Sunday, December 31, 2023

वो तथाकथित मस्जिदे जिनकी दिवारे चीखकर कहती है "हम मंदिर है"

देश जब आजाद हुआ तो शिक्षा व्यवस्था में एक ऐसा धड़ा बैठा था जिसने भारत और भारती इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया इसमें कोई सक नही हैं।आज भी इस्लामिक अक्रांताओ को महान बताने से ये पीछे नही हटते है। ये इनके कला और संस्कृति की बात करते है अब जिन्होंने भारत में मारकाट किया हो लाखो लोगो का धर्मांतरण किया हो उनका भला कोई कला संस्कृति भी होगा? इस देश में ये बात जबरदस्ती मनवाई जाती है वर्तमान में तो कोई नही मानने वाला है ये भी कहना गलत होगा मूर्खो की कमी नही है इधर बिना पढ़े दुसरो को सुनकर भी इधर बकवास किया जा सकता है इतिहास पर। मंदिरो को तोड़कर मस्जिद बनाने वालों का भला क्या योगदान हो सकता है जिनका महिमंडन तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवी और इतिहासकार करते है..!अयोध्या काशी मथुरा ही नही और भी बहुत सारे ऐसे प्राचीन मंदिर है जिसे तोड़कर मस्जिद खड़ी गई है।

 आइए जानते है कुछ ऐसे ही मंदिरो के बारे में :

अटाला मस्जिद 

उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल क्षेत्र के जौनपुर जिले में स्थित ये अटाला मस्जिद कभी अटाला मंदिर हुआ करता था। इसे देखते ही कोई भी कह सकता है ये मस्जिद नहीं मंदिर है। 
 इब्राहिम नायीब बारबक ने तुड़वाकर मस्जिद बनाई थी जिसे आज अटाला मस्जिद के नाम से जानते हैं। इसका काम 1377 में शुरू हुआ था और 1408 में इंब्राहिम शाह शर्की के शासन में खतम हुआ है।
कही से भी नही लगता है की ये विदेशी आक्रांताओं द्वारा इसका निर्माण कराया गया होगा। जिले की इतिहास पर लिखी त्रिपुरारि भास्कर की पुस्तक जौनपुर का इतिहास में अटाला मस्जिद के बारे में भी लिखा गया है। जिन्होंने अटाला के नाम के संबंध पर बताया कि "लोगों का विचार है कि यहां पहले अटलदेवी का मंदिर था, क्योंकि अब भी मोहल्ला सिपाह के पास गोमती नदी किनारे अटल देवी का विशाल घाट है। अंत में यह अटाला मस्जिद के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसका निर्माण कन्नौज के राजा विजयचंद्र के जरिए हुआ था और इसकी देखरेख जफराबाद के गहरवार लोग किया करते थे। यह कहा जाता है कि इस मंदिर को गिरा देने का हुक्म फिरोज शाह ने दिया था परंतु हिंदुओं ने बहादुरी से इसका विरोध किया, जिसके कारण समझौता होने पर उसे उसी प्रकार रहने दिया गया था। अंत में 1364 ई. में ख्वाजा कमाल खां ने  इसे मस्जिद का रूप देना प्रारंभ किया इब्राहिम शाह शर्की ने पूरा किया। इसके विशाल लेखों से पता चलता है कि इसके पत्थर काटने वाले राजगीर हिंदू थे जिन्होंने इस पर हिंदू शैली के नमूने तराशे है। कहीं-कहीं पर कमल का पुष्प उत्कीर्ण है। यह मस्जिद जौनपुर की शिल्पकला का एक अति सुंदर नमूना है। इसके मध्य के कमरे का घेरा करीब 30 फीट है यह एक विशाल गुंबद से घिरी है जिसकी कला, सजावट और बनावट मिश्र शैली के मंदिरों की भांति है।"
बाकी जिले का नाम ही तुगलकी है "जौनपुर" तो समझ सकते है इसके स्थापना के लिए किस तरह इधर तबाही मचाई गई होगी इन इस्लामिक जिहादियों द्वारा। ना जाने सारे मंदिर इधर तोड़े फोड़े गए होंगे जिनके अवशेष तक नहीं मिलते होंगे।

अढ़ाई दिन का झोपड़ा

इसकी तो ऐसी प्रशंसा कर दी जाती है की क्या ही कहना।बहुत कम लोग जानते होंगे की मंदिर के स्थान पर बनाया गया है।
वो मूल रूप से विशालकाय संस्कृत महाविद्यालय (सरस्वती कंठभरन महाविद्यालय) हुआ करता था, जहाँ संस्कृत में ही विषय पढ़ाए जाते थे। यह ज्ञान और बुद्धि की हिंदू देवी माता सरस्वती को समर्पित मंदिर था। इस भवन को महाराजा विग्रहराज चतुर्थ ने अधिकृत किया था। वह शाकंभरी चाहमना या चौहान वंश के राजा थे।

कई दस्तावेजों के अनुसार, मूल इमारत चौकोर आकार की थी। इसके हर कोने पर एक मीनार थी। भवन के पश्चिम दिशा में माता सरस्वती का मंदिर था। 19वीं शताब्दी में, उस स्थान पर एक शिलालेख (स्टोन स्लैब) मिली थी जो 1153 ई. पूर्व की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि शिलालेख के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मूल भवन का निर्माण 1153 के आसपास हुआ था।

कहानी के अनुसार, 1192 ई. में, मुहम्मद गोरी ने महाराजा पृथ्वीराज चौहान को हराकर अजमेर पर अधिकार कर लिया। उसने अपने गुलाम सेनापति कुतुब-उद-दीन-ऐबक को शहर में मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया। ऐसा कहा जाता है कि उसने ऐबक को 60 घंटे के भीतर मंदिर स्थल पर मस्जिद के एक नमाज सेक्शन का निर्माण करने का आदेश दिया था ताकि वह नमाज अदा कर सके। चूँकि, इसका निर्माण ढाई दिन में हुआ था, इसीलिए इसे ‘अढाई दिन का झोंपड़ा’ नाम दिया गया। हालाँकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक किंवदंती है। मस्जिद के निर्माण को पूरा करने में कई साल लग गए। उनके अनुसार, इसका नाम ढाई दिन के मेले से पड़ा है, जो हर साल मस्जिद में लगता है।


प्रसिद्ध इतिहासकार सीता राम गोयल ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू टेंपल: व्हाट हैपन्ड टू देम’ (‘Hindu Temples: What Happened To Them’) में मस्जिद का उल्लेख किया है। उन्होंने लेखक सैयद अहमद खान की पुस्तक ‘असर-उस-सनदीद’ का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया था कि अजमेर की मस्जिद, यानी अढाई दिन का झोंपड़ा, हिंदू मंदिरों की सामग्री का उपयोग करके बनाया गया था।

अलेक्जेंडर कनिंघम को 1871 में ASI के महानिदेशक के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने ‘चार रिपोर्ट्स मेड ड्यूरिंग द इयर्स, 1862-63-64-65’ में मस्जिद का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है। कनिंघम ने उल्लेख किया कि स्थल का निरीक्षण करने पर, उन्होंने पाया कि यह कई हिंदू मंदिरों के खंडहरों से बनाया गया था। उन्होंने कहा, “इसका नाम ‘अढ़ाई दिन का झोंपड़ा’ इसके निर्माण की आश्चर्यजनक गति को दिखाता है और यह केवल हिंदू मंदिरों के तैयार मुफ्त सामग्री के इस्तेमाल से ही संभव था।”

कनिंघम ने आगे रिपोर्ट में मस्जिद का दौरा करने वाले ब्रिटिश साम्राज्य के लेफ्टिनेंट-कर्नल जेम्स टॉड का हवाला दिया। टॉड ने कहा था कि पूरी इमारत मूल रूप से एक जैन मंदिर हो सकती है। हालाँकि, उन्होंने उन पर चार-हाथ वाले कई स्तंभ भी पाए जो स्वभाविक रूप से जैन के नहीं हो सकते थे। उन मूर्तियों के अलावा, देवी काली की एक आकृति थी।
उन्होंने आगे कहा, “कुल मिलाकर, 344 स्तंभ थे, लेकिन इनमें से दो ही मूल स्तंभ थे। हिंदू स्तंभों की वास्तविक संख्या 700 से कम नहीं हो सकती थी, जो 20 से 30 मंदिरों के खंडहर के बराबर है।

भोजशाला

‘भोजशाला’ ज्ञान और बुद्धि की देवी माता सरस्वती को समर्पित एक अनूठा और ऐतिहासिक मंदिर है। इसकी स्थापना राजा भोज ने की थी। राजा भोज (1000-1055 ई.) परमार राजवंश के सबसे बड़े शासक थे। वे शिक्षा एवं साहित्य के अनन्य उपासक भी थे। उन्होंने ही धार में इस महाविद्यालय की स्थापना की थी, जिसे बाद में भोजशाला के रूप में जाना जाने लगा। यहाँ दूर-दूर से छात्र पढ़ाई करने के लिए आते थे।
देवी सरस्वती का यह मंदिर मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित है, जो उस समय राजा भोज की राजधानी थी। संगीत, संस्कृत, खगोल विज्ञान, योग, आयुर्वेद और दर्शनशास्त्र सीखने के लिए यहाँ काफी छात्र आया करते थे। भोजशाला एक विशाल शैक्षिक प्रतिष्ठान था।
मुस्लिम जिसे ‘कमाल मौलाना मस्जिद’ कहते हैं, उसे मुस्लिम आक्रांताओं ने तोड़कर बनवाया है। अभी भी इसमें भोजशाला के अवशेष स्पष्ट दिखते हैं। मस्जिद में उपयोग किए गए नक्काशीदार खंभे वही हैं, जो भोजशाला में उपयोग किए गए थे। मस्जिद की दीवारों से चिपके उत्कीर्ण पत्थर के स्लैब में अभी भी मूल्यवान नक्काशी किए हुए हैं। इसमें प्राकृत भाषा में भगवान विष्णु के कूर्मावतार के बारे में दो श्लोक लिखे हुए हैं। एक अन्य अभिलेख में संस्कृति व्याकरण के बारे में जानकारी दी गई है।  इसमें प्राकृत भाषा में भगवान विष्णु के कूर्मावतार के बारे में दो श्लोक लिखे हुए हैं। एक अन्य अभिलेख में संस्कृति व्याकरण के बारे में जानकारी दी गई है। इसके अलावा, कुछ अभिलेख राजा भोज के उत्तराधिकारी उदयादित्य और नरवर्मन की प्रशंसा की गई है। शास्त्रीय संस्कृत में एक नाटकीय रचना है। यह अर्जुनवर्मा देव (1299-10 से 1215-18 ईस्वी) के शासनकाल के दौरान अंकित किया गया था। यह नाटक प्रसिद्ध जैन विद्वान आषाधार के शिष्य और राजकीय शिक्षक मदन द्वारा रचा गया था। नाटक को कर्पुरमंजरी कहा जाता है और यह धार में वसंत उत्सव के लिए था।



मंदिर, महलों, मंदिरों, महाविद्यालयों, नाट्यशालाओं और उद्यानों के नगर- धारानगरी के 84 चौराहों का आकर्षण का केंद्र माना जाता था। देवी सरस्वती की प्रतिमा वर्तमान में लंदन के संग्रहालय में है। प्रसिद्ध कवि मदन ने अपनी कविताओं में भी माता सरस्वती मंदिर का उल्लेख किया है।
साल 1305, 1401 और 1514 ई. में मुस्लिम आक्रांताओं ने भोजशाला के इस मंदिर और शिक्षा केंद्र को बार-बार तबाह किया। 1305 ई. में क्रूर और बर्बर मुस्लिम अत्याचारी अलाउद्दीन खिलजी ने पहली बार भोजशाला को नष्ट किया। हालाँकि, इस्लामी आक्रमण की प्रक्रिया 36 साल पहले 1269 ई. में ही शुरू हो गई थी, जब कमाल मौलाना नाम का एक मुस्लिम फकीर मालवा पहुँचा। कमाल मौलाना ने कई हिंदुओं को इस्लाम में धर्मांतरित करने के लिए छल-कपट का सहारा लिया। उसने 36 सालों तक मालवा क्षेत्र के बारे में विस्तृत जानकारी इकट्ठा की और उसे अलाउद्दीन खिलजी को दे दी। युद्ध में मालवा के राजा महाकाल देव के वीरगति प्राप्त करने के बाद खिलजी ने कहर शुरू हो गया। खिलजी ने भोजशला के छात्रों और शिक्षकों को बंदी बना लिया और इस्लाम में धर्मांतरित होने से इनकार करने पर 1200 हिंदू छात्रों और शिक्षकों की हत्या कर दी। उसने मंदिर परिसर को भी ध्वस्त कर दिया। मौजूदा मस्जिद उसी कमाल मौलाना के नाम पर है।


