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Tuesday, September 15, 2020

रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह का लोकसभा में बयान

( 15 सितंबर 2020, रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने भारत-चीन तनाव को लेकर लोकसभा में जवाब देते हुए। फोटो:- लोकसभा टीवी )

सबसे पहले मैं संक्षेप में चाईना के साथ हमारेBoundary issue के बारे में बताना चाहता हॅू।  जैसा कि सदन इस बात से अवगत है कि भारत एवं चाईना का सीमा का प्रश्न (Boundaryquestion) अभी तक unresolved है। भारत और China की Boundary का customary और traditional alignment,China नहीं मानता है ।हम यह मानते हैं, कि यहalignment, well-established भौगोलिक सिद्धांतों पर आधारित है, जिसकी पुष्टि न केवल treaties और agreements द्वारा, बल्किhistoric usage औरpractices द्वारा भी हुई है। इससे दोनों देश सदियों से अवगत हैं।जबकि चाईना यह मानता है कि boundary अभी भी औपचारिक रूप से निर्धारित नहीं है। साथ ही चाईना यह भी मानता है कि historical jurisdiction के आधार पर जो traditional, customary lineहै, उसके बारे में दोनों देशों की अलग-अलग व्याख्या है।  दोनों देश,1950 एवं 1960 के दशक में इस पर बातचीत कर रहे थे, परन्तु इस पर mutually acceptable समाधान नहीं निकल पाया।

जैसा कि यह सदन अवगत है चाईना, भारत की लगभग 38,000square km भूमि का अनधिकृत कब्जा लद्दाख में किए हुए है। इसके अलावा,1963 में एक तथाकथित Boundary-Agreement के तहत, पाकिस्तान नेPoKकी 5180square km भारतीय जमीन अवैध रूप से चाईना को सौंप दी  है।  चाईना, अरूणाचल प्रदेश की सीमा से लगे हुए लगभग 90,000square km भारतीय क्षेत्र को भी अपना बताता है।  भारत तथा चाईना, दोनों ने, औपचारिक तौर पर यह माना है कि सीमा का प्रश्न (Boundaryquestion)एक जटिल मुद्दा है जिसके समाधान के लिए patience की आवश्यकता है तथा इस issue का fair, reasonable और mutually acceptable समाधान, शांतिपूर्ण बातचीत के द्वारा निकाला जाए। अंतरिम रूप से दोनों पक्षों ने यह मान लिया है कि सीमा पर peace और tranquillityबहाल रखना bilateral relationsको बढ़ाने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

मैं यह भी बताना चाहता हूँ कि अभी तक India-China के border areas में commonly delineated Line of Actual Control (LAC) नहीं है और LAC को लेकर दोनों का perception अलग-अलग है।  इसलिए peace और tranquillity बहाल रखने के लिए दोनों देशों के बीच कई तरह के agreementsऔर protocolsहैं।

 इन समझौतों के तहत दोनों देशों ने यह माना है कि LAC पर peace और tranquillity बहाल रखी जाएगी, जिसपर LAC की अपनी-अपनीrespective positions और boundary questionका कोई असर नहीं माना जाएगा।  इस आधार पर वर्ष 1988 के बाद से दोनों देशों के bilateral relationsमें काफी विकास हुआ।  भारत का मानना हैकि,bilateral relations को विकसित किया जा सकता है, तथा साथ ही साथ boundary मुद्दे के समाधान के बारे में चर्चा भी की जा सकती है। परन्तु LAC पर peace और tranquillity में किसी भी प्रकार की गम्भीर स्थिति का bilateral relations पर निश्चित रूप से असर पड़ेगा।

 वर्ष 1993 एवं 1996 के समझौते में इस बात का जिक्र हैकि LAC के पास, दोनों देश अपनी सेनाओं की संख्या कम से कम रखेंगे।  समझौते में यह भीहै, कि जबतक boundaryissueका पूर्णसमाधान नहीं होता है, तबतक LACको strictly respect और adhere किया जाएगा और उसका उल्लंघन नहीं किया जाएगा । इन समझौतों में भारत व चाईना, LACके clarification द्वारा एक common understanding पर पहुचने के लिए भी committed हुए थे | इसके आधार पर 1990 से 2003 तक दोनों देशों द्वारा LAC पर एक common understanding बनाने की कोशिश की गई लेकिन इसके बाद चाईना ने इस कार्यवाही को आगे बढ़ाने पर सहमति नहीं जताई ।  इसके कारण कई जगहों पर China तथा भारत के बीच LAC perceptions में overlap है | इन क्षेत्रों में तथा border के कुछ अन्य इलाकों में दूसरे समझौतों के आधार पर दोनों की सेनाएं face-offआदि की स्थिति का समाधान निकालती हैं,जिससे कि शांति कायम रहे।

इससे पहले कि मैं सदन को वर्तमान स्थिति के बारे में बताऊॅं, मैं यह बताना चाहता हॅूं कि सरकार की विभिन्न intelligence agencies के बीच coordination का एक elaborate और time tested mechanism है जिसमें Central Police Forces और तीनों armed forces की intelligence agencies शामिल हैं | Technicalऔर human intelligence को लगातार coordinated तरीके से इकट्ठा किया जाता है, तथा armed forces से उनके decision making के लिए share किया जाता है।

 अब मैं सदन को इस साल उत्पन्न परिस्थितियों से अवगत कराना चाहता हॅूं।  अप्रैल माह से Eastern Ladakhकी सीमा पर चाईना की सेनाओं की संख्या तथा उनके armaments में वृद्धिदेखी गई।  मई महीने कीके प्रारंभ में चाईना ने गलवान घाटी क्षेत्र में हमारी troopsकेnormal, traditional patrolling pattern में व्यवधान  शुरू किया जिसके कारण face-offकी स्तिथि उत्पन्न हुई ।  Ground Commanders `द्वारा इस समस्या को सुलझाने के लिए विभिन्न समझौतों तथा protocol के तहत वार्ता की जा रही थी, कि इसी बीच मई महीने के मध्य में चाईना द्वारा western sector में कई स्थानों पर LAC पर transgression करने की कोशिश की गई।  इनमें Kongka La, Gogra and Pangong Lakeका North Bank शामिल है।  इस कोशिशों को हमारी सेनाओं ने समय पर देख लिया तथा उसके लिए आवश्यक जवाबी कार्यवाही की।

 हमने चाईना को diplomatic तथा military channels के माध्यम से यह अवगत करा दिया, कि इस प्रकार की गतिविधियाँ, status quoको unilaterally बदलने का प्रयास है।  यह भी साफ कर दिया गया कि ये प्रयास हमें किसी भी सूरत में मंजूर नहीं है।

