Showing posts with label वुहान वायरस. Show all posts
Showing posts with label वुहान वायरस. Show all posts

Wednesday, June 9, 2021

वैक्सीन पर राजनीति

क्यों रे गोलू ! बड़ा भोलू बन रहा है। वैक्सीन लगवाया की नही? गोलू- लगवा लिया भइया अभी दूसरा डोज लेना बाकी है। वाह तू तो बड़ा चालू निकला गोलू बिल्कुल ठीक किया यही एकमात्र विकल्प है कोरोना से लड़कर जितने के लिए। कुछ लोग तो कह रहे थे की हम नही लगवाएंगे भाजपा की वैक्सीन है! अब वैक्सीन भी राजनीतिक दल वाले बनाने लग गए क्या? हद होती हैं किसी चीज की अफवाह फैलाए की इसको लगाते ही इंसान नपुंसक होय जावेगा। 
देश के वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को भी इन तथाकथित लोगो ने नही छोड़ा। जब पूरी दुनिया इस महामारी से जूझ रही है तब यही भारत देश के वैज्ञानिकों और चिकित्सको ने मोर्चा संभाला है कोई राजनीतिक दल का कार्यकर्ता इलाज नही कर रहा है। दो चार बैनर और पोस्टर लगाकर समाजवाद का नारा देने वाले लोगो के रगो में जातिवाद का जहर दौड़ता हैं। तभी तो वैक्सीन को लेकर तपाक से बोले पड़े "बीजेपी वैक्सीन लगाएगी  उसका भरोसा करू मैं ? अपनी सरकार आएगी सबको मुफ्त में वैक्सीन लगेगी। हम बीजेपी का वैक्सीन नही लगवा रहे है।" भला बताओ जरा ये उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके है  बाते मूर्खो वाली करते है।

खैर बाप ही के पास बेटे का इलाज है। पूर्व रक्षा मुलायम सिंह यादव ने टीका लगवा लिया हैं और अपने पुत्र को ये संदेश दिया है कि टीका लगवा लो जिंदा रहे तो बहुत राजनीति होगी। बाप के टीका लगवाने और प्रधानमंत्री के भाषण के बाद फिर इसपर साहब का बयान आया की- "जनाक्रोश को देखते हुए आख़िरकार सरकार ने कोरोना के टीके के राजनीतिकरण की जगह ये घोषणा करी कि वो टीके लगवाएगी। हम भाजपा के टीके के ख़िलाफ़ थे पर 'भारत सरकार' के टीके का स्वागत करते हुए हम भी टीका लगवाएंगे व टीके की कमी से जो लोग लगवा नहीं सके थे उनसे भी लगवाने की अपील करते हैं ।"
शायद इसी को थूककर चाटने वाली राजनीति कहते है। समाजवाद के नाम पर जातिवादी मानसिकता को बढ़ावा देने वाले समाजवादियों का झंडा फट कर चरर  हो चु जीका है। इनका काम नही कारनामा बोलता है। इनके युवा समर्थक कहते है "कहा हो अखिलेश यूपी बुलाती है" और तो और नारा लगाया जाता है "22 में बायसाइकिल" का जो महज एक ख्याली पुलाव है।

 इतना ही नही सपा के सांसद एसटी हसन का बेतुका बयान देते है की बीते 7 वर्षों में शरीयत में छेड़छाड़ हुई, तभी आई आसमानी आफत..! एसटी हसन ने कहा कि "इन सात सालों में जनता का जो हश्र हुआ है, वो किसी से छिपा नहीं है।पिछले सात सालों में भाजपा सरकार ने कई कानून बनाये हैं. जिनमें शरीयत के साथ छेड़छाड़ की गई। नागरिकता कानून बना दिया गया, जिसमें सिर्फ मुसलमान को नागरिकता नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि इस सरकार के ऐसे कामों से जो नाइंसाफियां हुई हैं, इसके चलते ही देश में 10 दिन के अंदर दो बार बड़े तूफान आए। आसमानी आफत आई और कोरोना के चलते हजारों लोगों की मौत हो गई।" ये सब  बकवास सुनकर तो यही लगता है की समाजवादी पार्टी का नाम बदलकर नमाजवादी पार्टी कर देना चाहिए हद से हद क्या होगा सपा से नपा कहलाएंगे बाकी नप तो ये वैसे भी गए है।  