कुव्वत-उल-इस्लाम 
कुतुबुद्दीन ऐबक का कुतुब मीनार दिखाकर कला संस्कृति की अनोखी पहचान और उत्कृष्ट प्रदर्शन बताने वाले तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवी इतिहासकार कुछ ज्यादा ही मग्न होते है। इस क्रूर आक्रांता ने भी कम कहर नहीं ढाए है हिंदुओ पर।
कुव्वत-उल इस्लाम मस्जिद कुतुब मीनार के उत्तर पूर्व में स्थित है। कुव्वत-उल-इस्लाम को मामलुक वंश के संस्थापक कुतुब-उद-दीन ऐबक ने बनवाया था। इसे 27 हिंदू और जैन मंदिरों के खंडहरों का उपयोग करके बनाया गया था। यह भारत पर मुस्लिम विजय का जश्न मनाते हुए विजय की मीनार के लिए जाना जाता है। कुछ इतिहासकार कहते है की ये सन 1195 में शुरू हुआ था बनना और 1199 खतम हुआ। देखने से विष्णु मंदिर नजर आता है साफ साफ। अब इसे इधर लोग ऐसे बताते है मानो कितने बड़े विद्वान थे ये मलेक्ष।

जफर खान गाज़ी का मकबरा और मस्जिद
कहा जाता है ये पहले विष्णु मंदिर था या कृष्ण भगवान का मंदिर है इसे खंडित करके मकबरा और मस्जिद में तब्दील कर कर दिया गया था। दीवारे झूठ नहीं बोलते है कभी बस इतना समझ लीजिए। आखिर कहा तक इन आक्रांताओं के वजूद को लेकर ढोएंगे भारत के हिंदू और ये भारत देश अपने आराध्य प्रभु श्री कृष्ण की दुर्दशा कबतक बर्दाश्त करता रहेगा?
आप इन प्रस्तुत तस्वीरों में देख सकते है आखिर किस तरह से हमारे अस्तित्व को समाप्त करने की कोशिश की गई है।
कोई माने या माने ये तस्वीरे सबकुछ बयां कर रही है। लोग खुद भी जाकर इन जगहों में जांच पड़ताल कर सकते है। बाकी तस्वीरों में इतिहास बाकी सब बकवास। भारत के कुछ मंदिरों की दिवारे ऐसे ही अपना दर्द रोती है। चीखती पुकारती हैं , आओ मुझे मलेक्षो से स्वतंत्र करो, मुझे पवित्र करो। हमारा अस्तित्व को मिटाने की कोशिश करने वालो का इतना सम्मान आखिर क्यों हो रहा है ? क्या हमें अपनी खोई हुई विरासत को सहेजने का हक नहीं है? हम अपने ही देश में अपने मंदिर को पुनः स्थापित नही कर सकते है .. मंदिरों के देश ऐसे ही न जाने कितने मंदिर न्याय मांग रहे है... एक दिन आएगा उनका वीर धर्मपुत्र इनको मुक्ति दिलाएगा। बाकी कहा तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवी वर्ग लंबे चौड़े भाषण देकर लेख लिखकर भषड़ मचाता हैं इसपर कुछ नही बोलेंगे ये लोग इनकी बोलती बंद हो जाएगी या ये मनगढ़ंत कहानी प्रस्तुत कर देंगे...!
देश में आपसी भाईचारे, गंगा जमुनी तहजीब की बात होती है तो क्या मंदिर तोड़ कर बने मस्जिद में नमाज़ पढ़ना गंगा जमुनी तहजीब का उदाहरण है या इस्लामी आक्रांताओं के गुणगान करने का? क्या मुस्लिमों को स्वेच्छा से इन स्थानों को इनके असली हकदार को नहीं दे देनी चाहिए?


( स्रोत~  हिस्ट्री ऑफ मेडिवल इंडिया-वीडी महाजन , मध्यकालीन भारत के इतिहास पर तमाम पुस्तके , कुछ तस्वीरें इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त

Friday, December 22, 2023

राजनीतिक हलचल आजकल

बहुत दिनों से मेरा मोबाइल खराब हो रखा है तो कोई खबर नहीं मिलती है। आजकल के अखबारों में भी वो अब बात नही रही बस चारो तरफ गंध फैला हुआ है। राजनीति तो राजनीति अब खेलों में भी अलग धंधा चालू हो चुका है। मतलब क्या ही बोला जाय आजकल के खेल पत्रकारो का वो किसी खिलाड़ी विशेष के दलाल बने हुए दिख जाते है अपने लेख और खबरों के माध्यम से। बनिए फैन किसी बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी का लेकिन इतना गिरिए की किसी और बेहतरी खिलाड़ी को नीचा गिराने लग जाए खुलेआम। खैर छोड़िए भी मुड़कर आते हैं राजनीति में शुरू से लेकर अंत तक छत्तीसगढ़ में जो माहौल मीडिया में भूपेश बघेल जी ने बनाया था क्या ही कहना ऐसा लग रहा था इस बार भी यही मुख्यमंत्री बनेंगे और फिर कांग्रेस की सरकार बनेगी...!  जब नतीजे आए तो सब धरा का धरा रह गया। वो बिकाऊ मीडिया भी गायब हो गई जो इन्हे एक महान नेता की तरह प्रस्तुत कर रही थी। 
यही हाल राजस्थान और मध्यप्रदेश का रहा। राजस्थान का तो फिर भी समझ में आता है की हर पांच साल में सरकार बदल ही जाती है और जनता भी त्रस्त थी गहलोत सरकार से लेकिन जो घटिया माहौल शिवराज या भाजपा सरकार के खिलाफ बनाया गया था मीडिया, सोसल मीडिया द्वारा उसको जोरदार तमाचा लगा है। हा मुख्यमंत्री बेसक मोहन यादव जी को बनाया गया है लेकिन इससे शिवराज जी की लोकप्रियता खत्म नही हो जाती है। समय की मांग थी बदलाव जरूरी था और हुआ है। अब जैसे राजस्थान में  भजन लाल शर्मा जी को मुख्यमंत्री का पद मिला है ठीक वैसे ही जैसे छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय जी को मिला है। बात साफ भाजपा ने बड़ा खेल खेल लिया है इन तीनो जमीनी नेताओ को मुख्यमंत्री का पद देकर। सवर्ण ,सामान्य, पिछड़ा या अनुसूचित जाति, आदिवासी वर्ग के लोगो  लेकर गजब की राजनीति चल रही है जिसमे भाजपा ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है और विपक्ष से बहुत आगे निकल चुकी है जिसका परिणाम आने वाले लोकसभा चुनाव में भी दिखेगा। 
अब मोदी जी को पनौती बोला गया था मोदी जी ने उसे आड़े हाथों लिया इस मुद्दे को। कुछ लोग अपनी जबान बंद करके भी अपने पार्टी की मदद कर सकते है लेकिन इनसे ये भी नही होगा। चलिए ठीक है अभी हाल ही में संसद में कुछ तथाकथित लोग घुस गए जोकि एक राष्ट्रीय सुरक्षा में चूक का मामला है अगर यही बंदूक धारी होते और इनके पास विस्फोटक होता तो बड़ा हादसा हो सकता है। विपक्ष के पास बेहतरीन मौका था की सरकार को इस मुद्दे को लेकर घेरे लेकिन नही इन्हे उन तथकतिथ घुसपैठियों का समर्थन करना था। समर्थन करते हुए कहते है सब की बेरोजगारी की वजह से ये सब हुआ है। एक अलग ही स्तर की राजनीति चल रही विपक्ष वालो की इनका बनाया इंडी गठबंधन भी किसी काम का सब ढोकोसला था। शायद पहली बार ऐसा हुआ है की राज्यसभा से इतने सांसद निलंबित हुए है। विरोध प्रदर्शन में एक टीएमसी के नेता कल्याण बनर्जी ओछी हरकत करते हुए नजर  आए देश के उपराष्ट्रपति की नकल कर रहे थे और मजाक उड़ा रहे थे वही पर कांग्रेस के युवराज वीडियो बना रहे थे। एक लगभग 80 साल के शिष्ट और सुसंस्कृत व्यक्तित्व का मजाक उड़ाया गया जो संवैधानिक तौर पर भारत के शायद तीसरे सबसे महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन हैं। राहुल गांधी कभी भी एक गंभीर राजनेता नहीं बन सकते। राहुल गांधी वीडियो बनाने की जगह उस सांसद को रोकते तो एक गंभीर राजनेता की छवि बन सकती थी ये छोटी छोटी चीज ही इंसान को बड़ा बनाती है
बाकी सब मौजूद सांसदों की नीचता का स्तर भी दिख गया।



Wednesday, November 22, 2023

मैच जिताने में ऑलराउंडर की बड़ी भूमिका होती है

अभी अभी विश्वकप खत्म हुआ हैं। लोगो की भावनाएं आहत हुई है। करीब 20 साल बाद भारत और आस्ट्रेलिया आमने सामने थे फाइनल में इस बार टॉस जीतकर बॉलिंग की ऑस्ट्रेलिया ने पिछली भारत ने की थी जैसे लेकिन कोई फर्क नही पड़ा नतीजा वही निकला 6 विकेट से ऑस्ट्रेलिया ने मैच को जीत लिया। रोहित शर्मा ने जो शॉट खेला था उसके लिए वो जब तक जीवित रहेंगे तब तक खुद को गालियां ही देंगे... कैसे यार मुझे रुकना चाहिए था.... एक दम से 1983 में जैसे सर विवियन रिचर्ड्स ने खेला था और कपिल देव ने कैच पकड़ा था उसी तरह से रोहित शर्मा ने खेला और हेड ने कैच पकड़कर खेल पलट दिया। बात यही नही खतम नही होती है हमने एक ऑलराउंडर खेलाना जरूरी नहीं समझा, सूर्या को खेलाना बेकार ही फैसला था वो बॉलिंग भी नही करा सकता है.. हार्दिक पांड्या का घायल को बाहर होना खल गया लेकिन इतने बड़े देश क्या कोई ऑलराउंडर नहीं मिला बीसीसीआई को.. हद है अश्विन को बाहर बैठा कर रखा फाइनल में शार्दुल भी नही खेला चलो ठीक है कम से कम यार प्रसिद्ध कृष्णा को तो खेला सकते थे। पार्ट टाइमर कोई नहीं था भारत में जिसका डोमेस्टिक में बॉलिंग रिकॉर्ड बढ़िया हो और अच्छा खासा ओवर निकाल ले।

2007 का T20 ,2011 हो या 2013 का चैंपियन ट्रॉफी  हम तभी जीते जब खिलाड़ी बदलते गए पिच के हिसाब से विनिंग कांबिनेशन जैसा कुछ नही होता है। Constant कुछ भी नही होता है... सचिन सहवाग तक बॉलिंग करके ओवर निकाल लेते थे जब टीम जरूरत पड़ती थी तो। युवराज रैना जैसे ऑलराउंडर अब नही दिखते है टीम। भले ही फास्ट बॉलिंग ऑलराउंडर नही थे लेकिन टीम संतुलित थी इन स्पिन फेंकने वालो से। शर्म की बात है की टीम में कोई ऑलराउंडर नही है अगर जडेजा को आप बल्लेबाज मानते है तो आप आईपीएल ही देखिए वही सही है आपके लिए... Individual records बनाने में सब लगे ही थे और बनने भी चाहिए.. लेकिन दबाव में खेलने वाला गंभीर बड़ा याद आया यार...इस विश्वकप में ऑस्ट्रेलिया की टीम आप देख सकते है ऑलराउंडरों और पार्ट टाइम गेंदबाजों की कमी नही थी। मानते है हमने 10 दस मैच लगातार जीते लेकिन सामने 5 बार की चैंपियन थी जो कभी हार नही मानती है अफगानिस्तान के खिलाफ मैक्सवेल के दोहरे शतक बता दिया था की हम हारने वालो में से नही है। कहते है न सब अच्छा हो रहा तो गलत चीजे दिखनी बंद हो जाती है लोगो को वही हुआ है आलोचना किसी को पसंद नही आजकल वैसे भी आलोचना करने वालो का रिकॉर्ड चेक करने लग जाते है आजकल के तथाकथित प्रसंशक लोग। बिना ऑलराउंडर के खेलेंगे तो खामियाजा भुगतना ही था एक न एक दिन ।

2011 भारत विश्वकप टीम में धोनी और गंभीर को छोड़ सारे खिलाड़ी लगभग ठीक ठाक गेंदबाजी कर लेते थे।
1996 की श्रीलंका की विश्वकप टीम में महानामा और कालुविथर्ना को छोड़ सब गेंदबाजी कर सकते थे।
87 की विश्वकप ऑस्ट्रेलिया टीम में 8-9 गेंदबाजी कर सकने वाले लोग थे। ये विश्वकप भारत में हुए थे।

 एक बात और विव रिचर्ड्स महान थे और रहेंगे जब दुनियाभर के बड़े क्रिकेटर 60 की स्ट्राइक से वनडे खेलते थे और उसे बेस्ट कहते थे तब विव रिचर्ड्स की 90+ स्ट्राइक थी इतना ही नही तेज गेंदबाज भी थे फिल्डिंग में तो लाजवाब एक दम 3d खिलाड़ी बिना हेलमेट के उस समय के तेज गेंदबाजो को पानी पिला देते थे... महानता ये नही की आपने अपने करियर में क्या किया.. आपने विश्व कप जितवाया की नही अपनी टीम को इसमें में है..!

