे में मस्त रहते हैं। बिल्कुल सही कह रहो हो जब फिल्म शुरू होता है तब चेतावनी दी जाती है "शराब ,तंबाकू, खैनी, गुटखा आदि का नशा करने से कैंसर होता है फिल्म में दर्शाए ऐसे दृश्यों का हम किसी भी प्रकार से समर्थन नहीं करते है"। लेकिन असल जिंदगी में तो इससे भी ऊंचे शौक रखते है ये सिनेमा वाले। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियो को शर्म भी नहीं आती है बड़े गर्व से कहते है "सिनेमा समाज का आइना है"। इसी आइने में गलत तथ्य ,झूठ- कपास, बकवास इतिहास दिखाया  जाता है जिसको देखकर लोग गलत धारणाएं बनाने लग जाते है। सच मे ये बॉलीवुड बजबजाती हुई नाली की तरह है जिसका काम केवल हिन्दू धर्म , ब्राह्मण, समाज को गाली देना और हिन्दू संस्कृति का मजाक उड़ाना है। एक नया वेब सीरीज निकला है "A suitable boy" उसमे एक प्रेमी जोड़ा अश्लील हरकतें करते हुए मंदिर में दिखाए गए है और सबसे बड़ी बात ये कि लड़का मुस्लिम रहता है और लड़की हिन्दू।लव जिहाद का मामला वैसे ही खुलकर सामने आ रहा है ऊपर से ये सब मनोरजंन के नाम पर परोसा जा रहा है। किसी न्यूज चैनल  पर कुछ मुस्लिम धर्मगुरु ‘A Suitable Boy’ में मंदिर के अंदर फ़िल्माए गए चुंबन दृश्य का समर्थन कर रहे थे। फिर उनसे पूछा गया कि क्या वह ऐसा मस्जिद में होने देंगे? तो तुरंत आवाज आयी ‘देखिए धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो ये ग़लत है और ऐसा बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए’। हा, जब अपने पर आता तब पता चलता है क्या गलत है और क्या सही है?

ये छोटी मछली - बड़ी मछली कुछ नहीं होता है जो गलत है उसके ऊपर सख्त कार्रवाई हो रही है एनसीबी द्वारा। आगे देखो अखबार में क्या दिया है "उपनगरीय गोरेगांव में मादक पदार्थ तस्करों के यहां छापेमारी के दौरान एनसीबी के अधिकारियों की एक टीम पर 50 लोगों के एक समूह ने कथित तौर पर हमला कर दिया। इसमें दो अधिकारी घायल हो गए। एनसीबी के एक अधिकारी ने सोमवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रविवार की शाम हुई इस घटना के सिलसिले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है। एनसीवी के जोनल निदेशक समीर वानखेड़े और पुलिस अधीक्षक विश्व विजय सिंह समेत पांच सदस्यीय एक टीम छापेमारी के लिए गई थी। अधिकारी ने बताया कि एनसीबी की एक टीम जैसे ही गोरेगांव में भगत सिंह नगर क्षेत्र में पहुंची तो महिलाओं समेत लगभग 50 लोग वहां एकत्र हुए और इसके बाद हमलावरों ने उन पर हमला कर दिया।"
अरे भैया ये बहुत बड़ी साजिश है जिसका पूरी तरह खुलासा होना बाकी है। मेरे ख्याल अभी बहुत नाम आएंगे चौंकाने वाले। क्यों नहीं जरूर इस देश कि जनता को भी चाहिए ऐसे लोगो का और इनको समर्थन करने वालो का पूर्ण तरीके से बहिष्कार करें। ये जिहाद और नशा देश को बर्बाद कर देगा दोनों खात्मा होना जरूरी है। सिनेमा वालो को चाहिए कि ढंग का कोई फिल्म बनाए वरना झुनझुना बजाते रह जाएंगे..!  हाहा हा हा..।

Thursday, November 19, 2020

सामाजिक समता और हिन्दू संगठन : श्री. बालासाहेब देवरस

(प. पू. सरसंघचालक श्री. बालासाहेब देवरस द्वारा 1974 में पूना की ‘वसंत व्याख्यानमाला’ में दिया गया भाषण।)
आपने मुझे वसंत व्याख्यानमाला के इस वर्ष के भाषण-सत्र में आमंत्रित कर जो गौरव प्रदान किया है तथा यहां अपने विचार व्यक्त करने का सुअवसर दिया है, उसके लिये मैं आपका आभारी हूं।

यहां के आयोजकों ने मुझे कुछ विषय सुझाये थे, उनमें से मैंने 'सामाजिक समता और हिन्दु-संगठन'-विषय को चुना। क्योंकि राष्ट्र के भविष्य तथा विशेष रूप से हिन्दु-संगठन की दृष्टि से यह विषय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्र के कल्याणार्थ हिंदु-संगठन आवश्यक है। अत: उससे संबंधित सभी प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं। किन्तु इनमें भी सामाजिक समता का विषय नाजुक और सामयिक होने के कारण, वह मुझे अधिक महत्त्व का प्रतीत हुआ। इसीलिये मैंने सोचा कि ऐसे विषय पर विचार व्यक्त करने का सुवअसर मुझे नहीं चूकना चाहिये।

हिन्दु कौन है ? हिन्दु शब्द की व्याख्या क्या है ? इस पर अनेक बार काफी विवाद खड़े किये जाते हैं, ऐसा हम सभी का सामान्य अनुभव है। हिन्दु शब्द की अनेक व्याख्यायें हैं, किन्तु कोई भी परिपूर्ण नहीं है। क्योंकि हरेक में अव्याप्ति अथवा अतिव्याप्ति का दोष है। किन्तु कोई सर्वमान्य व्याख्या नहीं है, केवल इसीलिये क्या हिन्दु समाज के अस्तित्व से इन्कार किया जा सकेगा ? मेरी यह मान्यता है कि हिन्दु समाज है और उस नाम के अन्तर्गत कौन आते हैं, इस सम्बन्ध में भी सभी बन्धुओं की एक निश्चित व सामान्य धारणा है, जो अनेक बार अनेक प्रकारों से प्रकट होती है। कुछ वर्ष पूर्व सरकार ने 'हिन्दु कोड' बनाया। उसे बनाने में पं. नेहरू तथा डॉ. आम्बेडकर आदि अगुवा थे। यहां के बहुसंख्य समुदाय के लिये यह कोड लागू करने के विचार से अन्ततोगत्वा उन्हें इस कोड को 'हिन्दु कोड' ही कहना पड़ा तथा वह किन लोगों को लागू होगा, यह बताते समय उन्हें यही कहना पड़ा कि मुसलमान, ईसाई, पारसी तथा यहुदी लोगों को छोड़कर अन्य सभी के लिये-अर्थात् सनातनी, आर्य समाजी, जैन, सिक्ख, बौद्ध-सभी को यह लागू होगा। आगे चलकर तो यहां तक कहा है कि इनके अतिरिक्त और जो भी लोग होंगे, उन्हें भी यह कोड लागू होगा। 'हमें यह लागू नहीं होता' यह सिद्ध करने का दायित्व भी उन्हीं पर होगा।

उन्हें ऐसा विचार क्यों करना पड़ा ? तो उनके ध्यान में यह बात आयी कि ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सभी दृष्टियों से इन सभी बन्धुओं के लिये सर्वसमावेशक शब्द हिन्दु ही है। इसीलिये हिन्दु शब्द का उच्चारण करते ही, ये सारे लोग उसमें आते हैं, ऐसा मानकर ही हम इस विषय का विचार करेंगे।

हम सभी हिन्दुओं को संगठित करना चाहते हैं। संगठन याने मोर्चा अथवा सभा नहीं। वहां भी लोग एकत्रित होते हैं और संगठन में भी एकत्र आते हैं। अथवा यह कहना अधिक उचित होगा कि संगठन में उन्हें एकत्रित लाना पड़ता है। एकत्रित होने पर वे एकत्र, साथ-साथ कैसे रहेंगे, उन्हें एक-साथ क्यों रहना चाहिये, इसका भी विचार करना पड़ता है। इस एकता का आधार क्या हो सकता है ?