Tuesday, May 18, 2021

तथाकथित एजेंडो का पिटारा "टूलकिट"

आज बहुत बढ़िया बारिश हुई मानो बहुत दिनों बाद सुकून मिला हो। तीन चार दिन से उमस भरी गर्मी ने हाल बेहाल कर दिया था। इस लॉकडाउन में घर से बाहर निकलना खतरे से खाली नही। सबकुछ रुक सा गया है। पढ़ाई लिखाई तो एक तरह से बर्बाद ही हो चुकी है। इस वुहान वायरस ने झकझोर कर रख दिया है। कुछ तथाकथित न्यूज मीडिया वाले भी कम नही है इसको "इंडियन वेरिएंट" नाम से प्रचारित कर रहे है। बताइए भला जिसकी उत्पत्ति चीन में हुई हो उसे इंडियन वेरिएंट कहना कहा तक ठीक है? बात यही तक नही रह जाती कोई इस कोरोना वायरस को वुहान वायरस कह देता है तो उल्टा उसपर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं।
लाशों की तलाश में निकले पत्रकार आजकल चमक रहे है। सोशल मीडिया के माध्यम से उलूल-जुलूल तथ्यों को लोगो के सामने परोस रहे है। दूसरी लहर ने इनके सूखे जीवन में बरखा कर दी और फिर से जीवन हरा-भरा हो गया है। कुछ मिल भी नही रहा था एजेंडा चलाने के लिए कुछ नही तो यही सही। अब श्मशान घाट के मुर्दे तो बोलेंगे नही कोई तो चाहिए न जो इनकी आवाज बने। पिछले साल करोड़ों भारत में लोग मर रहे थे इनके अनुसार इस बार कुछ नही तो बीस-पच्चीस लाख तो ये मार ही दिए होंगे अपने जादुई आंकड़े का हवाला देकर। देखिए क्या क्या करते है ये लोग इनको ऐसे ही थोड़ी न विदेशियों द्वारा "कोरोना पत्रकार" के टाइटल से नवाजा जा रहा है। 

अफवाह फैलाया जा रहा है की सरकार वुहान वायरस से मरने वालों के आंकड़ों को छिपा रही है। अगर सरकार को छिपाना होता चार हजार से ज्यादा लोगो की मृत्यु हो रही इसे ही न छिपा देती। लाशों को समुद्र या सागर में फेंक दिया जाता जल जीवो का आहार बनने के लिए किसी को खबर ही नहीं लगती। लाशों का तमाशा करके रोजी रोटी चलाया जा रहा है इसके विरोध में बोल दो तो "डर का माहौल है" अब कोई आजाद देश में  पत्रकारिता भी नही कर सकता क्या? पत्रकारों की आजादी छीनी जा रही है!  नकारात्मक खबर दिखाकर वाहा-वाही लूटी जा रही है दुनिया भर से कि "अरे देखो कितना बेहतरीन पत्रकार है सत्य को दिखा रहा है!" 
अफवाह क्या सरासर झूठ बोला जा रहा है इन तथाकथित पत्रकारों द्वारा। गांव समाज से  जुड़ा हुआ  व्यक्ति देखेगा इसको टेलीविजन या सोशल मीडिया पर वो यहीं मानेगा न की इतने बड़े पत्रकार है झूठ थोड़ी बोलेंगे। कुछ नही सब वामपंथी, तथाकथित लिबरलो का एजेंडा है।