Sunday, November 5, 2023

संविधान प्रावधानों के स्त्रोत और योगदान


संविधान कि बेसिक बातों को छोड़कर कुछ अलग जानने कि कोशिश करते हैं। 

आंशिक भ्रांति वाली बातों जैसे कि संविधान मूलतः केवल प्रारूप समिति ने ही तैयार किया, संविधान का आधार मूलतः 1935 का भारत सरकार अधिनियम और संविधान के स्त्रोत केवल विदेशी संविधान ही है जैसे मुद्दों पर थोड़ा ध्यान देते हैं।

सर्वप्रथम तो "प्रारूप समिति" पर वाली बात पर आते हैं, संविधान सभा कि अनेक समितियां थी जिन्होंने अपना काम ईमानदारी व मेहनत से किया। उन्हें में से एक प्रारूप समिति भी थी इसलिए ऐसा नहीं कि उसका योगदान नहीं है। लेकिन अक्सर ऐसा समझा जाता है संविधान का खाका सर्वप्रथम इसी समिति और हल्केपन से कहां जाएं तो बाबा साहेब अंबेडकर ने तैयार किया। लेकिन ऐसा नहीं है, प्रारूप समिति का मुख्य काम ये था कि संविधान सभा कि परामर्श समिति द्वारा तैयार संविधान के प्रारूप का परिक्षण करें। और इस परामर्श समिति ने ही संविधान को प्रथम प्रारूप तैयार किया। इसमें प्रमुख थे संवैधानिक परामर्शदाता 'बेनेगल नरसिंह राव, जो कि एक सिविल सेवक और राजनीतिज्ञ थे। इन्होंने विश्व के संविधान विशेषज्ञों से बातचीत करके एक प्रतिवेदन भी प्रस्तुत किया। एक और महत्वपूर्ण बात कि ये सब होने से पहले ही संविधान सभा के सचिवालय ने 3 जिल्दों में दुनियाभर के संविधानों के महत्वपूर्ण दृष्टांत इक्ट्ठे पर संविधान सभा के सदस्यों को वितरित कर दिए थे।

अब आते हैं दूसरी बात पर कि एक लोकप्रचलित बात ये भी है कि संविधान का मूल ढांचा 1935 के भारत सरकार अधिनियम पर आधारित है और संविधान के लगभग सारे ही प्रावधान विदेशी संविधानों से उठाए गए हैं। लेकिन ये भी पूर्णतः सत्य नहीं है, बहुत से महत्वपूर्ण प्रावधान जो अभी संविधान में है और जो वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था है उनके बीज और छाया आपको 1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट और बाद में आए अधिनियमों में दिख जाएंगे। मूलाधार वो ही है।

नोट: ये सत्य है कि ब्रिटिश सरकार ने जो एक्ट और अधिनियम पारित किए वो केवल उसकी ही सहायता के लिए थे। लेकिन उन्हीं को आधार बनाकर आज के मोटे-मोटे प्रावधान बनाए गए हैं वो भी सत्य ही है।

जैसे कि:

1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट में आपको कालांतर में यानि वर्तमान में राष्ट्रपति कि सर्वोच्चता, मंत्रीमंडल, केन्द्रीय सरकार का प्रारूप, केन्द्र और राज्य तथा विदेश नीति, युद्ध जैसे मामलों में केन्द्र के अधिकार, संसद का प्रशासन पर नियन्त्रण, सुप्रीम कोर्ट के लक्षण नजर आने लगते हैं।

1781 के संशोधन अधिनियम में आपको नजर आएगा कि वहां सुप्रीम कोर्ट कि निरंकुशता पर आंशिक रोक लगी, संसद कि सर्वोच्चता का लक्षण दिखता है, कानून बनाने में भारतीय समाज के रीति-रिवाजों यानि कि समाजिक ढांचे के अनुसार व्यवहारिक कानून बनाना, केन्द्र को राज्यों के लिए कानून बनाने का अधिकार विधि निर्माण में संसद कि सर्वोच्चता के लक्षण दिखते हैं।

1784 के पिट्स इंडिया एक्ट में हमें केन्द्रीय मंत्रिमंडल और प्रधानमंत्री तथा राज्यों में राज्य मंत्रिमंडल का शुरूआती रूप देखने को मिलता है।

1786 के संशोधन अधिनियम में राष्ट्रपति के बिल पर रोक और अध्यादेश पारित करने कि शक्ति का आंशिक रूप देखते हैं।

1793 के चार्टर एक्ट में, हम एक लिखित संविधान और संविधान के प्रावधानों कि व्याख्या सुप्रीम कोर्ट के द्वारा किए जाने, लोकप्रतिनिधि के भारतीय नागरिक होने का अनिवार्यता व उनका वेतन जैसी बातों का आरंभिक रूप दिखता है।

1813 के चार्टर एक्ट में हम समानता का एक रूप देखते हैं (भले ही वो उस समय कंपनी के अलावा बाकी ब्रिटिश व्यापारियों के लिए हो), शिक्षा बजट इत्यादि कि एक रूप देखते हैं।

1833 के चार्टर एक्ट से हमें फिर राष्ट्रपति कि सर्वोच्चता और केन्द्र के पास अधिक अधिकार होने के लक्षण दिखते हैं। पद पर नियुक्ति के लिए समानता, कानून मंत्री और विधि मंत्रालय कि उद्गम का रूप दिखता है।

1853 के चार्टर एक्ट में राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाना, राज्यों में राज्यपाल नियुक्ति, शक्ति पृथक्करण, प्रतियोगी परीक्षाओं व राज्यों को भी अपने अधिकार क्षेत्र के कानून बनाने का अधिकार के शुरूआती रूप दिखते हैं।

1858 के भारत सरकार अधिनियम में, हम सरकारों कि वैधानिकता, संसद से पारित कानूनों पर राष्ट्रपति कि स्वीकृति, संसद में बजट पेश करना, लोक सेवाओं में समानता, जनता कि एकसमान अधिकार, सरकार के लोककल्याणकारी कार्यों जैसे अनेक प्रावधानों कि कच्ची रूपरेखा देखने को मिलती है।

1861 के भारत परिषद अधिनियम में हम संसद व विधानसभाओं में सदस्यों कि संख्या का निर्धारण, संसद के द्वारा नए राज्य व केंद्र शासित प्रदेश बनाना, राष्ट्रपति व राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने का अधिकार, संसद द्वारा देश के नागरिकों हेतु कानून बनाना, जैसे प्रावधानों व शक्तियों का और अधिक स्पष्ट रूप नजर आने लगता है।

1892 के भारतीय परिषद अधिनियम में निर्वाचन द्वारा विधानसभा व लोकसभा के सदस्य चुने जाना, संसद व विधानसभा कि शक्तियों में वृद्धि, कार्यपालिक पर नियंत्रण जैसी चीजों का शुरूआती रूप दिखने लगता है।

1909 के भारतीय परिषद अधिनियम (मार्ले-मंटो सुधार) में हम आरक्षित सीटों के कंसेप्ट, सरकार कि संसद में जवाबदेही जैसे महत्वपूर्ण प्रावधानों को पनपता देख सकते हैं।

1919 का भारत सरकार अधिनियम (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) में द्विसदनीय व्यवस्था, राज्यसभा में मनोनीत सदस्य, निर्वाचन क्षेत्र, मताधिकार, राज्यों में भी द्वैध शासन, केंद्र व राज्यों में विषयों का बंटवारा जैसे सिद्धांतों को और परिपक्व होते देखते हैं।

बाकी 1935 और 1947 का भारत सरकार अधिनियम तो है ही । उनके बारे में लिखकर पोस्ट को क्यूं ही बिना बात लंबा करना, जबकि ये पहले ही हो चुकीं हैं।

खैर, इतना लिखने का उद्देश्य बस ये था कि ऐसा नहीं है कि सबकुछ अचानक हो जाता है और एक ही इन्सान सबकुछ कर डालता है। विशेषकर बात जब एक सामूहिक योगदान से बने किसी प्रोजेक्ट कि हो, और यहां वो प्रोजेक्ट संविधान था। सबका योगदान था, सबका खून-पसीना शामिल था। ना किसी एक व्यक्ति और ना किसी एक राजनीतिक पार्टी ने तैयार किया।

लेखक: पुष्पराज आर्य

Tuesday, October 31, 2023

श्री राम जन्मभूमि मंदिर विवाद: संपूर्ण घटनाक्रम पर एक नजर

1528 : अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे हिन्दू भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं। मुगल बाबर ने यह मस्जिद बनवाई थी, जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था। मुगल बादशाह बाबर के के कमांडर मीर बाकी ने बाबरी का निमार्ण कराया था।

1853: हिन्दुओं का आरोप है कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ। हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा

1859: ब्रिटिश सरकार ने तारों की एक बाड़ खड़ी करके विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिन्दुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दे दी

1885 : मामला पहली बार अदालत में पहुंचा। महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे एक राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की अदालत ने याचिका खारिज कर दी थी।

1934 : अयोध्या में एक बार फिर दंगे हुए और मस्जिद के कुछ हिस्सों को नुकसान भी पहुंचाया गया। बाद में राज्य सरकार के खर्च पर मस्जिद में सुधार कर दिया गया।

1949: विवादित ढांचे के बाहर केंद्रीय गुंबद में रामलला की मूर्तियां स्थापित की गई।

1950: रामालला की मूर्तियों की पूजा का अधिकार हासिल करने के लिए गोपाल  विशारद ने फैजाबाद जिला अदालत में याचिका दायर की।

1950: परमहंस रामचंद्र दास ने पूजा जारी रखने और मूर्तियां रखने के लिए याचिका दायर की।

1959: निर्मोही अखाड़ा ने जमीन अधिकार दिए जाने के लिए याचिका दायर की।

1961: उत्तर प्रदेश सुन्नी केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने स्थल पर अधिकार के लिए याचिका दायर की।

1984: विश्व हिंदू परिषद ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने और राम जन्म स्थान को स्वतंत्र कराने व एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया।

1 फरवरी 1986 : स्थानीय अदालत ने सरकार को पूजा के लिए हिंदू श्रद्धालुओं के लिए स्थान खोलने का आदेश दिया।
विरोध में बाबरी एक्शन कमेटी का गठन।
 
1989: भाजपा का वीएचपी को औपचारिक समर्थन जुलाई में भगवान " रामलला विराजमान" नाम से पांचवा मुकदमा दाखिल।
1989: राजीव गांधी की सरकार ने बाबरी मस्जिद या नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी।

14 अगस्त 1989 : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित ढांचे के लिए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।

सितंबर,1990: लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली। सांप्रदायिक दंगे हुए । नवंबर में आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार किया गया। भाजपा ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस लिया।

अक्टूबर,1991: कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद के आस पास की 2.77 एकड़ भूमि को अपने अधिकार में लिया।

6 दिसंबर 1992: हजारों में की संख्या में कर सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद को ढहा दिया। एक अस्थायी राम मंदिर का निर्माण किया..!
16 दिसंबर 1992:  मस्जिद की तोड़ फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन।

3 अप्रैल 1993: विवादित स्थल में जमीन अधिग्रहण के लिए केंद्र ने 'अयोध्या में निश्चित क्षेत्र अधिग्रहण कानून' पारित किया। अधिनियम के विभिन्न पहलुओं को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कई रिट याचिकाएं दायर की गईं। इनमें इस्माइल फारूकी की याचिका भी शामिल। उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 139ए के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर रिट याचिकाओं को स्थानांतरित कर दिया जो उच्च न्यायालय में लंबित थीं।

 24 अक्टूबर 1994 : उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक इस्माइल फारूकी मामले में कहा कि मस्जिद इस्लाम से जुड़ी हुई नहीं है।

जनवरी 2002: अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल में एक अयोध्या विभाग शुरू किया जिसका काम विवाद को सुलझाने के लिए दोनो पक्षों से बातचीत करना था।

अप्रैल 2002 : उच्च न्यायालय में विवादित स्थल के मालिकाना हक को लेकर सुनवाई शुरू।

मार्च -अगस्त,2003:  13 मार्च को  न्यायालय ने असलम उर्फ भूरे मामले में कहा, अधिग्रहित स्थल पर किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधि की अनुमति नहीं है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर  भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दावा था कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष मिले।

 जुलाई ,2009: लिब्रहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी 

30 सितम्बर 2010 : उच्चतम न्यायालय ने 2:1 बहुमत से विवादित क्षेत्र को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच तीन हिस्सों में बांटने का आदेश दिया।

9 मई 2011: उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या जमीन विवाद में उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाई।

21 मार्च 2017: सीजेआई जेएस खेहर ने संबंधित पक्षों के बीच अदालत के बाहर समाधान का सुझाव दिया।

7 अगस्त 2017 : उच्चतम न्यायालय ने तीन सदस्यीय पीठ का गठन किया जिसने 1994 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की।

8 फरवरी 2018 : सिविल याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई शुरू की।

20 जुलाई 2018 : उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा।

27 सितम्बर 2018 : उच्चतम न्यायालय ने मामले को पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष भेजने से इनकार किया। मामले की सुनवाई 29 अक्टूबर को तीन सदस्यीय नई पीठ द्वारा किए जाने की बात कहीं।

29 अक्टूबर 2018: उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई उचित पीठ के समक्ष जनवरी के पहले हफ्ते में तय की जो सुनवाई के समय पर निर्णय करेंगी।

24 दिसम्बर 2018 : उच्चतम न्यायालय ने सभी मामलों पर चार जनवरी 2019 को सुनवाई करने का फैसला किया।

