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Wednesday, October 28, 2026

बंग की जंग


बंग की जंग इतनी आसान नहीं थी। कदम- कदम पर लहूलुहान कर देने वाले कांटे पथ पर बाधाएं उत्पन्न कर रहे थे। राजनितिक खून से सनी रहती ये धरती आज अपने उमंग में मलंग है। एक आशा की किरण कीचड़ में कमल का फूल खिला दी है। स्वतंत्रता से पहले और स्वतंत्रता के बाद तक राजनीतिक हत्याओं का दौर यहां चला ही है। एक समय कोलकाता की अपनी अलग पहचान थी औद्योगिक जगत में। एक कपड़े का का लत्ता भी कलकत्ता से मिलता था। वामपंथ के दुष्प्रभाव ने इतना बर्बाद किया कि अंदर से ये शहर खोखला हो चुका है। कम्युनिस्टों ने ना सिर्फ बंगालियों की दुर्दशा की है बल्कि अगल-बगल राज्यों के लोगों का भी सपना तोड़ा है। तृणमूलियो ने भी बंगाल को कंगाल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति से ओत-प्रोत सत्ता पाने में इस कदर हुए कि इनके हृदय में मक्का मदीना बसने लगा और बांग्लादेशी घुसपैठिया बंगाल में!
 जनता भी इन्हें दशकों तक आजमा कर त्रस्त हो चुकी थी। हाताश निराश जनता जब अपने पतन की ओर जाती है तो नास्तिकता से उठकर आस्तिकता की तरफ आशक्त होते हुए देवता से जतन करती है कि "हे प्रभु उद्धार करो"

पांच वर्ष पहले 2021 में ममता बनर्जी ने नारा दिया-खेला होबे, जवाब में भाजपा ने हार के बाद कहा- खेला शेष और पांच साल बाद चार मई 2026 को खेला खत्म कर दिया। इसके साथ ही प्रदेश में भगवा ध्वज फहरा कर गंगोत्री से गंगासागर तक भाजपा सरकार का सपना साकार कर लिया।
असल मायने में ये बंगाल की जनता ने मत प्रयोग कर मनबढ़ राजनेताओं को उनकी औकात दिखाई है। जो ये बार-बार कहकर डर बैठाने की कोशिश कर रहे थे कि "4 मई के बाद केंद्रीय सुरक्षा बल वाले चले जाएंगे उसके बाद क्या करोगे हम ही लोगो को रहना है" उन्हें जूते पड़े रहे हैं और सड़े हुए अंडे फेंककर मारा जा रहा है जनता के द्वारा। लोकतंत्र में जनता से बढ़कर कुछ भी नहीं है। जिस जनता के दम पर आप सरकार बना रहे हैं उसी पर जुर्म करेंगे तो कितने दिन टिक सकेंगे ?
बंगाल में गुंडे माफियाओं की बनियान-हॉफ पैंट में परेड निकाल रही है पुलिस वो ही पुलिस जो कल तक इन्हें सलामी ठोकती थी और हुजूर-हुजूर कहती थी। दूसरों की औकात देखने वाले खुद लात खा रहे हैं। कभी सपने में भी इन लोगों ने नहीं सोचा होगा कि इनका ये हश्र होगा। अहंकार किसी का टिक नहीं सका है और जब टूटता है तो चकनूर हो जाता है सब।
बंगाल में ना गरीबी  ना बेरोजगारी ना टूटी सड़क या टूटी नाली  कुछ नहीं दिखता था सेकुलर पत्रकारों को जनता ने अंडे से क्या मारा लोकतंत्र खतरे में आ गया। पर 21 में मर्डर और रेप को बंगाल का मिजाज बता रहे थें।
"अरे ये तो बंगाल में होता ही आया है"
दशकों के कुप्रबंधन ने जो नाश किया है बंगाल का उससे उबरने में समय तो लगेगा ही। अभी साल भी नहीं लगा है राजनीतिक मिजाज बदले बदले बंगाल का पूरा विपक्ष वैचारिक रूप से कंगाल हो चुका है। टीएमसी का तो क्या ही कहना  पार्टी नाम और सिंबल दोनों ही गया ममता दीदी अब लंगड़ी टांग से फुटबॉल ही खेले और खेला होबे जपती रहें। जीत गये तो लोकतंत्र की विजय और हार गए तो वोट चोरी का आरोप। इन सब उलूल-जुलूल बातों से किसी का राजनीतिक वजूद ज्यादा दिन नहीं बचता है। राजनीति में अहंकार और अहं की भावना का कोई महत्व नहीं होता है। सर्वाधिकारी पार्टी मुखिया अपने अहं को सबसे आगे रखता है।  राजनीति एक कठिन चीज़ है। सबके बस की बात नहीं है। सिर्फ राज करना ही नहीं होता बल्कि नीतियों के साथ चलना पड़ता है। बिना अच्छी नीति के राज करना असंभव है। लोकतंत्र में लोक सेवा और नीतियां ही आप के पक्ष में काम आएंगी जो इसे भूल जाता है अपना अस्तित्व और मूल खो बैठता है। बिना मूल के सब कुछ धूल में मिल जाता है।
मुख्यमंत्री अपनी सीट हारे और साथ में इसके 20 मंत्री तो समझ सकते हैं कितना धूल-धूसरित हुआ है।

