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Friday, July 21, 2023

क्यों जल रहा है मणिपुर और आगे क्या?

लेखक- प्रो. कपिल कुमार
मणिपुर में कराए गये दंगो के दौरान स्त्रियों के साथ हुई घृणित घटना मात्र निंदनीय ही नहीं हैं बल्कि ऐसे भेड़ियों का मनाव समाज में कोई स्थान नही है। मुझे इस पर कोई संदेह नही है कि मणिपुर में कराए गये दंगे एक सोची समझी योजना का परिणाम है जिसका उदेश्य भारत में दंगे करवा अस्थिरता स्थापित करना है इन दंगो में कुछ ऐसी विदेशी ताकतें का हाथ है जो की इन क्षेत्रों में काफी समय से सक्रिय है और उनको कुछ हमारे देश के गद्दार, अराजकतावादी और कट्टरपंती सहयोग देते है| मोदी फोबिया से ग्रस्त विरोधी दलों ने तुरंत केंद्रीय और राजकीय सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया; सोनिया गाँधी, जो कि बड़ी बड़ी घटनाओं पर भी चुप्पी साधी रहती है पर बाटला हॉउस में आतंकियों के मरने पर आँसू बहाती हैं, अपना पैगाम जनता को दे दिया।और उनका पुत्र तो वहाँ मोहब्बत बांटने भी पहुँच गया| किसी ने दोष लगाया कि ये दंगे नशे की खेती पर पाबंदी का नतीजा है और किसी ने हल्ला मचाया की मणिपुर जल रहा है और प्रधान मंत्री विदेश घूम रहे है। मेरा यह मानना हैं की मणिपुर तो केवल एक प्रयोग है और ऐसी कई प्रयोगशालाओं का इस्तेमाल देश में किया गया है जैसे शाहीन बाग और 24 के चुनावों तक किया जाएगा। यह इस बात से भी स्पष्ट है कि विरोधी दल और सुप्रीम कोर्ट के माय लोर्ड़ो को जिस प्रकार की हिंसा और उत्पीड़न बंगाल में हो रहा है वो दिखाई नही देती| अब तीन की जगह पांच बन्दर हो गये है. एक बन्दर को कुछ दिखाई नहीं देता दुसरे को सुनाई नहीं देता तीसरा बोल नहीं सकताचौथा लिख नहीं सकता और पाचवां पढ़ नहीं सकता क्योंकि वे केवल भेड़ियों और 
चतुर लोमड़ियो को ज़मानत देने में व्यस्त हैं।

यह इस बात से भी स्पष्ट है कि विरोधी दल और सुप्रीम कोर्ट के माय लार्डो को जिस प्रकार की हिंसा और उत्पीड़न बंगाल में हो रहा है वो दिखाई नही देती। अब तीन की जगह पांच बन्दर हो गये है| एक बन्दर को कुछ दिखाई नहीं देता दुसरे को सुनाई नहीं देता तीसरा बोल नहीं सकता चौथा लिख नहीं सकता और पाचवां पढ़ नहीं सकता क्योंकि वे केवल भेड़ियों और 
चतुर लोमड़ियो को ज़मानत देने में व्यस्त हैं। क्या किसी ने उत्तर-पूर्वी राज्यों में फैलाई जा रही हिंसा को ऐतिहासिक परिपेक्ष में समझने की कोशिश की है?  इस प्रकार की कोई भी घटना आकस्मिक नहीं है। उलटे इन घटनाओं को कराने के लिए एक वातावरण तैयार किया जाता है और इस क्षेत्र में चीन तथा पाकिस्तानी आई.एस.आई. एक लम्बे समय से सक्रिय हैं। एतिहासिक परिपेक्ष इसलिए भी जरूरी है कि पहले की सरकारों द्वारा की गई गलतियों से बाहर निकला जा सके, उनकी पुर्नावृती की जाए और विकास की जिस राह पर आज उत्तर-पूर्वी राज्य चल रहे हैं उसमे कोई बाधाएँ उत्पन्न न हो।

