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Thursday, September 16, 2021

मादर-ए-वतन सब हिन्दू हैं


सभी का ख़ून हैं शामिल यहाँ की मिट्टी में, किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी हैं,
सही तो कह गए मियाँ इंदौरी, आख़िर बाप तुम्हारा ग़ज़नी, अब्दाली या क़ासिम थोड़ी है, 

जिन माताओं की अस्मतें लूटीं उन आठसौ सालों में, वो नृशंसता बादशाह या सुल्तानों की थोड़ी हैं,
कहीं मूर्ति तोड़ी तो कहीं मंदिर तोड़े, फ़िर भी ये इतिहास काला थोड़ी हैं,

गज़वा-ए-हिन्द के गाज़ी आए और निपट गए, फ़िर भी ये सोच हारी थोड़ी है,
हिन्दू से नफ़रत सीने में दबाए, आज भी आतंकी जिहादी थोड़ी हैं,

कौन-सी ग़ैरत है तुम्हें यह मानने से, की तुर्कों-अरब से तुम्हारा रिश्ता थोड़ी हैं,
जिस संस्कृति ने अपनाया, उसी को काफ़िर मानते, ये जहालत भी तुम्हारी अपनी थोड़ी हैं,

कब तक छुपाओगे अपनी पहचान, आख़िर मानने में कोई हर्ज़ थोड़ी हैं,
सभी का ख़ून एक ही हैं मियाँ इंदौरी, मादर-ए-वतन सब हिन्दू हैं!!

- गौरव राजमोहन नारायण सिंह (हृतिक सिंह)

Friday, August 6, 2021

स्वराज स्मृति

ऐसा कहा जाता है कि जब समय अपनी चलायमान गति से आगे बढ़ता है, तो लोग उन महान विभूतियों को इतिहास और यादों के किसी अस्पृश्य हिस्से में समेट लेते हैं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी 'नए भारत' के निर्माण में समर्पित कर दी।

श्रीमती स्वराज कई युवा भारतीयों के लिए एक माँ की तरह थीं, जो उन्हें मानवीय भावनाओं के विभिन्न पक्षों के प्रति संवेदनशील और अपने आदर्शों के प्रति समर्पित व्यक्तित्व के रूप में देखते थे। देश उन्हें आज भी एक मज़बूत नेत्री के रूप में देखता हैं, क्योंकि वह उस संघर्षकाल से निकली नेत्री हैं, जब राजनीति में महिलाओं के भागीदारी ना-मात्र की थी। उस काल खंड से आज के युवा भारत की सोच के बीच श्रीमती सुषमा स्वराज का जीवन एक परिवर्तनात्मक सेतुबंध हैं, जिसने समाज की दशा और दिशा बदलने में एक अकल्पनीय योगदान दिया है।

वह अपनी विचारधारा और 'अंत्योदय' को समाज में विकास का मार्ग मानती थीं। एक संघर्षरत जीवन व कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता की मिसाल बनी सुषमा स्वराज आम जन-मानस के हृदयस्पर्शी विषयों को लोकतंत्र में एक सशक्त प्रतिनिधित्व देने हेतु हमेशा जानी जाती थी, और इसीलिए जानता से उनका सीधा जुड़ाव आज भी महसूस किया जा सकता हैं। उनका स्पष्ट व संवाद कौशल राजनीतिक मतांतरों के बावजूद सभी विरोधियों कायल होने पर मजबूर कर देता था और आज भी करता हैं। यह सम्मान व सद्भाव अर्जित करना आज के राजनैतिक परिदृश्य में देख पाना बहुत मुश्किल हैं। विभिन्न भारतीय भाषाओं में उनकी विद्वत्ता व संस्कृत के प्रति उनका समर्पण आज भी याद किया जाता हैं। भारतीय संस्कृति में रमी एक ऐसी जन-नायिका शायद ही इस देश में कोई होगी, जिसका कोई राजनैतिक कुल नहीं रहा।

वे भारतीय संसद के दोनों सदनों में लंबे समय तक एक संसद सदस्य, वाजपेयी जी की सरकार में विभिन्न पदों पर मंत्री, दिल्ली के मुख्यमंत्री, लोकसभा में विपक्ष की नेता, और अंत में, मोदीजी के नेतृत्व में एक उत्कृष्ट विदेश मंत्री के रूप में उनकी राजनैतिक यात्रा बहुत शानदार और स्मरणीय रही हैं।

उनके जीवन की उपलब्धियों से पता चलता है कि जब आप अपने आपको सार्वजनिक सेवा के लिए समर्पित करते हैं, तो निश्चित ही आपका संकल्प अपने निहित लक्ष्यों को प्राप्त करेगा, जो आपने समाज कल्याण हेतु परिलक्षित किया है। श्रीमती स्वराज का जीवन अनुभव हम जैसे कई हिंदुस्तानियों को हमेशा वाजपेयी जी और डॉ कलाम की तरह एक मूल्यवान सबक देता है, जो यह हैं कि, लोक सेवा एक महान आह्वान है, जिसका सम्मान राष्ट्रीय हित व विकास में बेहद महत्वपूर्ण हैं।

