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Saturday, May 14, 2022

साक्ष्यों के बल पर हिन्दू अपना हक ले रहा है

लोग रामायण, महाभारत, गीता जैसे धर्मग्रंथों से ही सीखते हैं और आज के लोग उसको फालो भी कर रहे हैं... 

महाभारत में जब पांडव का बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास खत्म हुआ तो उन्होंने अपना राज्य इंद्रप्रस्थ को कौरवों से मांगा, और इसके लिए पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण को अपना दूत बना कर भेजा, भगवान श्रीकृष्ण युद्ध नहीं चाहते थे और पांडव भी युद्ध नहीं चाहते थे। 
भगवान श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र की भरी सभा में शांति का प्रस्ताव रखते हैं और पांडवों का इंद्रप्रस्थ मांगते हैं लेकिन दुर्योधन कहता है कि वह इंद्रप्रस्थ नहीं देगा और पूरी हस्तिनापुर की धृतराष्ट्र सभा मौन रहते हैं। इस पर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ठीक है दुर्योधन पांडवों को केवल पांच गांव ( अविस्थल, वकरास्थल, मकांडि, वरणाव्रत और एक कोई भी गांव) लेकिन दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण के इस शांति प्रस्ताव को ठुकराते हुए बोलता है कि “मैं पांडवों को एक सई की नोक के बराबर भी भूमि नहीं दूंगा”। दुर्योधन के इस जवाब पर भगवान श्रीकृष्ण उठकर जाते हैं तब दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का आदेश देता है फिर भगवान अपना विराट रूप दिखाते हैं।

फिर महाभारत का युद्ध होता है और पांडव इंद्रप्रस्थ के साथ साथ पूरा हस्तिनापुर हासिल करते हैं। धर्म ग्रंथ में उलेखित इस पंक्तियों का सार इतना ही है कि युद्ध कोई नहीं चाहता है सभी शांति चाहते हैं। 

अब इस दौर में अयोध्या आंदोलन के नायक रहे स्वर्गीय डॉक्टर अशोक सिंघल जी भी महाभारत का मर्म जानते थे इसीलिए उन्होंने उस समय मुस्लिम समाज से अपिल की थी आप हिंदूओं को उनका केवल तीन स्थल “अयोध्या, मथुरा, काशी” दे दीजिए, हिंदू तीन लाख मंदिरों को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों पर अपना दावा कभी नहीं करेगा लेकिन मुस्लिम समाज और उनके तथाकथित बुद्धिजीवी सेकुलर गिरोह ने वही काम किया जो धृतराष्ट्र की सभा में दुर्योधन ने किया कि “हम सुई के नोक के बराबर भी भूमि नहीं देंगे” 

मुस्लिम समाज और उनके पैरोकार सेकुलर हिंदू भी वही काम किया और दावा नहीं छोड़ा, उन्होंने दावा अयोध्या पर भी नहीं छोड़ा, वो दावा काशी और मथुरा पर भी नहीं छोडऩे को तैयार हैं जबकि काशी में तो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है कि वो मंदिर ही है। नंदी की मूर्ति, ज्ञानवापी कुआं से लेकर के श्रृंगार गौरी माता की मंदिर तक सारे साक्ष्य उपलब्ध हैं। फिर भी मुस्लिम समाज दावा नहीं छोड़ रहा है। 

जो शांति चाहता है वह रास्ता ढूंढने का काम करता है लेकिन मुस्लिम समाज हठधर्मिता नहीं छोड़ रहा है। यही कारण है कि हिंदू समाज को सुप्रीम कोर्ट से 400 साल बाद अपने आराध्य के लिए हक लेकर आना पड़ा है। यही सब कार्य पिछले कई सालों से हिंदू समाज को अंदर ही अंदर संगठित करने का काम कर रहा था और आज हिंदू समाज संगठित हो चुका है कुछ सेकुलर हिंदुओं को छोड़कर करके। 
          जो महाभारत में भी थे जो जानते थे कि पांडव सच के साथ हैं, धर्म के मार्ग पर हैं फिर भी उन्होंने अधर्म का साथ दिया। जिनमें भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, महारथी कर्ण और नारायणी सेना।

जो काम भगवान श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र की सभा में किया था आज वही काम हिंदू समाज कर रहा है अपना विराट रुप दिखा रहा है उसी का नतीजा है काशी के बाबा विश्वनाथ धाम में जो कोर्ट का फैसला आया है। 