LACके ऊपर friction बढ़ता हुआ देख कर दोनों तरफ के सैन्य कमांडरों ने 6 जून 2020 को मीटिंग की, तथा इस बात पर सहमति बनी कि reciprocal actionsके द्वारा disengagement किया जाए।  दोनो पक्ष इस बात पर भी सहमत हुए कि LAC को माना जाएगा तथा कोई ऐसी कार्रवाई नहीं की जाएगी, जिससे status-quoबदले।  किन्तु इस सहमति के violation में चीन द्वारा एक violent face off की स्थिति 15 जून को गलवान में create की गई।  हमारे बहादुर सिपाहियों ने अपनी जान का बलिदान दिया पर साथ ही चीनी पक्ष को भी भारी क्षति पहुचाई और अपनी सीमा की  सुरक्षा में कामयाब रहे।

इस पूरी अवधि के दौरान हमारे बहादुर जवानों ने, जहाँ  संयम की जरूरत थी वहां संयम रखा तथा जहाँ शौर्य की जरुरत थी, वहां शौर्य प्रदर्शित किया।  मै सदन से यह अनुरोध करता हूँ कि हमारे दिलेरों की वीरता एवं बहादुरी की भूरि-भूरि प्रशंसा करने में मेरा साथ दें।  हमारे बहादुर जवान अत्यंत मुश्किल परिस्थतियों में अपने अथक प्रयास से समस्त देशवासियों को सुरक्षित रख रहे हैं।

एक ओर किसी को भी हमारे सीमा की सुरक्षा के प्रति हमारे determination के बारे में संदेह नहीं होना चाहिए, वहीँभारत यह भीमानता है कि पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण संबंधों के लिए आपसी सम्मान और आपसी sensitivity आवश्यक हैं।  चूंकि हम मौजूदा स्थिति का dialogueके जरिए समाधान चाहते हैं,   हमने Chinese sideके साथ diplomatic और military engagement बनाए रखाहै।  इन discussions में तीन key principles हमारी approachको तय करते हैंः (i)दोनों पक्षों को LACका सम्मान और कड़ाई से पालन करना चाहिए; (ii) किसी भी पक्ष को अपनी तरफ से यथास्थिति का उल्लंघन करने का प्रयास नहीं करना चाहिए; और  (iii)दोनों पक्षों के बीच सभी समझौतों और understandings का पूर्णतया पालन होना चाहिए।  Chinese sideकी यह  position है कि , स्थिति को एक जिम्मेदार ढंग से handled किया जाना चाहिए और द्विपक्षीय समझौतों एवं protocolके अनुसार शांति एवं सद्भाव सुनिश्चिित किया जाना चाहिए।

 जबकि ये discussions चल ही रहे थे, चीन की तरफ से 29 और 30 अगस्त की रात को provocative सैनिक  कार्रवाई की गई, जो Pangong Lakeके South Bank area में status quo को बदलने का प्रयास था।  लेकिन एक बार फिर हमारी armed forces द्वारा timely और firm actionsके कारण उनके ये प्रयास सफल नहीं हुए। 

जैसा कि उपर्युक्त घटनाक्रम से स्पष्ट है, चीन की कार्रवाई से हमारे विभिन्न द्विपक्षीय समझौतों के प्रति उसका disregard दिखता है। चीन द्वारा troops की भारी मात्रा में तैनाती किया जाना 1993 और 1996 के समझौतों का उल्लंघन है।  LAC का सम्मान करना और उसका कड़ाई से पालन किया जाना, सीमा क्षेत्रों में शांति और सद्भाव का आधार है, और इसे 1993 एवं 1996 के समझौतों में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है।  जबकि हमारी armed forcesइसका पूरी तरह पालन करती हैं, Chinese sideकी ओर से ऐसा नहीं हुआ है। उनकी कार्रवाई के कारण LACके आसपास समय- समयपर  face-offsऔर frictions पैदा हुए हैं।  जैसा कि मैंने पहले भी उल्लेख किया, इन समझौतों में face-offsकी स्थिति से निपटने के लिए विस्तृत procedures और normsनिर्धारितहैं।  तथापि, इस वर्ष हाल की घटनाओं में Chinese forces का violent conduct सभी mutually agreed normsका पूर्णतया उल्लंघन है।

 अभी की स्थिति के अनुसार, Chinese side ने LAC  और अंदरूनी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में सैनिक टुकड़ियां और गोलाबारूद mobilize किआ हुआ है।  पूर्वी लद्दाख और Gogra, Kongka La और Pangong Lake का North और South Banks पर कई friction areas हैं।  चीन की कार्रवाई के जवाब में हमारी armed forces ने भी इन क्षेत्रों में उपयुक्त counter deployments किए हैं ताकि भारत के security interests पूरी तरह सुरक्षित रहे।  अध्यक्ष महोदय, सदन को आश्वस्त रहना चाहिए कि हमारी armed forces इस चुनौती का सफलता से सामना करेंगी, और इसके लिए हमें उनपर गर्व है।  अभी जो  स्थिति बनी हुई है उसमें sensitive operational issues शामिल है।  इसलिए मैं इस बारे में ज्यादा ब्यौरा का खुलासा नहीं करना चाहॅूंगा और, मैं आश्वस्त हॅूं, यह सदन इस  sensitivity को समझेगा।

Covid-19 के challenging समय में, हमारी armed forces और ITBP की तेजी से deployment हुई है। उनके प्रयासों को appreciate किए जाने की जरूरत है। यह इसलिए भी संभव हुआ है, क्योंकि सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में border infrastructure के विकास को काफी अहमियत दी है। सदन को जानकारी है कि पिछले कई दशकों में चीन ने बड़े पैमाने पर infrastructure activity शुरू की है, जिनसे border areas में उनकी deployment क्षमता बढ़ी है।इसके जबाव में हमारी सरकार ने भी border infrastructure विकास के लिए बजट बढ़ाया है, जो पहले से लगभग दुगुना हुआ है। इसके फलस्वरूप border areas में काफी roads और bridges बने हैं। इससे न केवल local population को जरूरी connectivity मिली है, बल्कि हमारी armed forces को बेहतर logistical support भी मिला है। इसके कारण वे border areas में अधिक alert रह सकते हैं, और जरूरत पड़ने पर बेहतर जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं। आने वाले समय में भी सरकार इस उद्देश्य के प्रति committed रहेगी।