4 जनवरी 2019 : उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मालिकाना हक मामले में सुनवाई की तारीख तय करने के लिए उसके द्वारा गठित उपयुक्त पीठ दस जनवरी को फैसला सुनाएगी।

8 जनवरी 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ का गठन किया जिसकी अध्यक्षता प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने की। इसमें न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति एनवी रमन्ना, न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ शामिल थे।

10 जनवरी 2019 : न्यायमूर्ति यूयू ललित ने मामले से खुद को अलग किया जिसके बाद उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई 29 जनवरी को नई पीठ के समक्ष तय की।

25 जनवरी 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ का पुनर्गठन किया। नई पीठ में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एसए नजीर शामिल थे।

29 जनवरी 2019 : केंद्र ने विवादित स्थल के आसपास 67 एकड़ अधिग्रहीत भूमि मूल मालिकों को लौटाने की अनुमति मांगने के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 26 फरवरी 

2019 : उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता का सुझाव दिया और फैसले के लिए पांच मार्च की तारीख तय की जिसमें मामले को अदालत की तरफ से नियुक्त मध्यस्थ के पास भेजा जाए अथवा नहीं इस पर फैसला लिया जाएगा। 

8 मार्च 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता के लिए विवाद को एक समिति के पास भेज दिया जिसके अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एफएम आई कलीफुल्ला बनाए गए।

9 अप्रैल 2019: निर्मोही अखाड़े ने अयोध्या स्थल के आसपास की अधिग्रहीत जमीन को मालिकों को लौटाने की केन्द्र की याचिका का उच्चतम न्यायालय में विरोध किया।

10 मई 2019: मध्यस्थता प्रक्रिया को पूरा करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने 15 अगस्त तक की समय सीमा बढ़ाई।

11 जुलाई 2019 : उच्चतम न्यायालय ने 'मध्यस्थता की प्रगति' पर रिपोर्ट मांगी।

18 जुलाई 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति देते हुए एक अगस्त तक परिणाम रिपोर्ट देने के लिए कहा।

1 अगस्त 2019 : मध्यस्थता की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को दी गई। 2 अगस्त 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता नाकाम होने पर छह अगस्त से रोजाना सुनवाई का फैसला किया।

6 अगस्त 2019 : उच्चतम न्यायालय ने रोजाना के आधार पर भूमि विवाद पर सुनवाई शुरू की। 4 अक्टूबर 2019: अदालत ने कहा कि 17 अक्टूबर तक सुनवाई पूरी कर 17 नवम्बर तक फैसला सुनाया जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कहा।

16 अक्टूबर 2019 : उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा।

19 नवम्बर 2109: उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या में पूरी 2.77 एकड़ विवादित जमीन राम लला को दी, जमीन का कब्जा केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगा। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को मुस्लिमों को मस्जिद बनाने के लिए एक मुनासिब स्थान पर पांच एकड़ भूमि आवंटित करने का भी निर्देश दिया।

स्रोत: राष्ट्रीय सहारा अखबार, बीबीसी हिंदी, पीटीआई आदि

Sunday, October 29, 2023

इजराइल की कार्रवाई से भारत में बैठे इस्लामिक कट्टरपंथियों का होता चरित्र उजागर

बहुत भसड़ मचा हुआ है देश में । एक अलग ही स्तर का बकइती हो रहा है। क्या फर्क पड़ता है हमे फिलिस्तीन में लोग मरे या जिए? रही बात समर्थन की तो हमारा समर्थन उसी को जो इस्लामिक आतंकवाद से जूझ रहा है। हमने लाखो लोगो की जान गवां दी है इस तथाकथित जिहादी आतंकवाद से। फिर भी कुछ लोगो को कीड़ी काट रही है। भारत में बैठा लिबरल गैंग ऐसे रोना रो रहा है मानो ये युद्ध भारत की भूमि पर लड़ा जा रहा है और भारत के लोग मारे जा रहे है। हद है मतलब भारत जबरदस्ती का इसमें क्या उखाड़ने जाय? 

कोई लड़े मरे कटे क्या ही फर्क पड़ता है।शक्तिशाली लोगो के साथ रहकर ही शक्ति हासिल होती है। तब जाकर कही महाशक्ति की स्थापना होती है। औरतों और बच्चों का आड़ लेकर कायराना हमला करने वाले खुद पीड़ित बताने में लगे रहते है। तीन जादुई शब्दो का खेला बहुत खतरनाक होता है इनका। आज के समय में कोई कमजोर नही है अगर किसी के घर में घुसकर में कोई उत्पात तो मचाएगा तो कूटा ही जायेगा..! खुद को इस्लाम का हिमायती बताने वाले इतने सारे इस्लामिक राष्ट्र क्यों नहीं कोई इन फिलिस्तीनियों को शरण दे दे रहा है.. ? बात साफ है जो इन्हे जो शरण देगा ये उसी की कब्र खोदने में लग जाएंगे..इनका इतिहास रहा है गद्दारी का और गद्दारों को शरण नही दिया जाता है बल्कि निर्वासित किया जाता है। बात वही है न इस्लाम का नेता है बनना है तो सब इनके लिए बोल दे रहे है..! हमास एक आतंकी संगठन है जिसे तुर्की के राष्ट्रपति ने मुक्ति सेना का नाम दे दिया हैं हा वही तुर्की जो भारत के खिलाफ भी जहर उलगता रहता है समय समय पर । भारत में बैठे कुछ दो कौड़ी के लोगो का अलग ही मातम मच रहा है । ठोके हमास वाले जा रहे है दर्द इनको हो रहा है। छपटाहट देखी जा सकती है खुलेआम रोना मचा हुआ है। 

इजराइल में रह रही भारतीय महिला सौम्य संतोष की इसी फिलिस्तीन हमास के आतंकी हमले में मृत्यु हो गई थी 2 साल पहले इसपर कोई नही बोला था। बोलेंगे कैसे? शांतिप्रिय समुदाय वाले जो ठहरे! देखने वाली बात है जैसा 2 साल पहले हुआ था उससे ज्यादा खतरनाक हमला हुआ है इजराइल पर जिसकी उम्मीद किसी ने नही की थी। इस्लामीक कट्टरपंथियो का भड़काऊ भाषण देख सकते है इन्हे अपने देश से प्यार नही है। ये जिस देश में रहते हैं वहा बस इस्लामिक राज कायम करना चाहतें है। इन्हे बस अपना मजहब दिखता है और कुछ नही। वरना भारत में रहने वाले मुस्लिमो से क्या मतलब की इजराइल फिलिस्तीन में क्या कर रहा है? 

ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड का कमांडर सुलेमानी को अमेरिकी सेना ने मार गिराया था इसको भी लेकर भारत के कारगिल में जुलूस निकाला जाता है, अमेरिका के खिलाफ नारेबाजी होती है। इतना ही नही 2012 में आतंकी रोहिंग्याओ को लेकर गंध मचा था भारत में । एक तस्वीर सबने देखी होंगी जिसमे कुछ जिहादी वीरों की अमर जवान ज्योति को मारकर तोड़ रहे है, फिर कहते है आप हमारे देशभक्ति पर सक कर रहे है। इसका क्या अर्थ निकाला जाय ? अगर कल को किसी मुस्लिम राष्ट्र से भारत का युद्ध हो गया तो  भारत में रह रहे तथाकथित मुसलमान क्या भारत के साथ रहेंगे? 

अरे नही मतलब भारत माता की जय नही बोलेंगे वंदेमातरम से तकलीफ है इनको क्या तकलीफ है भाई पूछ दो तो बोलेंगे संविधान में ऐसा नही लिखा है.. तो अरे मिया तो भारत का संविधान तो ये भी नही कहता है की सड़को पर उतर कर "फिलिस्तीन जिंदाबाद" के नारे लगाओ...! बात साफ है गजवा ए हिंद का खतरनाक इरादा लेकर चलते है ये तथाकथित घृणित मानसिकता वाले पंचर पुत्र जिनका सफाया होना बहुत जरूरी है। बाकी आतंकवाद के विरुद्ध भारत और इजराइल एक दूसरे का समर्थन करते है और करते रहेंगे।

Monday, October 9, 2023

इस तांडव की अग्नि में सब जलकर भस्म हो जाएंगे

फिल्मों और मीडिया वालो को पैसे देकर अपने बारे में जो नैरेटिव फैलाए या बनाए है कई सालो से दुनियां के कुछ तथाकथित उच्च स्तर के खुफिया विभाग वाले उसी को लोग सच मान बैठें है। देखा जाय तो इनके असफल ऑपरेशन को भी फिल्मों में एक सफल ऑपरेशन बताकर उसपर पर्दा डालने की कोशिश की गई है। मीडिया में बढ़ा चढ़ा कर ऐसे प्रस्तुत किया जाता है की दुनिया के किसी भी कोने में कोई व्यक्ति पेड़ के पीछे खड़ा होकर चाट पकौड़ी खा रहा हो या मूत रहा हो, ये सब देख लेते है।खासकर भारत में ऐसे सुनी सुनाई कहानियों को लोग हवा देने लग जाते है, ये मिथक जोर शोर से कथक करता हुआ नजर आता भी है। अरे ये दुनिया के सबसे ताकतवर लोगो में से एक है इनसे कोई नहीं उलझ सकता है, ये अदृश्य है...! चीजे इससे भी ज्यादा पेचीदा है वास्तव में देखा जाय तो।

हमारे देश में देखा जाय कुछ भी बड़ा हमला हो जाय कही तो लोग इंटेलिजेंस फेलियर बोलना शुरु कर देते है की साहब खूफिया एजेंसियां सो रही है। अपने देश के इंटेलिजेंस पर सवाल खड़ा करने वाले उन तथाकथित उच्च स्तर की एजेंसियों से तुलना करने लग जाते है बिना कुछ जाने और समझे।
जबकि हमारी खुफिया एजेंसियों की जानकारी एकदम सटीक रहती हैं। ना कोई दिखावा रहता है ना कोई प्रदर्शन। परदे के पीछे रहकर वो अपना काम बखूबी निभाते है ,बात ये ही रहती है उसपर अमल कितना किया जा रहा है? बहुत बारी देखा गया है की जब इनकी रिपोर्ट को सरकारों द्वारा न मानने पर देश को खामियाजा भुगतना पड़ा है। चीन की नाक के नीचे रक्तविहीन तख्तापलट कर सिक्किम का भारत के राज्य के तौर पर विलय करवाने का काम हो या उससे पहले पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश की स्थापना करना हो ये सब बिना एक मजबूत खुफिया विभाग के संभव नही था। दुश्मन देश की सेना में शामिल होकर उनसे सलामी ठोकवाना हमारे ही देश के खुफिया विभाग वाले कर सकते है। किसी को कानों कान खबर नहीं लगती है , बात साफ है हम जो चाहते है , दिखाते है सिर्फ़ उतना ही दुनिया भर के लोग देख और समझ पाते है। 

अब कुछ बोलेंगे की इतनी ही खुफिया विभाग मजबूत थी तो देश के प्रधामंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कैसे हो गई?
तो बात बता दू जो सुनने में आता है एक दम साफ तरीके से की इन्हे आगाह किया गया था की सुरक्षा कर्मियों को बदल ले ,इन्हे सुझाव दिया गया था जिसको इन्होंने ने नही माना फिर वही हुआ जिसका डर था..! जिन्होंने हत्या की कौन जानता था की राष्ट्र की सुरक्षा का शपथ लेने वाले राष्ट्र अध्यक्ष के लिए भक्षक बन जाएंगे। जान बचाने वाले जानी दुश्मन बन साबित होंगे लेकिन हमारे खुफिया /सुरक्षा एजेंसियों को भनक लग गई थी अब इनकी रिपोर्ट को नही माने कोई तो इसमें इनका क्या फेलियर? यही हाल पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी का था वो रैली में गए थे जहां जाने से मना किया गया था उन्हे खुफिया विभाग वालो द्वारा लेकिन नही माने और कल के अखबार में एक दुखद समाचार छप गया था।सब चीज से खिलवाड़ कर लेना चाहिए लेकिन इंटेलिजेंस रिपोर्ट से बिलकुल भी नहीं।सुनने में तो ये भी आता है कारगिल के समय में भी इनके रिपोर्ट को दरकिनार किया गया था।तब सरकार शांति समझौता करने में व्यस्थ थी। नतीजा क्या हुआ सबने देखा ये कोई बताने वाली बात नही है।