 "मां- माटी मानुष" और जय बांग्ला बोल देने भर से नहीं होता है कुछ नहीं इसको जमीन पर उतारना भी होता है। ऊपर से "जय-बांग्ला" बांग्लादेश मुक्ति संग्राम 1971 का नारा हो तो सेकुलर राजनीति का पता चलता है कि मुस्लिम तुष्टीकरण ही इसका आधार है। मतलब बांग्लादेशी आते रहे अवैध तरीके से बसते रहे वोट मिलता रहे। इतना ही नहीं "मां- माटी- मानुष" का नारा भी बांग्लादेश में चुनावी नारा था। 1991 के बांग्लादेश चुनाव में बेगम खालिदा जिया की बीएनपी ने अपना चुनावी नारा बनाया था । तो  तृणमूल का  अपना मूल क्या रह गया? यहां तो नारे भी घुसपैठ कर रहे हैं। ये सब नारों से जनता ऊब चुकी थी और हद से ज्यादा लड़ाकू प्रवृत्ति की पार्टी को कौन समर्थन करना चाहेगा तो ये सब नारे गले नहीं उतरे मतदाताओं के। मतदाताओं ने "जय श्री राम" के नारे पर भाजपा का साथ दिया। यहीं संस्कृति राष्ट्रवाद की असली विजय है।

जहां बेरोजगारी चरम पर है। युवा पलायन कर रहे हैं। उद्योग नहीं आ रहे।  शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है महिलाओं की सुरक्षा का सवाल सबसे बड़ी समस्या बन चुका हो वहां ढिठाई से "अबार खेला होबे" नारा दिया जाएगा तो जनता परिवर्तन करके सत्ता से उखाड़ ही फेकेगी। हृदय में कमल खिलेगा ही। यही तो लोकतंत्र की खुबसूरती है।
जैसा कि माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने कहा था कि "पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र के इस उत्सव में डर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीत हुई है। उन्होंने कहा कि जब बंगाल में भाजपा की जीत हुई है, तो 'बदला' की नहीं, बल्कि 'बदलाव' की बात होनी चाहिए। 'भय' की नहीं, बल्कि 'भविष्य' की बात होनी चाहिए।"

( स्रोत: जनसत्ता ई पेपर , दैनिक जागरण और और अन्य समाचार पत्र-पत्रिका लेखक से फेसबुक पर  जुड़े - शिवम कुमार पाण्डेय )