Honorable Speaker,

मैं इस बात पर बल देना चाहूंगा कि भारत हमारे border areas में मौजूदा मुद्दों का हल, शांतिपूर्ण बातचीत और consultation के जरिए किए जाने के प्रति committed है। इस उद्देश्य को पाने के लिएमैं अपने Chinese counterpart से 4 सितंबर को Moscow में मिला और उनसे हमारीin-depth discussion हुई। मैंने स्पष्ट तरीके से हमारी चिन्ताओं को चीनी पक्ष के समक्ष रखा, जो उनकी बड़ी संख्या में troops की तैनाती, aggressive behaviour और unilaterally status quo बदलने की कोशिश, (जो bilateral agreements के उल्लंघन) से सम्बंधित थाI मैंने यह भी स्पष्ट किया, कि हम इस मुद्दे को शांतिपूर्ण ढंग से हल करना चाहते हैं और हम चाहते हैं कि चीनी पक्ष हमारे साथ मिलकर काम करेंIवहीं हमने यह भी स्ष्ट कर दिया कि हम भारत की sovereignty और territorial integrity की रक्षा के लिए पूरी तरह से determined हैं। इसके बाद मेरे colleague विदेश मंत्री श्री जयशंकर जी भी 10 सितंबर को Moscow में Chinese विदेश मंत्री से मिले । दोनों एक agreement पर पहुंचे कि यदि Chinese side द्वारा sincerely और faithfully agreement को implement किया जाता है तो complete disengagement प्राप्त किया जा सकता है, और border areas में शांति स्थापित हो सकती है।

जैसे कि सदस्यों को जानकारी है, बीते समय में भी चीन के साथ हमारे border areas में लम्बे stand-offs की स्थिति कई बार बनी है जिसका शांतिपूर्ण तरीके से समाधान किया गया था। हालांकि, इस वर्ष की स्थिति, चाहे वो troops की scale of involvement हो या friction points की संख्या हो, वह पहले से बहुत अलग है, फिर भी हम मौजूदा स्थिति के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति committed हैं। इसके साथ-साथ मैं सदन को आश्वस्त करना चाहता हॅूं कि हम सभी परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार हैं।

 अध्यक्ष महोदय, इस सदन की एक गौरवशाली परम्परा रही है, कि जब भी देश के समक्ष कोई बड़ी चुनौती आयी है तो इस सदन ने भारतीय सेनाओं की दृढ़ता और संकल्प के प्रति अपनी पूरी एकता और भरोसा दिखाया है। साथ ही, सीमा क्षेत्र में तैनात अपने बहादुर सेना के जवानों के शौर्य, पराक्रम, और सीमा की सुरक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर पूरा विश्वास व्यक्त किया है।

मैं आपको यह विश्वास दिलाना चाहता हूं कि हमारे armed forces के जवानों का जोश एवं हौसला बुलंद है। माननीय प्रधानमंत्री जी के बहादुर जवानों के बीच जाने के बाद हमारे कमांडर तथा जवानों में यह संदेश गया है कि देश के 130 करोड़ देशवासी जवानों के साथ हैं। उनके लिए बर्फीली ऊॅंचाइयों के अनुरूप विशेष प्रकार के गरम कपड़े, उनके रहने का specialised tent तथा उनके सभी अस्त्र-शस्त्र एवं गोला बारूद की पर्याप्त व्यवस्था की गई है। हमारे जवानों की यह प्रतिज्ञा सराहनीय है I दुर्गम ऊॅंचाइयों पर, जहां आक्सीजन की कमी है, तथा तापमान शून्य से नीचे है, उनके उत्साह में कोई कमी नहीं आती है, और वे सियाचीन, कारगिल आदि ऊॅंचाइयों पर अपना कर्तव्य इतने वर्षों से निभाते आ रहे हैं। 

मुझे इस गौरवमयी सदन के साथ यह साझा करने में कतई संकोच नहीं है कि लद्दाख में हम एक चुनौती के दौर से गुजर रहे हैं, और मैं इस सदन से यह आग्रह करना चाहता हॅूं कि हमें एक resolution पारित करना चाहिए कि हम अपने वीर जवानों के साथ कदम-से-कदम मिलाकर खड़े हैं, जो कि अपनी जान की बगैर परवाह किए हुए देश की चोटियों की उचाईयों पर विषम परिस्थितियों के बावजूद भारत माता की रक्षा कर रहे हैं। यह समय है जब यह सदन अपने सशस्त्र सेनाओं के साहस और वीरता पर पूर्ण विश्वास जताते हुए उनको यह संदेश भेजे कि यह सदन और सारा देश सशस्त्र सेनाओं के साथ है जो भारत की संप्रभुता एवं सम्मान की रक्षा में जुटे हुए हैं।

Wednesday, September 9, 2020

CCC गठजोड़ को तोड़ कर रख दिया गया है।

लेखक:- शिवम् कुमार पाण्डेय

CCC गठजोड़ को तोड़ कर रख दिया गया है। CCC यानि  कांग्रेस कम्युनिस्ट चीन इनकी बेहूदा हरकतों का मुंहतोड़ जवाब दिया जा रहा है भारतीय सेना द्वारा। कांग्रेसियों का कहना ही क्या वो तो भारतीय सेना को कायर सिद्ध करने में लग गई थी और इनके जूठन में पर पलने कम्युनिस्टों का कहना ही क्या वो माओ को अपना बाप मानते हैं तो चीन का ही समर्थन करेंगे। चीन की पीपुल्स लिबशन आर्मी 7 सितम्बर की शाम पूरी के साथ रिचेन ला और रिजांग ला क्षेत्र में घुसे थे, लेकिन भारतीय सेना ने उनकी कोशिश को नाकाम कर दिया। हवाई फायरिंग भी हुई पर आगे ऐसा फिर कोई घुसपैठ कोशिश हुई तो भीषण गोलाबारी भी हो सकती है और चीनी सरकार अपने सैनिकों की तबाही अपने आंखो से देखेगी। चीन हमेशा 1962 की रट लगाए रहता है पर 1967 भूल जाता है जब भारतीय सेना के रणबांकुरो ने चीनियों को धूल चटाई थी।दोनों देशों की सेना के बीच एक महत्वपूर्ण एवं निर्णायक तकरार सितंबर 1967 में नाथू ला पोस्ट पर हुई जिसने यह मिथक तोड़ दिया था कि भारतीय सेना कभी चीन से युद्ध में जीत नहीं सकती। जनरल सगत सिंह को 17 माउंटेन डिविजन का जीओसी बनाया गया था। उनकी इसी पोस्टिंग के दौरान नाथुला में चीनी सैनिकों की भारतीय सैनिकों से ज़बरदस्त भिड़ंत हुई।

1962 के बाद पहली बार जनरल सगत सिंह ने दिखाया कि चीनियों के साथ न सिर्फ़ बराबरी की टक्कर ली जा सकती है, बल्कि उन पर भारी भी पड़ा जा सकता है। जनरल वी के सिंह बताते हैं, "इत्तेफ़ाक से मैं उस समय वहीं पोस्टेड था। जनरल सगत सिंह ने जनरल अरोड़ा से कहा कि भारत चीन सीमा की मार्किंग होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं सीमा रेखा पर चलता हूँ।अगर चीनी विरोध नहीं करते हैं तो हम मान लेंगे कि यही बॉर्डर है और वहाँ पर हम फ़ेसिंग बना देंगे।"

