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Thursday, September 14, 2023

स्वातंत्र्यवीर विनायकदामोदर सावरकर

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर एक वीर स्वतंत्रता सेनानी, उत्साही समाज सुधारक, रचनात्मक लेखक, प्रबुद्ध वक्ता और समर्पित राष्ट्रवादी थे।

श्री सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र में नासिक के समीप भागुर गांव के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उन्होंने छह वर्ष की आयु में गांव के विद्यालय में प्रवेश लिया और उनका बचपन अपने पिता से रामायण और महाभारत की कहानियां और राष्ट्रवादी नेताओं के बारे में गाथागीत और बाखड़ सुनते हुए बीता। जन्म से ही प्रतिभावान सावरकर में कविता रचना की विलक्षण क्षमता थी और दस वर्ष की आयु में ही उनकी कविताएं सुप्रसिद्ध समाचारपत्रों में प्रकाशित हुई थीं।

बाल्यावस्था में भी विनायक लोगों की वेदनाओं के बारे में बहुत सचेत थे । वह अकाल और प्लेग जैसी महामारियों के कारण भावनात्मक रूप से द्रवित हो उठे। इसमें ब्रिटिश शासन के कटु व्यवहार और ज्यादतियों ने आग में घी का काम किया। ऐसे वातावरण में युवा सावरकर उद्वेलित हो उठे। उन्होंने अंग्रेजों को अपनी मातृभूमि से निकाल कर भारत को आजाद कराने के शहीदों के अधूरे लक्ष्य को पूरा करने के लिए अपने परिजनों और मित्रों तक की कुर्बानी देने का प्रण किया। वर्ष 1899 में मात्र 16 वर्ष की आयु में ही सावरकर ने 'मित्र मेला' नामक संगठन का गठन किया जिसका मूल उद्देश्य भारत की संपूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना था। बाद में इस संगठन का नाम बदलकर "अभिनव भारत" रख दिया गया।

सावरकर 1906 में लंदन के लिए रवाना हो गए और उन्होंने वहां अपना कार्य जारी रखा। उसी वर्ष उन्होंने 'फ्री इंडिया सोसाइटी' की शुरुआत की। उनके अनुसार मातृभूमि की स्वतंत्रता हेतु संघर्ष में स्वदेशी का पाठ और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार; राष्ट्रीय शिक्षा देना और क्रांतिकारी भावना उत्पन्न करना तथा सैन्य बलों में देशभक्ति की भावना जागृत करना अनिवार्य रूप से शामिल होना चाहिए। दिसम्बर 1908 में आयोजित सम्मेलन में स्वराज की मांग करने वाला एक संकल्प सर्वसम्मति से पारित हुआ । इसी सम्मेलन में तुर्किस्तान को गणराज्य बनने पर बधाई दी गई।

सावरकर संभवतः भारतीय नेताओं में पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए अंतर्राष्ट्रीय समर्थन के महत्व को महसूस किया । " अभिनव भारत" के भारतीय क्रांतिकारी रूस, आयरलैंड, मिस्र तथा चीन की क्रांतिकारी ताकतों से निरंतर सम्पर्क बनाए हुए थे। सावरकर ने न्यूयार्क के "गैलिक अमरीका में भारतीय मामलों से संबंधित लेख लिखे तथा इन्हें फ्रेंच, जर्मन, इतालवी, पुर्तगाली और रूसी भाषाओं में अनुवाद करवाकर प्रकाशित करवाया।