 मुस्लिम समाज ने बाबा धाम के सर्वे को रोक दिया था इसीलिए कोर्ट ने कहा अब सर्वे केवल श्रृंगार गौरी मंदिर का ही नहीं बल्कि पूरे मस्जिद का भी होगा। 
         चार दिन के अंदर रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल होगा। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि पीएसी लगाकर सर्वे कराया जाए और अगर कोई सर्वे में बाधा उत्पन्न करता है तो उस पर एफआईआर दर्ज किया जाए और उसको जेल भेजा जाए। सर्वे अंदर बैरिकेडिंग हटाकर होगा। सर्वे के दौरान अगर कहीं ताला बंद है तो उसे तोड़कर सर्वे पूरा किया जाएगा। 

तो आज हिंदू समाज जागृत हो चुका है इसीलिए वह अब केवल इंद्रप्रस्थ या पांच गांव लेकर संतुष्ट नहीं होगा उसे अब पूरा हस्तिनापुर भी चाहिए और यही कारण है कि मथुरा, काशी दोनों स्थलों का केस कोर्ट में है और कुतुबमीनार से लेकर कश्मीर के मार्तंड मंदिर तक सब पर हिंदू समाज ने अपना दावा किया है। हिंदू समाज की जागृति ही है जो आपको कोर्ट लेकर जा रही है क्योंकि वहाँ युद्ध से नहीं बल्कि साक्ष्यों के बल पर हिंदू अपना हक ले रहा है। 

हिंदू जागृति का ही फल है कि आज के दौर में सेकुलर राजनीतिक दल प्रत्यक्ष रूप से हिंदू समाज के खिलाफ और मुसलमानों का खलीफा बनने की कोशिश भी नहीं कर रहा है और जिसने किया भी है उसका हश्र पिछले कई सालों से क्या है रहा है वो भी किसी से छुपा नहीं है। 

इसलिए मुस्लिम समाज और तथाकथित सेकुलर गिरोह भविष्य में इस तरह के और स्थलों के लिए तैयार रहे क्योंकि देश में तीन लाख से अधिक मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है ( सुब्रमण्यम स्वामी और स्वर्गीय डाँ अशोक सिंघल जी के अनुसार)। दो मंदिर तो बनारस में ही हैं जिनको तोड़कर मस्जिद बनाया गया है। 

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन।
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय।।

बोल डमरू वाले की जय....

 लेखक: कृष्णकांत उपाध्याय

Monday, December 13, 2021

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से शिव के कॉरिडोर तक

 संस्कृति से सरोकार न रख कर सर्वांगीण विकास का सपना देखने वाले राष्ट्र कालांतर में बरबाद गये। भारत में भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को वर्षों तक उपेक्षित किया गया। देश का सौभाग्य है कि इसके महत्व को समझने वाला भारत माता का एक ऐसा सच्चा सपूत नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी के रूप में अवतरित हुआ। जिसने अपने सांस्कृति राष्ट्रवाद के विचारों को अमली जामा पहनाते हुए पूरे विश्व में इसकी धाक जमा दी है। समाज की समझ जरूरी है, भारत जैसे विशाल देश की समझ सामान्य नागरिक के बस की बात नहीं हैं। मैं मोदी को तो एक एक परिपक्व समाजशास्त्री मानता हूं और उसका की परिणाम है कि भारत पूरी तेजी से विकास की राह पर अग्रसर है। पूरा विश्व भारत के नेतृत्व को स्वीकार करने को मानसिकता बना रहा है।
भारत सदियों अनेक बाह्य एवं आंतरिक आक्रमणों एवं कुचक्रो के बाद भी एक जीवंत राष्ट्र बना रहा, उसका मूल धारणा उसकी संस्कृति एवं संस्कृति की निरंतरता रही है।भारत का प्राण उसकी संस्कृति है और उसकी प्राण वायु प्रदान करने वाली 135 करोड़ देशवासियों की विशाल फौज देश के प्रति अगाध श्रद्धाभक्ति भागौलिक राष्ट्रवाद की संकल्पना नही ला सकती है । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा ज्यादा महत्वपूर्ण है। भारत ऋषि मुनियों एवं अनेकानेक वैदिक ग्रंथों ने संपूर्ण सृष्टि के कल्याण कि जो कल्पना की वह अन्यत्र देश में नहीं मिलती है। हम संस्कृति के पोषक पुजारी हैं संस्कृति हमारी पहचान है। संस्कृति हम सभी को आपस में प्रेम एवं बंधुत्व का सटीक पाठ कराते हुए न केवल दिल से जोड़ती है अपितु मानवीय गुणों की समस्त आवश्यकताओं एवं संभावनाओं से युक्त बनाती है। औपनिवेशिक शक्तियों एवं दुर्दांत मुगल आक्रमणकारियों ने जितना हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ करने का प्रयास किया ,उतना ही वें असफल हुए। यह सही है कि हमारी पहचान मिटाने की कोशिश की गई और इसी क्रम में हमारे धार्मिक व सांस्कृतिक धरोहरों एवं आस्था के केंद्रों को ध्वस्त कर दिया गया। हमारा मनोबल टूटा लेकिन यह बहुत दिनों तक निम्न रहा। ऐसा नेतृत्व आया जिसने टूटे मनोबल को पुनर्जीवित किया और सम्मान की ज्योति आकाश को छूने लगी है। 