"जब उन्होंने ये करना शुरू किया तो चीनियों ने विरोध किया।उनके सैनिक आगे आ गए। कर्नल राय सिंह ग्रनेडियर्स की बटालियन के सीओ थे। वो बंकर से बाहर आकर चीनी कमांडर से बात करने लगे। इतने में चीनियों ने फ़ायर शुरू कर दिया। कर्नल राय सिंह को गोली लगी और वो वहीं गिर गए।"

"गुस्से में भारतीय सैनिक अपने बंकरों से निकले और चीनियों पर हमला बोल दिया। जनरल सगत सिंह ने नीचे से मीडियम रेंज की आर्टलेरी मंगवाई और चीनियों पर फ़ायरिंग शुरू करवा दी। इससे कई चीनी सैनिक मारे गए। चीनी भी गोलाबारी कर रहे थे लेकिन नीचे होने के कारण उन्हें भारतीय ठिकाने दिखाई नहीं दे रहे थें।"

भारतीय सेना के करीब 70 जवान शहीद हो गए और भारतीय सेना के हमले से चीनी सैनिकों को भागने का भी मौका नहीं मिला और उसके 400 सैनिक मारे गए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उन दिनों सेना को तोप से गोलाबारी करने का हुक्म प्रधानमंत्री देते थे। सगत सिंह ने किसी से आदेश नहीं लिया और लगातार तीन दिन तक फायरिंग करते रहे। यह लड़ाई तब रुकी जब चीन ने भारत को हवाई हमले की धमकी दी, तब दोनों देशों के सैन्य अधिकारी युद्ध विराम पर सहमत हुए। सगत सिंह ने वह कर दिया था जिसकी कल्पना भी नामुमकिन थी। उसने उस सोच को पूरी तरह बदल दिया कि भारतीय फौज कभी चीन से मुकाबला नहीं कर सकती। खैर बात वर्तमान की जाय तो सत्ता राष्ट्रवादियों के हाथ में है और सेना को खुली छूट है। चीनी आंखो को फोड़ना सख्त जरूरी हो गया है क्योंकि इनकी नजरे भारतीय क्षेत्रो को हड़पने में ही लगी रही रहती है और लूटी हुई जमीन से इनको दौड़ाकर मार भगाना भी है। तिब्बत के लोग भी आज़ादी चाहते है वो इस चीनी साम्यवादी सरकार के क्रूरता से तंग आ चुके है। इस युद्ध के अलावा दुसरा कोई विकल्प नहीं है।


Thursday, July 2, 2020

चीन के अड़े रहने के कारण दोनों तरफ से बढ़ी सेना की तैनाती

पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव दूर करने के लिए मंगलवार को करीब 12 घंटे चली बैठक का परिणाम उत्साहवर्धक नहीं रहा। दोनों पक्षों ने तनाव कम करने पर जोर दिया लेकिन चीन के भारतीय सेना को भी दो किलोमीटर पीछे हटाने पर अड़े रहने से मामला फिर अगली पैंगोंग त्सो ले बैठक के लिए टल गया। हालांकि इस बात पर सहमति बनी कि तनाव दूर करने के लिए बैठकों का दौर चलता रहेगा। बैठक राजनयिक स्तर पर भी होगी। मसला पैंगोंग त्सो लेक के फिंगर 4 को लेकर फंसा है। चीन की शर्त है कि वह इस बिंदु से तभी हटेगा जब भारत भी दो किलोमीटर पीछे हटेगा। भारत का पीछे हटना का अर्थ है कि उसका फिगर चार से दावा कमजोर पड़ जाएगा। भारत की शर्त है कि चीन वापस फिंगर-8 से पीछे जाए। भारत की तरफ से 14 कोर कमांडर लेफ्टिनेंट हरविंदर सिंह और चीन की तरफ से तिब्बत मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट के मेजर जनरल लीयू लिन बैठक में भाग लिया। इस बात बैठक चिशुल में भारतीय भूभाग में हुई। बातचीत का परिणाम न निकलने के कारण दोनों तरफ से एलएसी पर सेना की तैनाती बढ़ा दी गई है।भारत ने सीमा पर भीष्म टैंकों की तैनाती बढ़ाने के साथ ही पेंगोंग त्सो लेक में निगरानी बढ़ाने के लिए नौसेना के आधुनिक नावों की तैनाती की है। सूत्रों का कहना है कि चीनी सेना ने उत्तरी शिनजियांग प्रांत में दो डिवीजनों को तैनात किया एक डिवीजन में 10,000 सैनिक हैं। यह वास्तविकनियंत्रण रेखा से 1000 किलोमीटर की दूरी पर है, चीनी सीमा पर समतल इलाकों के कारण अधिकतम 48 घंटे में सीमा तक पहुंचने के लिए उन्हें जुटाया जा सकता है। भारत ने पूर्वी लद्दाख क्षेत्र के आस-पास के स्थानों से कम से कम दो डिवीजनों को तैनात किया है इसमें एक आरक्षित माउंटेन डिवीजन भी शामिल है जो हर साल पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में अपने युद्ध अभ्यास करती है। सूत्रों का कहना है कि मंगलवार की बैठक में तनाव दूर करने के लिए चीनी सेना को पीछे हटने और छह व 22 जून को हुईकोर कमांडर स्तर की बैठक में जिन मुद्दों पर सहमति बनी थी, उन पर कितना अमल हुआ, इस पर चर्चा हुई भगवान घाटी में चीनी सेना टोकन के रूप में थोड़ा पीछे हटी है, लेकिन उसने अपने ढांचा नहीं होते हैं। मंगलवार को बैठक में चीन की तरफ से कहा गया कि भारत को भी दो किलोमीटर पीछे हटना पड़ेगा। इस अर्थ हुआ कि भारत को अपनी ही धरती पर से दावा छोड़ना होगाऔर चीन को भारत पर दो किलोमीटर की बढ़त मिल जाएगी। भारत की तरफ से बातचीत कर रहे लेफ्टिनेंट जनरल हरविंदर सिंह ने अपना पक्ष मजबूती रखा कि चीन को 4 मई से पहले की स्थिति बहाल करनी होगी और 17 जून को दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बातचीत में बनी सहमति के अनुसार इस मसले को जिम्मेदारी के साथ सुलझाना होगा। चीनी पक्ष अपनी बात पर अड़ा रहा कि भारतीय सेना को भी पीछे हटना होगा। उधर पाकिस्तान ने भी मौके का फायदा उठाने के लिए एलओसी 20 हजार जवानों को गिलगित बाल्टिस्तान में एलओसी के नजदीक तैनात किया है।

( स्रोत:  राष्ट्रीय सहारा)

Tuesday, June 30, 2020

चीनी छलावा: भारत और भारत-प्रशांत क्षेत्र के माध्यम से एक निकास योजना

लेखक:- गौरव राजमोहन नारायण सिंह
छात्र, काशी हिन्दू वश्वविद्यालय

(नक्शा अक्साई चिन और चीन के साथ विवादित क्षेत्रों को दर्शाता है। इसके साथ ही यह कुछ ऐसी जगहों को भी दिखाता है जहाँ उनके हाल के सीमा विवाद हैं।)