आज लोग सार्वजनिक पद और लोक सेवा के बीच रेखित अंतर नहीं समझ पाते हैं, लेकिन जब हम स्वराज जी जैसे दिग्गजों व्यक्तित्व को याद करते हैं, तो हमें अपनी आस्था और निष्ठा को नेक और आवश्यक सार्वजनिक सेवा के लिए दोहराना चाहिए और राष्ट्र निर्माण में जीवन आहूत करने हेतु संकल्प लेना चाहिए।

सुषमा जी की स्मृति में

लेखक
गौरव राजमोहन नारायण सिंह

Saturday, May 1, 2021

क्यों लाशनऊ तो हो सकता हैं, मगर मृत्युगढ़', 'मौत-राष्ट्र' और 'श्मशानस्थान' नहीं?


लेखक:- गौरव राजमोहन नारायण सिंह (हृतिक सिंह)


जब कोई व्यक्ति कुंठा में किसी की मृत्यु पर अपने बंद पड़े छापखाने को चलाने के निम्नस्तरीय प्रयासों में संवेदनशीलता की सारी सीमा पार कर दें, तब हम जैसे परेशान मगर स्वाभिमानी, ऐसे पुरस्कृत बकैताधिश्रेष्ठ को उन्हीं के स्तर पर उतर कर जवाब देने आना पड़ता हैं। सम्मानाधिपति, प्रत्रकार-श्रेष्ठ बकैत, जिन्होंने अपने दैवीय कधों पर राष्ट्रीय चिंतन व चेतना का सम्पूर्ण भार वहन करने का कष्ट लिया हैं, उनके लिए किसी भी शहर की अस्मिता को अपने शब्दकोशिय-ज्ञान के भंडार से चुनें, किसी निम्नस्तरीय व वीभत्सकारी शब्द से अलंकृत करना, कोई आश्चर्यजनक बात नहीं। महामारी के इस विनाशकारी प्रकोप से दूर, घर की चारदीवारी से बाहर न निकलनेवाले, अपनी गिद्ध-दृष्टि से किसी शहर के लाचार व्यक्ति की कहानी पर राजनीतिक घृणा व विष्ठा का मरहम लगाते है, तो हर उस व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के स्नातक को इस सागर-सी समावेशी भावना में संकीर्णता दिखाई देती हैं। 

अपनी संकुचित विचारधारा के मद में चूर बकैत-राज नें, लखनऊ का नाम बदल कर 'लाशनऊ' कर दिया। तर्क में बकैत-पुरुष, शुरुआत में एक बुज़ुर्ग पत्रकार की लाचारियों भारी मृत्यु से करते हैं, जिसका शोक हमें भी हैं, मगर उसमें बकैत-राज अपना प्रपंच ना जोड़े, ऐसा संभव कहाँ। पूरे देश में महामारी के इसी कठिन अवसर पर अपनी अवसादग्रस्त वैचारिक विपन्नता का प्रदर्शन, किसी की लाश से करना, क्या कोई भी सभ्य समाज में सोच सकता हैं! मगर जहाँ के पत्रकारिता जगत में स्वयंभू-श्रेष्ठाधिपति श्री बकैत-राज, अपनी दैवीय आभा से पूरे जगत को अलंकृत कर रहे हों, वहाँ न सिर्फ इसकी उम्मीद की जा सकती हैं, बल्कि इसे समाज में एक विशेष वर्ग की स्वीकारिता भी प्राप्त हो जाती हैं।

हमें मालूम हैं की कुछ चरमपंथी, नामपंथी, वामी-दंगाइयों के मसीहा पर एक व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी वाला इतना कुछ लिख दें, तो ज़ाहिर हैं, मसिहा-प्रेमियों की कुंठा कितनी होगी, राम ही जाने ! एक आम व्यक्ति अपने भावों के शब्द तभी देता है, जब किसी भी चीज़ की अति होती हैं। मानवीय मूल्यों व संवेदनाओं को बेचकर अपने हित साधना बिकुल भी सही नहीं हैं। आख़िर महामारी पूरे देश में फ़ैली है, तो फ़िर सिर्फ लखनऊ, भोपाल और अहमदाबाद ही क्यों? सिर्फ़ इनका ही नामकरण क्यों किया हैं, क्यों नहीं मुंबई का 'मुर्दाबई' नहीं हो सकता, मगर लखनऊ का 'लाशनऊ' हो सकता हैं !