कांग्रेसियों का तो टूलकिट वायरल हो रहा है सोशल मीडिया पर जैसे किसान आंदोलन में विदेशी लड़की ग्रेटा थर्नबर्ग का हुआ था। टूलकिट एक माध्यम बन गया है भारत विरोधी एजेंडा चलाने का। भाजपा नेताओं का कहना है कि ये वो दस्तावेज है, जिसके माध्यम से कॉन्ग्रेस ने अपने नेताओं को कोरोना काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कुम्भ मेला को बदनाम करने के तरीके समझाए हैं। ये टूलकिट दिखाता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी किस तरह एक महामारी के वक़्त भी राजनीति का घिनौना खेल खेलने से बाज़ नहीं आती है।इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने और देश की संस्कृति को निशाना बनाने के निर्देश दिए गए हैं। ईद की भीड़ पर चुप रहने के विशेष निर्देश भी दिए गए हैं। कॉन्ग्रेस के ‘माननियों’ द्वारा इसमें अपने आईटी सेल को ईद और कुम्भ की तुलना करने से बचने की भी सलाह दी गई है।
टूलकिट में कार्यकर्ताओं से आस-पास के अंतिम संस्कार स्थलों से ‘शवों और अंत्येष्टि की तस्वीरों का नाटकीय रूप से उपयोग’ करने के लिए भी कहा गया है। इसके अलावा, स्थानीय कॉन्ग्रेस नेताओं को अस्पतालों में बेड ‘रोकने’ के सुझाव दिए गए हैं, जिसे कॉन्ग्रेस के इशारे पर ही मरीजों को दिया जाएगा। टूलकिट में गुजरात को कोविड के खिलाफ लड़ाई में असफल राज्य बताने के साथ ही कॉन्ग्रेस नेताओं को PM CARES पर भी सवाल उठाने का निर्देश दिए गए हैं। इतना ही नही कुछ भारतीय मीडिया संस्थानों के ‘मित्र पत्रकारों’ से कोरोना के नए स्ट्रेन को ‘इंडियन स्ट्रेन’ लिखवाने के निर्देश दिए गए है ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि खराब हो और इसका नतीजा मोदी को चुनाव में उठाना पड़े।
इन सब से एक बात समझ में तो आही गई होगी की कौन कितना बड़ा दूध का धुला हुआ है। खैर गिद्धों का काम ही क्या है? 

Friday, May 14, 2021

लाशों पर पत्रकारिता

आजकल बड़ा सुर्खिया बटोर रही है अनगिनत अनजान लाशे। कुछ तो माइक और लेकर बैठ जा रहे है श्मशान घाट पर फिर होता लाइव कवरेज जलती हुई लाशों का। देश विकट परिस्थितियों से जूझ रहा और ये मनहूसियत फैला रहे है अपने खूनी खबरों से। कुछ लोग कह रहे है सत्य दिखाना गलत है क्या? नही सत्य दिखाना गलत नही है पर किसी अनजान व्यक्ति के लाश को दिखाना कितना सही है? क्या ये अपमान नही है? श्मशान घाट पर रोज लाश जलती है लोग विभिन्न कारणों से अपने प्राण गवा देते है। जितना जीवन सत्य है उतना मृत्यु भी इस बात कोई झुठला नहीं सकता है। लेकिन असल मुद्दा तो ये है कि आजकल लोग वुहान वायरस से मर रहे है। सरकार को बदनाम करने के लिए लाशों को फुटेज मिल रहा है भले ही देश का नाम खराब हो इन तथाकथित लोगो कि पत्रकारिता चलनी चाहिए।

देखा जाए तो विदेशो में भारत से ज्यादा लोगो की मृत्यु हुई है इस वुहान वायरस से। अमेरिका को ही ले लीजिए उसकी स्थिति देखिए आपको खुद पता चल जायेगा कितनी भयावह स्थिति हो गई है पर वहा की मीडिया क्या अपने आम जनता की लाशों कवरेज दे रही है? अमेरिका छोड़िए यूरोप का ही उदारहरण ले लीजिए। एक तरह से अपना एजेंडा ही चला रहे है ये लोग इनका काम सिर्फ और सिर्फ भारत की छवि बिगाड़नी है। मोदी घृणा में ये कुछ भी करने को तैयार है।विपक्षी दलों नेता वैक्सीन न लगवाने का अपील कर रहे थे कुछ दिन पहिले तक। कुछ नेता तो वैक्सीन लगवाने से नपुंसक हो रहे थे। अब क्या हो रहा है ? अब लाशों का  ढिढोरा पीटा जा रहा है की सरकार गलत कदमों की वजह से मौतें हो रही है। वैक्सीन का उत्पादन क्यों नही हो रहा है? ऑक्सीजन को लेकर भी लोग बवाल खड़ा किए थे।