अपनी यह मातृभूमि है, हम उसके पुत्र हैं, और हजारों वर्षों से हम यहां एक साथ रहते आये हैं। इस दीर्घ कालखण्ड में हमने भूतकाल का उज्ज्वल इतिहास निर्माण किया है, यह भावनात्मक अधार तो होगा ही, किन्तु क्या यही पर्याप्त है ? क्या इस भावना के साथ ही कोई व्यावहारिक पक्ष होना आवश्यक नहीं ? सब लोगों को 'हम सभी एक हैं' का भावनात्मक बोध होना जैसा आवश्यक है, वैसा ही प्रत्यक्ष व्यवहार में भी इस एकता का अनुभव सदा सहज रूप से होना चाहिये। अपने दैनंदिन व्यवहार में जब तक हम सभी को अपनी इस 'एकता' की अनुभूति नहीं होती, तब तक एकता की नींव मजबूत और चिरस्थायी नहीं हो सकती। यदि आप ऐसा समझते हैं, और मुझे विश्वास है कि आप भी ऐसा ही सोचते हैं, तो फिर इस दृष्टि से हममें क्या कमी है, इसका विचार करना भी आवश्यक हो जाता है।

विगत अनेक शताब्दियों के इतिहास में मुट्ठीभर मुसलमानों तथा अंग्रजों ने इस देश पर राज किया, हमारे अनेक बांधवों का धर्मांतरण किया तथा हम लोगों के बीच ब्राह्मण-गैर ब्राह्मण, सवर्ण-अस्पृश्य आदि भेद पैदा किये। इस सम्बन्ध में केवल उन लोगों को दोष देकर हम अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकते। परकीयों से सम्बन्ध आने, उनके द्वारा बुध्दि-भेद किया जाने से ही यह सब हुआ, ऐसा कहने मात्र से क्या होगा ? अन्य समाज और संस्कृति के साथ आज नहीं तो कल सम्बन्ध तो आनेवाला ही था। बर्लिन में जिस भांति दीवार खड़ी की गयी, वैसा होना तो संभव ही नहीं था। दीवार तो वे खड़ी करते हैं, जिन्हें दूसरों के दर्शन और विचारों से भय लगता है। दोनों पध्दतियां एक साथ चलने में ही उनकी श्रेष्ठता प्रस्थापित होती है। जो पध्दति भय के कारण अपने चारों ओर दीवार खड़ी करती है, वह तो स्वयं ही अपनी हीनता स्वीकार कर लेती है। अत: अन्य लोगों पर दोषारोपण करने की अपेक्षा अन्तर्मुख होकर हमारे किन दोषों का उन्होंने लाभ उठाया, इसका भी हमें विचार करना होगा। इसके लिये सामाजिक विषमता भी कारणीभूत रही है, ऐसा हमें स्वीकार करना होगा। वर्ण-भेद, जाति भेद, अस्पृश्यता ये सभी सामाजिक विषमता के ही आविष्कार हैं। आज भी समाज में विचरण करते समय इन प्रश्नों की ठोकर हमें लगती है, यह हम सभी का अनुभव है।

अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही संस्कृति के हम अभिमानी हैं। सम्पूर्ण हिन्दु समाज को अपनी संस्कृति का अभिमान रखना चाहिये, यह हमारी अपेक्षा है। हम समझते हैं कि हिन्दु को यदि सच्चे अर्थ में हिन्दु के रूप में जीवित रहना है, तो उसे अपनी संस्कृति के शाश्वत-जीवन मूल्यों को, जो प्रदीर्घ काल के आघातों और ऐतिहासिक तथा राजनीति की उथल-पुथल के बावजूद टिके रहे, बने रहे, उनकी विरासत को नहीं छोड़ना चाहिये। ऐसा सोचना उचित ही है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि 'जो पुराना है वह सोना है', वह अपरिवर्तनीय और शास्त्रशुद्ध है।

'पुराणमित्येव न साधु सर्वम्' अर्थात् पुराना है इसीलिये अच्छा है, ऐसा मानने का कोई कारण नहीं। यह भी सोचने का तरीका उचित नहीं कि पुरानी बातों से अब तक हमारा गुजारा होता रहा, अत: आज ही नये ढंग से सोचने की क्या आवश्यकता है ? 'तातस्य कूपोऽ यमिति ब्रुवाणा: क्षारं जलम् कापुरुषा: पिबन्ति' अर्थात् यह कुआं मेरे पिताजी का है, उसका जल खारा हुआ तो क्या हुआ ? उन्होंने इसका जल पीया है, उनका कुछ नहीं बिगड़ा। अत: हम भी उसी जल को पीयेंगे। इस प्रकार का दुराग्रह करना ठीक नहीं होगा। किन्तु समाज में अनेक प्रकार के लोग रहते हैं। एक वर्ग किसी भी नयी बात को स्वीकार करने को तैयार रहता है। अन्य प्रकार के लोगों में पुरानी बातों से चिपके रहने की वृत्ति होती है। 'परीक्षान्यतरत् भजन्ते'- ऐसा विचार कर अर्थात् कसौटी पर कस कर, सदसद्विवेक बुध्दि से किसी वस्तु का त्याग अथवा स्वीकार करना ही अधिक उचित होगा। अधिकाधिक लोग इसी पद्धति से विचार और आचार करने हेतु प्रवृत्त हों, ऐसा हमें प्रयास करना चाहिये।

मुझे यह जानकारी मिली है कि यहूदी लोगों ने विशिष्ट कालखण्डों के बाद बार-बार अपने धर्मग्रन्थों और धार्मिक आचारों की जांच की है, पुनर्मूल्यांकन किया है। धर्मग्रंथ के शब्द तो बदलना संभव नहीं था। किन्तु उन्होंने नयी व्याख्यायें (Interpretations) तैयार कीं। प्राचीन काल में अपने देश में भी इसी प्रकार का धर्मचिंतन, धर्ममंथन किया ही गया होगा। उन्होंने इस बात का भी विचार किया होगा कि अपने धर्म की शाश्वत बातें कौन सी हैं और परिवर्तनीय कौन सी ? अन्यथा इतनी स्मृतियां तैयार नहीं हो पातीं। अपने देवताओं में परिवर्तन हुआ है। ऋग्वेद के इन्द्र, वरुण, अग्नि प्रभृति देवताओं के बजाय विष्णु और शिव की उपासना चल रही है। शैव और वैष्णवों के बीच शत्रुता का व्यवहार था, किन्तु आद्य शंकराचार्यजी ने समन्वय स्थापित कर पंचायतन पूजा प्रचलित की। अब तो घर-घर में शिवरात्रि के साथ ही, शयनी व प्रबोधिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है।

प्राचीन ग्रन्थों में, पुराणों में जो कथायें बतायी गयी हैं, उन्हें हम ज्यों-की-त्यों सही मानने के लिये तैयार नहीं। अपने पुराणों में चन्द्र-ग्रहण की कथा है। राहु चन्द्रमा को लीलता है, इसीलिये चन्द्र को ग्रहण लगता है। अत: शालाओं में बच्चों को चन्द्र-ग्रहण क्यों लगता है यह पढ़ाते समय, क्या इस कथा को भी पुस्तक में शामिल किया जायेगा ? ऐसी बात नहीं कि रुढ़िवादिता अथवा धर्मग्रंथ के हर शब्द पर अक्षरश: विश्वास और आस्था रखना कोई अपने ही देश में है। सन् 1925 में अमेरिका में एक बड़ा रोचक मामला चला (रीडर्स डाइजेस्ट जुलाई 1962)। वहां एक राज्य में किसी शिक्षक पर मामला चलाया गया। उस पर आरोप लगाया गया कि बाइबिल में सृष्टि और मनुष्य की उत्पत्ति की जो कहानी है, उसके विरुद्ध वह 'ईव्होल्यूशन' की 'थ्योरी' बताता है। उसे दण्ड भी दिया गया। किन्तु आज तो सभी ईसाई बाइबिल में वर्धित सृष्टि व मनुष्य की उत्पत्ति की कहानी को अमान्य करते हैं। फिर भी बाइबिल को वे अमान्य नहीं करते। यह बात ध्यान में रखने योग्य है।

अनेक बातें ईश्वर ने निर्माण की हैं, ऐसा कुछ लोग मानते हैं। वे अपरिवर्तनीय हैं, यही समझाने का उनका उद्देश्य रहता है। किन्तु ईश्वर ने ही स्वयं कहा है कि 'धर्म-संस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे'। धर्मग्लानि के बाद धर्म-संस्थापना का यह अर्थ तो नहीं कि पुरानी बातों को ही फिर से लाया जायेगा, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा। अंतिम पैगम्बर की भांति, 'मैं अंतिम अवतार हूं,' ऐसा तो किसी ने नहीं कहा। प्राण-तत्त्व तो पुराने ही होंगे, क्योंकि वे शाश्वत एवं सनातन हैं। किन्तु उनका आविष्कार और अभिव्यक्ति में परिवर्तन होगा। इस परिवर्तन का हमें स्वागत करना चाहिये।