सन 1946 में ही कांग्रेस के नेतृत्व में उत्तर-पूर्वी राज्यों की अवहेलना की थी| 1946 के मेरठ के कांग्रेस के अधिवेशन में नागालैंड से आए एक कांग्रेसी प्रतिनिधि ने मंच से आगाह किया था कि अमरीकी मिशनरी नागा लोगों को भड़का रहे हैं वो भारतीय संघ में शामिल न हो इसके जवाब में नेहरु ने यह कहा था कि भारत की स्वतंत्रता का यह संग्राम नागालैंड से शुरू नही होगा। ऐसा क्यों? नोट करें की नेहरु नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और आजाद हिन्द फ़ौज के विरोधी थे। आसाम जाकर उन्होंने यह तक घोषणा की थी कि यदि बोस जापानियों की मदद से सेना लेकर आते हैं तो वो खुद तलवार लेकर बोस से लड़ेंगे और नेहरु के इस वक्तव्य का उस समय का आल इंडिया रेडियो दिन में कई बार प्रसारण करता था। दूसरी तरफ ध्यान दे कि नागालैंड और मणिपुर के लोगों ने जिनमे कूकी, मैती, नागा और कई अन्य अरण्यवासी ने आजाद हिन्द फ़ौज और नेताजी का जम के समर्थन किया था।14 अप्रैल 1944 के दिन मणिपुर के मोइरांग में ही आजाद हिन्द सरकार का झंडा फैराया गया था। लगभग 18,000 वर्ग मिल से अधिक का इलाका इन क्षेत्रों में अंग्रेजों से मुक्त करा लिया गया था। यह लोग नेताजी को अपना राजा मानते थे और जब आजाद हिन्द फ़ौज यहाँ से वापसी कर रही थी तो दस्तावेज यह बताते हैं कि यहाँ के जनजातीय मुखियों ने बार बार ये आग्रह किया था कि हम पर जो भी हैं मिल बाँट कर खा लेंगे पर वापस न जाओ। हर प्रकार की सहायता इन क्षेत्रों में आजाद हिन्द सरकार की गई थी। अंग्रेजों ने इन क्षेत्रों पर अधिकार कर मणिपुर और नागालैंड के सैकड़ों निवासियों को जेलों में डाल दिया और यातनाएं दी पर प्रधान मंत्री नेहरु के आधीन अंतरिम सरकार ने अपनी जुबान तक नहीं खोली। सन 1947 के बाद लगभग 90,000 नागा, मैती और कूकी लोगों ने आजाद हिन्द सरकार से लड़ने और उनको सहयोग देने के लिए स्वयं को स्वतंत्रता सेनानी घोषित करने के आवेदन दिए। ऐसे हजारों आवेदन नागालैंड और मणिपुर के अभिलेखागारों में मौजूद हैं। नेहरु ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया और क्यों देता कितने भारतियों को यह पता हैं कि नेहरु ने आजाद हिन्द फ़ौज को स्वतंत्रता सेनानी मानने से इंकार कर दिया था यही नहीं उनको भारत की सेना में लेने से भी इंकार कर दिया था, किसके कहने पर? जी हां, कमांडर इन चीफ औखिनलेक, वाइसराय लार्ड वैवेल और लार्ड माउंटबैटन के कहने पर। भारतीय सरकार ने 1972 में जाकर के ही इनको स्वतंत्रता सेनानी माना। तो जब आजाद हिन्द फ़ौज को ही स्वतंत्रता सेनानी नही माना गया तो फिर इन मैती, कूकी और नागा लोगों की क्या हस्ती थी।