सावरकर ने अपने राजनैतिक कार्य के साथ-साथ अपने शैक्षिक जीवन को भी आगे बढ़ाया। यद्यपि सावरकर 'ग्रे इन' की अंतिम परीक्षा में उत्तीर्ण हुए लेकिन 'इन' की बेंचों ने सावरकर को बार में बुलाने से इंकार कर दिया। वे चाहते थे कि सावरकर लिखित में वचन दें कि वह कभी भी राजनीति में भाग नहीं लेंगे। सावरकर ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। सावरकर की गतिविधियों के चलते अंततः मार्च 1910 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जब उन्हें भारत को प्रत्यर्पित किया जा रहा था, तो उनके जहाज के इंजन में गड़बड़ी आ गई और उसे फ्रांस के मार्सेल में लंगर डालना पड़ा। इस अवसर का लाभ उठाते हुए सावरकर ने भागने का दो बार प्रयास किया लेकिन वह असफल रहे। अंतत: वह अपने शरीर को सिकोड़कर जहाज के झरोखे से बड़े अनूठे ढंग से बाहर निकलकर बच निकले। फ्रांसीसी कानून का संरक्षण प्राप्त करने की दृष्टि से वह मार्सेल तट पर पहुंचे। तथापि, काफी कोशिशों के बाद अंग्रेजी पहरेदारों ने उन्हें पकड़ लिया और वापस जहाज पर पहुंचा दिया। 27 वर्ष की छोटी सी आयु में उन्हें दो बार काले पानी की सजा सुनायी गयी और अंडमान में कारागार में रखा गया। कारागार का जीवन (1911-1924) बेहद कठिनाइयों से भरा हुआ था। उन्हें कोल्हू में बैल की तरह जोता जाता था और यहां तक कि उन्हें निर्धारित मात्रा से अधिक पानी भी नहीं दिया जाता था। उनके साथ किए गए कठोर बर्ताव के कारण उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरता गया और उनका शरीर सूखकर कांटा हो गया।

1924 में जेल से छूटने के बाद सावरकर समाज सुधार का कार्य पूरी गंभीरता से करने लगे। उन्होंने जातिवाद और अस्पृश्यता के विरुद्ध युद्ध छेड़ा और अंतरजातीय विवाह, समुद्र यात्रा और पुन: धर्म परिवर्तन से जुड़ी वर्जना के खिलाफ जम कर लिखा। वह अस्पृश्य बच्चों के लिए न्यायसंगत, नागरिक, मानवीय और वैध अधिकारों को सुनिश्चित कर पाए और उन्होंने पब्लिक स्कूलों में अस्पृश्य बच्चों को उच्च जाति के हिन्दू बच्चों के साथ बिठाया। सावरकर ने सच्चे दिल से 'अस्पृश्यों' की मुक्ति के लिए डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के संघर्ष का समर्थन किया।

वर्ष 1937 में सावरकर अहमदाबाद अधिवेशन में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। तत्पश्चात् पांच अनुवर्ती वर्षों के लिए उन्होंने महासभा अधिवेशन की अध्यक्षता की। जब स्वतंत्रता मिलने वाली थी, तब सावरकर ने विभाजन का कड़ा विरोध किया। सावरकर की भारत की संकल्पना ऐसी थी जहां सभी नागरिकों के जाति, वंश, प्रजाति या धर्म का भेदभाव किए बिना समान अधिकार और कर्तव्य हों बशर्ते वे देश के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना रखें। अल्पसंख्यकों की भाषा, धर्म, संस्कृति इत्यादि को सुरक्षित रखने के लिए प्रभावी रक्षोपाय किए जाएं। सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति, अंतरात्मा, पूजा-अर्चना, संगठन की स्वतंत्रता इत्यादि मूलभूत अधिकार समान रूप से दिए जाएं। कोई प्रतिबंध लागू करते समय, सार्वजनिक शांति और व्यवस्था के हित या राष्ट्रीय आपातस्थिति, इसके लिए मार्गदर्शी सिद्धांत रहें। संयुक्त मतदाता वर्ग और 'एक व्यक्ति एक मत' सामान्य नियम हों। नौकरियां केवल योग्यता के आधार पर ही मिलें। प्राथमिक शिक्षा निःशुल्क एवं अनिवार्य हो। 'नागरी' राष्ट्रीय लिपि हो, हिंदी जनभाषा और संस्कृत देवभाषा हो ।

सावरकर ने अर्थव्यवस्था के महत्व को समझा और आर्थिक नीति के लिए कुछ मुख्य सिद्धांतों के सुझाव दिए जिनमें अन्य बातों के साथ-साथ कृषक वर्ग, श्रमिक वर्ग और गांवों को पुनः सक्रिय बनाने हेतु प्रयास करना, कुछ प्रमुख उद्योगों अथवा विनिर्माण इकाइयों का राष्ट्रीयकरण करना और विदेशी प्रतिस्पर्धा से राष्ट्रीय उद्योगों की रक्षा करने के लिए राज्य द्वारा उठाये जाने वाले कदम भी शामिल थे।