 2014 के बाद से जब से देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल जी को बनाया गया है तब से आप देख सकते है की हमारा खुफिया विभाग कितना बेहतरीन कार्य रहा हैं। कश्मीर में आतंकवाद से लेकर पुरे देश में फैले नक्सलवाद का कमर टूट चुका है। खुफिया विभाग मजूबती के साथ सक्रिय क्या हुई देश विरोधी ताकते अपने आप निष्क्रिय गई। वरना पशुपति से तिरुपति तिरुपति तक खून खराबा होता था और लाल आतंक जाल फैला हुआ था। बात वही है न फैसले लेने की मजूबत राजनीतिक इच्छाशक्ति जिसका समर्थन पाकर खुफिया विभाग वालो ने आतंकवाद की कब्र खोद के रख दी है। पहले इनकी रिपोर्ट पर कारवाई उतनी नही होती थी जितना की अब हो रहा हैं। जैसे इंदिरा जी के समय एक्शन लिया जाता था बिलकुल वैसे ही कार्य सुचारू रूप से चल रहा है। पठानकोट एयर बेस पर हमला हो , उड़ी हो या पुलवामा हमला इन सभी इस्लामिक जिहादी हमलों का मुहतोड़ जवाब दिया गया है शुरु में लोग यहां भी इंटेलिजेंस फेलियर बोलते थे लेकिन गुरु सब जानते है चूक कहा हुई थी.. 370 हटने के बाद जो कुटाई हुई है आतंकियों की वो देखने लायक है..! कई महीनों से कश्मीर एक दम शांत है कुछ घटनाओं को छोड़ दे तो। परेशान तो भारत के खुफिया एजेंसियों की हिटलिस्ट में शामिल आतंकी है जिन्हे कोई अज्ञात आकर ठिकाने लगा दे रहा है। कनाडा हो या पाकिस्तान इन अज्ञातो को घंटा फर्क पड़ता है उनका काम है ठोकना ठोक रहे है।

लश्कर के जिहादी हो या खालिस्तानी सबके स्थान विशेष में गोलियां ठोककर ये अज्ञात गायब हो जा रहे हैं। आतंकी सरगना Let हाफिज सईद के लौंडे को उठाकर चलती कार में अगले दिन ठोक दिए सब बाकी सब तो रॉ की साजिश है पाकियों की भाषा में ,पिछले साल कंधार हाईजैक में शामिल आतंकी ठोक गया था। एक तरह से देखा जाय तो वध हो रहा है वध वो भी चुन चुनकर हो रहा है अज्ञात लोगो द्वारा कभी दो पहिया वाहन तो कभी कार से। अमेरिका में सुना हु ये एक्सीडेंट होता है देश विरोधियों का..! बात वही है हमारे यहां हमले करके आनंद लेने वालो को ये नहीं पता की जब हम मुस्कुराते है तो तांडव होता है। इस तांडव की अग्नि में सब जलकर भस्म हो जाएंगे।ना जाने कौन है ये अज्ञात जो कर रहे है आतंकियों पर घात, उतार रहे है मौत के घाट नही वध कर रहे है वध। अदृश्य ताकतों को सलाम पर्दे के पीछे रहकर करते शत्रुओं का काम तमाम।

 बाकी धर्मो रक्षति रक्षितः🔥

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Saturday, September 30, 2023

कुआं हमारे पूर्वजों की धरोहर है

आज कल सब कुएं की बात कर रहे है मेरे घर में दो कुआ था। एक कुआ बाहर  द्वार पर है ठाकुर जी के मंदिर से सटा हुआ ये मंदिर भी हमारे घर का जिसका मन आए अपना पूजा पाठ करे। जिसका मन था अपना रस्सी लाता था पानी निकालता था चला जाता था... कभी किसी को पानी के लिए नही रोका हमने और तो हमारे पूर्वजों ने ऐसे दसियो कुएं खुदवा रखे थे गांव भर में...। शाम को बैठकी भी होती थी यहां तमाम विषयों को लेकर खासकर क्रिकेट से लेकर राजनीति तक कुछ भी नही छूटता था। बहुत  लोगो की अनगिनत यादें इससे जुड़ी हुई है।

अब मंदिर कुछ ऐसा दिखता है.... कुएं को पाटा नही गया है.. बाकी सबके घर के हैंडपंप लगा हुआ है हैंडपंप क्या होता है बटन दबाकर हर हर गंगे होता है..!
ये हमारा पंपू सेट मशीन... अंगिनत यादों को समेटे.. अब भले
खंडहर हो चला है लेकिन इसका भी एक जमाना था .. 70 के
दशक में इसे नीदरलैंड के इंजीनियर साहब लोग बनाए थे.... यहां से भी लोग आते थे बटन दबाते थे पानी ले जाते थे अपने मन का ..हमारे दादाजी कभी नहीं टोके किसी को भी ना ही किसी को टोकने देते थे पानी के लिए .. भले सामने वाले से मारा मारी हुआ हो लेकिन पानी हमेशा ऑन रहता था किसी भी समय... आजकल लोग घड़ी देखते हैं यहां कोई समय नहीं देखा जाता था.. जिसे बोल दिए पानी देंगे उसे दे ही देते थे भले अपना कल भराए खेत... पैसा रूपया कुछ नहीं जिसका मन में आया दे दे कुछ भी नही तो रहने दे।

मेरे दादाजी इस मशीन पर अकेले रात में सोते थे रात में.. नाग देवता लोग भी आते जाते रहते थे पर किसी की हिम्मत नही थी इन्हे कोई मारे दादाजी मना किए थे इन्हें कोई नही छुएगा एक बार इनके घर में ही इनके बड़े भाई साहब ने एक सांप को मार दिए थे तो नाराज हो गए थे....! बाकी यहां झुंड लगता था लोगो का नहाने के लिए जो यहां नहाए हैं बचपन में उनका एक अलग ही अनुभव रहा  होगा..। 

ये टैंक जिसे हौदा भी बोलते थे हम लोग इसमें डूबकर नहाने का एक अलग ही मजा था।



जस का तस का देखिए सब पड़ा हुआ है। मैंने सोचा हैं इसे बनवाऊंगा जल्द ही काम लगवाने वाला हु। 

2005_7 तक के बाद यहां का काम खत्म हो चला था। घर में कोई ऐसा नही था जो ये सब काम देखें। सब पढ़ लिखकर बाहर ही निकल गए। खेती बारी कौन देख ही रहा है आज के समय में। पहले की तरह खेती बारी भी नही रह गई हैं। जहा तक मुझे लगता है गांव के युवा जो बाहर जाकर मेहनत मजदूरी करते है उतना तो अपने यहां सब्जियां उगाकर कमा लेंगे साथ में 2 चार गाय भैंस पाल ले तो क्या ही कहना ..! लेकिन भेड़ चाल में सब निकल पड़े है गांव गलियों को छोड़कर खैर इसपर चर्चा फिर कभी करूंगा किसी और ब्लॉग में।
ये ठीक पंपु सेट मशीन के पीछे ही है हमारे। ये पूर्वजों की विरासत में से एक है "बिशुन बाबा" हर दिवाली यहां दीया बारा जाता है। सभी गांव वालो के लिए पूजनीय है। इसके बगल में एक और कुआ हैं इतना पुराना होने के बाद भी इसमें साफ जल बना हुआ है।
ये रहा काली माई का तीर्थ स्थल में .. मेरे पूर्वजों में  एक काली बाबा थे जो यहां तपस्या किए थे इसी नीम के पेड़ के नीचे काली माई स्थापित हो गई कोई हिला ना सका ये नया मंदिर बनवाया लोगो ने लेकिन माई पेड़ के नीचे ही रही जस की तस माई की महिमा अपरंपार है..!
जय हो माई सबका कष्ट हरिए माई। माई के यहां अलग ही सुकून मिलता है।
ये देखिए यहां भी एक कुआ है जो अब वक्त के साथ खंडहर हो चला है। गांव वालों को कम से कम साफ सफाई रखनी चाहिए इधर ये तरांव गांव में पड़ता है मेरे गांव से कुछ ही दूरी पर नदी उस पार।
ये मेरे देवकली गांव की गांगी नदी क्या ही कहना? इसे देखकर कौन कहेगा की पानी के लिए तरसा होगा कोई। भले अब पीने लायक नही रह है लेकिन है तो है खेती बारी में इस्तेमाल होता ही है। बाढ़ आने के बाद ये पुल डूब जाता हैं। लेकिन घबराने की कोई बात नहीं रहती है एक दूसरा रास्ता भी है जो सबके लिए आराम दायक है।
ये पुल है जो नया नया बना है इसकी तवस्वीर सही से नही ले पाया मैं, बाढ़ में इसी का इस्तेमाल होता है। तराव वालों के लिए ये एक वरदान ही समझिए पहले जब बाढ़ आता था तो ये सबसे कट जाते थे। देवकली वालो को ये दिक्कत की खेत खलिहान सबके लगभग इधर ही है नदी पार। 

ये भी मेरे पूर्वजों की धरोहर है ...: ब्रह्म बाबा का मंदिर.. बाबा जगदीशानंद हमारे पूर्वजों में से एक...  यहां लोगो आते जाते रहते है बाबा सबकी सुनते है.. ये कुंवरपुर गांव में है सैदपुर तहसील जिला गाजीपुर.. आप लोग भी इस देव स्थान पर आ सकते है.. खास बात क्या की प्रांगण दसियो बिस्सा में फैला हुआ है कुआ भी मिलेगा और तो और यहां कोई पंडा पुजारी वाला फालतू लफड़ा भी नही है..एक लोग हमारे खानदान के है जो बैठते है इधर देखते रहते है सब ब्राह्मण आदमी है तो पूजा पाठ छोड़ कहा जाएंगे... बाकी शांति भरपूर मिलेगी ... यहां की बात ही कुछ और है बाबा किसी को निराश नहीं होने देते है जो यहां जो आया है कष्ट उसके दूर ही हुए है... बाबा के बारे में दसियो कहनिया किस्से है लिखूंगा आराम से कभी....!
                        जय हो ब्रह्म बाबा 

खास बात का है  हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित किया गया जितना भी कुआ है सैकड़ों वर्ष तक पुराने है,सबमें पानी अभी तक है और सबके सब देव स्थल हैं .... अगल बगल के गांव में दूसरो के द्वारा अब तक बनवाया गया सब सुख गया है.....! यूंही नहीं ब्राह्मण घराने में हमारा परिवार/ खानदान बड़ा है और लोग इज्जत करते है।फिलहाल इतना ही आगे की कड़ी में सिर्फ गांव के मंदिरो के बारे में विस्तृत रूप से चर्चा करूंगा। 

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Friday, September 15, 2023

भारत: विश्वगुरु से विश्व नेतृत्व की यात्रा

भारत में जी20 सम्मेलन होने से भारत का एक अलग ही माहौल बना है दुनिया भर में। विश्व स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी कद वास्तव में पहले से कई गुना अधिक ऊंचा हुआ है। देश को विश्व गुरु बनाने की जो मुहिम छेड़ी है माननीय प्रधानमंत्री जी ने उसपर अमल भी किया हैं। सबसे बड़ी बात क्या मोदी जी के पट्टिका पर "भारत" लिखा गया गया था। सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी जी की पहचान "भारत" का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता के तौर पर पेश की गई। सरकार ने जी 20 के कई आधिकारिक दस्तावेजो में देश के लिए "भारत" शब्द का  प्रयोग किया। मोदी जी ने जब शिखर सम्मेलन को संबोधित किया था , उस समय उनके सामने रखी नाम पट्टिका में "भारत" लिखा था। अर्थात एजेंडा तय है कि देश के अस्तित्व एकता और अखंडता संप्रभुता से कोई खिलवाड़ नही कर सकता है। जब बात भारत को उसकी खोई हुई विरासत और पहचान दिलाने की है तो सबसे पहले नाम पर ही काम करना जरूरी था।
मोदी जी ने आह्वान किया की विश्वास की कमी को "भरोसे" में बदले। अशांत वैश्विक अर्थव्यस्था,आतंकवाद तथा खाद्य,ईंधन एवं  उर्वरकों के प्रबंधन का ठोस समाधान को लेकर जोर दिया और आह्वान किया की इसका सामूहिक रूप  से समाधान निकाले। साथ ही साथ क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखने का आह्वान हुआ। जी20 देशों के ‘नई दिल्ली लीडर्स समिट डिक्लेरेशन' में शनिवार को कहा गया कि आज का युग युद्ध का युग नहीं है और इसी के मद्देनजर घोषणापत्र में सभी देशों से क्षेत्रीय अखंडता तथा संप्रभुता सहित अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों को बनाए रखने का आह्वान किया गया।
घोषणापत्र में कहा गया है कि संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान के साथ-साथ कूटनीति और संवाद भी जरूरी है। इसमें कहा गया है कि यूक्रेन में युद्ध के संबंध में बाली में हुई चर्चा को याद किया गया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तथा संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपनाए गए प्रस्तावों को दोहराया गया।
यूक्रेन संघर्ष पर घोषणा पत्र की खास बातें :

■ आज का युग युद्ध का युग नहीं है
■ संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान के साथ-साथ कूटनीति और संवाद भी जरूरी 
■ सभी देश संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करें 
■ परमाणु हथियारों का इस्तेमाल या इस्तेमाल की धमकी देना अस्वीकार्य
■ जी20 आर्थिक सहयोग का प्रमुख मंच है, भू-राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों के समाधान का मंच नहीं
■ रूसी संघ और यूक्रेन से अनाज, खाद्य पदार्थों और उर्वरकों की तत्काल और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने का आह्वान