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत की सांस्कृतिक, भौगोलिक, प्रजातीय इत्यादि विविधताओं को एकता में परिवर्तित करता है। इसमें हमें जो बल प्राप्त होता है वह राष्ट्रवाद की भावना को प्रबल करता है। इस भावना की प्रबलता को बनाए रखना देश की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। हमें अपने सांस्कृतिक आधारों को मजबूती प्रदान करना है ताकि राष्ट्रप्रेम की भावना अक्षुण हो और देशभक्ति की अलख पूर्ण सम्मान के साथ निरंतर जलती रहे। हमारे प्रधानमंत्री जी ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जो अलख जलायी, उसके अंतर्गत संपूर्ण भारत में विविध कार्य सम्पादि किये जा रहे हैं। एकता के नैतिक प्रतीक सरदार वल्लभ भाई पटेल का स्मारक एक सफल प्रयास है। 
देश की सांस्कृतिक एकता का संभावना शिव है जो काशी के अधिष्ठता हैं। काशी भारतीय धर्म एवं संस्कृति का जीवंत संग्रहालय हैं। यह देवाधिदेव महादेव विश्वनाथ की ऐसी नगरी है जिसके कण- कण में विद्यमान है। शिव की महिमा अपरंपार है। वे परम ब्रह्म हैं। काशी संपूर्ण भारत में पूजनीय है। काशी का जीवन शिव के विराट व्यक्तित्व की छवि है। द्रविड़ सभ्यता हो या देश की कोई भी सभ्यता और सभी ने शिव की इस नगरी को अपने तीर्थ स्थली के रूप में अंगीकार किया है तथा काशी विश्वनाथ के दर्शन को प्राप्त करने के सुयोग की कामना की है। प्रत्येक हिंदू काशी आने को अपना सौभाग्य मानता है और शिव दर्शन को अहोभाग्य। यह शिव के कारण ही अनेकता में एकता का अद्भुत परिवेश दिखाई पड़ता है। एकात्मकता जो दर्शन होता है वह संपूर्ण काशी के अधिवास के प्रतिरूप को देखकर समझा जा सकता है। काशी लघु भारत है। विश्वनाथ की नगरी में क्षेत्रीय था एवं प्रांतीय था कि संकीर्ण में भावना नदारद है। इसी का परिणाम है कि सर्वत्र काशी की भी पूछ होती है, वह सर्वत्र पूजनीय और वंदनीय होता है। शिव शंकर और गंगा से युक्त काशी सर्व समर्थ है लेकिन वर्षो से विश्वनाथ दरबार का एक ऐसा स्वरूप भी है जो सब को कष्ट देता रहा है तथा मंदिर की छवि को धूमिल करता रहा है। वह है, इसके आसपास संकरी तंग गलियां, अपर्याप्त दर्शन, भीड़ भाड़ व अव्यवस्था तथा गंगाजी तक की कष्टकारी पहुंच। श्री विश्वनाथ मंदिर हिंदू एकता का एक ऐसा अद्वितीय विशाल आस्था का केंद्र है, जहां ही नहीं विदेशों से भी हिंदू भक्त प्रति वर्ष श्रद्धा पूर्वक आते हैं। शिव प्रदत्त सांस्कृतिक एकता में जो सबसे बड़ी बाध थी, वह मंदिर में प्रवेश से लेकर ज्योति स्वरूप लिंग के संगम दर्शन पूजन तक की रही। किसी जमाने में मां गंगा जो वहीं पास से बहती रही, श्रद्धालु उनमें स्नान कर मंदिर में प्रवेश करते रहे। सरकारें आयी और गई किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। अंततः वर्ष 2014 में मां गंगा ने नरेंद्र मोदी जी को बुला ही लिया। भगवान शिव का आशीर्वाद ना केवल मोदी जी को ही प्राप्त हुआ अपितु काशी वासियों एवं संपूर्ण देशवासियों को भी प्राप्त हुआ। हमारा आत्म सम्मान पुनः प्रतिष्ठित हुआ है। सनातन धर्म सत्यम शिवम सुंदरम पर आधारित है। ऐसे सनातन धर्म की शाश्वत मोदी जी के प्रयास से और भी सुदृढ़ एवं सुगम हुई है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की यह पहल राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करेगी और भारत को विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठापित करेगी।

( प्रस्तुत लेख काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर अरविंद कुमार जोशी जी का है । लेख का का स्रोत "राष्ट्रीय सहारा अखबार"। )