प्राचीन काल में जो व्यवस्थायें निर्माण हुईं वे उस उस काल की आवश्यकता के अनुरूप तैयार की गयीं, ऐसा मुझे लगता है। आज यदि उनकी आवश्यकता न हो, उनकी उपयोगिता समाप्त हो गयी हो, तो हमें उनका त्याग करना चाहिये। अपनी वर्ण-व्यवस्था का ही विचार करे तो हमारे ध्यान में आयेगा कि समाज में चार प्रकार के कार्य समाज-धारणा के लिये अच्छे ढंग से होना आवश्यक है, ऐसा मानकर, तथा समाज के विविध व्यक्तियों तथा व्यक्तिसमूहों की स्वाभाविक क्षमता और प्रवृत्ति को देखते हुए ही इस प्रकार की व्यवस्था निर्माण हुई। व्यवस्था में वर्गीकरण का होना अपरिहार्य है। (System entails Classification) किन्तु उस व्यवस्था में भेदों की कल्पना कदापि नहीं थी। कुछ विद्वानों के मतानुसार प्रारंभ में यह जन्मानुसार नहीं थी। किन्तु आगे चलकर इस विशाल देश में तथा जनसमूह में गुणों याने 'Aptitude' को कैसे पहचाना जाये, यह प्रश्न विचारशील लोगों के मन में उठा होगा। किसी भी विशिष्ट परीक्षा-पध्दति (System of tests) के अभाव में उन्होंने शायद जन्म से ही वर्ण का बोध स्वीकार किया होगा, ऐसा मैं समझता हूं। किन्तु उसमें ऊंच-नीच का भाव नहीं था। बल्कि, सहस्त्रशीर्ष, सहस्त्राक्ष, सहस्त्रपाद ऐसे विराट समाज के ये सभी महत्त्वपूर्ण अवयव हैं यही भव्योदात्त कल्पना इसके पीछे रही है। अत: यह स्पष्ट है कि इसमें, पैरों से जंघायें श्रेष्ठ और जंघाओं से हाथ अथवा हाथों से सिर श्रेष्ठ है, इस प्रकार की विपरीत अथवा हास्यापद भावना कदापि नहीं थी। इसी कारण एक जमाने में यह व्यवस्था सर्वमान्य थी और कुछ काल तक सुचारू रूप से चली थी। इसके लिये कुछ Checks and balances की व्यवस्था थी। ज्ञान-शक्ति को पृथक् किया गया। उसे सम्मान तो दिया, पर साथ में दारिद्रय भी दिया। दंड शक्ति को पृथक् किया और उसे धन-शक्ति से दूर रखा। धन-शक्ति को दंड-शक्ति से नहीं मिलने दिया। इस प्रकार जब तक यह Checks and balances ठीक तरह से काम करते रहे तब तक यह व्यवस्था भी सुचारू रूप से चली। किन्तु बाद में इस ओर दुर्लक्ष होने से तथा अन्य कारणों से यह व्यवस्था टूट गयी।

जन्म से अर्थात् आनुवंशिकता से गुण-संपदा आती है, इस प्रकार का विचार पूर्वजों ने किया, किन्तु उस काल में भी उन्होंने जन्मत: आने वाले गुणों की मर्यादा को समझा था। इसीलिये, 'शूद्रोपि शील-सम्पन्नो गुणवान् ब्राह्मणों भवेत्। ब्राह्मणोपि क्रियाहीन: शूद्रात् प्रत्यवरो भवेत्' ऐसा कहा अथवा 'जातिर्ब्राह्मण इति चेत् न'-जन्म से ब्राह्मण होता है, ऐसा कहना उचित नहीं यह बताते हुए ऋष्यशृंग, वसिष्ठ, विश्वामित्र, अगस्ति आदि अन्य जातियों में जन्में लोग भी धर्माचरण के कारण ब्राह्मण ही हुए, यह स्पष्ट किया है।

पुराणों में ऐसी कथा है कि शूद्र स्त्री का पुत्र महीदास अपने गुणों के कारण द्विज बना तथा उसने 'ऐतरेय' ब्राह्मणों की रचना की। जिसके पिता का पता नहीं, ऐसे जाबाल का उपनयन संस्कार कर, उसके गुरु ने उसे द्विज बनाया - उपनिषद की यह कथा भी प्रसिध्द है। प्राचीन पध्दति में आवश्यक लचीलापन होने के कारण ही यह संभव हुआ होगा।
किन्तु आज तो अनेक कारणों से परिस्थिति पूर्णतया बदल गयी है। इस कारण नये युग, नये काल के अनुरूप विचार करना ही उचित होगा। छपाई-कला के कारण पुस्तकों द्वारा शिक्षा संस्थाओं में ज्ञानार्जन शुरू हुआ, यंत्र-युग के कारण घर-घर में होने वाले काम कारखानों में होने लगे। नये आविष्कार हुए। नया विज्ञान आया। इस कारण आनुवंशिकता के साथ ही आसपास का वातावरण और अन्य बातों का महत्त्व बढ़ गया।

यह सही है, कि प्रकृति के कारण अर्थात् आनुवंशिकता के कारण कुछ विषमता निर्माण होती है। किन्तु उस विषमता का शास्त्र बनाना उचित नहीं। यदि मनुष्य के प्रयास प्रकृति द्वारा निर्मित विषमता को स्थायी बनाने में हुए, तो यह कोई उसका बड़प्पन या महानता नहीं होगी। इसलिये मनुष्य को यही विचार करना चाहिये कि प्रकृति के नियमों का अध्ययन कर, यह प्राकृतिक विषमता कैसे दूर की जा सकती है, उसे किस प्रकार सहनीय बनाया जा सकेगा ? विषमता का दर्शन तैयार करना उचित नहीं होगा। दुर्बल अथवा निर्धन परिवार में जन्में बालक को भी सभी प्रकार की सुविधायें उपलब्ध कराने के प्रयास, विश्व के सभी समझदार समाजों में होते हैं। यदि किसी जाति विशेष में जन्म लेने के कारण कुछ Handicaps अथवा न्यूनतायें निर्माण होती हों, तो वह व्यवस्था चल नहीं पायेगी। उन न्यूनताओं को आनुवंशिक या नैसर्गिक कहकर उनका समर्थन करना भी आज के युग में भूल होगी। विशिष्ट प्रकार की शिक्षा-प्रशिक्षा द्वारा तथा अन्य व्यवस्था से, पीढ़ियों से चले आ रहे गुण बदले जा सकते हैं। जापान के लोग ठिंगले समझे जाते थे। किन्तु द्वितीय महायुध्द के बाद अमेरिकी जनता से उनका सम्बन्ध आया और उनके रहन-सहन तथा खान-पान की आदतों में काफी परिवर्तन हो गया। इससे उनकी औसत ऊंचाई भी बढ़ गयी। यह बात सिध्द हो चुकी है। पहले अपने देश मे तथा कुछ अन्य देशों में भी कुछ जातियों (Races) को Martial कहने की पद्धति थी। प्रथम तथा द्वितीय महायुध्द इतने बड़े पैमाने पर हुए कि Total mobilization अथवा Conscription करके ही बड़ी-बड़ी सेनायें खड़ी करनी पड़ी तथा हम जानते हैं कि ये सभी लोग Martial Races की भांति ही लड़े।

वास्तव में देखा जाये तो आज की सम्पूर्ण परिस्थिति इतनी बदल चुकी है कि समाजधारणा के लिये आवश्यक ऐसी जन्मत: वर्ण-व्यवस्था अथवा जाति-व्यवस्था आज अस्तित्व में ही नहीं है। सर्वत्र अव्यवस्था है, विकृति है। अब वह व्यवस्था केवल विवाह सम्बन्धों तक ही सीमित रह गयी है। इस व्यवस्था का Spirit समाप्त हो गया है, केवल Letter ही शेष है। भाव समाप्त हो गया, ढांचा रह गया। प्राण निकल गया, पंजर बचा है। समाजधारण से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। अत: सभी को मिलकर सोचना चाहिये कि जिसका समाप्त होना उचित है, जो स्वयं ही समाप्त हो रहा है, वह ठीक ढंग से कैसे समाप्त हो।

अपने यहाँ रोटी-बेटी-व्यवहार शब्द प्रचलित है। पहले रोटी-व्यवहार भी जाति तक ही सीमित था। किन्तु अब वे बन्धन टूट चुके हैं और रोटी-व्यवहार सभी जातियों में शुरू हो गया है। इस कारण जाति-भेद की तीव्रता कम होने मे काफी मदद मिली है। अब विभिन्न जातियों के बीच बेटी-व्यवहार भी शुरू हो गया है। यह अधिक पैमाने पर हुआ तो जाति-भेद समाप्त करने तथा सामाजिक एकरसता निर्माण होने में वह अधिक सहायक होगा, यह स्पष्ट ही है। अत: रोटी-बेटी व्यवहार के बंधनों का टूटना स्वागतार्ह है। किन्तु बेटी-व्यवहार, रोटी-व्यवहार जैसा आसान नहीं है। यह बात सभी को ध्यान में रखकर, संयम न खोते हुए, उसके अनुकूल आचरण करना चाहिये। विवाह कहते ही अच्छी जोड़ी (Good Match) का विचार होना स्वाभाविक ही है। अत: ऐसे विवाह शैक्षणिक, आर्थिक और जीवन-स्तर की समानता के आधार पर ही होंगे। जिस मात्रा में लोगों के निवास की बस्तियाँ एक स्थान पर होकर साथ-साथ रहने की प्रवृत्ति बढ़ेगी, समान शिक्षा सुविधा के साथ लोगों का जाति-निरपेक्ष आर्थिक-स्तर ऊंचा उठेगा उतनी मात्रा में ही यह स्वाभाविक रूप से संभव हो सकेगा। कानून बनाकर अथवा धन का लालच दिखाकर यह संभव नहीं। न ही यह कोई जल्दबाजी का विषय है। यह बात सभी को ध्यान मे रखनी चाहिये। सभी लोगों को, सामाजिक-परिवर्तन के इस प्रयास में अपना-अपना योगदान देना होगा।