इसके साथ 55 देशों के सदस्यों वाले अफ्रीकन यूनियन को प्रधानमंत्री मोदी जी ने स्थायी सदस्यता दिलवाई। अफ्रीकी संघ सात वर्ष से पूर्ण सदस्यता की मांग कर रहा था सभी लोग जानते है इस बात को , बाली में हुए सम्मलेन में प्रधामंत्री ने कहा था मोदी की गारंटी है चिंता मत करिए सदस्यता मिलकर रहेगी। इससे होगा क्या की ग्लोबल साउथ को आवाज को मजबूती मिलेगी। भले ही जी20 में अफ्रीकन यूनियन को शामिल कराने का श्रेय चीन और रूस भी ले रहे हों लेकिन दिल्ली शिखर सम्मेलन में इसका फैसला होने से यह उपलब्धि भारत के ही खाते में दर्ज की जायेगी। इससे ग्लोबल साउथ की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत में भारत का प्रभाव भी बढ़ेगा। 
जी20 में अफ्रीकन यूनियन को शामिल करने का फायदा अफ्रीका के 55 देशों को होगा। अफ्रीका के कई देशों में अभी भी उपनिवेश का प्रभाव है और तमाम देशों में ज्यादा विकास नहीं हुआ है। चीन इन देशों में अपना प्रभाव बनाना चाहता है, हालांकि इन देशों को भारत से नजदीकी बनाना अधिक अनुकूल लगता है। वजह साफ है कि भारत उन पर चीन की तरह अपनी शर्तें नहीं थोपता।
इस बात पर गौर करना होगा कि घाना, तंजानिया, कोंगो, नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी देशों से भारत की पुरानी निकटता है और भारतीय वहां लंबे समय से रह भी रहे है। विशेषज्ञ कहते है कि अफ्रीकी देशों का अब इटली, फ्रांस और जर्मनी सरीखे देशों से मोह भंग हो गया है। वह भारत, चीन और जापान जैसे एशियाई देशों में संभावनाएं देख रहे है। चीन अफ्रीका का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और अफ्रीकी देश सबसे ज्यादा कर्ज भी उसी से लेते हैं। वहीं रूस अफ्रीकी देशों का सबसे बड़ा हथियार प्रदाता है।
देखा जाए तो दुनिया को जिन संसाधनों की जरूरत है, उनमें अफ्रीकी देश बेहद समृद्ध है । अफ्रीकी महाद्वीप में विश्व की 60% नवीकरणीय ऊर्जा संपत्तियाँ और 30% से अधिक खनिज है जो नवीकरणीय और निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण है। अफ्रीका के आर्थिक विकास पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट है कि अकेले कांगो में दुनिया का लगभग आधा कोबाल्ट है, जो लिथियम-आयन बैटरी के लिए आवश्यक धातु है। जी20 में अफ्रीकी यूनियन को शामिल करने का सबसे बड़ा उद्देश्य वैश्विक अर्थव्यवस्था को अधिक समावेशी और न्यायसंगत बनाना है।
अफ्रीकन संघ को इसका लाभ तो होगा ही। अफ्रीका के विकास को बढ़ावा मिलेगा, वैश्विक अर्थव्यवस्था में अफ्रीकी देशों की वास्तविक भागीदारी होगी और तो और तो अफ्रीकी देशों की आवाज बुलंद होगी..! जिसका श्रेय भारत को ही जाता है। इस जी20 सम्मलेन में प्रधामंत्री मोदी के बाद तो दो ही सबकी नजरें ज्यादा टिकी हुई थी वो है अफ्रीकन संघ के प्रमुख अजाली असोमानी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पास आकर गले लगना और ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और उनकी पत्नी अक्षता। बाकी हमे इटली की प्रधानमंत्री जियॉर्जिया मेलोनी को भी नही भूलना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के साथ हुई बैठको का नतीजा ही है जो इटली चीन के बेल्ट रोड परियोजना(BRI) से बाहर निकलने का फैसला किया।
सबसे बड़ी बात क्या की सबकी नजरें मोदी जी पर टिकी हुई थी चीन और रूस के राष्ट्रपतियों के आने न आने का कोई फर्क नही पड़ा। हालांकि रूस ने भारत का समर्थन किया है घोषणा पत्र को लेकर। बाकी जो भी हो मोदी ने दुनियां को  मोदी ने दुनियां  को सबका "सबका साथ, सबका विकास , सबका विश्वास, सबका प्रयास का" मंत्र दिया। यह जी20 सम्मलेन भारत की एक ऐतिहासिक सफलता है। जिसे आने वाले समय में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जायेगा। वैश्विक स्तर पर मोदी जी के नेतृत्व में भारत ने जो पहचान बनाई उसको आने वाले समय में भी बरकरार रखना है तभी देश विश्व गुरु बन पायेगा। 

Thursday, September 14, 2023

स्वातंत्र्यवीर विनायकदामोदर सावरकर

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर एक वीर स्वतंत्रता सेनानी, उत्साही समाज सुधारक, रचनात्मक लेखक, प्रबुद्ध वक्ता और समर्पित राष्ट्रवादी थे।

श्री सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र में नासिक के समीप भागुर गांव के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उन्होंने छह वर्ष की आयु में गांव के विद्यालय में प्रवेश लिया और उनका बचपन अपने पिता से रामायण और महाभारत की कहानियां और राष्ट्रवादी नेताओं के बारे में गाथागीत और बाखड़ सुनते हुए बीता। जन्म से ही प्रतिभावान सावरकर में कविता रचना की विलक्षण क्षमता थी और दस वर्ष की आयु में ही उनकी कविताएं सुप्रसिद्ध समाचारपत्रों में प्रकाशित हुई थीं।

बाल्यावस्था में भी विनायक लोगों की वेदनाओं के बारे में बहुत सचेत थे । वह अकाल और प्लेग जैसी महामारियों के कारण भावनात्मक रूप से द्रवित हो उठे। इसमें ब्रिटिश शासन के कटु व्यवहार और ज्यादतियों ने आग में घी का काम किया। ऐसे वातावरण में युवा सावरकर उद्वेलित हो उठे। उन्होंने अंग्रेजों को अपनी मातृभूमि से निकाल कर भारत को आजाद कराने के शहीदों के अधूरे लक्ष्य को पूरा करने के लिए अपने परिजनों और मित्रों तक की कुर्बानी देने का प्रण किया। वर्ष 1899 में मात्र 16 वर्ष की आयु में ही सावरकर ने 'मित्र मेला' नामक संगठन का गठन किया जिसका मूल उद्देश्य भारत की संपूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना था। बाद में इस संगठन का नाम बदलकर "अभिनव भारत" रख दिया गया।

सावरकर 1906 में लंदन के लिए रवाना हो गए और उन्होंने वहां अपना कार्य जारी रखा। उसी वर्ष उन्होंने 'फ्री इंडिया सोसाइटी' की शुरुआत की। उनके अनुसार मातृभूमि की स्वतंत्रता हेतु संघर्ष में स्वदेशी का पाठ और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार; राष्ट्रीय शिक्षा देना और क्रांतिकारी भावना उत्पन्न करना तथा सैन्य बलों में देशभक्ति की भावना जागृत करना अनिवार्य रूप से शामिल होना चाहिए। दिसम्बर 1908 में आयोजित सम्मेलन में स्वराज की मांग करने वाला एक संकल्प सर्वसम्मति से पारित हुआ । इसी सम्मेलन में तुर्किस्तान को गणराज्य बनने पर बधाई दी गई।

सावरकर संभवतः भारतीय नेताओं में पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन के महत्व को महसूस किया । " अभिनव भारत" के भारतीय क्रांतिकारी रूस, आयरलैंड, मिस्र तथा चीन की क्रांतिकारी ताकतों से निरंतर सम्पर्क बनाए हुए थे। सावरकर ने न्यूयार्क के "गैलिक अमरीका में भारतीय मामलों से संबंधित लेख लिखे तथा इन्हें फ्रेंच, जर्मन, इतालवी, पुर्तगाली और रूसी भाषाओं में अनुवाद करवाकर प्रकाशित करवाया।

सावरकर ने अपने राजनैतिक कार्य के साथ-साथ अपने शैक्षिक जीवन को भी आगे बढ़ाया। यद्यपि सावरकर 'ग्रे इन' की अंतिम परीक्षा में उत्तीर्ण हुए लेकिन 'इन' की बेंचों ने सावरकर को बार में बुलाने से इंकार कर दिया। वे चाहते थे कि सावरकर लिखित में वचन दें कि वह कभी भी राजनीति में भाग नहीं लेंगे। सावरकर ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। सावरकर की गतिविधियों के चलते अंततः मार्च 1910 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जब उन्हें भारत को प्रत्यर्पित किया जा रहा था, तो उनके जहाज के इंजन में गड़बड़ी आ गई और उसे फ्रांस के मार्सेल में लंगर डालना पड़ा। इस अवसर का लाभ उठाते हुए सावरकर ने भागने का दो बार प्रयास किया लेकिन वह असफल रहे। अंतत: वह अपने शरीर को सिकोड़कर जहाज के झरोखे से बड़े अनूठे ढंग से बाहर निकलकर बच निकले। फ्रांसीसी कानून का संरक्षण प्राप्त करने की दृष्टि से वह मार्सेल तट पर पहुंचे। तथापि, काफी कोशिशों के बाद अंग्रेजी पहरेदारों ने उन्हें पकड़ लिया और वापस जहाज पर पहुंचा दिया। 27 वर्ष की छोटी सी आयु में उन्हें दो बार काले पानी की सजा सुनायी गयी और अंडमान में कारागार में रखा गया। कारागार का जीवन (1911-1924) बेहद कठिनाइयों से भरा हुआ था। उन्हें कोल्हू में बैल की तरह जोता जाता था और यहां तक कि उन्हें निर्धारित मात्रा से अधिक पानी भी नहीं दिया जाता था। उनके साथ किए गए कठोर बर्ताव के कारण उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरता गया और उनका शरीर सूखकर कांटा हो गया।

1924 में जेल से छूटने के बाद सावरकर समाज सुधार का कार्य पूरी गंभीरता से करने लगे। उन्होंने जातिवाद और अस्पृश्यता के विरुद्ध युद्ध छेड़ा और अंतरजातीय विवाह, समुद्र यात्रा और पुन: धर्म परिवर्तन से जुड़ी वर्जना के खिलाफ जम कर लिखा। वह अस्पृश्य बच्चों के लिए न्यायसंगत, नागरिक, मानवीय और वैध अधिकारों को सुनिश्चित कर पाए और उन्होंने पब्लिक स्कूलों में अस्पृश्य बच्चों को उच्च जाति के हिन्दू बच्चों के साथ बिठाया। सावरकर ने सच्चे दिल से 'अस्पृश्यों' की मुक्ति के लिए डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के संघर्ष का समर्थन किया।

वर्ष 1937 में सावरकर अहमदाबाद अधिवेशन में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। तत्पश्चात् पांच अनुवर्ती वर्षों के लिए उन्होंने महासभा अधिवेशन की अध्यक्षता की। जब स्वतंत्रता मिलने वाली थी, तब सावरकर ने विभाजन का कड़ा विरोध किया। सावरकर की भारत की संकल्पना ऐसी थी जहां सभी नागरिकों के जाति, वंश, प्रजाति या धर्म का भेदभाव किए बिना समान अधिकार और कर्तव्य हों बशर्ते वे देश के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना रखें। अल्पसंख्यकों की भाषा, धर्म, संस्कृति इत्यादि को सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी रक्षोपाय किए जाएं। सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति, अंतरात्मा, पूजा-अर्चना, संगठन की स्वतंत्रता इत्यादि मूलभूत अधिकार समान रूप से दिए जाएं। कोई प्रतिबंध लागू करते समय, सार्वजनिक शांति और व्यवस्था के हित या राष्ट्रीय आपातस्थिति, इसके लिए मार्गदर्शी सिद्धांत रहें। संयुक्त मतदाता वर्ग और 'एक व्यक्ति एक मत' सामान्य नियम हों। नौकरियां केवल योग्यता के आधार पर ही मिलें। प्राथमिक शिक्षा निःशुल्क एवं अनिवार्य हो। 'नागरी' राष्ट्रीय लिपि हो, हिंदी जनभाषा और संस्कृत देवभाषा हो ।

सावरकर ने अर्थव्यवस्था के महत्व को समझा और आर्थिक नीति के लिए कुछ मुख्य सिद्धांतों के सुझाव दिए जिनमें अन्य बातों के साथ-साथ कृषक वर्ग, श्रमिक वर्ग और गांवों को पुनः सक्रिय बनाने हेतु प्रयास करना, कुछ प्रमुख उद्योगों अथवा विनिर्माण इकाइयों का राष्ट्रीयकरण करना और विदेशी प्रतिस्पर्धा से राष्ट्रीय उद्योगों की रक्षा करने के लिए राज्य द्वारा उठाये जाने वाले कदम भी शामिल थे।

सावरकर की साहित्यिक कृतियां जोश, उत्कृष्टता और आदर्शवाद से परिपूर्ण थीं। जोसेप मैजिनी के दर्शन से अत्यधिक प्रभावित होकर सावरकर ने उनकी आत्मकथा का मराठी में अनुवाद किया जो चालीस वर्ष तक प्रतिबंधित रही। अंडमान जेल में लेखन सामग्री के अभाव में उन्होंने जेल की अपनी कोठरी की दीवारों पर अपनी कविताएं लिखीं। उनके कविता संग्रह को ठीक ही 'जंगली फूल' (वाइल्ड फ्लावर) का शीर्षक दिया गया है। यद्यपि ये रचनाएं अपने आप में पूर्ण हैं, तथापि 'कमला', 'गोमांतक', 'सप्तऋषि', 'विरहोच्छ्वास' और 'महासागर' अपूर्ण महाकाव्य के भाग हैं। उनकी अन्य कविताएं 'चेन', 'सेल', 'चैरियेट फेस्टिवल ऑफ लार्ड जगन्नाथ', 'ओह स्लीप' तथा 'ऑन डेथबेड' दार्शनिकता पर आधारित हैं।