जॉन फिट्जगेराल्ड कैनेडी का चीन के बारे में विचार उनकी एक अभिव्यक्ति से पता लगता है की,"चीनी शब्द 'संकट' लिखने के लिए दो ब्रश स्ट्रोक का उपयोग करते हैं। एक ब्रश स्ट्रोक खतरे के लिए होता है तो दूसरा अवसर के लिए । एक संकट में, खतरे से अवगत रहें लेकिन अवसर को पहचानें"। आज जब दुनिया वुहान वायरस के कठिन दौर से गुजर रही है, तब कैनेडी के द्वारा किए गए उपरोक्त अवलोकन चीनी विचार प्रक्रिया और उनके वैचारिक दृष्टिकोण्ड के बारे में बहुत कुछ बताता हैं। चीन के साथ हमारी सीमा पर आज जो कुछ हम देखते हैं उसे इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए। स्थिति और तर्क को बेहतर समझने के लिए, सभी को यह सोचने की जरूरत है कि जब चीन से उत्पन्न वायरस ने पूरी दुनिया को अनिश्चितता में धकेल दिया, तो वह जिम्मेदार देश भारत, वियतनाम, ताइवान, जापान और भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र के अन्य द्वीपीय राष्ट्रों के साथ सीमागतिरोध को क्यों उकसा रहा है। इसके अलावा अनुवर्ती तर्क यह है कि इन सभी देशों के साथ विवादास्पद परिस्थिति को निर्मित करने बाद जिसे पश्चिमी देशों में संवेदनशील मसलों का हिस्सा बनाया गया है उसपर अभी भी चीनी शीर्ष नेतृत्व कुछ कार्यवाही करने या कहने की स्थिति में क्यों नहीं नज़र आ रहा । यह एक गंभीर प्रश्न है, जिसका निहित उत्तर अवसर है।

चीन इस महामारी का उपयोग देश और विदेश दोनों में आनेवाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए कर रहा है। चीनी नेतृत्व के बारे में बात करें तो वुहान वाइरस के दौरान व्याप्त दुश्वारीयों के बाद प्रीमियर ली और राष्ट्रपति शी के बीच एक बड़ा मतभेद दिखाई दिया हैं। साथ ही हांगकांग में लंबे समय से चल रहे लोकतंत्र-समर्थित विरोध ने भी चीनी नेतृत्व की छवि को धूमिल किया है, जिसकी पश्चिमी देशों में तीखी आलोचना हुई है। हॉन्गकॉन्ग के लिए प्रस्तावित सुरक्षा बिल ने पुनः तनाव की परिस्थिति का निर्माण किया है जो कि महामारी के प्रतिबंध के दौरान शांत हुए थे दूसरी ओर ताइवान के विश्व मंच पर अधिक जुड़ाव और स्वीकार्यता ने बीजिंग को झकझोर कर रख दिया है। समस्याओं को जोड़ते हुए, अमेरिका के साथ व्यापार संबंधों में सुधार ने भी एक गंभीर रूप ले लिया है। महामारी के अमेरिका में अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक पहुंचने के बाद से शत्रुता और बढ़ी है। इसने चीन के लिए राजनयिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर कई समस्याएं पैदा की हैं और इस प्रकार, चीन में कई मैन्युफैक्चरिंग और मानसी अब अन्य पसंदीदा व्यापारिक स्थलों जैसे भारत, वियतनाम, बांग्लादेश, आदि पर जा रहे हैं या जाने की प्रक्रिया मे है, जो कि विश्वास के घाटने और मूल-देश के दबाव के कारण से हुआ हैं। इसे चीन में भारी छटनी हुई है और दशकों बाद चीन के औद्योगिक उत्पादन में रिकॉर्ड कमी आई है। अर्थव्यवस्था मंदी के कगार पर है, बैंक उधार देने में असमर्थ हैं और इसलिए, चीन की महत्वकांशी ओबीओबी परियोजना पर भी ग्रहण लग गया है। कई राष्ट्र अब अपने ऋणों को दूर करने के लिए चीनी की ओर रुख कर रहे हैं कुछ राष्ट्र अपनी प्रतिबद्धताओं पर पुनर्विचार करके चीन के इस ऋण जाल रणनीति से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सबसे बुरी खबर यह है कि चीन अपने चेहरे बचाने की कोशिश में भी नाकाम रहा। चीन द्वारा उपलब्ध चिकित्सा आपूर्ति और महत्वपूर्ण उपकरणों को अस्वीकार कर दिया गया है और भारत सहित कई देशों द्वारा इन्हें वापस भेज दिया गया है। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि यह सब चीन के लिए ठीक नहीं है और इसलिए पैक में अपने अंतिम कार्ड का उपयोग करते हुए, चीन ने इस महामारी जैसे प्रमुख मुद्दों से सभी का ध्यान भटकाने के लिए कई मोर्चों पर सीमाओं पर तनाव बढ़ा है। और कवरेज और रुझानों को आधार माने तो चीन काफी हद तक इसमें सफल रहा है। इस प्रकार, इस विचलन में सबसे बड़ा योगदान चीन-भारत सीमा गतिरोध को जाता है।
आज लद्दाख के विभिन्न प्रमुख सामरिक क्षेत्र जैसे मोगरा-हॉट सिंस, गालवान वैली, पैंगॉन्ग त्सौ झील और फिंगर एरिया, डेपसांग प्लेन, दौलत बेग ओल्डी, दरबुक, चुमार, चुशुल और डेमचोक सार्वजनिक प्रवचन में हैं। समाचार पाठकों और भावुक अनुयायियों के लिए ये घरेलू नाम बन गए हैं। प्रत्येक समाचार चैनल, अंग्रेजी और हिंदी दोनों, प्रचलित मुद्दे पर लंबाई से रक्षा और रणनीतिक विशेषज्ञों के साथ 7 से 11 बजे के प्राइम घंटे के दौरान गहन चर्चा करते है। यह अब एक संघर्ष से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति दोनों में एक फ्लैशप्वाइंट बन गया है क्योंकि यह चार दशकों के बाद था जब एक हिंसक झड़प में 20 बहादुर भारतीय सैनिकों की मौत हो जाती है, जिन पर लोहे की छड़, पत्थर और बेसबॉल बैट में कटिली तार लपेट कर चीनियों ने हमला किया। यह सब 15-16 जून की रात में गैलवान घाटी के पैट्रोलिंग पॉइंट 14 में हुआ था गालवान घाटी हालिया संघर्ष क्षेत्रों में से एक है जहां भारतीय गश्ती दल ने चीनी को 6 जून की विघटन योजना पर सहमति के रूप में वापस जाने के लिए कहा। जब गश्ती दल ने तम्बू और वॉच टॉवर के अवैध निर्माण पर आपत्ति जताई, तो चीनी सैनिकों ने भारतीय गश्ती दल पर हमला कर दिया। इसलिए, एक भयंकर प्रतिशोध में भारतीय बलों ने न केवल उन संरचनाओं को नष्ट कर दिया, बल्कि लगभग 35 पीएलए सैनिकों को भी मार गिराया, जिनकी अमेरिकी खुफिया द्वारा पुष्टि की गई है। चीनी ने भी इस बात पुष्टि की है कि उनके कमांडिंग अधिकारी कार्रवाई में मारे गए है। हालांकि, चीनी विदेशी कार्यालय गतिरोध रोकने के नाम पर अपनी तरफ से हताहतों की संख्या को लेकर चुप है। उसी अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि गालवान में पीएलए की यह पूर्व निर्धारित कार्रवाई उनके लिए एक बड़ी शर्मिंदगी थी। यह भारतीय सैनिकों की डीब्रीफिंग के माध्यम से भी सही है, जो कार्रवाई में मौजूद थे, जैसा कि भारतीय सेना द्वारा रिपोर्ट किया गया था इसके अलावा, गालवान में चीनी जीत का कोई भी प्रचार उसके किसी भी मीडिया आउटलेट से नहीं निकला है, जो अब हर दिन अपनी सेना के सैन्य अभ्यास का जश्न मनाता है और पीएलए के प्रशिक्षण वीडियो का भी खुलकर प्रचार करता है। यह पूरी घटना तीन चीजों को स्पष्ट रूप से सिद्ध करती है, एक कि गालवान में उत्तेजक कार्रवाई की योजना बनाई गई थी और थिएटर कमांड स्तर पर इसे मंजूरी दी गई थी, अर्थात इसे पश्चिमी कमान के चीनी जनरल द्वारा अनुमोदित किया गया था, दूसरा यह कि चीनी सलामी स्लाइसिंग रणनीति अब प्रभावी है और इसका अनुकूल उत्तर हमेशा दिया जाएगा और तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस घटना ने चीनी सेना की तथाकथित ताकत का भंडाफोड़ किया है और विश्व मंच पर उनके लिए यह घटना एक बड़ी शर्मिंदगी का कारण बनी है। हालांकि, दोनों सेनाओं के बीच पैंगोंग त्सो और फिंगर एरिया, गोगरा-हॉटस्प्रेग्स और डेपसांग प्लेन में टकराव जारी है। पिछले 6 वर्षों में भारत ने बड़े पैमाने पर चीनी से सटे इलाकों में आधारभूत संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) के विकास के कारण चीनी घुसपैठ काफी बढ़ी गयी है। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 255-किलोमीटर DSDBO (दरबूक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी) सड़क के पूरा होने के बाद चीनी बौखला गए हैं, जो LAC के लगभग समानांतर चलता है। सड़क की ऊंचाई 13,000 फुट और 16,000 फुट के बीच है, जिसके निर्माण में भारत की सीमा सड़क संगठन (BRO) ने लगभग दो दशक बाद पुरा कर लिया है।
नक्शा 255 किमी लंबे डीएसडीबीओ
 (दरबूक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी) सड़क के नवनिर्मित और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण को दर्शाता है।