अस्पृश्यता (छुआछूत) अपने समाज की विषमता का एक अत्यंत दु:खद और दुर्भाग्यजनक पहलू है। विचारशील लोगों का मत है कि अति प्राचीन काल मे भी इसका अस्तित्व नहीं था तथा काल के प्रवाह में यह किसी अनाहूत की भाँति समाविष्ट होकर रूढ़ बन गयी। वास्तविकता कुछ भी हो, किन्तु हमें यह स्वीकार करना चाहिये कि अस्पृश्यता एक भयंकर भूल है और उसका पूर्णतया उन्मूलन आवश्यक है (Lock, Stock & Barrel)। इस सम्बन्ध में अब कहीं भी दो मत नहीं हैं। अब्राहम लिंकन ने दास-प्रथा के सम्बन्ध मे कहा था, "If slavery is not wrong then nothing is wrong". उसी तरह हमें भी यह कहना चाहिए की 'अगर अस्पृश्यता गलत नहीं तो दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है'।  

अत: हम सभी के मन में सामाजिक विषमता के उन्मूलन का ध्येय अवश्य होना चाहिये। हमें लोगों के सामने यह स्पष्ट रूप से रखना चाहिये कि विषमता के कारण हमारे समाज में किस प्रकार दुर्बलता आयी और उसका विघटन हुआ। उसे दूर करने के उपाय बतलाने चाहिये तथा इस प्रयास में हरेक व्यक्ति को अपना योगदान देना चाहिये।

अपने धर्मगुरु, संत, महात्मा और विद्वानों का जनमानस पर प्रभाव है। इस कार्य में उनका सहयोग भी आवश्यक है। पुरानी बातों पर उनकी श्रद्धा और वे बनी रहें इतना आग्रह ठीक है। किन्तु हमारा उनसे यही अनुरोध है कि वे लोगों को अपने प्रवचनों-उपदेशों द्वारा यह भी बतायें कि अपने धर्म के शाश्वत मूल्य कौन से हैं तथा कालानुरूप परिवर्तनीय बातें कौनसी हैं। ऐसा किया जाने पर उनके प्रतिपादन का अधिक व्यापक और गहरा असर होगा। शाश्वत-अशाश्वत का विवेक रखनेवाले सभी आचार्यों, महंतों और संतों की आवाज देश के कोने-कोने में फैलनी चाहिये। समाज की रक्षा का दायित्व हमारा है और वह मठों से बाहर निकलकर समाज जीवन में घुल-मिलकर रहने से ही पूर्ण होगा, ये बातें उन्हें समझनी चाहिये तथा तदनुरूप कार्य करने हेतु उन्हें आगे आना चाहिये। सौभाग्य से इस दिशा में उनके प्रयास प्रारंभ होने के शुभ संकेत भी मिलने लगे हैं। हमारे दिवंगत सरसंघचालक श्रीगुरुजी ने ऐसे सभी-महात्माओं को एक साथ लाकर, उन्हें इस दृष्टि से विचार करने हेतु प्रवृत्त किया था। इसी का यह सुफल है कि अनेक धर्मपुरुष, साधु-संत समाज के विभिन्न घटकों में घुलने-मिलने लगे और धर्मांतरित बांधवों को स्वधर्म में शामिल करने तैयार हुए।

समाज के अन्य समझदार लोगों पर भी बड़ा दायित्व है। उन्होंने ऐसे तरीके, ऐसे मार्ग सुझाने चाहिये कि जिनसे काम तो बनेगा किन्तु समाज में कटुता उत्पन्न नहीं होगी। 'उपायं चिन्तयन् प्राज्ञ: अपायमपि चिन्तयेत्'-समाज में सौहार्द, सामंजस्य और परस्पर सहयोग का वातावरण स्थापित करने के लिये ही हमें समानता चाहिये। इस बात को भूलकर अथवा इसे न समझते हुए जो लोग बोलेंगे, लिखेंगे और आचरण करेंगे, वे निश्चय ही अपने उद्देश्यों को बाधा पहुंचायेंगे।

हिन्दु-समाज के किसी भी वर्ग को, अन्याय व अत्याचार का पुतला कहकर कोसते रहना, अपमानित करना, आत्महत और तेजोहत करना कदापि उचित नहीं। उनका आत्मबल बनाये रखकर, नये प्रकार के अच्छे सामाजिक व्यवहार के उदाहरण और आदर्श उनके सामने रखे जाना आवश्यक है। आखिर वे सभी हिन्दु समाज के ही अंग है। अत: उनका स्वाभिमान भी बना रहे, इसका ध्यान रखना होगा। जाति-व्यवस्था तथा अस्पृश्यता का उन्मूलन करना हो, तो जो लोग उसे मानते हैं, उनमें भी परिवर्तन लाना होगा। जो उसे मानते हैं, ऐसे लोगों पर टूट पड़ने अथवा उनसे संघर्ष करने की बजाय कार्य करने का दूसरा मार्ग भी हो सकता है। संघ के संस्थापक आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार के साथ काम करने का सौभाग्य मुझे मिला है। वे कहा करते- हमें न तो अस्पृश्यता माननी है, न उसका पालन करना है। संघ शाखाओं और कार्यक्रमों की रचना भी उन्होंने इसी आधार पर की। उन दिनों भी कुछ और ढंग से सोचने वाले लोग थे। किन्तु डॉक्टर जी को विश्वास था, कि आज नहीं तो कल, वे अपने विचारों से सहमत होंगे ही। अत: उन्होंने न तो इसका ढोल पीटा और न किसी से झगड़ा किया या उसके विरुद्ध अनुशासन भंग की कार्रवाई ही की। क्योंकि उन्हें विश्वास था कि दूसरा व्यक्ति भी सत्प्रवृत्त है। कुछ आदतों के कारण भले ही वह संकोच करता हो, किन्तु यदि उसे समय दिया गया तो वह भी अपनी भूल निश्चित ही सुधार लेगा। प्रारंभिक दिनों में, एक संघ-शिविर में, कुछ बन्धुओं ने महार बंधुओं के साथ भोजन करने में संकोच व्यक्त किया। डॉक्टरजी ने उन्हें नियम बताकर शिविर से निकाला नहीं। सभी अन्य स्वयंसेवक, डॉक्टरजी और मैं एक साथ भोजन के लिये बैठे। जिन्हें संकोच था वे अलग बैठे। किन्तु उसके बाद दूसरे भोजन के समय, वे ही बन्धु स्वयं होकर हम सभी के साथ बैठे। इससे भी अधिक उद्बोधक उदाहरण मेरे मित्र स्व. पं. बच्छराजजी व्यास का है। जिस शाखा का मैं प्रमुख था, उसी शाखा के वे स्वयंसेवक थे। उनके घर का वातावरण पुराना, कट्टरपंथी होने के कारण, वे उन दिनों मेरे यहां भी भोजन के लिये नहीं आते थे। जब वे पहली बार संघ-शिविर में आये, तब उनके भोजन की समस्या खड़ी हो गई। सब लोगों का एक-साथ तैयार किया गया तथा परोसा गया भोजन उन्हें नहीं चलता था। मैंने डॉक्टरजी से पूछा तो उन्होंने कोई नियम बताकर उन्हें शिविर में आने से नहीं रोका। क्योंकि उन्हें बच्छराजजी के संबंध में विश्वास था, कि उनमें उचित परिवर्तन अवश्य होगा। अत: उन्होंने मुझे कहा कि बच्छराजजी को शिविर में आने दो। हम उन्हें अलग रसोई पकाने की छूट देंगे। प्रथम वर्ष तो यही हुआ, किन्तु दूसरे वर्ष स्वयं बच्छराजजी ने कहा कि मैं भी सब लोगों के साथ भोजन करूंगा। बाद में वे जैसे-जैसे संघकार्य में रमते गये वैसे-वैसे उनके व्यवहार में (धार्मिक वृत्ति के होने के बावजूद भी) किस प्रकार परिवर्तन हुआ, यह सर्वविदित है।

अनेक बार, हिन्दु-समाज में जो आन्तरिक विद्वेष और संघर्ष की स्थिति पैदा होती है, उसका मूल कारण राजनीतिक अथवा वैयक्तिक झगड़ा ही होता है। आगे चलकर राजनीतिक लोग अथवा सम्बन्धित व्यक्ति उसे दो जातियों के बीच के संघर्ष का रूप देते हैं, ताकि अपनी चमड़ी बचायी जाकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा हो सके। ऐसे समय अनेक सत्प्रवृत्त बंधु तथा पत्रकार भी अज्ञानवश उनका साथ देते हैं। हिन्दु और मुसलमान के बीच के झगड़े को, दो सम्प्रदायों के बीच का संघर्ष निरूपित किया जाता है, किन्तु हिन्दुओं के राजनैतिक अथवा वैयक्तिक झगड़ों अथवा अत्याचारों को भड़कीले व जातीयतावादी शीर्षक दिये जाते हैं। यह कदापि उचित नहीं।