सावरकर की साहित्यिक कृतियां जोश, उत्कृष्टता और आदर्शवाद से परिपूर्ण थीं। जोसेप मैजिनी के दर्शन से अत्यधिक प्रभावित होकर सावरकर ने उनकी आत्मकथा का मराठी में अनुवाद किया जो चालीस वर्ष तक प्रतिबंधित रही। अंडमान जेल में लेखन सामग्री के अभाव में उन्होंने जेल की अपनी कोठरी की दीवारों पर अपनी कविताएं लिखीं। उनके कविता संग्रह को ठीक ही 'जंगली फूल' (वाइल्ड फ्लावर) का शीर्षक दिया गया है। यद्यपि ये रचनाएं अपने आप में पूर्ण हैं, तथापि 'कमला', 'गोमांतक', 'सप्तऋषि', 'विरहोच्छ्वास' और 'महासागर' अपूर्ण महाकाव्य के भाग हैं। उनकी अन्य कविताएं 'चेन', 'सेल', 'चैरियेट फेस्टिवल ऑफ लार्ड जगन्नाथ', 'ओह स्लीप' तथा 'ऑन डेथबेड' दार्शनिकता पर आधारित हैं।

सावरकर की प्रसिद्ध कृतियां 'हिन्दुत्व' तथा 'हिन्दू - पद - पादशाही' मराठा उपनाम से रत्नागिरी जेल में लिखी गई थीं। इस पुस्तक में हिंदू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों की विस्तृत व्याख्या की गयी थी। 1907 1908 के दौरान लंदन में उन्होंने 'फर्स्ट इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस, 1857 नामक पुस्तक की रचना की थी जो कई क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही। 'सिक्स ग्लोरियस इपॉक ऑफ इंडियन हिस्ट्री' में लगभग एक हजार संदर्भ हैं। उन्होंने 'माई ट्रांसपोर्टेशन फॉर लाइफ', 'हिन्दू राष्ट्र दर्शन' और 'एन इको फ्रॉम अंडमान' की भी रचना की। मराठी कविताओं में 'वैनायक' नामक मुक्त छंद की शुरुआत सावरकर के महत्वपूर्ण योगदानों में से एक थी। उन्होंने मराठी भाषा की शुद्धता के लिए भी आंदोलन चलाया।

जीवन के अंतिम काल में सावरकर का स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगा और वह बिस्तर पर ही रहे। 3 फरवरी 1966 को उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया। चिकित्सकों को आश्चर्य था कि बिना दवा के तथा प्रतिदिन मात्र 5-6 चम्मच पानी पीकर भी वे 22 दिनों तक जीवित रहे। अंतत: 26 फरवरी 1966 को 83 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

वीर सावरकर के निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन ने कहा था कि " सावरकर हमारे देश की स्वतंत्रता के एक कर्मठ और जुझारू कार्यकर्ता थे, युवाओं के लिए उनका जीवन एक मिसाल है" ।

तत्कालीन उप-राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा था कि "वह एक महान क्रांतिकारी थे, जिन्होंने हमारी मातृभूमि की मुक्ति के लिए अनेक युवाओं को कार्य करने हेतु प्रेरित किया" ।

सावरकर को भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा कि सावरकर समकालीन भारत के महान नेता थे जिनका नाम साहस और देशभक्ति का प्रेरणास्रोत है। वह महान क्रांतिकारी के सांचे में ढले ऐसे व्यक्तित्व थे जिनसे अनगिनत लोगों ने प्रेरणा ली।

(लेख का स्रोत : लोक सभा सचिवालय नई दिल्ली  द्वारा 2019 में प्रकाशित )

Thursday, July 28, 2022

तन मन से अखण्ड भारत

मेरी कलम है घायल 
जैसे वैश्या के पैरों में पायल
घुटन महसूस होती है
तड़प तड़प कर कट रहा जीवन
शांति की बात और शीतल पवन
बहुते शर्म आती है
भारत माता टुकड़े टुकड़ों में बट जाती है
अरे वाह देखो कैसे आजादी की मिठाई बाटी जाती है..
हर्षों उल्लास मनाया जाता है मां के टुकड़े करकर 
क्या ये वही भारत है जिसके कण कण में शंकर ...
क्या मिला आजाद को गोली खाकर ?
 भगत सिंह के सपनो का भारत 
बन गया फांसी चढ़कर ?