अब तो गंगा में लाशों के प्रवाह कि खबरे आना शुरू हो गई है। मानो ये घटना लिबरल मीडिया के लिए वरदान साबित हुई है। अब भारत की छवि और धूमिल करेंगे ये तथाकथित पत्रकार। निश्चिंत ही ये सरकारों की जवाबदेही है की आखिर लोग लाश को जल में प्रवाहित क्यों कर रहे है? क्या मामला है की दाह संस्कार करने वाले जगहों पर जल प्रवाह किया जा रहा है? कोरोना संक्रमित लाशो के लोग नजदीक नही चाहते है कही संक्रमण फैल ना जाय पर इसका मतलब ये भी नही की उस मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी ढंग से ना हो। किसी का भी परिवार हो चाहे निर्धन असहाय ही क्यों ना हो वो अपने जिगर के टुकड़े का शव क्षत- विक्षत तो नही होने देगा। कुंठित मानसिकता वालो का कुछ कहा नहीं जा सकता उनके लिए अपने जान और माल से बढ़कर कुछ भी नही हैं भले उनका पुत्र उनके सामने क्यों ना दम तोड़ दे। कोई तो पिता की लाश ही नही लेने जा रहा है मजबूरी में अस्पलताल वाले लाश को सामाजिक संस्थाओं के हवाले कर दे रहे है। गंगा में शव बहाना कोई आज की परंपरा नहीं है बहुत पुरानी है पर जल प्रदूषण के रोकथाम के लिए इसपर सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाया गया है। जो श्मशान में बैठकर लाइव कवरेज दे सकता है मानो पिकनिक मन रहा हो उनके लिए तो ये बहती गंगा में लाशे किसी अमृत से कम थोड़ी है !

Saturday, May 1, 2021

क्यों लाशनऊ तो हो सकता हैं, मगर मृत्युगढ़', 'मौत-राष्ट्र' और 'श्मशानस्थान' नहीं?


लेखक:- गौरव राजमोहन नारायण सिंह (हृतिक सिंह)


जब कोई व्यक्ति कुंठा में किसी की मृत्यु पर अपने बंद पड़े छापखाने को चलाने के निम्नस्तरीय प्रयासों में संवेदनशीलता की सारी सीमा पार कर दें, तब हम जैसे परेशान मगर स्वाभिमानी, ऐसे पुरस्कृत बकैताधिश्रेष्ठ को उन्हीं के स्तर पर उतर कर जवाब देने आना पड़ता हैं। सम्मानाधिपति, प्रत्रकार-श्रेष्ठ बकैत, जिन्होंने अपने दैवीय कधों पर राष्ट्रीय चिंतन व चेतना का सम्पूर्ण भार वहन करने का कष्ट लिया हैं, उनके लिए किसी भी शहर की अस्मिता को अपने शब्दकोशिय-ज्ञान के भंडार से चुनें, किसी निम्नस्तरीय व वीभत्सकारी शब्द से अलंकृत करना, कोई आश्चर्यजनक बात नहीं। महामारी के इस विनाशकारी प्रकोप से दूर, घर की चारदीवारी से बाहर न निकलनेवाले, अपनी गिद्ध-दृष्टि से किसी शहर के लाचार व्यक्ति की कहानी पर राजनीतिक घृणा व विष्ठा का मरहम लगाते है, तो हर उस व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के स्नातक को इस सागर-सी समावेशी भावना में संकीर्णता दिखाई देती हैं। 