दलित अथवा अस्पृश्य माने गये बंधुओं ने, काफी अत्याचार व कष्ट सहन किये हैं। किन्तु उन्हें भी यह ध्यान में रखना चाहिये, कि समाज के सभी घटक यह महसूस करते हैं कि यह बात गलत है और ये अत्याचार रुकने चाहिये। इस दिशा में वे प्रयत्नशील भी हैं। उन्हें (अस्पृश्यों को) भी अभिप्रेत है कि अन्याय समाप्त होकर, उन्हें सब के साथ समानता का स्थान प्राप्त हो। अत: सभी लोगों का इस दृष्टि से प्रयास होना चाहिये। उन प्रयत्नों के लिये पोषक भाषा का उपयोग और आचरण होना भी आवश्यक है। समाज की अन्यायपूर्ण तथा बुरी बातों की निंदा अथवा आलोचना तो अवश्य होनी चाहिये। किन्तु साथ ही अपने समाज के दोषों के प्रति व्यथा की भावना भी प्रकट होनी चाहिये। जिस प्रकार विदेशी लोग, हमें परकीय मानकर, तुच्छता और तिरस्कारपूरर्ण बर्ताव करते हैं, उस प्रकार का भाव हममें नहीं रहना चाहिये। सभी को इस बात की सावधानी बरतनी चाहिये, कि भूतकाल के झगड़ों को वर्तमान में घसीटकर अपने भविष्य को कोई खतरें में न डाल दे। हम सब इसी समाज के अंग हैं अत: हम समाज के अन्य घटकों के साथ रहेंगे, इस प्रकार का वास्तविक आग्रह उन्हें रखना चाहिये। ऐसा करने पर ही दलितेतर बहुत बड़ा समाज और दलितों की शाक्ति एकजुट होकर, उस शक्ति के आधार पर अपेक्षित सामाजिक समता का वातावरण बन सकेगा।
महात्मा फुले, गोपालराव आगरकर अथवा डॉ. आंबेडकर प्रभृति आदि महापुरुषों ने अपने समाज की बुराइयों पर कड़े प्रहार किये हैं। कुछ जातियों तथा ग्रन्थों की भी कटु आलोचना की है। उसका क्या प्रयोजन था तथा उस समय की परिस्थिति क्या थी, इसे हमें समझना होगा। व्यक्ति, प्रारंभ में किसी बात की ओर ध्यान आकर्षित कराने के लिये तथा जनमत जागृत करने के लिये कड़ी भाषा का प्रयोग करता है। किन्तु सदा-सर्वदा ऐसा करते रहना सबके लिये आवश्यक नहीं है।

मेरी यह धारणा है कि दलित बंधु किसी की कृपा नहीं चाहते हैं, वे बराबरी का स्थान चाहते हैं और वह भी अपने पुरुषार्थ से ही।

हमारे ये भाई अब तक पिछड़े हुए रहने के कारण चाहते हैं कि सभी प्रकार की सुविधायें ओर अवसर मिलने चाहिये। उनकी यह अपेक्षा और मांग उचित ही है। किन्तु अन्ततोगत्वा उन्हें समाज के विभिन्न घटको के साथ योग्यता की कसौटी पर स्पर्धा करके ही बराबरी का स्थान प्राप्त करना है। यह उन्हें भी अभिप्रेत होगा।

अनेक दोषों के बावजूद हिन्दुओं की अपनी कुछ विशेषतायें हैं। जीवन विषयक उनकी कुछ कल्पनायें हैं, धारणायें हैं। विश्व के विचारशील लोग भी यह स्वीकार करते हैं कि समाज ने कुछ शाश्वत-मूल्य प्रस्थापित किये हैं। अत: इन जीवन-मूल्यों को माननेवाला तथा तदनुरूप आचरण करनेवाला ऐसा एकरस समतायुक्त संगठित हिन्दु समाज खड़ा हो सका तो ये विशेषतायें टिकी रहेंगी और विश्व के लिये भी उपयोगी सिद्ध हो सकेंगी। सभी व्यक्ति ईश्वर-पुत्र हैं, इतना ही नहीं तो इससे भी आगे बढ़कर वे ईश्वर के ही अंश हैं, ऐसा माननेवाले हिन्दु-धर्म में ऊंच-नीच की भावना पनपे, इस सम्बन्ध में डॉ. आम्बेडकर ने अत्यंत दु:ख व्यक्त किया था। वास्तव में समानता का साम्राज्य प्रस्थापित करने के लिये इससे बड़ा आधार और क्या हो सकता है। अत: हिन्दुओं की एकता आवश्यक है और उस एकता का आधार सामाजिक समता ही हो सकती है-ऐसा ही विचार सभी बांधवो को करना चाहिये और यह राष्ट्र संगठित व शक्तिशाली बनाने हेतु आगे आना चाहिये।

अपने समाज के इतिहास का कालखंड काफी लंबा है तथा उसमें विचार और आचार की स्वतंत्रता के लिये पूर्ण गुंजाइश होने के कारण पुराने ग्रन्थों में कुछ ऐसे वचनों का उल्लेख मिलता है, जिनका विपरीत अर्थ निकालकर विषय का विपर्यास किया जा सकता है। इस संस्कृति ने स्त्री को तुच्छ माना है, यह बताने की लिये-‘न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति’ का उल्लेख किया जाता है और दूसरी ओर स्त्री को अपने समाज में कितना ऊंचा स्थान प्राप्त है, यह बताने के लिये-‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता:’ इस प्रकार का वचन भी यहाँ उपलब्ध है। जो समाज की एकता चाहते हैं उन्हें एकता के लिये जो-जो बातें आवश्यक व अनुकूल हैं, वे सभी लोगों के सामने किस प्रकार लायी जा सकेंगी, उनकी विपरीत धारणायें कैसे दूर हो सकेंगी तथा उनमें किस प्रकार सामंजस्य स्थापित किया जा सकेगा, इस दिशा में प्रयास करना होगा।

पूना, 8 मई 1974

Monday, November 16, 2020

हिन्दू नजरिए से

वरिष्ठ लेखक-शंकर शरण

हिंदू बुद्धिजीवियों द्वारा सेक्यूलर कहलाने के लिए उट-पटांग हरकतें ऐसी हैं, मानो हंस कौवे की चाल चलने के लिए मरा जा रहा हो। ऐसे सेक्युलरिज्म के मूल्यांकन के लिए सीताराम गोयल की पुस्तक 'इंडिया' ज सेक्युलरिज्म: न्यू नेम फॉर नेशनल सब्वर्सन'(वॉयस ऑफ इंडिया,2003) अवश्य पठनीय है। भारत में सनातन धर्म के हजारों वर्ष के इतिहास में कभी धर्म के नाम पर रक्तपात नहीं हुआ किंतु जब से सेक्युलरवाद की धारणा उधार दे गई, तब से हमारी समस्याओं का अंत नहीं। जिन धारणाओं की पृष्ठभूमि नितांत भिन्न है, उनकी अंध-नकल कर हमने अपनी संस्कृति को भ्रष्ट और घायल किया।
इसाईयत की उत्पत्ति के बाद जो विचार- तंत्र यूरोप में रिलीजन नाम से जाना गया,भारत में ऐसी कोई चीज ईसाई या इस्लामी मत आने से पहले ना थी। यहां जी से धर्म कहते है, वैसा कोई विचार ईसाइयत या इस्लामी-मतवाद मैं नहीं है। इसीलिए पश्चिमी भाषाओं में भारत की 'धर्म'अवधारणा के लिए कोई शब्द नहीं, और यूरोपीय 'सेक्युलरिज्म' के लिए भारतीय भाषाओं में कोई शब्द नहीं मिलता। यूरोप में चौथी-आठवीं शताब्दी के बीच ईसाई चर्च और राज्य के बीच गहरा संबंध था। दोनों मिलकर व्यक्ति के इहलोक और परलोक पर तानाशाही नियंत्रण रखते थे। चर्च के कुपित होने पर किसी को जिंदा जलाने तक हर यंत्रणा दी जाती थी। राजा मानते थे कि राज्य चर्च की सेवा के लिए है। इसीलिए वहां राज्य को चर्च का "सेक्यूलर अंग"  कहा जाता था।