लाल किले से आई आवाज
 सहगल ढिल्लो शाहनवाज, 
तीनों की उम्र हो दराज ।
 'लाल किले को तोड़ दो, 
आजाद हिन्द फौज को छोड़ दो।'

नेताजी कहा गए ? 
उनको देता रहता हू आवाज 
गुमनामी में जीवन बिता 
क्यों कहते हो की उनको खा
गया हवाई जहाज...
आजाद हिंद फौज ने दिया बलिदान 
फिर भी हो गया "चरखा" महान
वाह! रे.. हिंदुस्तान...

इनके बलिदानों की तुलना चरखो से की जाती है
हो भी क्यों ना जब जवानी कापुरुषता के क्रोड़ में सो जाती है...

काला पानी का काल कूट पीकर 
वीर सावरकर का चेहरा और निखर जाता है
दुख तब होता है जब गलफत के नींद में पड़ा बेखबर 
कोई युवा "कायर" कह जाता है...
भारत माता के टुकड़े कर
 अपनी अपनी सरकार बनाई जाती है
एक जिहाद फैलाता है
एक शांति का श्वेत कबूतर उड़ाता है

खंडित भारत की तस्वीर 
मेरे मन को नहीं भाता है
 तन में आग लग जाता है
फिर अटल जी के शब्दो को 
मुख बार बार दोहराता है_

"दूर नहीं खण्डित भारत को, पुन: अखण्ड बनायेंगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक, आजादी पर्व मनायेंगे।

उस स्वर्ण दिवस के लिए, आज से कमर कसें, बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएं, जो खोया उसका ध्यान करें॥"

~शिवम कुमार पाण्डेय

Monday, May 10, 2021

10 मई का शुभ का दिन

आजादी की पहली जंग
[अप्रैल, 1928 में 'किरती' के 1857 के गदर सम्बन्धी अंक में '10 मई का शुभ दिन' नाम से लेख छपा। इसके लेखक का नाम तो नहीं दिया गया, लेकिन यह शहीद भगत सिंह के साथियों का ही लेख है। सम्भवतः भगवतीचरण वोहरा का। वे बहुत 'अच्छे लेखक थे और 'किरती' से गहरे रूप में जुड़े हुए थे। मार्च, 1925 से लेकर जुलाई, 1928 तक भगत सिंह ने 'किरती' के सम्पादकीय विभाग में बहुत ही लगन से काम किया था। यह लेख उसी समय छपा था।.]

"ओ दर्दवाले दिल, दर्द हो चाहे हजार
दस मई का दिन भुलाना नहीं,
इसी रोज छिड़ी 'आजादी की जंग'
वक्त खुशी का गमी लाना नही।"

10 मई वह शुभ दिन है जिस दिन कि 'आजादी की जंग' शुरू हुई थी। भारतवासियों का गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए यह प्रथम प्रयास था। यह प्रयास भारत के दुर्भाग्य से सफल नहीं हुआ, इसीलिए हमारे दुश्मन इस 'आज़ादी की जंग' को 'गदर' और बगावत के नाम से याद करते हैं और इस 'आज़ादी की जंग में लड़नेवाले नायकों को कई तरह की गालियाँ देते हैं। विश्व के इतिहास में ऐसी कई घटनाएँ मिलती हैं, जहाँ आज़ादी की जंग को कोई बुरे शब्दों में याद किया जाता है। कारण यही है कि वह जंग जीती न जा सकी। यदि विजय हासिल होती तो उन जंगों के नायकों को बुरा-भला न कहा जाता, बल्कि वे विश्व के महापुरुषों में माने जाते और संसार उनकी पूजा करता।
आज दुनिया गैरीबाल्डी और वाशिंगटन की क्यों बड़ाई व इज्जत करती है, इसलिए कि उन्होंने आज़ादी की जंग लड़ी और उसमें सफल हुए। यदि वे सफल न होते तो वे भी ''बागी' और 'गदरी' आदि भद्दे शब्दों में याद किए जाते। लेकिन वे सफल हुए, इसलिए वे महापुरुषों में माने जाने लगे। इसी तरह यदि 1857 की आज़ादी की जंग में तात्या टोपे, नाना साहिब, झाँसी की महारानी, कुमार सिंह (कुँवर सिंह) और मौलवी अहमद साहिब आदि वीर जीत हासिल कर लेते तो आज वे हिन्दुस्तान की आज़ादी के देवता माने जाते और सारे हिन्दुस्तान में उनके सम्मान में राष्ट्रीय त्यौहार मनाया जाता।