अपनी संकुचित विचारधारा के मद में चूर बकैत-राज नें, लखनऊ का नाम बदल कर 'लाशनऊ' कर दिया। तर्क में बकैत-पुरुष, शुरुआत में एक बुज़ुर्ग पत्रकार की लाचारियों भारी मृत्यु से करते हैं, जिसका शोक हमें भी हैं, मगर उसमें बकैत-राज अपना प्रपंच ना जोड़े, ऐसा संभव कहाँ। पूरे देश में महामारी के इसी कठिन अवसर पर अपनी अवसादग्रस्त वैचारिक विपन्नता का प्रदर्शन, किसी की लाश से करना, क्या कोई भी सभ्य समाज में सोच सकता हैं! मगर जहाँ के पत्रकारिता जगत में स्वयंभू-श्रेष्ठाधिपति श्री बकैत-राज, अपनी दैवीय आभा से पूरे जगत को अलंकृत कर रहे हों, वहाँ न सिर्फ इसकी उम्मीद की जा सकती हैं, बल्कि इसे समाज में एक विशेष वर्ग की स्वीकारिता भी प्राप्त हो जाती हैं।

हमें मालूम हैं की कुछ चरमपंथी, नामपंथी, वामी-दंगाइयों के मसीहा पर एक व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी वाला इतना कुछ लिख दें, तो ज़ाहिर हैं, मसिहा-प्रेमियों की कुंठा कितनी होगी, राम ही जाने ! एक आम व्यक्ति अपने भावों के शब्द तभी देता है, जब किसी भी चीज़ की अति होती हैं। मानवीय मूल्यों व संवेदनाओं को बेचकर अपने हित साधना बिकुल भी सही नहीं हैं। आख़िर महामारी पूरे देश में फ़ैली है, तो फ़िर सिर्फ लखनऊ, भोपाल और अहमदाबाद ही क्यों? सिर्फ़ इनका ही नामकरण क्यों किया हैं, क्यों नहीं मुंबई का 'मुर्दाबई' नहीं हो सकता, मगर लखनऊ का 'लाशनऊ' हो सकता हैं !

हमें याद है वो दिन जब इस देश में पहली महामारी की लहर आयी थी तब देश के तथाकथित 'बेस्ट सीएम' वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों व उनकी तथाकथित रणनीति की बकैत तारीफ़ करते नहीं थकते थे। रोज़ अपने बिगहा-भर लेख और रात की पंचायत में प्रपंच ! आंकड़े हो या फ़िर आखों-देखा हाल, कौन इस बात को झुठला सकता हैं की संक्रमण महानगरों से ही फैला चाहें धारावी हो या आनंद विहार, तस्वीरें तो झूठ नहीं बोलती। हम कैसे वो दिन भूल सकते हैं, जब इन्हीं महानगरों के सर्वेसर्वाओं के 'सु-राज' में भूखे-प्यासे मज़दूर मिलों का सफ़र पैदल तय करने पर मजबूर हुए थे। उस फेक न्यूज़ को कौन भूल सकता हैं जब बकैताधिराज ने सूरत से सीवान की रेल गाड़ी को नौ दिन में पहुँचा दिया था। आज जो संक्रमण तेज़ी से फैल रहा है उसकी ज़िम्मेदारी क्या इनकी नहीं थी, सवाल तो होना ही चाहिए। आज देश में संक्रमण से सबसे ज़्यादा मृत्यु दर जिन राज्यों की हैं, वहाँ संक्रमित व्यक्ति की पुकार और समस्या पर लाशनाऊ जैसे शब्द क्यों नहीं गढ़े जाते। क्यों उन प्रभावित राज्यों की मार्मिक चर्चा नहीं होती जहां 68,000 और 16,000 से ज़्यादा मृत्यु सिर्फ सिस्टम के फ़ेल होने के कारण चली गई। हॉस्पिटल में आग लगने और हादसों पर क्यों बकैत-राज की चर्चा और दृष्टि सिर्फ कुछ राज्यों पर ही पढ़ती है। इन गैर-मामूली सवालों का उत्तर सिर्फ इतना हैं की, क्योंकि बकैत-राज को भी तो किसी की गोदी में इठलाना हैं। आख़िर इसीलिए तो 'मृत्युगढ़', 'मौत-राष्ट्र' और 'श्मशानस्थान' जैसे अलंकरण नहीं इस्तेमाल किए गए जाते। 