जैसा कि आप ऊपर के नक्शे में देख सकते हैं, इस सड़क का रणनीतिक महत्व यह है कि यह लेह को काराकोरम दर्रे के डीबीओ बेस से जोड़ती है, जो चीन के झिंजियांग स्वायत्त क्षेत्र को लद्दाख से अलग करती है। DBO दुनिया की सबसे ऊंची हवाई पट्टी है, जिसे मूल रूप से 1962 के युद्ध के दौरान बनाया गया था लेकिन 2008 तक छोड़ दिया गया, जब भारतीय वायु सेना (IAF) ने इसे LAC के साथ अपने कई उन्नत लैंडिंग ग्राउंड (ALG) में से एक के रूप में पुनर्जीवित किया। इसके अलावा, यह डीएसडीबीओ सड़क तिब्बत-झिंजिंग राजमार्ग के उस खंड तक भारत को सैन्य पहुंच प्रदान करती है, जो अक्साई चिन से होकर गुजरती है। यह सड़क लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश अक्साई चिन पर LAC के लगभग समानांतर चलती है, जिसे चीन ने 1950 के दशक में कब्जा कर लिया था, जिसके कारण 1962 का युद्ध हुआ था। DSDBO सड़क के उद्भव से चीन को घबरा गया है क्योंकि यह सड़क उस राजनीतिक बढ़त को स्तर देता है जिसका उसने वर्षों से आनंद लिया। गालवान घाटी में हुए उस दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण को इस संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए क्योंकि झड़प स्थल के पास, भारतीय सेना के इंजीनियर रेजिमेंट और बीआरओ द्वारा निर्मित एक 4 स्पैन ब्रिज है। यह श्योक-गाल्वन नदी के संगम से 3 किमी पूर्व में और पैट्रोलिंग पॉइंट 14 के पश्चिम से 2 किमी की दूरी पर स्थित है। यह एक करीबी जानकारी दे सकता है कि 15-16 जून की रात में जो झड़प हुई थी, वह पूरी तरह से सड़क पर वर्चस्व के लिए थी जिसमें हमारे 20 बहादुर जवानों ने हमारे देश की सेवा में सर्वोच्च बलिदान दिया इन सामरिक क्षेत्रों में चीन द्वारा बनाया गया तनाव 1962 के युद्ध के समाप्त होने के बाद से कभी भी संघर्ष में नहीं था, लेकिन नए क्षेत्रों में भड़कने वाला तनाव और कुछ नहीं है, लेकिन व्यापक विदेशी कठिनाइयों को दूर करने का अवसर देगा। छलावे की योजना है जो चीन को अपनी घरेलू और वर्तमान मुद्दे को संक्षेप में समझना अच्छा है, लेकिन फिर भी यह प्रश्न अनुत्तरित है कि चीन जब भी घर और विदेश दोनों ही जगह, मुसीबत में होता है तो वो हमेशा अन्य देशों के साथ सीमा या जल सीमा (नौवाहन सीमा) विवादों में क्यों साथ आता है। यह सवाल बहुत प्रासंगिक है और चीन भारतीय सीमा विवादों की अंतर्दृष्टि के माध्यम से इसका जवाब दिया जा सकता है।
(नक्शा पश्चिमी (अक्साई चिन) क्षेत्र में सीमा के भारतीय और चीनी दावों को दर्शाता है, मैकार्टनी-मैकडोनाल्ड लाइन, विदेशी कार्यालय लाइन, साथ ही साथ चीनी सेना की प्रगति के रूप में उन्होंने चीन-भारतीय युद्ध के दौरान क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया।)