विभाजन के समय 1947 में जिस प्रकार से उत्तर-पूर्वी राज्यों की सीमाएं पूर्वी पाकिस्तान के साथ बनाई गयी उसपर सरदार पटेल के अलावा अन्य कांग्रेसी नेताओं की चुप्पी भी बहुत कुछ कहती है। कभी उन दस्तावेजों को देखे कि किस प्रकार चकमा पहाड़ियों के क्षेत्र को पूर्वी पाकिस्तान को दिया गया न कि आसाम को। नवम्बर 1949 में सरदार पटेल ने भारत की भूमि के ऊपर चीन की महत्वकांक्षा और उससे उत्पन्न हो रहे खतरे से आगाह किया था। इसके अतिरिक्त इस पत्र में पटेल ने आग्रह किया था कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में बुनियादी ढांचे का विकास किया जाए, यहाँ के लोगों का विश्वास जीता जाए, सुरक्षा के लिए सेना नियुक्त की जाए आदि। परन्तु चाऊ इन लाइ के घनिष्ट मित्र नेहरु ने इस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया जिसका नतीजा भारत को 1962 में भुगतना पड़ा। यही नहीं चीन ने इन राज्यों में लगातार भारत के विरुद्ध विद्रोह को भड़काया और कई गुप्त संगठनों को स्थापित कर शस्त्रों से भी उनकी मदद की नतीजतन स्थिति गंभीर रूप लेती चली गयी।
कुछ अन्य बेवकूफियां भी कांग्रेस की सरकार ने निरंतर की। आजाद भारत में भारत की भूमि को मुख्य धारा और हाशिए की धारा में परिवर्तित कर दिया गया। दिल्ली मुख्य धारा थी और उत्तर-पूर्वी राज्य हाशिए के क्षेत्र जिन्हें बार बार प्रवचन दिए जाते थे कि वो मुख्य धारा से जुड़े। अपने स्कूल के दिनों से ही जब मैं यह प्रवचन सुनता था तो परेशान हो उठता था कि क्या भारत का हर निवासी, क्या भारत का हर क्षेत्र भारत नही है तो फिर ये मुख्य धारा और हाशिए का विभाजन क्यों? “हाशिए” के इन प्रदेशों में विकास के लिए जो पैसा भेजा जाता था वो किन जेबों में जाता था वो आप सब भलीभांति जानते हैं और उसकी चर्चा मैं यहाँ नही करूंगा। दिल्ली की “मुख्य धारा” का भ्रष्टाचार इन प्रदेशों में भयंकर रूप ले चुका था। दूसरी तरफ धर्मान्तरण का नंगा नाच भी पुरे जोड़ शोर से चला।