सावरकर की प्रसिद्ध कृतियां 'हिन्दुत्व' तथा 'हिन्दू - पद - पादशाही' मराठा उपनाम से रत्नागिरी जेल में लिखी गई थीं। इस पुस्तक में हिंदू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों की विस्तृत व्याख्या की गयी थी। 1907 1908 के दौरान लंदन में उन्होंने 'फर्स्ट इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस, 1857 नामक पुस्तक की रचना की थी जो कई क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही। 'सिक्स ग्लोरियस इपॉक ऑफ इंडियन हिस्ट्री' में लगभग एक हजार संदर्भ हैं। उन्होंने 'माई ट्रांसपोर्टेशन फॉर लाइफ', 'हिन्दू राष्ट्र दर्शन' और 'एन इको फ्रॉम अंडमान' की भी रचना की। मराठी कविताओं में 'वैनायक' नामक मुक्त छंद की शुरुआत सावरकर के महत्वपूर्ण योगदानों में से एक थी। उन्होंने मराठी भाषा की शुद्धता के लिए भी आंदोलन चलाया।

जीवन के अंतिम काल में सावरकर का स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा और वह बिस्तर पर ही रहे। 3 फरवरी 1966 को उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया। चिकित्सकों को आश्चर्य था कि बिना दवा के तथा प्रतिदिन मात्र 5-6 चम्मच पानी पीकर भी वे 22 दिनों तक जीवित रहे। अंतत: 26 फरवरी 1966 को 83 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

वीर सावरकर के निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन ने कहा था कि " सावरकर हमारे देश की स्वतंत्रता के एक कर्मठ और जुझारू कार्यकर्ता थे, युवाओं के लिए उनका जीवन एक मिसाल है" ।

तत्कालीन उप-राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि "वह एक महान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने हमारी मातृभूमि की मुक्ति के लिए अनेक युवाओं को कार्य करने हेतु प्रेरित किया" ।

सावरकर को भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा कि सावरकर समकालीन भारत के महान नेता थे जिनका नाम साहस और देशभक्ति का प्रेरणास्रोत है। वह महान क्रांतिकारी के सांचे में ढले ऐसे व्यक्तित्व थे जिनसे अनगिनत लोगों ने प्रेरणा ली।

(लेख का स्रोत : लोक सभा सचिवालय नई दिल्ली  द्वारा 2019 में प्रकाशित )

Sunday, September 10, 2023

भारतीय संविधान सभा में देश का नाम "भारत" रखने पर हुई चर्चा के कुछ अंश

भारतीय संविधान सभा में देश का नाम "भारत" रखने पर हुई चर्चा के कुछ अंश, लंबा पोस्ट है किंतु धैर्य रखते हुए पूरा पढ़ने का प्रयास करें।

वाद-विवाद का समय: (रविवार, 18 सितंबर, सन् 1949)

श्री एच.वी. कामतः

मैं प्रस्ताव पेश करता हूं। अपने प्रथम संशोधन सं. 220 को पहले लेते हुए, संसार के अधिकांश व्यक्तियों में यह प्रथा है कि नवजात का नामकरण संस्कार अथवा नाम रखने का उत्सव मनाया जाये। गणराज्य के रूप में भारत का शीघ्र ही जन्म होने वाला है अतः समाज के कई वर्गों में लगभग सभी वर्गों में यह आन्दोलन हो रहा है कि इस नये गणराज्य के जन्म पर नामकरण संस्कार भी होना चाहिये। इस प्रकार के कई सुझाव दिये गये है कि भारतीय गणराज्य के इस नवजात शिशु का समुचित नाम क्या हो। मुख्य चुनाव ये हैं- भारत, हिन्दुस्तान, हिन्द, भरतभूमि, भारतवर्ष तथा अन्य इसी प्रकार के नाम । इस समय यह वांछनीय होगा, और शायद लाभदायक भी हो, कि इस विषय को ले लिया जाये कि भारतीय गणराज्य के रूप में नवजात शिशु के जन्म पर कौन सा नाम सबसे अधिक उपयुक्त होगा । कुछ लोग कहते हैं शिशु का नाम क्यों रखा जाये? इण्डिया पर्याप्त है। ठीक है । यदि नामकरण संस्कार की आवश्यकता न होती तो इण्डिया को ही बनाये रखते, पर जब हम यह मान चुके हैं कि इस शिशु का कोई नया नाम होना चाहिये तो यह प्रश्न उठता है कि इसका क्या नाम रखा जाये?

जो लोग भारत, भरतभूमि या भारतवर्ष के पक्ष में हैं, उन लोगों का तर्क इस तथ्य पर आश्रित है कि इस देश का यह बहुत ही प्राचीन नाम है। इतिहास लेखकों और भाषा वैज्ञानिकों ने इस देश के नाम के विषय में विशेषकर "भारत" नाम की व्युत्पत्ति पर गहन विचार किया है। परन्तु भारत नाम किस प्रकार पड़ा इस पर सब एकमत नहीं हैं। कुछ लोग इसका संबंध दुष्यंत और शकुन्तला के पुत्रा से जोड़ते हैं जो 'सर्वदमन' अर्थात् सर्वविजयी के नाम से भी प्रसिद्ध था और जिसने इस प्राचीन देश में अपना अधिपत्य तथा राज्य स्थापित किया। उनके नाम पर यह देश भारत नाम से विख्यात हुआ । गवेषणा करने वाले विद्वानों की एक और विचारधारा वेफ अनुसार भारत वैदिक काल से.

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श्री एच.वी. कामतः

मैं केवल आयरलैण्ड के संविधान की ओर निर्देश करना चाहता हूं जिसको बारह वर्ष पूर्व स्वीकार किया गया था। इस अनुच्छेद के खण्ड (1) में वाक्य की जो रचना प्रस्थापित की गई है उससे उसमें भिन्न रचना है। मैं समझता हूं कि "इंडिया अर्थात् भारत" इस पद का अर्थ "इंडिया जिसको भारत कहा जाता है" है। मैं समझता हूं कि संविधान में यह कुछ भद्दा सा है। यदि इस पद का एक अधिक सांविधानिक मान्य रूप में और मैं तो यह कहूंगा कि एक अधिक कलात्मक तथा निश्चय ही अधिक सही रूप में रूपभेद कर दिया जाये तो अधिक अच्छा होगा। इस सभा में उपस्थित मेरे माननीय मित्र यदि 1937 में पारित किये गये आयरलैण्ड वके संविधान को देखने का कष्ट करें तो उनको यह विदित हो जायेगा कि आयरलैण्ड का स्वतन्त्र राज्य आधुनिक संसार के उन कुछ देशों में से है जिन्होंने स्वतन्त्रता प्राप्त करने के पश्चात् अपने नाम बदले और उसके संविधान का चतुर्थ अनुच्छेद उनके देश के नाम परिवर्तन के संबंध में है। आयरलैण्ड स्वतन्त्र राज्य के संविधान का वह अनुच्छेद इस प्रकार है: "राज्य का नाम एयर अथवा अंग्रेजी भाषा में आयरलैण्ड है। "

मैं समझता हूं कि "इंडिया अर्थात् भारत" एक भद्दी पदावली है और मैं नहीं समझ पाता हूं कि मसौदा समिति ने इस प्रकार की रचना क्यों की है और एक ऐसी भूल की है जो मुझे एक सांविधानिक भूल दिखाई देती है। डॉ. अम्बेडकर पहले अपनी कई भूलें स्वीकार कर चुके हैं और मैं आशा करता हूं कि इस भूल को भी वे स्वीकार करेंगे और इस खण्ड की रचना का पुनरीक्षण करेंगे।

सेठ गोविन्द दासः

सभापति जी, नामकरण हमारे देश में एक बड़े महत्व की चीज मानी जाती थी और आज भी मानी जाती है। हम सदा इस बात का प्रयत्न करते हैं कि नामकरण शुभ मुहूर्त में हो और जो नाम हम रखें वह नाम सुन्दर से सुन्दर हो। मुझे यह देख कर बड़ा हर्ष होता है कि हमारे देश का जो प्राचीनतम नाम है, वह हम रख रहे हैं परन्तु वह जिस सुन्दर तरीके से रखा जाना चाहिये था, डाक्टर अम्बेडकर साहिब मुझे क्षमा करेंगे, उस तरह से नहीं रखा जा रहा है। "इंडिया देट इज भारत" यह बहुत सुन्दर तरीका नाम रखने का नहीं है। हमें नाम रखना चाहिये था "भारत जिसे बाहर विदेशों में इण्डिया भी कहा जाता है" वह नाम ठीक नाम होता। जो कुछ हो कम से कम एक बात से हमें संतोष कर लेना चाहिये कि भारत नाम आज हम अपने देश का रख रहे हैं।

कुछ लोगों को यह भ्रम हो गया है कि इण्डिया इस देश का सबसे पुराना नाम है। हमारे सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद हैं और अब तो यह माना जाने लगा है कि वेद संसार के सबसे पुराने ग्रन्थ हैं, वेदों में इण्डिया नाम का कोई उल्लेख नहीं मिलता। ऋग्वेद में "ईडयम इड्डू और ईडेन्यः " ये शब्द आये हैं। यजुर्वेद में इडा शब्द आया है। परन्तु इनका इण्डिया से कोई संबंध नहीं है।
 
अध्यक्षः यह किसने कहा कि इण्डिया सबसे पुराना नाम है?

सेठ गोविन्द दासः

कुछ व्यक्तियों से यह सुना जाता है और इस घोषणा में एक पम्पफलेट भी निकला है जिसमें यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया है कि इण्डिया भारत से भी पुराना नाम है। मैं चाहता हूं कि यह बात रिकार्ड में रहे कि यह गलत है। ईडयन और ईडे का अर्थ अग्नि है, ईडेन्यः का प्रयोग अग्नि के विशेषण वेफ रूप में हुआ है और ईडा वाणी का वाचक है।

श्री महावीर त्यागीः

क्या यह समझा जाये कि इण्डिया शब्द जो है वह इन्टरनेशनल फार्म का है?

सेठ गोविन्द दासः

इण्डिया शब्द हमारे किसी प्राचीन ग्रन्थ में न होकर उस समय से प्रयोग में आने लगा जब से यूनानी भारत में आये। यूनानियों ने हमारी सिन्ध नदी का नाम इंडस रखा और इंडस कहने के साथ इण्डिया शब्द आया। यह बात एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में भी लिखी है। उसके विपरीत यदि हम देखें तो हमको मालूम होता है कि वेदों, उपनिषदों तथा ब्राह्मण ग्रंथों के पश्चात् हमारा सबसे प्राचीन और महान् ग्रन्थ जो महाभारत है, उसमें हमको भारत का नाम मिलता है: "अथते कीर्ति पष्यामि, वर्ष भारत भारत" - भीष्म पर्व । विष्णु पुराण में भी हमें भारत नाम मिलता है। वह इस प्रकार है: "गायन्तिः देवा किल गीत कानि, धन्यास्तु ने भारत भूमि भागे" । ब्राह्मण्ड पुराण में भी हमें इस देश का नाम भारत ही मिलता है। - "भरणाच्य प्रजानावै मनुर्भरत उच्यते । निरुक्त वचनाचैव वर्ष तद्भारत स्मृतं।" चीनी यात्री इत्सिंग जब भारत आया तो उसने भी अपनी यात्रा के वृतान्त में इस देश का नाम भारत ही लिखा था।

श्री कल्लूर सुब्बा राव (मद्रास):

श्रीमान्, मैं भरत नाम का हार्दिक समर्थन करता हूं जो प्राचीन नाम है। भरत नाम ऋग्वेद (ऋग3, 4, 23.4) में है। उसमें यह कहा गया है 'इम इन्द्र भरतस्य पुत्रा' ऐ इन्द्र, ये भरत के पुत्र हैं। वायुपुराण में भरत की सीमायें में दी हुई हैं: 

'इदं तु मध्यमं चित्रां शुभाशुभ फलोदयम्। 
उतरं यत्समुद्रस्य हिम् वत् दक्षिणं च यत्।।
(वायुपुराण उ. 45-75)

इसका अर्थ यह है कि वह भूमि जो हिमालय के दक्षिण में है और समुद्र के उत्तर में है, भरत नाम से पुकारी जाती है। इस कारण भरत नाम बहुत प्राचीन है। इण्डिया नाम सिन्धु; इण्डस नदी के नाम पर पड़ा है और हम अब पाकिस्तान को हिन्दुस्तान कह सकते हैं क्योंकि सिन्धु नदी वहां पर है। सिन्द हिन्द हो गया क्योंकि संस्कृत के (स) का उच्चरण प्राकृत में (ह) हो जाता है। यूनानी हिन्द को इन्द कहते हैं। एतत्पश्चात् यह ठीक तथा उचित होगा कि हम इण्डिया का भरत के नाम से उल्लेख करें। सेठ गोविन्द दास और अन्य हिन्दी भाषा भाषी मित्रों से मैं निवेदन करूंगा कि भाषा का नाम भी वे भारती रखें। मैं समझता हूं कि हिन्दी के स्थान में भारती रखा जाये क्योंकि भारती का अर्थ सरस्वती है।