चीन-भारत सीमा विवाद को बेहतर ढंग से समझने के लिए इस नक्शे पर एक नजर डालने की जरूरत है, जिसने विभिन्न वर्षों में तत्कालीन ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के बीच हुई विभिन्न सीमाओं का सीमांकन किया है। इसके अलावा, यह मानचित्र वास्तविक सीमा के रूप में जॉनसन लाइन के भारतीय दावे का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें अक्साई चिन शामिल है, जबकि इसके विपरीत चीन अक्साई चिन को अपना क्षेत्र बता कर उसपर दावा करता हैं। यह नक्शा 1962 के युद्ध के दौरान चीनी आक्रामकता की सीमा को दर्शाता है। इसके साथ यह वास्तविक नियंत्रण रेखा का सीमांकन भी करता है। यह झिंजियांग-तिब्बत रोड के मार्ग को भी दिखाता है जो 1962 में युद्ध के सबसे बड़े कारणों में से एक था।
इन रेखाओं और सीमाओं पर अलग-अलग समय में बातचीत या सीमांकन से स्पष्ट होता है कि लद्दाख का यह क्षेत्र हमेशा पीढ़ियों-दर-पीढ़ियों से तिब्बत (अब चीन द्वारा कब्जा किए गए) और भारत के बीच संघर्ष का कारण रहा है। प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में इस संदर्भ में बहुत कुछ नहीं है, लेकिन आधुनिक इतिहास के दस्तावेज़ों के आधार पर कोई भी यह स्पष्ट रूप से देख सकता है कि समस्या का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजों द्वारा भारत को विरासत के रूप में दिया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत के ब्रिटिश मानचित्रों पर जॉनसन-अर्दग और मैकार्टनी-मैकडोनाल्ड दोनों लाइनों का इस्तेमाल किया गया था। 1908 तक, अंग्रेजों ने मैकडोनाल्ड लाइन को सीमा के रूप में इस्तेमाल किया, लेकिन 1911 में, चीन में शिनहाई क्रांति का परिणाम स्वरूप केंद्रीय शक्ति का पतन हुआ और प्रथम विश्व युद्ध के अंत तक, ब्रिटिश ने आधिकारिक तौर पर जॉनसन लाइन का इस्तेमाल किया। इन विरोधाभासों के साथ-साथ उन्होंने चौकी स्थापित करने या जमीन पर वास्तविक नियंत्रण का दावा करने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया। अक्साई चिन मुद्दे पर कभी भी चीन ने तिब्बत की सरकारों के साथ अंग्रेजों ने चर्चा नहीं की थी और यह सीमा विवाद भारत की स्वतंत्रता के तत्पश्चात तक बना रहा। आज़ादी के बाद यह मामला और भी पेचीदा हो गए क्योंकि भारत में नेहरू सरकार ने 1958 तक चीनी के साथ इस सीमा मुद्दे पर चर्चा नहीं की, जब तक की शिनजियांग-तिब्बत रोड की खबरें सार्वजनिक हुईं, और भारतीय मीडिया की सुर्खियां बनी। अपरिपक्व फॉरवर्ड नीति और अप्रभावी सैन्य तैयारी के कारण नेहरू सरकार ने लगभग 38 हजार वर्ग किमी का इलाका खोया (यानी अक्साई चिन) साथ ही सीमा का सीमांकन नहीं हुआ और एक चीज़ जिसका आज भी हम दंश झेल रहे है वो यह है की एक घोषित कार्य या संघर्ष-विराम सीमा (जैसे LOC जो हमारी पाकिस्तान से लगती कार्य/संघर्ष सीमा है) भी आज लद्दाख में नहीं है। 1967 के नाथुला और चोला संघर्ष में जीत की संभावनाओं के बारे में खुद को खुश करके 1962 को छिपाने की कोशिश करने वाले हर राजनीतिक तबके को एक ही सवाल का जवाब देने की जरूरत है कि तब से दो शक्तिशाली पड़ोसी, एक कार्मिक सीमा या सीमांकित संघर्ष-विराम को निर्धारित करने में सक्षम नहीं थे। इस तथ्य को भी समझने और गहराई से सोचने की जरूरत है कि अब तक भारत सरकार ने सीमा पर व्यवस्थाओं जैसे हथियारों के इस्तेमाल, सैनिकों के आचरण, गश्त आदि पर एक काल्पनिक (notional) LAC पर चीनी के साथ बातचीत की है, जो भारत और चीन दोनों में अलग है, अर्थात भारतीय नक्शे एक अलग एलएसी का सीमांकन करते हैं जबकि  चीनी नक्शे में अलसी का अलग सीमांकन हैं। और यह सब हमें एक बहुत ही बेतुकी वास्तविकता में लाता है कि शांति और स्थिरता के हर उपाय पर चर्चा की जाती है और दो पक्षों इसे लागू भी कर देते है लेकिन बिना एक सीमांकित संघर्ष विराम या कार्मिक सीमा के।

यह पूरे मसले की जड़ है। शुरुआती वर्षों में भारतीय नेतृत्व की ओर से सीमा मुद्दे को मुखरता से हलन करने वो की कीमत है जो हम अभी चुका रहे हैं। इन सभी वर्षों के दौरान चीनी ने अपने स्वयं के लाभ के लिए इस अनसुलझे सीमा का शोषण किया है और अब वह उन्हें हल करने में कोई रुचि नहीं रखता हैं क्योंकि यह उनके संकट की स्थिति के दौरान एक सुरक्षित निकास द्वार के रूप में करता है। चीनी जो गलत सूचनाओं और धोखे के स्वामी हैं, वो चीन हमेशा शांति और दोस्ती के नाम पर भारत के साथ बेहतर आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाएगा। यह तथाकथित भ्रामक शांति सिर्फ व्यापार के लिए है। शांति और पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंध बस एक धोखा और कुछ भी नहीं, यह एक आवरण जो चीन इन महत्वपूर्ण मुद्दों को, न केवल भारत के साथ, बल्कि अन्य देशों के साथ भी, छिपाने के लिए उपयोग करता है। इस रणनीति का चीन ने उपयुक्त समय पर उपयोग करने का काम किया है। भारत का चीन के साथ 48 बिलियन अमरीकी डालर का व्यापार घाटा है, जो इस भ्रामक शांति और लाभकारी रिश्ते में एकतरफा आर्थिक लाभ की तस्वीर दिखा रहा है। भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र में कई राष्ट्रों का व्यापार और कर्ज के संदर्भ में चीन पर बहुत अधिक निर्भरता दिखाई देती है, इस बात का उपयोग रणनीतिक और सामरिक दोनों स्तरों पर करता आया है। वह अपनी शक्ति से दुनिया का "नेक्स्ट अमेरिका या अंकल सैम" बनने की इच्छा रखता है। किसी भी कम्युनिस्ट शासन की तरह, चीन वास्तविकता की तुलना में भ्रामक प्रचार पर अधिक निर्भर करता है। दशकों से चीन द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे धोखे और विभाजन की रणनीति अब सभी के सामने आ गई है।