 विभिन्न जनगणनाओं के आकड़ों को देख आप स्वयं निष्कर्ष निकाल सकते हैं। जनसँख्या के इन परिवर्तनों में घुसपैठियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई बांग्लादेश से आए घुसपैठिए इन क्षेत्र में फैलते चले गये और सरकारें वोट बैंक के चक्कर में इसे बढ़ावा देती रही। कभी केंद्रीय लोक निर्माण के कुछ उन अधिकारीयों से बात करके देखिये जिन्हें बांग्लादेश की सीमा पर तारो की बाड़ लगाने का काम सौंपा गया था वो आपको बताएँगे कैसे दिल्ली से फ़ोन आता था कि इस इलाके को छोड़ो। कही कही पर तो हमारे कुछ राजनितिक दलों के दफ्तर आगे होते थे और हमारी चेकपोस्ट पीछे और घुसपैठियों के लिए इन दफ्तरों में राशन कार्ड उनके स्वागत के लिए तैयार मिलते थे। जहाँ एक तरफ बांग्लादेश की ओर से यह प्रक्रिया चलती रही है तो 2013 में रोहिंगिया घुसपैठियों ने रही सही कसर पूरी कर दी है कमाल देखिए की रोहिंगिया को जम्मू के सेना के कैंटोनमेंट के पीछे तक ले जाकर बसा दिया गया।
घुसपैठियों के इस स्वागत के लिए कांग्रेस, साम्यवादी,
टी.एम.सी. भारत के तथाकथित सेक्युलर और मानव अधिकारों के नाम पर अपनी दुकाने चलाने वाले जिम्मेवार हैं। चीन और आई.एस.आई दोनों ने इसका खूब फायदा उठाया।उत्तर-पूर्व के राज्यों को तो छोड़िए चीन ने भारत में सशस्त्र नक्सलवादी आन्दोलन को जन्म देकर हर प्रकार का सहयोग दिया। हमारी सुरक्षा एजेंसीयों और जवानों के हाथ बाँध कर रखे है क्योंकि सत्ता में रहने और सत्ता में आने की हवस इन लोगों में देश से ज्यादा महत्वपूर्ण है। पिछले 9 वर्षों में एक परिवर्तन आया जब उत्तर-पूर्वी राज्यों में आधारभूत ढ़ांचो को सशक्त करने का कार्य प्रारंभ हुआ, इन इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को हर तरीकों से मजबूत किया गया और जनता के विश्वास को जितने का प्रयास ही नहीं किया गया बल्कि जीता भी गया। इन क्षेत्रों में निरंतर कांग्रेस की हार साम्यवादियों की हार और भारतीय जनता पार्टी का सत्ता में आना एक विश्वास का ही परिणाम है। कांग्रेस और वामपंथी स्तब्ध थे कि इसाई धर्म को मानने वाली जनता ने भी इन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को वोट कैसे दे दिया। निसंदेह प्रशासन के क्षेत्र में भी परिवर्तन हुए और विकास के लिए भेजी गयी राशि जनता तक पहुँचने लगी| विपक्ष के लिए यह एक और झटका था। नशीले पदार्थो की खेती पर रोक केवल नशा रोकने का ही प्रयास नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी सवाल है क्योंकि इसमें घुसपैठियों और विदेशों का लम्बा हाथ हैं।

मुझे इस बात का पूरा विश्वास है कि भारत की सरकार इस प्रकार की उकसाई गयी हिंसा और देशद्रोह को शक्ति से दबा रही है परन्तु मणिपुर की दुखद घटनाओं पर चिल्लाने वाले विपक्षी जरा अपनी अंतरात्मा में भी झांक कर देख ले कि जहाँ उनकी सरकारें हैं वहाँ क्या हो रहा है। सरकार पर आरोप लगाइए यह आपका काम हैं पर जहाँ आपकी सरकारें हैं वहाँ दीदी, पारिवारिक राजकुमार और गह्लोत के आधीन क्या हो रहा है उस पर भी सवाल उठाएं अन्यथा मगरमच्छ क्यों और कैसे आँसू बहाता हैं वो देश का बच्चा-बच्चा जानता है। मेरा भारतवासियों से निवेदन है की ऐसे तत्वों से सावधान रहे और एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण में दिए जाने वाले अपने योगदान को जारी रखे। आज का युवक यह समझ चूका है की उसका अपना भविष्य, उसका अपना विकास देश के भविष्य और विकास से जुड़ा हुआ है और यह युवक ही अराजकतावादी तत्वों को जवाब देकर भारत को और आगे बढ़ाएगा।
कौन है वो देशद्रोही जो उन मैती, कूकी और नागाओं को आजाद हिन्द सरकार के लिए, आजाद हिन्द फ़ौज के लिए और अखंड भारत के लिए एक हो कर लड़े थे उन्हें आपस में लड़वा रहे हैं? जरा सोचिये?

Thursday, July 28, 2022

तन मन से अखण्ड भारत

मेरी कलम है घायल 
जैसे वैश्या के पैरों में पायल
घुटन महसूस होती है
तड़प तड़प कर कट रहा जीवन
शांति की बात और शीतल पवन
बहुते शर्म आती है
भारत माता टुकड़े टुकड़ों में बट जाती है
अरे वाह देखो कैसे आजादी की मिठाई बाटी जाती है..
हर्षों उल्लास मनाया जाता है मां के टुकड़े करकर 
क्या ये वही भारत है जिसके कण कण में शंकर ...
क्या मिला आजाद को गोली खाकर ?
 भगत सिंह के सपनो का भारत 
बन गया फांसी चढ़कर ?