श्री रामसहाय (मध्य भारत संघ):
प्राचीन प्रथा के अनुसार तो नामकरण प्रारम्भिक जीवन में ही किया जाता है लेकिन आज आधुनिक सभ्यता के अनुसार जब हम किसी बिल या किसी कानून का विचार करते हैं तो पहली धारा को जो नाम की होती है उसे आखिर में लेते हैं। उसी प्रथा के अनुसार आज हम पहली धारा पर विधान की करीब-करीब सब धाराओं पर विचार करने के पश्चात् अन्त में विचार करते हुए इस भारतवर्ष का नाम भारत अपने विधान में रख रहे हैं। आज जितनी भी हमारी धार्मिक पुस्तके हैं और जितना हिन्दी साहित्य है उन सबमें ही करीब-करीब इस देश का नाम हमेशा भारत ही के नाम से प्रचलित रहा है। हमारे लीडर्स भी जब वह भाषण देते हैं तब वह इसे प्रायः भारत के ही नाम से पुकारते हैं। एक समय वह था कि जब यह समझा जाता था कि रियासतें अंग्रेजी राज्य को मजबूत बनाने के लिये कायम की गई हैं। यह, एक प्रकार का कलंक रियासती जनता पर भी था। आज से बहुत पहले हम उस कलंक को मिटा चुके हैं और भारतवर्ष का एक अंग बनकर ही हमने कांस्टीट्यूशन बनाने में भाग लिया है और सारे विधान का उपभोग हम अब प्रान्तीय जनता के समान उसके साथ करेंगे। मैं अधिक समय हाउस का न लेकर उस प्रस्ताव का समर्थन करता हूं।

श्री कमलापति त्रिपाठी (यू.पी): 

आज इस देश का नामकरण करने का संशोधन हमारे सामने उपस्थित है। मुझे प्रसन्नता होती यदि ड्राफ्टिंग कमेटी ने जो संशोधन उपस्थित किया है उसका स्वरूप कुछ दूसरा रखा होता। "इण्डिया दैट इज भारत" के स्थान पर यदि दूसरे प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया गया होता तो मैं समझता हूं कि, अध्यक्ष महोदय, कि वह इस देश की परम्परा और गौरव के अनुकूल ही होता और कदाचित् इस विधान- परिषद् के लिये भी सौभाग्य की बात हुई होती। यदि दैट इज लगाना ही था तो 'भारत दैट इज इण्डिया' यदि स्वीकार किया गया होता और इस प्रकार का प्रस्ताव हमारे सामने आता तो वह अधिक उपयुक्त हुआ होता। मेरे मित्र कामत जी ने आपके सामने अपना संशोधन उपस्थित किया है कि "भारत एज इट इज नोन इन इंग्लिस लैंग्वेज इण्डिया" को ड्राफ्टिंग कमेटी ने स्वीकार किया होता अथवा इस समय भी स्वीकार कर लेती तो वह भी हमारे हृदय को और हमारे गौरव को अधिक सम्मानित करता और हमें प्रसन्न्ता प्रदान करता । जब कोई देश पराधीन होता है तो वह अपना सब वुफछ खो देता है। एक हजार वर्षों की अपनी पराधीनता में हमारे इस देश ने भी अपना सब कुछ खो दिया। हमने अपनी संस्कृति खो दी, हमने अपना इतिहास खो दिया, हमने अपना सम्मान खो दिया, हमने अपनी मनुष्यता खो दी, हमने अपना गौरव खो दिया, हमने अपनी आत्मा खो दी और कदाचित् हमने अपना स्वरूप खो दिया तथा अपना नाम भी खो दिया। आज सहस्र वर्ष की पराधीनता के बाद स्वाधीन हुआ यह देश अपना नाम प्राप्त करेगा और हम आशा करते हैं कि अपनी संज्ञा लुप्त हुई संज्ञा प्राप्त करने के बाद वह अपना स्वरूप भी प्राप्त करेगा, अपना आकार भी प्राप्त करेगा और अपनी मूर्छित हुई आत्मा का उद्बोधन भी अनुभव करेगा कदाचित् वह संसार में अपना गौरवपूर्ण स्थान भी प्राप्त कर सकेगा।
सभापति जी, मुझे भारत के इस शब्द से बड़ा प्रेम है। यह एक ऐसा शब्द है जिसका उच्चारण करने मात्रा से हमें अपने देश की सहस्राब्दियों की संस्कृति क्षण मात्रा में सामने दिखाई पड़ने लगती है। मैं समझता हूं कि इस धरती पर कोई दूसरा ऐसा राष्ट्र नहीं है जिसके जीवन का इतिहास, जिसका सांस्कृतिक प्रवाह और जिसका नाम सहस्रों वर्षों से इसी प्रकार अब तक चला आता है, जैसा हमारे देश का चला आता है। धरती के अंक में कोई ऐसा देश नहीं है जिसने इतने पद् दलन, इतने अपमान और इतनी लम्बी पराधीनता के बाद भी अपने नाम और अपनी आत्मा को किसी प्रकार रखने में सुरक्षित समर्थ हुआ हो ।

आज सहस्रों वर्षों के बीत जाने पर भी हमारा देश भारत कहा जाता रहा है। अब तक हमारे साहित्य में यह नाम प्रयुक्त होता रहा है। वेदों के युग से लेकर पुराणों में तो इस नाम की कितनी महिमा है। हमारे पुराण भारत के नाम और इस देश की महिमा का गुणगान करते रहे हैं। देवता स्वर्ग में इस देश के नाम का स्मरण करते रहे हैं "गायन्ति देवा खिल गीत कानी" पुराण कहते हैं कि इस देश का गुणगान देवता भी स्वर्ग में बैठे हुए करते हैं। देवताओं में यह कामना होती है कि वह भारत की पवित्र भूमि में उत्पन्न हों और जीवन उपभोग करवेफ अपने परम लक्ष्य को प्राप्त कर सके। हमारे लिये तो इस नाम में हमारी पवित्र स्मृति भरी हुई है। हमें स्मरण हो जाता है कि यह वह देश है जिसमें किसी युद्ध में बड़े-बड़े पुरुषों ने, बड़े-बड़े महर्षियों ने एक महान् संस्कृति को जन्म दिया था। जिस संस्कृति ने न केवल इस देश के कण-कण को प्रभावित किया वरन यहां की सीमा का उल्लंघन करके सुदूर पूर्व के कोने-कोने में पहुंची। हमें स्मरण होता है कि एक ओर वह संस्कृति भूमध्य सागर के तट तक पहुंची तो दूसरी ओर उसने प्रशान्त की लहरियों का भी स्पर्श किया। हमें स्मरण होता है कि इस देश के हमारे नायकों ने, हमारे विचारकों ने, सहस्राब्दियों पूर्व एक महान् राष्ट्र को जन्म दिया था जिसने अपनी संस्कृति को सारे संसार में फैलाया और एक गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। जब हम इस शब्द "भारत" का उच्चारण करते हैं तो हमें हमारे महर्षियों के मुंह से निकले हुए ऋग्वेद के उन मन्त्रों की याद आ जाती है जिसमें उन्होंने अपने सत्य और अन्तर्ज्ञान से उत्पन्न अपनी अनुभूतियों को व्यक्त किया। जब हम इस शब्द का उच्चारण करते हैं तो हमें उपनिषद् के वह वाक्य याद आ जाते हैं जिसकी वीर वाणी समस्त मानव जाति को आमन्त्रित करती हुई कहती है कि "उठो, जागो और लक्ष्य को प्राप्त करो।"

इस शब्द का उच्चारण करने से हमें भगवान तथागत की याद आ जाती है जिन्होंने ललकार कर संसार से कहा था कि "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय लोकानुवंफपाय" जीवन का संचालन करो और देवताओं और मनुष्यों के हित के लिये उठो, जागो और संसार को ज्ञान वेफ मार्ग का प्रदर्शन कराओ। जब हम इस शब्द का उच्चारण करते हैं तो हमें शंकराचार्य का स्मरण हो आता है जिन्होंने संसार को एक नई दृष्टि प्रदान की। जब हम इस शब्द का उच्चारण करते हैं तो हमें भगवान राम की उन विशाल भुजाओं का स्मरण हो जाता है जिसमें धनुष की प्रत्यंचा के टंकार से इस देश के आसमुद्र हिमाचल अंतरिक्ष को गुंजारित कर दिया था। हमें प्रसन्नता है और हम डाक्टर साहब को इस बात के लिये बधाई देते हैं कि उन्होंने इस शब्द का प्रयोग किया है। यह बात कितनी अच्छी होती अगर वह श्री कामत के संशोधन को भी स्वीकार कर लेते जिसमें कहा गया है 'Bharat as is known in English language' इससे देश के गौरव की रक्षा होगी। भारत शब्द को रखने से, इसको ग्रहण करने से हम इस देश को एक स्वरूप प्रदान कर सकेंगे। इस देश को उसकी खोई हुई आत्मा को दे सकेंगे। इस देश की रक्षा कर सकेंगे। भारत एक महान् राष्ट्र हो जायेगा जो संसार के रंगमंच पर मानव जाति की सेवा कर सकेगा।

श्री हरगोविन्द पन्त (यूपी):

सभापति जी, इस परिषद् के प्रारम्भिक अवस्था में ही मैंने एक संशोधन भेजा था जिसका अभिप्राय यह था कि इण्डिया शब्द के स्थान में भारत या भारतवर्ष का प्रयोग किया जाये। मुझे हर्ष है कि इस संबंध में थोड़ी कुछ बदलफेर तो स्वीकार कर ली गई है। परन्तु यह जो भारतवर्ष शब्द है उसका जो गौरवपूर्ण स्थान स्वीकार किया जा रहा है, सीधे क्यों नहीं इस देश के नाम के लिये ग्रहण कर लिया जाता है, यह बात तो मेरी समझ में नहीं आती। मैं उन बातों को दोहराना नहीं चाहता हूं जो कि अन्य सदस्यों ने इस महान् शब्द के प्रयोग के लिये यहां पर कही हैं। मैं सिर्फ दो एक बात इस संबंध में कहना चाहता हूं।

भारतवर्ष या भारत यह नाम तो हमारे दैनिक धार्मिक संकल्प में कहा जाता है जो नित्य स्नान में भी काम में आता है: "जम्बू द्वीपे भरत खण्डे आर्यावर्ते" यही नहीं, इस नाम को जगत् प्रसिद्ध महाकवि कालीदास ने अपने दो प्रसिद्ध पात्र राजा दुष्यन्त और शकुन्तला के आख्यान में भी प्रयुक्त किया है। राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के पुत्र का नाम भरत था उनका राज्य भारत कहलाया। इस आख्यान को सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं। तो फिर मेरी समझ में यह बात नहीं ती कि क्यों न इस नाम को खुले दिल से ग्रहण किया जाता है। रहा इण्डिया नाम, इस शब्द से न जाने क्यों हमारी ममता सी हो गई है, यह नाम इस देश को विदेशियों ने दिया है। यह नामकरण भी विदेशियों ने ही किया है और उनको इस देश के वैभव का हाल सुन लालच हुआ था और अपनी लालसा को पूरी करने के लिये उन्होंने हमारी स्वाधीनता पर आक्रमण किया था। अगर हम इण्डिया शब्द को अब भी अपने हृदय से लगाये रखें तो इसके माने यह होते हैं कि हमको इस नाम से, जो हमारे लिये अपमानजनक है, जिस नाम को विदेशियों ने हमारे ऊपर थोपा है और जिसका नामकरण उन्होंने किया है, उससे हमको कोई दुःख नहीं है। मेरी समझ में यह बातें नहीं आतीं कि क्यों कर हम इस नाम को अपने पास रख रहे हैं। भारतवर्ष और भारत हमारे नाम हैं और यह नाम हमारे प्राचीन इतिहास और प्राचीन परम्परा से चले आ रहे हैं और हम लोगों को बड़ा उत्साह और बड़ी वीरता देने वाले हैं। इसलिये मैं तो कहूंगा कि इस नाम को अपनाने में हमें बिलकुल भी संकोच नहीं करना चाहिये। अगर हम इस नाम को नहीं रखा और इसकी जगह में किसी दूसरे शब्द को स्थान दिया तो यह हमारे लिये एक लज्जा का विषय होगा। मैं भारत के उस उत्तर प्रान्त के रहने वाले 18 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व यहां पर करता हूं, जिस उत्तर प्रान्त में श्री बद्रीनाथ, श्री केदारनाथ, श्री जागेश्वर, श्री बागेश्वर और मानसरोवर आदि स्थान हैं। वहीं की जनता की अभिलाषा मैं आपके सामने रखना चाहता हूं और मैं आपसे कहूंगा कि वहां की जनता यह चाहती है कि इस देश का नाम भारतवर्ष हो न कि और कुछ.

जय हिन्द 

स्त्रोत: Parliament Digital Library

[आश्चर्यजनक और दुखद बात है कि जनता का इच्छा होते हुए और इतने तार्किक वक्तव्यों के बाद भी अत में वोटिंग द्वारा ये संशोधन अस्वीकार कर दिया गया, क्योंकि बहुमत जिनका था उनमें से बहुत सारे अभी भी अंग्रजों की चाटुकारिता करने में पीछे नहीं रहना चाहते थे।]