हिन्दुस्तान के मौजूदा इतिहासों को, जो कि हमारे हाथों में दिए जाते हैं, पढ़कर हिन्दुस्तानियों के दिलों में उन शुर-वीरों के लिए कोई अच्छी भावनाएँ पैदा नहीं होतीं, क्योंकि उन 'आजादी की जंग' के नायकों को कातिल, डाकू, खूनी, धार्मिक जनूनी व अन्य कई बुरे-बुरे शब्दों में याद किया गया है और उनके विरोधियों को राष्ट्रीय नायक बनाया गया है। कारण यह है कि 1857 की "आजादी की जंग" के जितने इतिहास लिखे गए हैं, वे सारे के सारे ही या तो अंग्रेजो ने लिखे हैं जो कि जबरदस्ती तलवार के जोर पर, लोगों की मर्जी के खिलाफ हिंदुस्तान पर कब्जा जमाए बैठे है और या अंग्रेजो के चाटुकारों ने। जहां तक हमे पता है, इस आजादी की जंग का एकमात्र स्वतंत्र इतिहास लिखा गया, जो कि बैरिस्टर सावरकर ने लिखा था और जिसका नाम "1857 की आजादी की जंग"(The history of the Indian war of Independece 1857) था। यह इतिहास बड़े परिश्रम से लिखा गया था और इंडिया ऑफिस  की लायब्रेरी से छान-बिनकर, कई उद्धरण दे देकर सिद्ध किया गया था कि यह राष्ट्रीय संग्राम था और अंग्रेजो के राज से आजाद होने के लिए लड़ा गया था । लेकिन अत्याचारी सरकार ने इसे छपने ही नही दिया और अग्रिम रूप से जब्त कर लिया। इस तरह लोग सच्चे हालात पढ़ने से वंचित रह गए।

इस जंग की असफलता के बाद जो जुल्म और अत्याचार निर्दोष हिंदुस्तानियों पर किया गया, उसे लिखने की ना तो हमारे में हिम्मत है और न ही किसी और में। यह सब कुछ हिंदुस्तान के आजाद होने पर ही लिखा जाएगा। हां, यदि किसी को इस जुल्म, अत्याचार, और अन्याय का थोड़ा सा नमूना देखना हो तो उन्हें मिस्टर एडवर्ड थॉमसन की पुस्तक, "तस्वीर का दूसरा पहलू" ( The other side of the medal) पढ़नी चाहिए, जिसमें सभ्य अरे जो की करतूतों को उधाड़ा है और जिसमें बताया गया है कि किस तरह नील हैवलॉक, हॉट्स,हडसन कूपर और लॉरेंस ने निर्दोष हिंदुस्तानी स्त्री-बच्चों तक पर ऐसे- ऐसे कह रहे थे कि सुनकर रोए खड़े हो जाते हैं और शरीर कांपने लगता है।

इस बात का ख्याल कर के स्वतंत्र व्यक्तियों को शर्म आएगी की यह लोग भी, जिनके बुजुर्ग इस जंग में लड़े थे, जिन्होंने हिंदुस्तान की आजादी की भाजी पर सब कुछ लगा दिया था और जिन्हें इस पर गर्व होना चाहिए था, वे भी, जंग को आजादी की जंग कहने से डरते हैं। कारण्य की अंग्रेजी अत्याचार ने उन्हें इस कद्र दबा दिया था कि यह सर छुपा कर ही दिन काटते थे। इसलिए उन बुजुर्गों की यादगार मनानी जा स्थापित करनी तो दूर, उनका नाम लेना भी गुनाह समझा जाता था।