लाल किले से आई आवाज
 सहगल ढिल्लो शाहनवाज, 
तीनों की उम्र हो दराज ।
 'लाल किले को तोड़ दो, 
आजाद हिन्द फौज को छोड़ दो।'

नेताजी कहा गए ? 
उनको देता रहता हू आवाज 
गुमनामी में जीवन बिता 
क्यों कहते हो की उनको खा
गया हवाई जहाज...
आजाद हिंद फौज ने दिया बलिदान 
फिर भी हो गया "चरखा" महान
वाह! रे.. हिंदुस्तान...

इनके बलिदानों की तुलना चरखो से की जाती है
हो भी क्यों ना जब जवानी कापुरुषता के क्रोड़ में सो जाती है...

काला पानी का काल कूट पीकर 
वीर सावरकर का चेहरा और निखर जाता है
दुख तब होता है जब गलफत के नींद में पड़ा बेखबर 
कोई युवा "कायर" कह जाता है...
भारत माता के टुकड़े कर
 अपनी अपनी सरकार बनाई जाती है
एक जिहाद फैलाता है
एक शांति का श्वेत कबूतर उड़ाता है

खंडित भारत की तस्वीर 
मेरे मन को नहीं भाता है
 तन में आग लग जाता है
फिर अटल जी के शब्दो को 
मुख बार बार दोहराता है_

"दूर नहीं खण्डित भारत को, पुन: अखण्ड बनायेंगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक, आजादी पर्व मनायेंगे।

उस स्वर्ण दिवस के लिए, आज से कमर कसें, बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएं, जो खोया उसका ध्यान करें॥"

~शिवम कुमार पाण्डेय

Saturday, January 23, 2021

आजादी के सबसे बड़े नायक

अरे भैया आज कौन सा बड़ा दिन है जो लोग भीड़ लगाए खड़े है उस मूर्ति के सामने ?.. ये मूर्ति आज़ादी के नायक नेताजी सुभाषचंद्र बोस की है।.. आज उनकी 125वी जयंती है ये सब आए है उनकी मूर्ति को माला पहनाएंगे , फोटो खिंचवाएंगे  कल के अखबार के लिए सुर्खियां बटोरेंगे और चले जाएंगे। लेकिन सबसे महत्त्वूर्ण बात ये है नेताजी की जयंती को भारत सरकार ने पराक्रम दिवस  के तौर पर मनाने का निर्णय लिया है।
इससे पहले भी माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में 2018 में अंडमान के द्वीप का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप रखा गया था। देश की भावना को समझते हुए, नेताजी से जुड़ी फाइलें  भी मोदी सरकार ने सार्वजनिक कीं थी और ये इसी सरकार का सौभाग्य रहा जो 26 जनवरी की परेड के दौरान INA Veterans परेड में शामिल हुये थे। 
नेताजी कोई मामूली व्यक्ति नहीं थे जिन्हे भूला देना आसान है। ये वही व्यक्ति है जिसने नारा दिया था "आजादी छीनकर हासिल होती है मांग कर नहीं। तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।" ब्रिटिश राज की निंद उड़ गई थी जब बोस बाबू ने कड़े पहरे को चकमा देकर जर्मनी भाग गए। जहा उन्होंने युद्ध लड़ने की ट्रेनिंग ली और हिटलर की मदद से द्वितीय विश्व युद्ध के युद्धबंदी भारतीय सिपाहियो के साथ मिलकर एक फौज खड़ी कर दी थी।4 जुलाई1943  में  सिंगापुर के कैथे भवन में एक समारोह में रासबिहारी बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस के हाथों में सौंप दी थीं।  करीब 26,000 से ज्यादा सिपाहियो ने अपनी कुर्बानी दे दी थी जय हिन्द और चलो दिल्ली का नारा जोर शोर से गूंजा था। ब्रिटिश राज तो बोस के नाम से भी कांपने लगा था। फिर  तो Royal Indian Navy के सिपाहियों ने बगावत शुरू कर दी थी धीरे - धीरे ब्रिटिश राज अंदर से खोखला हो गया और भारत छोड़कर जाना ही पड़ा।