धूर्त और कपटी होने की एक सीमा होती है। मग़र उसकी भी सीमा लांघ चुके बकैत-राज को इस विकट परिस्थितियों में 3,693 करोड़ रुपये 43 मुनिसिपल करपोर्टरों के बंगले पर ख़र्च करनेवाली सरकार से सवाल करने से परहेज़ क्यों होता हैं। क्यों वो विज्ञापन वाली सरकार से ये नहीं पूछते की 3 दिन में ऐसा क्या हुआ की ऑक्सिजन और बेड खत्म हो गए, क्यों आखिर 8 की जगह सिर्फ 1 ही पीएसए ऑक्सीजन प्लांट लगा, क्यों पिछले 6 साल से 30,000 बेड बढ़ानेवाले, एक भी बेड न बढ़ा सकें? क्या ये आंकड़े और तथ्य नहीं? अगर आज ये महानगरों के 'बेस्ट सीएम' जो फ़िर से अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए तालाबंदी कर रहे हैं, क्या उससे जो पुनः पलायन की स्थिति हो रही है, क्या वो संक्रमण नहीं फैला रहा हैं? इसका जिम्मेदार कौन हैं? 

जिस 'लहसुन बाघ' की सोच से कुंभ और भाजपा की रैलियों पर सवाल खड़े करते हैं, क्यों नहीं यही सवाल डकैत और उनके झुंड से पूछे जाते है की संक्रमण-काल में दिल्ली बॉर्डर पर क्यों बैठे हों, वहां दो गज़ की दूरी नहीं दिखती? क्यों दीदी की रैलियों की भीड़ में कोरोना नहीं होता? आख़िर मुनाफ़क़त क्यों बकैताधिश्रेष्ठ? 

लेकिन हमें लगता हैं की इसमें बकैत-श्रेष्ठ की गलती नहीं, क्योंकि जिसकी दिलचस्पी एक राज्य के चुनावों में भी केंद्र की एन्टी-इनकम्बेंसी को ढूढ़ने की हो, उसकी पत्रकारिता भी तो 'सु-सु दर्ज़े' की ही होगी। ऐसा बौद्धिक स्तर भगवान इसी गिरोह के प्रतिपादकों और उनके शुभचिन्तकों को ही दे। सवालों से बचकर अपने मफ़ाद की खबरों चलाकर पत्रकारिता का निष्पक्ष स्तंभ बताने का ढोंग बंद करो बकैताधिराज। किसी की मृत्यु पर अपना एजेंडा ठेलने से अपना ही चहरा मलीन करते हुए कब तक अपनी निम्न पत्रकारिता करोगें। हम इस बात से कभी इनकार नहीं करते कि परेशानी में हम सभी हैं, बहुत विकट परिस्थितियों से पूरा देश परेशान हैं। मग़र इस परिस्थिति में अपनी बंद पड़ी दुकान के लिए अवसर तलाश करना ये बिल्कुल भी सही नहीं है। आज ये जो स्तिथि बानी है इसका जिम्मेदार हर कोई हैं, खुले बाज़ार में नीचे होते मास्क और भीड़-भाड़, रैलियों में जाने वाले लोगो और उनको कवर करनेवाले पत्रकार, सभी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। ज़िम्मेदार तो वो भी है जिनके ऊपर ज़िम्मेदारी थी की न सिर्फ दूसरों को उनकी जिम्मेदारी बताए बल्कि उसके लिए कुछ कठोर क़दम भी उठाए, मगर जब उनकी प्राथमिकता ही आंदोलनों के अधिकार और दूसरी अन्य गैर-जरूरी मसलों पर हो, तो आज जागने से कोई फायदा नहीं। 