चर्चा और राज्य का गठजोड़
जब तक यूरोप में ऐसे लोग बच रहे जिन्हें ईसाइयत में लाना शेष था, तब तक चर्चा और राज्य का यकृत जोर बखूबी चलता रहा। किंतु 15 वी शताब्दी तक पूरा यूरोप ईसाई हो चुका थ। अब चर्च के हस्तक्षेप से राजाओं को कठिनाई होने लगी। फिर, चर्च की मनमानियों के विरुद्ध यूरोप में जगह-जगह विद्रोह भी होने लगे। उसी समय यूरोप के अनेक चिंतक ग्रीस, भारत और चीन जैसी प्राचीन संस्कृतियों के संपर्क में आए। इससे उन्हें मानवीयता और सार्वभौमिकता के नवीन विचार प्राप्त हुए। उस प्रभाव में उन्होंने 
ईसाई मतवाद के विरुद्ध वैचारिक विद्रोह का सूत्रपात किया। "रिफॉर्मेशन और रेनेसा"के आंदोलन वही चीज थे। जल्द ही ईसाई मतवाद को मैदान छोड़ना पड़ा। अंततः 19वीं शताब्दी तक यूरोप राज्य चर्च के दबदबे से मुक्त हो गए।अब राज्य का कार्य यह न रहा कि प्रजा के परलोक का भी जबरदस्ती ध्यान रखें। अब वह व्यक्ति के निजी विश्वास के विषय में बदल गया। इसे भी राज्य का सेक्यूलर बन जाना कहां गया।
इस पृष्ठभूमि में देखिए कि स्वतंत्र भारत में सेक्युलरिज्म का क्या अर्थ हुआ? स्वाधीनता आंदोलन के संपूर्ण काल में हमारे किसी चिंतक, नेता या सामाजिक संगठन के विचारों या प्रस्ताव में सेक्युलरिज्म शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। फिर स्वतंत्र भारत में वही शब्द संविधान के ऊपर भी एक तरह का सुपर- विधान और डिक्टेटर कैसे बन बैठा? यह एक भितरघात था। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में इस्लाम और ईसाईयत के नाम से उस विचार-तंत्र के दो रूप अस्तित्व में थे, जिसे यूरोप में रिलीजन कहा जाता था। जिसके जगह से मुक्त होने के लिए वहां सेक्युलरिज्म का पादुर्भाव हुआ। भारत में चर्च ने गोवा जैसे कुछ जगहों में राज्य शक्ति के प्रयोग से लोगों को ईसाइयत के घेरे में लाने की हर तरह के अत्याचार किए थे।इस संदर्भ में ही समझा जा सकता है कि भारत में इस्लाम या ईसाइयत के पहले हिंदू समाज की राज्य सत्ताए स्वभाव से ही 'सेक्यूलर' रही हैं। वैजानती ही नहीं थी कि ऐसा भी राज्य हो सकता है, जो बुद्धि - विवेक से परे जबरदस्ती कोई मत-विश्वास फैलाने का कार्य भी कर सकता है।

अतएव ,ऐसे हिंदू समाज को सेक्युलरिज्म का  उपदेश- निर्देश देना मानो सूरज को दीपक दिखाना था। वस्तुतः स्वतंत्र भारत में सेक्युलरिज्म एक ही अर्थ हो सकता था, यह कि उन धर्मांतरण- विस्तारवादी मतवादों केअंधविश्वासी मंसूबों पर रोक लगाकर जनता को पूर्ण सांस्कृतिक स्वतंत्रता प्रदान की जाती।किसी उलेमा या चर्च के नियंत्रण से मुक्त कर अपनी सहज चेतना से जीवन जीने की स्वतंत्रता मिलती किंतु दुर्भाग्य से नितांत विपरीत घटित हुआ। उलेमा और मिशनरी वर्ग,जिन्होंने सदैव भारतीय धर्म संस्कृति के प्रति और शत्रुता प्रदर्शन किया था, ने दुष्प्रचार आरंभ कर दिया कि स्वतंत्र भारत में ईसाई और इस्लामी समुदाय को बहुसंख्यक हिंदुओं से खतरा है।इसलिए राज्य को उनकी रक्षा के उपाय अर्थात विशेष सुविधाएं देनी चाहिए।

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे
यह उल्टा चोर कोतवाल को डांटे जैसी बात थी। जिन उलेमा और मिशनरियों ने सदियों से हिंदू जनता पर राज्य- बल से हर तरह के अत्याचार किए, जिसका रिकॉर्ड उनके अपने गौरव-गाथा साहित्य में उपलब्ध हैं, वही अपने को पीड़ित बता रहा था। अपने भोलेपन में स्वतंत्र भारत के नौसीखिए सत्ताधीश सदियों से कूटनीति में पगे मुल्ला  और मिशनरियों की बात मान बैठे। इस्लामिक तबलीगियो और ईसाई मिशनरियों को अपने साम्राज्यवादी विचार-तंत्र का प्रचार करने की छूट और विशेष सुविधाएं दी गई। ऊपर से नेहरू जी ने अपने कम्युनिस्ट अंधविश्वास में हिंदू धर्म से वितृष्णा को राजकीय नीति बना डाला। इसी को सेक्युलरिज्म का नाम दे दिया गया।
होना तो यह चाहिए था कि उन स्व-घोषितधर्मांतरणकारी विचार तंत्रों से हिंदू समाज को अब सुरक्षा दी जाती जो शताब्दियों बाद जाकर मुक्त हुआ था किंतु उल्टे एक बार फिर भारत में सनातन धर्म को ही शिकारी मतवादों के समक्ष असहाय छोड़ दिया गया। यह कितनी बड़ी विडंबना हुई, इसे समझा तक नहीं गया है। कश्मीर से हिंदुओं का नाश उसी नीति आक्रामक विचार तंत्रों के समक्ष हिंदुओं को असहाय छोड़ देने की नीति का ही एक दुष्परिणाम हुआ।भारत में प्रचलित सेक्युलरिज्म हिंदू धर्म- संस्कृति के प्रति अस्थाई शत्रुता भाव से भरे आक्रमक मत वादों को प्रोत्साहन देने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर रहा है। ऐसे सेक्यूलरवाद से पूर्णतः छुटकारा पाना हिंदू समाज का सर्वप्रथम कर्तव्य होना चाहिए।

(यह लेख राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप में 16 जून 2018 को छपा था)

Saturday, November 14, 2020

अरे मित्र आज दिवाली है!


अरे मित्र आज दिवाली है,
घर की साफ सफाई करना
पूरे गांव में दिया जलाना
माफ करना इस दिवाली
मैं गांव नहीं आ सकता
सरहदों पर जंग छिड़ी है
देश का रक्षा करना है
घुसपैठियों को मार भगाना है
घायल हो रहे हैं साथी जवान
इनकी शहादत का बदला लेना है
दुश्मनों के नापाक हरकतों का 
मुंहतोड़ जवाब देना है, 
अब इनके हर साजिश को नाकाम
करना है, इन्हें इनके अंजाम तक 
पहुंचाना है। 
वक्त आ गया है इन कायरों को
फिर से हार का धूल चटाना है।
दुश्मनों की अब होगी हर रात काली
मित्र तुम चिंता मत करो, धूम - धाम
से मनाओ दिवाली।।

Monday, November 9, 2020

जब साहसिक कदम ने बचाया था देश!

अरे क्या हुआ? आज कौन सा बड़ा दिन है जो सब चर्चा किए जा रहे है। ओह! ट्रंप चुनाव हार गए और बाइडेन राष्ट्रपति बन गया अमेरिका का यही का? इसी की चर्चा हो रही है न! अरे नहीं भैया इसकी नहीं कुछ और ही बात हो रही है। इसकी चर्चा नहीं हो रही तब किसकी हो रही है?_सच मे भैया आपकी यादास बहुत ही कमजोर है जो प्रधानमंत्री के "नोटबंदी" जैसे बड़े फैसले को फूल गए। कुछ याद आया 8 नवंबर 2016 जब माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने ये  घोषणा किया की  "भाईयो बहनों देश को भ्रष्टाचार और काले धन रूपी दीमक से मुक्त कराने के लिए एक और सख्त कदम उठाना ज़रूरी हो गया है। आज मध्य रात्रि यानि 8 नवम्बर 2016 की रात्रि 12 बजे से वर्तमान में जारी 500 रुपये और 1,000 रुपये के करेंसी नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे यानि ये मुद्राएं कानूनन अमान्य होंगी"।  ये एक ऐतिहासिक और साहसिक फैसला साबित हुआ। कितने लोगो कि खटिया खड़ी हो गई थी उनको समझ में नहीं आया कि करे क्या? तभी तो बोरा भर - भर के नोट कचड़े में तो कहीं नाले नदी में फेंका गया था। अधजले नोट इसके सबूत है आखिर इतना नोट आया कहा से? देश कि जानी मानी महिला नेता के गले में लाखो रुपयों के नोट का माला पहनाया गया था नोटबंदी होते ही सबकी औकात का पता चला गया। आखिर लूटा हुआ पराया धन से कोई कब तक घर भरता अपना एक न एक दिन झट से जाना ही था।
नक्सलियों और आतंकियों की भूखमरी आ गई नोटबंदी की वजह से। नक्सलियों का हजारों करोड़ों रुपया पानी में मिल गया जब देश में नोटबंदी लागू कर दी गई । झारखंड में कई नक्सलियों के खाते सीज हो गए जहां से करोड़ों रुपए मिले। ये लोग गांव वालो को धमका के गाव से ही वसूला हुआ नोट बदलना चाह रहे थे पर सरकार ने ऐसा डंडा मारा कि सारी हेकड़ी अन्दर चली गई। वहीं हाल आतंकियों का हुआ करीब 12 लाख करोड़ रुपए नकली नोट छाप के रखे थे ये पाकिस्तान के खुफिया एजेंसी आई .एस .आई वाले जिसको एक झटके तहस - नहस कर दिया गया। इसका एक फायदा ये हुआ कि आतंकियों की फंडिंग पहले जैसी नहीं रह गई  इनकी भी भूखमरी आ गई। अब कुछ बचा नहीं तो सब खुल के बाहर आने लगे आतंक फैलाने के लिए और भारतीय सेना तैयार थी पहले इनको इनके ठिकाने तक पहुंचाने के लिए। नोटबंदी के बाद कश्मीर में वो चेहरे भी खुलकर सामने आने लगे जो मुफ्त में पाकिस्तानी या विदेशी  फंडिंग पर पलते थे जैसे ही नोटबंदी हुई ये 100-50 के लिए पत्थरबाज के रूप उभर के सामने आने लगे जिन्हें तथाकथित विपक्षी नेता, सेक्युलर बुद्धिजीवी वर्ग भटके हुए लोगों कि संज्ञा दे दिए थे।