Friday, December 22, 2023

राजनीतिक हलचल आजकल

बहुत दिनों से मेरा मोबाइल खराब हो रखा है तो कोई खबर नहीं मिलती है। आजकल के अखबारों में भी वो अब बात नही रही बस चारो तरफ गंध फैला हुआ है। राजनीति तो राजनीति अब खेलों में भी अलग धंधा चालू हो चुका है। मतलब क्या ही बोला जाय आजकल के खेल पत्रकारो का वो किसी खिलाड़ी विशेष के दलाल बने हुए दिख जाते है अपने लेख और खबरों के माध्यम से। बनिए फैन किसी बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी का लेकिन इतना गिरिए की किसी और बेहतरी खिलाड़ी को नीचा गिराने लग जाए खुलेआम। खैर छोड़िए भी मुड़कर आते हैं राजनीति में शुरू से लेकर अंत तक छत्तीसगढ़ में जो माहौल मीडिया में भूपेश बघेल जी ने बनाया था क्या ही कहना ऐसा लग रहा था इस बार भी यही मुख्यमंत्री बनेंगे और फिर कांग्रेस की सरकार बनेगी...!  जब नतीजे आए तो सब धरा का धरा रह गया। वो बिकाऊ मीडिया भी गायब हो गई जो इन्हे एक महान नेता की तरह प्रस्तुत कर रही थी। 
यही हाल राजस्थान और मध्यप्रदेश का रहा। राजस्थान का तो फिर भी समझ में आता है की हर पांच साल में सरकार बदल ही जाती है और जनता भी त्रस्त थी गहलोत सरकार से लेकिन जो घटिया माहौल शिवराज या भाजपा सरकार के खिलाफ बनाया गया था मीडिया, सोसल मीडिया द्वारा उसको जोरदार तमाचा लगा है। हा मुख्यमंत्री बेसक मोहन यादव जी को बनाया गया है लेकिन इससे शिवराज जी की लोकप्रियता खत्म नही हो जाती है। समय की मांग थी बदलाव जरूरी था और हुआ है। अब जैसे राजस्थान में  भजन लाल शर्मा जी को मुख्यमंत्री का पद मिला है ठीक वैसे ही जैसे छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय जी को मिला है। बात साफ भाजपा ने बड़ा खेल खेल लिया है इन तीनो जमीनी नेताओ को मुख्यमंत्री का पद देकर। सवर्ण ,सामान्य, पिछड़ा या अनुसूचित जाति, आदिवासी वर्ग के लोगो  लेकर गजब की राजनीति चल रही है जिसमे भाजपा ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है और विपक्ष से बहुत आगे निकल चुकी है जिसका परिणाम आने वाले लोकसभा चुनाव में भी दिखेगा। 
अब मोदी जी को पनौती बोला गया था मोदी जी ने उसे आड़े हाथों लिया इस मुद्दे को। कुछ लोग अपनी जबान बंद करके भी अपने पार्टी की मदद कर सकते है लेकिन इनसे ये भी नही होगा। चलिए ठीक है अभी हाल ही में संसद में कुछ तथाकथित लोग घुस गए जोकि एक राष्ट्रीय सुरक्षा में चूक का मामला है अगर यही बंदूक धारी होते और इनके पास विस्फोटक होता तो बड़ा हादसा हो सकता है। विपक्ष के पास बेहतरीन मौका था की सरकार को इस मुद्दे को लेकर घेरे लेकिन नही इन्हे उन तथकतिथ घुसपैठियों का समर्थन करना था। समर्थन करते हुए कहते है सब की बेरोजगारी की वजह से ये सब हुआ है। एक अलग ही स्तर की राजनीति चल रही विपक्ष वालो की इनका बनाया इंडी गठबंधन भी किसी काम का सब ढोकोसला था। शायद पहली बार ऐसा हुआ है की राज्यसभा से इतने सांसद निलंबित हुए है। विरोध प्रदर्शन में एक टीएमसी के नेता कल्याण बनर्जी ओछी हरकत करते हुए नजर  आए देश के उपराष्ट्रपति की नकल कर रहे थे और मजाक उड़ा रहे थे वही पर कांग्रेस के युवराज वीडियो बना रहे थे। एक लगभग 80 साल के शिष्ट और सुसंस्कृत व्यक्तित्व का मजाक उड़ाया गया जो संवैधानिक तौर पर भारत के शायद तीसरे सबसे महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन हैं। राहुल गांधी कभी भी एक गंभीर राजनेता नहीं बन सकते। राहुल गांधी वीडियो बनाने की जगह उस सांसद को रोकते तो एक गंभीर राजनेता की छवि बन सकती थी ये छोटी छोटी चीज ही इंसान को बड़ा बनाती है
बाकी सब मौजूद सांसदों की नीचता का स्तर भी दिख गया।