लेकिन हालात कुछ ऐसे बन गए कि विदेशों में बसे हिंदुस्तानी नौजवान 10 मई के दिन को राष्ट्रीय त्योहार बनाकर मनाने लगे। और कुछ हिनी (हिंदुस्तानी) नौजवान यहां भारत में भी त्योहार मनाने की कुछ कोशिशें करते रहे हैं। सबसे पहले, जहां तक पता चलता है, त्यौहार इंग्लैंड में "अभिनव भारत" बैरिस्टर सावरकर के नेतृत्व में सन 1907 में मनाया। इस त्यौहार को मनाने का खयाल कैसे आया, कथा इस तरह है (गुलामों में खुद तो ऐसे यादगारी दिन मनाने के ख्याल कम ही पैदा होते हैं)-

"1907 में जब अंग्रेजों ने विचार किया कि 18 57 के गदरियो पर जीत हासिल करने की पचासवीं वर्षगांठ बनानी चाहिए। सो 57 की याद ताजा करने के लिए हिंदुस्तान और इंग्लैंड के प्रसिद्ध अंग्रेजों के अखबारों ने अपने-अपने विशेषांक निकाले, किए गए और लेक्चर दिए और हर तरह के इन कथित ग दरियों को बुरी तरह कोसा गया। यहां तक की जो कुछ भी इनके मन में आया, सब ऊल- जलूल इन्होंने गदरियों के खिलाफ कहा कई कुफ्र किए। इन गालियों और बदनाम करने वाली कार्रवाई के विपरीत सावरकर ने 1857 स्तानी नेताओं-नाना साहिब, महारानी झांसी, तात्या तोपे, कुंवर सिंह, मौलवी अहमद साहिब की याद मनाने के लिए काम शुरू कर दिया, ताकि राष्ट्रीय जंग के सच्चे-सच्चे हालात बताएं जाएं। यह बड़ी बहादुरी का काम था और शुरू भी अंग्रेजी राजधानी में किया गया। आम अंग्रेज नाना साहिब और तान के अक्टूबर को शैतान के वर्ग में समझते थे, इसलिए लगभग सभी हिंदुस्तानी नेताओं ने इस आजादी की जंग को आने वाले दिन में कोई हिस्सा ना लिया। लेकिन मि. सावरकर के साथ सभी नौजवान थे। हिंदुस्तानी घर में एक बड़ी भारी यादगारी मीटिंग बुलाई गई। खवास किए गए और कश्मीर ली गई कि उन बुजुर्गों की याद में एक हफ्ते तक कोई अय्याशी की चीज इस्तेमाल नहीं की जाएगी। छोटे-छोटे पैंफलट 'ओ शहीदों' (Oh! Martyrs) से इंग्लैंड और हिंदुस्तान में बांटे गए। छात्रों ने ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज और उच्च कोटि के कॉलेजों में छातियों पर बड़े-बड़े, सुंदर- सुंदर बैज लगाए जिन पर लिखा था, "1857 के शहीदों की इज्जत के लिए!" गलियों -बाजारों में कई जगह झगड़े हो गए। कॉलेज में एक प्रोफेसर आपे से बाहर हो गया और हिंदुस्तानी विद्यार्थियों ने मांग की कि वह माफी मांगे, क्योंकि उसने उन विद्यार्थियों के राष्ट्रीय नेताओं का अपमान किया है और विरोध में सारे के सारे विद्यार्थी कॉलेज से निकल आए। कई की छात्रवृत्तिया मारी गई, कईयों ने उन्हें खुद ही छोड़ दिया। कईयों को उनके मां-बाप ने बुलवा लिया। इंग्लिश तान में राजनीतिक वायुमंडल बड़ा गर्म हो गया और हिंदुस्तानी सरकार बड़ी हैरान हो गई चैन हो गई।"
    (बैरिस्टर सावरकर का जीवन पृष्ठ 45-46, चित्रगुप्त रचित)
इन हालात की खबर जहाँ भी पहुँची, विदेशों में वहाँ-वहाँ दस मई का दिन बड़ी सज-धज से मनाया गया और लोगों में बड़ा जोश आ गया कि अंग्रेज किस प्रकार हमारे राष्ट्रीय वीरों को बदनाम करते हैं। उन्होंने रोष के रूप में मीटिंगें कीं और उनकी याद में 10 मई का दिन हर वर्ष मनाना शुरू कर दिया। काफी समय बाद अभिनव भारत सोसायटी टूट गई और इंग्लैंड में यह दिन मनाना बन्द हो गया, लेकिन कुछ समय बाद अमेरिका में हिन्दुस्तान गदर पार्टी स्थापित हो गई और उसने उसे हर बरस मनाना शुरू कर दिया गदर पार्टी के स्थापित होने के दिन से लेकर अब तक अमेरिका में यह दिन सज-धज से मनाया जाता है। बड़ी भारी मीटिंग होती है, जिसमें सब हिन्दुस्तानी एकत्र होते हैं। उसमें इन 1857 के शूर-वीरों के जीवन और कारनामे बताए जाते हैं। इस तरह इन शहीदों की याद साल-दर-साल ताजा की जाती है और ऐसी कविताएँ-