पूरा विपक्ष नोटबंदी का घनघोर और पुरजोर विरोध किया था पर संसद में बहस ही नहीं किया। एकदम से हल्ला हूं मचा दिया था। नोटबंदी को सबसे बड़ा घोटाला का नाम देने लगा! कश्मीर में तो अलगावादी नेताओ की कमर टूट गई थी। इधर पंजा खडंजा पंजा पर गिर गया था। उत्तर प्रदेश में तो साइकिल पंक्चर हो गई और हाथी भूखमरी से मरने लगी पर नोटबंदी के कारण ना पंक्चर बना ना ही हाथी का पेटे भर पाया! हा हा हा.हा..।
अब चुप करो हम भी कुछ जानकारी देने जा रहे है सुनो। _जी भैया सुनाइए .. एक बार बहुत पहिले  की बात है जून या जुलाई का महीना था साल 2011 में जब हाथी सत्ता में थी तब पूरा विधानसभा गूंजा था। मामला था नेपाल के रास्ते पड़ोसी जिलों में हो रहे नकली नोटो के कारोबार का जिसमे विपक्ष का आरोप था पुलिस  कारोबारी को पकड़ती है पर वह चंद दिनों के बाद ही रिहा हो जाते है। सरकार को ऐसे लोगो पर रसुका लगाना चाहिए। तब उस वक्त संसदीय कार्य मंत्री लालजी वर्मा ने विपक्षी सदस्यों का जवाब देते हुए कहा था कि" साल 2008 में 55 जिलों में नकली नोटो का कारोबार हो रहा था। वर्ष 2009 में 61 जिले प्रभावित हुए।सरकार ने नकली नोटों के कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए प्रभावी कारवाई की। ऐसे कारोबारियों ठोस कार्रवाई के लिए पुलिस महानिदेशक की अध्यक्षता में राज्यस्तरीय समिति गठित की गयी। सीमावर्ती (नेपाल) जिलों जहां ज्यादा जाली नोट पाये जाने जब्त किये जाने की घटनाएं हुई, वहा जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिलास्तरीय समितियां बनायी गयीं। इसका नतीजा हुआ कि वर्ष 2010 में यह कारोबार 34 जिलों में सिमट गया। इस साल 30 जून 2011 तक 20 जिले ऐसे कारोबार से प्रभावित रह गये हैं।" लालजी वर्मा ने ये भी स्वीकार किया था कि बैंकों के अलावा एटीएम से भी जाली नोटों की निकासी होती है।
बहुत हंगामा मचा था उस दिन क्या सपा? क्या रालोद? आदि सभी पार्टियों ने प्रदेश सरकार पर खूब आरोप प्रत्यारोप लगाया था जिसमे भाजपा भी प्रमुख रूप से शामिल थीं। लेकिन देखने वाली ये है कि नोटबंदी का कांग्रेस के साथ मिलकर  सबने विरोध किया और नहीं हाथी भी भड़क गई जो नकली नोटो के कारोबार को कुचलने की बात थी। महत्वपूर्ण ये की कमल ने इसपर अमल किया और  देश में एक नई क्रांति लाई।

मत पूछो जितना बिजली बिल, पानी का बिल , टैक्स आदि जितना भी बकाया था सबका अचानक से भुगतान हो गया नोटबंदी के दौरान। घाटे चल रहा बिजली विभाग का मानो स्वर्णिम काल था सबने बिजली बिल का पैसा भर दिया बनारस का उदाहरण दू तो। नोटबंदी के दौरान जो लोग जूठा ही गरीबी रोना रोते थे उनका पोल खुल गया नोटबंदी के समय। सबसे ज्यादा दिक्कत लूट - घसूट करने वालों को हुई। आम जनता को बहुत कोशिश किया गया भड़काने और भटकाने का पर किसी की एक न चली सबने सरकार के साहसिक कदम का समर्थन किया भले ही थोड़ा कष्ट झेलना पड़ा पर राष्ट्रहित में हमारे देश की जनता ने बखूबी अपना फर्ज निभाया था।
_अरे वाह भैया क्या खूब जानकारी दी मजा आ गया लेकिन एक वर्ग ऐसा भी था जो सेना के साथ बॉर्डर पर जाकर लड़ने की कसमें खाता था बेचारे एटीएम और बैंक में लाइन लगाकर लगाकर जाते जाते थक कर चूर गए..!

Friday, November 6, 2020

पत्रकार , पत्तलकार और सरकार।

अरे  क्या हो रहा है? क्यों इतना पुलिस वाले भीड़ लगाए हुए है? लगता है कोई बहुत बड़ा आतंकी हाथ लगा है। नहीं भैया ध्यान से देखिए ये तो एक पत्रकार है जिसे ये पुलिस वाले घसीट के लेके जा रहे है। अरे हा यार ये तो "पूछता है भारत वाला " है ! एक पत्रकार के ऊपर इस तरह की कार्यवाही महाराष्ट्र सरकार की   नपुंसकता को दर्शाता है। आखिर एक पत्रकार को बार - बार परेशान कर के आप अपना उल्लू सीधा नहीं करते सकते है। जो कुछ भी हुआ या हो रहा है बिल्कुल उचित नहीं है। सत्ता सुख में कोई इतना अंधा कैसे हो सकता है कि जो मन में आए वो करे।इस तरह तो हर कोई अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करता रहता है पर जो महराष्ट्र में जो हुआ उसके ऊपर चुप्पी साधे बैठे है। कांग्रेस जब से केंद्र में सत्ता से बाहर हुई है तब से उसे भारत में लोकतंत्र खतरे नजर आ रहा है पर महाराष्ट्र में हुआ जो उसका क्या? वो लोग भी नजर नहीं आ रहे है जो नक्सल गतिविधियों को समर्थन करने वाले पत्रकारों तनिक भी विरोध होता हुआ देखते है तो उनके  मुंह से निकलता है "प्रेस की आजादी छीनी जा रही है"! वो पत्रकार भी इसका घटना विरोध करते हुए नजर नहीं आ रहे है जो आतंकवादियो के घर जाकर शोक व्यक्त करना अपना परमो धर्म समझते है और इसे स्वंतत्र पत्रकारिता का नाम देते है। मानता हूं सभी पत्रकारों का अपना - अपना अलग विचार है पर इसका मतलब ये तो नहीं कि एक पत्रकार होकर पत्रकार पर हुई इस घटिया कार्यवाही  का विरोध ना करें। 
सब टक्कर है टीआरपी की न कहा बीस - बीस सालों से न्यूज चैनल अचानक से एक पत्रकार  दो तीन सालों में अपना न्यूज चैनल खड़ा कर देता है और पूरी टीआरपी अपनी ओर खींच लेता है तो जलन होगी न तमाम बड़े तथाकित न्यूज चैनलो को। नया दौर के हिसाब से आप भी चैनल में बदलाव कीजिए और जनता के बीच लोकप्रियता हासिल कीजिए। लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि आप पत्रकारिता के क्षेत्र से होकर किसी पत्रकार का समर्थन ना करे जब उसके साथ किसी किस्म ज्यातिकी और बदसलूकी हो रही हो। इस समय सभी पत्रकारों एकजुट होना चाहिए क्योंकि जो हो रहा है या हुआ वो कल को इनके साथ भी हो सकता है।  