21 वीं सदी के युग में जहां सूचना का युद्ध दुनिया के सामाजिक व्यवस्था में गहराता चला गया है, किसी भी देश को अब पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तरह रणनीतिक लाभ नहीं है। वुहान वायरस ने एक ही झटके में चीनी भ्रामक नीति को नाकाम कर दिया। आज 120 से अधिक राष्ट्र वायरस की उत्पत्ति की जांच करने के लिए कह रहे हैं, जिसके कारण डब्ल्यूएचओ की भूमिका पर भी जांच की बात है, जिसमें चीन की मदद करने और जानकारी छुपने का आरोप लगाया गया है। इस वायरस ने चीनी नेतृत्व का असल चेहरा उजागर किया है जो संकट की शुरुआत के बाद से विफल रहा है, जिसके कारण उसकी विश्वसनीयता और छवि को एक गंभीर चोट लगी है। यहां तक की नेता भी चीन में आपस में ही एक सत्ता के खेल में लगे दिखाई देते हैं हांगकांग और ताइवान मुद्दे अब विश्व के केंद्र मे आ गए हैं। अपना चेहरा बचाने के लिए चीन जो कुछ भी करना चाहता है वह विफल हो रहा है और इसी कारण उसकी राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त दरारों का उपयोग अमेरिका कर रहा है। विश्व व्यवस्था बदल गई है और चीनी प्रभुत्व कम हो गया है। भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र के देशों के साथ कई सीमा और नौवाहन सीमा विवादों के माध्यम से चीन की छलावे की योजना का भीभंडाफोड़ हुआ है। चाहे भारत हो या जापान या वियतनाम या कोई अन्य भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र का कोई देश, हर कोई चीनी आक्रामकता के खिलाफ खड़ा है। चीन के खिलाफ इन देशों के रवैये में इस बदलाव को अब पश्चिमी दुनिया का काफी समर्थन भी प्राप्त हुआ है। पश्चिमी मीडिया में इन मुद्दों पर सक्रिय रूप से बहस हो रही हैं, जो चीन-विरोधी भावना को और मजबूत करने का काम रही हैं। इसलिए भारत व अन्य देशों के साथ सीमा और नौवहन सीमा विवाद के माध्यम से अपनी समस्याओं से बचाने की इस योजना चीन पूरी तरह से विफल रहा है।




Wednesday, June 17, 2020

राष्ट्रवादियों को उकसाओगे तो जान से जाओगे।

सोमवार  देर रात पूर्वी लद्दाख की गलवान वैली में भारत और चीन की सेना के बीच हुए खूनी संघर्ष में भारत के 20 जवान शहीद हो गए। इनमें एक कर्नल संतोष बाबू शामिल है। चीन के करीब 43 सैनिकों के हताहत होने की खबर। 
भारत- चीन सीमा विवाद लंबे समय से चल आ रहा है पिछ्ल महीने 5-6 मई को चीन सेना एलएसी  पर भारतीय सीमा में घुसपैठ कि और तब से वह पेंगोंग लेक और गलवान घाटी जमे हुए है। उनको भारतीय सीमा से रेखा से हटाने के लिए अनेक स्तर पर चल रही थी पर "लातो के भूत  बातों से कहा मानते है" उल्टे गश्त पर गए भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया जिसका मुंहतोड़ जवाब इनको मिला। जवाबी कार्यवाही में भारत ने चीन के सैनिकों बड़ी संख्या में हताहत किया है। चीन ने कहा कि हमारी तरफ से 5 सैनिक मारे गए है बाद में अपने बयान से पलट गया और कहा कि हम संख्या के बारे में नहीं बताएंगे। उम्मीद है काफी गहरी चोट पहुंची है इनको ना तो बताते बन रही है और नाही छिपाए। ये भुल गए की ये 62 वाला भारत नहीं है घर में घुस कर मारना जानता है। सत्ता भी इस वक्त राष्ट्रवादियों के हाथ में है उकसाओगे तो जान से जाओगे। 
ये हिंसक झड़प क्षेत्र में ' यथास्थिति के एकतरफा तरीके से बदलने के चीनी पक्ष के प्रयास ' के कारण हुई।
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, हम अपने देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
आज पीएम मोदी ने लद्दाख में चीन से विवाद पर बयान जारी किया है. पीएम मोदी ने कहा है कि जिन जवानों की शहादत हुई है, वो व्यर्थ नहीं जाएगी. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हमें अपने जवानों पर गर्व करना चाहिए, वे मारते-मारते मरे हैं। 
भारत का साफ शब्दों में संदेश  है कि अगर किसी ने भी हमारी जमीन की तरफ आंख उठा के देखा तो उसकी आंखे फोड़ दी जाएंगी। खैर बैठकों का दौर जारी है गृह मंत्री विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री इस मुद्दों को लेकर काफी गंभीर है। तीनो सेनाओं के चीफ और सीडीएस से बातचीत हुई है सेना को खुली छूट मिल गई है और सबको अलर्ट कर दिया गया है जवानों की छुट्टियां रद्द कर दी गई है। मातृभूमि पुकार रही है शत्रुओं का नाश करो..

Wednesday, May 27, 2020

इनके अरमानों को पंचशील के समझौतों ने लील लिया।

संयुक्त राष्ट्र संघ दुनिया भर में मानवाधिकारो को लेकर बकैती करता  रहता है पर उसे "तिब्बत" में हो रहा क्रूर न्याय नहीं दिखाई दिया। 1949 से लेकर 1959 तक का यह 10 साल का कालखंड तिब्बत के इतिहास का विनाशकारी और निराशाजनक कालखंड है। एक शक्तिशाली पड़ोसी देश चीन तिब्बत को निगल रहा था और दुनिया चुपचाप उसे देख रही थी इस अमानवीय कृत्य पर विश्व मौन है। तिब्बत के मन्दिर तोड़ दिए गए,पुस्तकालय जला दिए गए और मठों में से साधुओं को बाहर निकाल दिया गया। भारत को उस वक्त तिब्बत का साथ देना चाहिए था आखिर में तिब्बत की संस्कृति ही भारत को उससे जोड़ती थी पर इधर अहिंसा की कसमें खाने वाले '"हिंदी चीनी" भाई - भाई करने में लगे हुए थे। एक दिन ऐसा आया कि इनके अरमानों को पंचशील के समझौतों ने लील लिया। हैरानी की बात तो ये भी है कि पंडित नेहरू के वक्त में ही चीन सरकार लद्दाख में सड़क बनाती रही। भारत सरकार को इसका पता था लेकिन वह उसे छिपाती रही और अंत में जब चीन ने खुद ही घोषणा कर दी कि उसने लद्दाख में सड़क बना ली है तो भारत सरकार के पास दिखावे के लिए भी कोई बहाना नहीं बचा था।