'ओ दर्द-मन्द दिल, दर्द दे चाहे हजार 
दस मई का दिन भुलाना नहीं।
इस रोज छिड़ी जंग आज़ादी की
बात खुशी की गमी लाना नहीं।'

आदि पढ़ी जाती हैं। विशेषतः 1914-15 में यह पंक्तियां प्रत्येक पुरुष की जीभ पर चढ़ी हुई थी, क्योंकि उस समय भी एक और आजादी की जंग लड़कर हिंदुस्तान को आजाद करवाना चाहते थे। लेकिन यह प्रयास भी असफल हुआ, जिसमें हजारों नौजवानों ने भारत माता फौजी स्वार्थी है लेकिन हमारी गुलामी को न काटा जा सका।
10 मई का दिन क्यों मनाया जाता है? इसका कारण क्या है कि 10 मई के दिन ही अपनी जंग शुरू हुई थी। 10 मई को मेरठ छावनी के 85 वीरों ने चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया था। उनका कोर्ट मार्शल किया गया और प्रत्येक जवान को 10 साल सख्त कैद की सजा दी गई। बाद में 11 सिपाहियों की कैद पर कर 5 साल कर दी गई थी। लेकिन यह सारी कार्रवाई थी इस तरीके से की गई थी कि जिसमें हिंदुस्तानी सिपाहियों के गर्व और मान को भारी चोट पहुंचती थी, वह दृश्य बड़ा दर्दनाक था। देखने वालों की आंखों से टप टप आंसू गिरते थे। सारे के सारे भूत बने हुए थे। वे 85 जो उनके भाई थे, सभी दुखों-सुखों में शरीक थे, उनके पैरों मैं बेड़ियां डाली हुई थी उनका अपमान सहज करना मुश्किल था, लेकिन कुछ बन नहीं सकता था।
अगले दिन "घुड़सवार और पैदल सेना ने जाकर जेल तोड़ दी, अपने साथियों को छुड़ा लिया, करो के घरों को फूंक डाला। वी जिस यूरोपीय को पकड़ सके, उसे मार डाला और दिल्ली की ओर चढ़ाई कर दी। ग़दर का आरंभ हुई इसी दिन हुआ और 10 मई से ही खेला जाता है।"

गदर आंदोलन को जानने के लिए यहां क्लिक करे-

सो पाठकों ने ऊपर लिखी घटनाओं से देख लिया है कि दस मई का दिन क्यों और कब से मनाना शुरू किया गया। पाठक यह सब हाल पढ़कर देख सकते हैं कि उनका क्या फर्ज है। क्या उन्होंने उस आज़ादी के लिए, जिसलिए कि हजारों-लाखों हिन्दुस्तानियों ने लगा दिए थे और हजारों लगाने के लिए तैयार बैठे थे, आज तक कुछ किया है या नहीं? यदि आज तक उन्होंने कुछ नहीं किया तो वे कौन-सा मुहूर्त देख रहे हैं? आज़ादी की जंग में शामिल होने के लिए तो साल के 365 दिनों में से 365 ही पवित्र हैं। हर पल भारत माता तुम्हारा इन्तजार कर रही है कि तुम उसकी जंजीरें तोड़ने के लिए अपना फर्ज़ पूरा हो या नहीं। क्या इनसान बनकर आज़ादी हासिल करोगे? इसी सवाल के जवाब से भारत का भविष्य निर्भर करता है।

(इस लेख को "भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज" नामक पुस्तक में छपा है । जिसे ब्लॉग पर  पाठको के लिए प्रकाशित के प्रकाशित किया गया है।)