नेताजी जैसे महान क्रांतिकारी को गुमनामी में जीना पड़ा ये कितने शर्म की बात है जिसकी वजह से आज़ादी मिली उसकी जयंती को भुला दी गया था। 70 साल लग गए गणतंत्र दिवस परेड में आजाद हिन्द फौज के सिपाहियो सम्मान देने में। ये वही नेताजी है  जिन्होंने आजाद हिंद के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई जिसे जर्मनी, जापान, फिलिपींस, कोरिया, चीन, इटली, आयरलैंड समेत नौ देशों ने मान्यता भी दिया था। नेताजी ने आजाद हिन्द बैंक की स्थापना की और आजद हिन्द रेडियो से अपनी बात रखते थे। इनका सपना था अखण्ड भारत का जो पूरा नहीं हुआ। इनके अचानक से गायब होना भी एक षड्यंत्र था।
"दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल.." मुंह से बोलने वाली बात है पर हकीकत तो ये है कि मां भारती के महान सपूत नेताजी और इनके सिपाहियो की देन थी अंग्रेज़ देश छोड़कर भागना शुरू किए। सत्य और अहिंसा कहने वाली बात होती है जब  विदेशी आक्रांताओं के मार से मां रक्त   के  आंसू बहा रही हो और उपर आंखे सुख गई हो तो तब शत्रुओं के मस्तक को धड़ से अलग करना ही पुत्र करना सर्वप्रर्थम कर्तव्य होता है । पूरी धरती को खून से सींच कर पवित्र कर देना ही महान कर्तव्य है..! यही काम बोस ने किया था जो हर मां भारती के सपूत करना चाहिए।

प्रधानमंत्री मोदी जी ने देश को संबोधित करते हुए कहा कि "आज के ही दिन माँ भारती की गोद में उस वीर सपूत ने जन्म लिया था, जिसने आज़ाद भारत के सपने को नई दिशा दी थी। 
आज के ही दिन ग़ुलामी के अंधेरे में वो चेतना फूटी थी, जिसने दुनिया की सबसे बड़ी सत्ता के सामने खड़े होकर कहा था, मैं तुमसे आज़ादी मांगूंगा नहीं, छीन लूँगा ! देश ने ये तय किया है कि अब हर साल हम नेताजी की जयंती, यानी 23 जनवरी को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाया करेंगे।हमारे नेताजी भारत के पराक्रम की प्रतिमूर्ति भी हैं और प्रेरणा भी हैं।"
 शत - शत नमन है मां भारती के इस  महान सपूत को..!

जय हिन्द !


Wednesday, October 21, 2020

अखण्ड भारत की पहली आजाद सरकार "अर्जी हुकूमत - ए - आजाद हिन्द"