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के सामने अर्णब की गिरफ्तारी को लेकर प्रदर्शन हुआ। दूरदर्शन के वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने ऑप इंडिया को दिए बयान में कहा कि आज कल सोशल मीडिया पर नया ट्रेंड चल रहा है पत्तलकार यानी जो पत्तल लेकर बैठे रहते है कि कोई सरकार उनके पत्तल में कुछ दाने डाल दे  इस इंतजार में बैठे रहते है तो देखिए जो आज नहीं निकले वो मैं मानता हूं दरअसल वो पत्तलकार है क्योंकि वो सरकारों के दम पर सरकारों के पैसों से, सरकारों कि जो सहानभूति थी और सरकारों से फेवर लेकर पलते रहे है। उन्होंने आगे कहा कि , आप ये सोचिए की पुलिस वालें एक हो जाते है अगर एक पुलिस वाले पर हमला होता है तो , वकील एक हो जाते है अगर एक वकीलो पर हमला होता है तो , जज एक हो जाते है जब जजो पर हमला हो जाता है सबकी कौम हो जाती है लेकिन पत्रकारों की कौम क्यों नहीं होती क्योंकि पत्रकारों की कौम सबसे ज्यादा अगर कह सकते है तो सबसे ज्यादा हिन्दुस्तान में सरकारों का  कोई फेवर लेकर रही  तो पत्रकारों की कौम रही है। लुटियंस लॉबी कौन नहीं जानता? ये खान मार्केट गैंग क्या है? ये सब वही लोग है जो सरकारो से फेवर लेकर जिंदा रहे है। इसीलिए आज इनको लगता है कि महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ बोलेंगे कल को अगर केंद्र में सोनिया या राहुल गांधी की सरकार आ गई, अगर कांग्रेस समर्थित सरकार आ गई तो हम विरोध में बोलेंगे तो कल को हमें बंगले कैसे मिलेंगे? हमे विदेश यात्राएं जो मिलती वो कैसे मिलेंगे या हमे जो फेवर मिलते है वो कैसे मिलेंगे? ये दलाली करते है इसलिए खामोश बैठे। जो घर बैठे है इसीलिए वास्तव में मैंने इन्हें पत्रकार मानता नहीं। वो यही नहीं रुके ऑप इंडिया के अजित भारती से बात करते वक्त प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और एडिटर्स गिल्ड पर निशानाा साधते कहा की पत्रकारिता सेे जुड़ी हर बड़ी संस्था अब बेकार हो चुकी है। प्रेस क्लब की भूमिका क्या है? प्रेस क्लब की भूमिका बहुत बड़ी भूमिका है। प्रेस क्लब आजकल चुनाव लड़ने का इंजॉय करने का अड्डा बन के रह गया है। अर्नब गोस्वामी को छोड़िए इससे पहले भी बहुत से हजारों पत्रकारों की गिरफ्तारी हो चुकी है उस वक्त तो  प्रेस क्लब आगे नहीं आया। एडिटर्स गिल्ड के ऊपर भी जमकर बरसते हुए बोले कि हमारा एक कैमरा पर्सन साहू छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की गोली का शिकार हुआ था उस वक्त जो एडिटर्स गिल्ड ने जो बयान जारी किया था  हमारे जो कैमरा पर्सन साहू है उनका नाम तक नहीं था। इतना शर्मनाक स्टेटमेंट पत्रकार के मौत होने पर और दूसरी तरफ बर्मा में यानी म्यांमार कुल 4 पत्रकार गिरफ्तार हुए थे इन चारों पत्रकारों का बकायदा नाम देकर उसका विरोध किया गया था। जो एडिटर्स गिल्ड एक पत्रकार की हत्या पर, नकल जब उसको मारते हैं उसके खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते हैं वह एडिटर्स गिल्ड किस काम के? यह बिकी हुई कलम के लोग हैं! वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने तथाकथित लोगों पर निशाना साधते हुए का की आकार पटेल, तीस्ता सीतलवाड़ यह कोई पत्रकार है क्या? ये सब अपने को पत्रकार कहते है। आप पूरे देश में पूछिए एडिटर्स गिल्ड के बारे में सबसे पूछिए ये लोग ढकोसले बाज लोग है सबको पता है इनमें से कोई भी असली पत्रकार नहीं रह गया है। 2-4 नाम होंगे इनमें से विरोध कर रहें है। आलोक मेहता का उदहारण देते हुए कहा कि उन्होंने ट्वीट का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे कुछ लोग है जिनकी रीड की हड्डी है जो लोग आवाज उठाते हैं। लेकिन बाकी एडिटर्स गिल्ड , ऑफ़ प्रेस क्लब  या बाकी तमाम संस्थाएं हैं सब irrelevant हो चुकी है। इनका सिर्फ एक काम है कि सिर्फ मोदी का विरोध करना है और इनको किसी भी चीज कोई मतलब नहीं है क्योंकि मोदी ने इनकी दुकानदारी , दलाली बंद कर दी है । 

अजीत भारती के अगले सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि मैं भी अर्णब के चैनल पर जब रिपोर्टिंग देखा था उनके पत्रकार उछल कर रिपोर्टिंग करते थे मैंने कहा ये क्या हो रहा है? मैंने ट्विटर पर सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया है। मैंने कहा ये पत्रकारिता नहीं है लेकिन आज अर्णब को गिरफ्तार कर लिया गया तो मैं यह कहूंगा कि आपकी पत्रकारिता ऐसी है वैसी है। मैं राजदीप  की पत्रकारिता को जानता हूं घनघोर विरोधी हूं मै रवीश की जो एकतरफा पत्रकारिता है उसका घनघोर विरोधी हूं। लेकिन जब राजदीप पर कुछ लोगों ने हमला किया था जब वो एक रेस्टोरेंट में गए थे मैंने उसका भी विरोध किया था क्योंकि मै ये मानता हूं पत्रकार चाहे लेफ्ट विंग का हो या राइट विंग का हो उसके ऊपर अगर हमल हो रहा हो तो आपको बोलना चाहिए। क्योंकि आप राइट और लेफ्ट इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आपके पास डेमोक्रेसी है, संविधान की दी हुई ताकत है। मीडिया के पास आ जाती है इसीलिए आप लेफ्ट और राइट कर रहे हैं। अगर आपके पास आजादी ही नहीं होगी तो आप लेफ्ट क्या करोगे राइट क्या करोगे? आपको सिर्फ एक ही दिशा में चलना होगा वो होगा तानाशाही इसीलिए इसके खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है। कैबिनेट कुछ नहीं होता है जो लोग कैबिनेट  लगा रहे है दरसअल वो किसी न किसी आड़ में छिपने कोशिश कर रहे हैं। उनका मन साफ नहीं वो अर्णब की तरक्की से जले हुए हैं। देखें बहुत सारे पत्रकार इसलिए भी परेशान है जो लोग आवाज नहीं उठा रहे हैं क्योंकि उनको लग रहा है कि अरे इतनी जल्दी उसने टीआरपी लेली, अरे इसने हमारी टीआरपी खत्म कर दी, अरे इतनी इतनी जल्दी इतना पैसा बना लिया, दो - दो चैनल खड़े कर दिए और 1 साल के अंदर इसके दोनों चैनलों ने सतरह - अट्ठारह 20 साल से खड़े चैनलों का बाजा बजा दिया। तो ये उस बात से भी परेशान है। अरे कंपटीशन है आप रहिए ना आप में दम है तो आप अर्णब से कंपटीशन कीजिए ना, आप टीआरपी में कंपटीशन कीजिए, अर्णब से बड़ा एम्पायर खड़ा कीजिए लेकिन आप नहीं खड़ा कर पाएंगे तो आप कहेंगे कि ये तो पत्रकारिता नहीं है। आप कौन होते हैं पर सर्टिफिकेट देने वाले? राजदीप पत्रकार है क्या? राजदीप जो कुछ करते रहे पत्रकार है, रवीश जो करते रहे हैं वह पत्रकारिता है क्या? पत्रकारिता का सर्टिफिकेट कोई दे नहीं सकता ! कोई माई का लाल ऐसा है नहीं  हिंदुस्तान में जिसने घर में छापाखाना खोल रखा हो कि मैं पत्रकारो का सर्टिफिकेट दूंगा तो वो ही पत्रकार होगा। किसी के मां ने इतना दूध नहीं पिलाया है कि वह पत्रकारों को सर्टिफिकेट बांटे। मैं भी पत्रकार हूं आप भी पत्रकार हैं, अर्णब भी पत्रकार है और प्रदीप भंडारी भी पत्रकार है सब पत्रकार हैं। और हम सब को इसके खिलाफ आवाज उठाना चाहिए। हम किसी भी आड़ में छिपने की कोशिश कर रहे है तो हम सब डबल स्टैंडर्ड है, हम लोग दोगले लोग है।

देश कि जनता मूर्ख नहीं है उसे ही पता है कौन गलत है कौन सही है इसीलिए देश कि जनता गिरफ्तारी का विरोध कर रही है भारत के अनेक राज्यों में इसका पुरजोर विरोध हो रहा है। महाराष्ट्र सरकार में बैठे फासीवादी सोच के लोग सत्ता का दंभ भर रहे है। उछलते हुए ऐसा करेंगे कि फिर कभी उठ नहीं पाएंगे। 


Sunday, November 1, 2020

तुम कश्मीरी हो भारत देश के

जब आग लगी है सीने,
अब क्या रखा है 
घुट - घुट के जीने में?
उठो तुम युवा हो कश्मीर के
भारत माता के जन्नत में 
तुम जन्म लिए हो
तुम पहचानो अपने आपको 
अलगाववादियों से बच के रहो
दूर रहो तुम आतंकवाद से
जिनको पत्थर से मारते हो
वो फौजी है तुम्हारे अपने देश के
अफवाहों से दूर रहो,केवल याद रखो
तुम कश्मीरी हो भारत देश के।
 
(आज से 4- 5 साल पहले मैंने इसको अपनी डायरी में लिखा था उस वक्त के माहौल को देखते हुए)