आज परिस्थितियों ऐसी नहीं है जिसपर सियासत की जा सके और ना ही किसी आम आदमी के पास इतना समय हैं की वो इन सवालों से वार-पलटवार कर ऐसे बकैतो को सारे बाज़र शर्मशार करे। मगर जब सभ्य समाज में मानवीय मूल्यों की संवेदनशीलता पर 'लाशनऊ' जैसा तंज, राजनैतिक द्वेष से किया जाए, तब इसको ना तो बर्दाशत किया जा सकता हैं और ना ही भुलाया जा सकता हैं। इसलिए समाज के ऐसे धूर्त व कपटी शकुनियों की बकैती का जवाब देना आवश्यक हैं, क्योंकि खुद महात्मा गांधी जी भी इस बात पर विश्वास करते थे की शिक्षा ही मानव के सर्वांगीण विकास व अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हैं। इसीलिए हम जैसे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के स्नातकों पर ये ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती हैं ।

नोट:-  व्यंग्य शैली में लिखे इस लेख में किसी भी व्यक्ति, समाज या समूह का अपमान का आशय नहीं हैं। यह एक भाव-अभिव्यक्ति अतः आप इसे उसी परिपेक्ष्य में लें।

(लेखक  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक और हिंदी पत्रकारिता में डिप्लोमा  है।)

Friday, April 23, 2021

ये वुहान वायरस से भी ज्यादा खतरनाक है..!

देश और दुनिया में गजब का माहौल चल रहा है। हर कदम पर मौत नजर आ रही है। कोरोना वायरस एक ऐसी महामारी जिसने लोगो की तबाह कर के रख दी है। इसे वुहान वायरस कहकर बुलाया जाए  तो ज्यादा सही है। देश एम इस वायरस को लेकर खूब राजनीति हुई कुछ ने कहा ये अफवाह है! कुछ ने कहा हम वैक्सीन नही लगवाएंगे ये लोगो को नपुंसक बना देगी! कुछ लोग तो इस वायरस के सहारे सरकार बना रहे थे कह रहे थे हमारी सरकार आएगी तब हम मुफ्त में वैक्सीन लगवाएंगे ये भाजपा की वैक्सीन पर भरोसा नही हमे। जब दूसरी लहर चली तो सबकी अकल ठिकाने आ गई।
सोशल मीडिया पर लोग मोदी विरोध में इतना गिर गए हैं की देश विरोधी गतिविधियों से भी बाज नही आ रहे है। खैर इसमें कौन सा नया बात है ये रोज का हो गया है। कई लोगो की मां 3 घंटे से तड़पकर मर गई यकीन नही होता न तो देखिए इस तस्वीर में...

 गौर से देखिए कैसे एक ही पोस्ट को  कॉपी पेस्ट करके सब छापे जा रहे है। एक बहुत बड़ा एजेंडा चलाया जा रहा है देश को नीचा गिराने की जिसका मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी हो गया है। देश में जहा भाजपा की सरकार है वहा भाजपा के मुख्यमंत्रियों की  बुराइयां निकाली जा रही है और जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकार है वहा प्रधामंत्री  मोदी जी को गलत ठहराया जा रहा है की ये कोरोना को रोकने में नाकाम साबित हुए है अगर पूरी लेफ्ट लिबरल मीडिया द्वारा । पर सत्य तो यही है कि झूठ पर झूठ बोला जा रहा है तथ्य को गलत बताया जा रहा है मोदी घृणा में कुछ मुट्ठी भर लोगों ने पूरे देश को भटकाने की कोशिश की है इस महामारी के दौर में। वुहान वायरस से भी खतरनाक वायरस तो ये तथाकथित मुट्ठी भर लोग है जिन्होंने देश को कई सालो से अंदर से खोखला करने में कोई कसर नही छोड़ी है।
लाशों पर राजनीति करने से विपक्ष तनिक संकोच नहीं कर रहा है।भले ही ये विपक्ष वाले खुद संक्रमित क्यों ना जाए पर इनकी सत्ता पाने की लालसा कभी नही जायेगी। ये घटिया लोग बस देश में आराजकता फैलाने के सिवाय और किए ही क्या है?