क्या कह रहे हो? क्या हुआ? आज कौन सा बड़ा दिन है? अरे इतना भी नहीं जानते हो भैया की आज ही के दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 21 अक्टूबर 1943 में "आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की थी। 77 साल पहले देश से बाहर बनी 'आज़ाद हिंद सरकार' अखंड भारत की सरकार थी, अविभाजित भारत की सरकार थी। ब्रिटिश राज का सर्वनाश करने के लिए नेताजी की भी हद तक जा सकते थे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को शामिल किए जाने का पुरजोर विरोध किया था जिसके बाद उन्हें जेल डाल दिया गया। उन्होंने ने भूख हड़ताल शुरू कर दिया फिर क्या अंग्रेजो को थक हार के जेल से निकाल कर उन्हें उनके ही घर में नजरबंद कर दिया गया था। नेताजी इसी दौरान ब्रिटिश हुकूमत के आंख में धूल झोंक कर भारत से जर्मनी भाग गए। वहां युद्ध का मोर्चा देखा और युद्ध लड़ने की ट्रेनिंग ली।
जहां उन्होंने हिटलर से मिलकर भारतीय युद्ध बन्दी सैनिकों की मदद से सेना का गठन किया था।
जर्मनी में रहने के दौरान उन्हें जापान में रह रहे आज़ाद हिंद फ़ौज के संस्थापक रासबिहारी बोस ने आमंत्रित किया। डॉक्टर राजेंद्र पटोरिया अपनी किताब 'नेताजी सुभाष' में लिखते हैं, "4 जुलाई 1943 को सिंगापुर के कैथे भवन में एक समारोह में रासबिहारी बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस के हाथों में सौंप दी।" इसके बाद सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई जिसे जर्मनी, जापान, फिलिपींस, कोरिया, चीन, इटली, आयरलैंड समेत नौ देशों ने मान्यता भी दिया था।

नेताजी की आजाद हिंद सरकार का अपना अलग बैंक भी था। 1943 में बने आजाद हिंद बैंक ने 10 रुपए के सिक्के से एक लाख रुपए तक के नोट जारी किए थे। सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी कि इन्होंने जापान की मदद से अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह को स्वाधीन भूमि के रूप में प्राप्त किया। आजाद हिन्द सरकार ने नेताजी के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फ़ौज को बेहद शक्तिशाली बना दिया। फ़ौज को आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करने की दिशा में जन, धन और उपकरण जुटाए। इतना ही नहीं आजाद हिंद सरकार के पास अपना डाक टिकट और अपना गुप्तचर तंत्र भी था। नेताजी ने आजाद हिन्द फौज में महिला रेजिमेंट की स्थापना की जिसका नाम था "रानी  झांसी रेजिमेंट" जिसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी सहगल के हाथो में थी। लोग आज के जमाने में महिला सशक्तीकरण  की बात करते है नेताजी के आजाद हिन्द सरकार ने इसको साबित किया। । नेताजी सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि आज़ादी की इच्छा हर भारतीय के दिल में उठे तो भारत को स्वतंत्र होने से कोई रोक नहीं सकेगा। इसके लिए उन्होंने अपने लेखों, भाषणों में लिखना-बोलना शुरू किया। उन्होंने 'फॉरवर्ड' नाम से पत्रिका के साथ ही आज़ाद हिंद रेडियो की स्थापना की और जनमत बनाया।  नेताजी की आजाद हिन्द फौज ने आखिर सांस तक लड़ाई लड़ी। तृतीय विश्व युद्ध में अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी में  6 और 9 अगस्त को परमाणु बम से हमला कियाा गया जिसके बाद जापान नेेे सरेंडर  दिय। अंग्रेजी फौज को कोहिमा और इंफाल के मोर्चे पर कई बार आजाद हिंद फौज ने धूल चटाई। जापानियों के सरेंडर ने सब कुछ बिगाड़ कर रख दीया था। बेहद कठिन परिस्थितियों में आजाद हिंद फौज के सैनिकों ने आत्मसर्पण कर दिया और उसके बाद लाल किले में इनके ऊपर मुकदमा चलाया गया। जब यह मुक़दमा चल रहा था तो पूरा भारत भड़क उठा और जिस भारतीय सेना के बल पर अंग्रेज़ राज कर रहे थे, वे विद्रोह पर उतर आए। नौसैनिक विद्रोह ने ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में अंतिम कील जड़ दी। अंग्रेज़ अच्छी तरह समझ गए कि राजनीति व कूटनीति के बल पर राज्य करना मुश्किल हो जाएगा।उन्हें भारत को स्वाधीन करने की घोषणा करनी पड़ी। ऐसे बहुत से किस्से पड़े हुए है नेताजी के आजाद हिन्द सरकार और उसकी फौज की। बाकी नेेेेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है।

जय हिन्द