हमें याद है वो दिन जब इस देश में पहली महामारी की लहर आयी थी तब देश के तथाकथित 'बेस्ट सीएम' वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों व उनकी तथाकथित रणनीति की बकैत तारीफ़ करते नहीं थकते थे। रोज़ अपने बिगहा-भर लेख और रात की पंचायत में प्रपंच ! आंकड़े हो या फ़िर आखों-देखा हाल, कौन इस बात को झुठला सकता हैं की संक्रमण महानगरों से ही फैला चाहें धारावी हो या आनंद विहार, तस्वीरें तो झूठ नहीं बोलती। हम कैसे वो दिन भूल सकते हैं, जब इन्हीं महानगरों के सर्वेसर्वाओं के 'सु-राज' में भूखे-प्यासे मज़दूर मिलों का सफ़र पैदल तय करने पर मजबूर हुए थे। उस फेक न्यूज़ को कौन भूल सकता हैं जब बकैताधिराज ने सूरत से सीवान की रेल गाड़ी को नौ दिन में पहुँचा दिया था। आज जो संक्रमण तेज़ी से फैल रहा है उसकी ज़िम्मेदारी क्या इनकी नहीं थी, सवाल तो होना ही चाहिए। आज देश में संक्रमण से सबसे ज़्यादा मृत्यु दर जिन राज्यों की हैं, वहाँ संक्रमित व्यक्ति की पुकार और समस्या पर लाशनाऊ जैसे शब्द क्यों नहीं गढ़े जाते। क्यों उन प्रभावित राज्यों की मार्मिक चर्चा नहीं होती जहां 68,000 और 16,000 से ज़्यादा मृत्यु सिर्फ सिस्टम के फ़ेल होने के कारण चली गई। हॉस्पिटल में आग लगने और हादसों पर क्यों बकैत-राज की चर्चा और दृष्टि सिर्फ कुछ राज्यों पर ही पढ़ती है। इन गैर-मामूली सवालों का उत्तर सिर्फ इतना हैं की, क्योंकि बकैत-राज को भी तो किसी की गोदी में इठलाना हैं। आख़िर इसीलिए तो 'मृत्युगढ़', 'मौत-राष्ट्र' और 'श्मशानस्थान' जैसे अलंकरण नहीं इस्तेमाल किए गए जाते। 

धूर्त और कपटी होने की एक सीमा होती है। मग़र उसकी भी सीमा लांघ चुके बकैत-राज को इस विकट परिस्थितियों में 3,693 करोड़ रुपये 43 मुनिसिपल करपोर्टरों के बंगले पर ख़र्च करनेवाली सरकार से सवाल करने से परहेज़ क्यों होता हैं। क्यों वो विज्ञापन वाली सरकार से ये नहीं पूछते की 3 दिन में ऐसा क्या हुआ की ऑक्सिजन और बेड खत्म हो गए, क्यों आखिर 8 की जगह सिर्फ 1 ही पीएसए ऑक्सीजन प्लांट लगा, क्यों पिछले 6 साल से 30,000 बेड बढ़ानेवाले, एक भी बेड न बढ़ा सकें? क्या ये आंकड़े और तथ्य नहीं? अगर आज ये महानगरों के 'बेस्ट सीएम' जो फ़िर से अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए तालाबंदी कर रहे हैं, क्या उससे जो पुनः पलायन की स्थिति हो रही है, क्या वो संक्रमण नहीं फैला रहा हैं? इसका जिम्मेदार कौन हैं? 

जिस 'लहसुन बाघ' की सोच से कुंभ और भाजपा की रैलियों पर सवाल खड़े करते हैं, क्यों नहीं यही सवाल डकैत और उनके झुंड से पूछे जाते है की संक्रमण-काल में दिल्ली बॉर्डर पर क्यों बैठे हों, वहां दो गज़ की दूरी नहीं दिखती? क्यों दीदी की रैलियों की भीड़ में कोरोना नहीं होता? आख़िर मुनाफ़क़त क्यों बकैताधिश्रेष्ठ? 

लेकिन हमें लगता हैं की इसमें बकैत-श्रेष्ठ की गलती नहीं, क्योंकि जिसकी दिलचस्पी एक राज्य के चुनावों में भी केंद्र की एन्टी-इनकम्बेंसी को ढूढ़ने की हो, उसकी पत्रकारिता भी तो 'सु-सु दर्ज़े' की ही होगी। ऐसा बौद्धिक स्तर भगवान इसी गिरोह के प्रतिपादकों और उनके शुभचिन्तकों को ही दे। सवालों से बचकर अपने मफ़ाद की खबरों चलाकर पत्रकारिता का निष्पक्ष स्तंभ बताने का ढोंग बंद करो बकैताधिराज। किसी की मृत्यु पर अपना एजेंडा ठेलने से अपना ही चहरा मलीन करते हुए कब तक अपनी निम्न पत्रकारिता करोगें। हम इस बात से कभी इनकार नहीं करते कि परेशानी में हम सभी हैं, बहुत विकट परिस्थितियों से पूरा देश परेशान हैं। मग़र इस परिस्थिति में अपनी बंद पड़ी दुकान के लिए अवसर तलाश करना ये बिल्कुल भी सही नहीं है। आज ये जो स्तिथि बानी है इसका जिम्मेदार हर कोई हैं, खुले बाज़ार में नीचे होते मास्क और भीड़-भाड़, रैलियों में जाने वाले लोगो और उनको कवर करनेवाले पत्रकार, सभी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। ज़िम्मेदार तो वो भी है जिनके ऊपर ज़िम्मेदारी थी की न सिर्फ दूसरों को उनकी जिम्मेदारी बताए बल्कि उसके लिए कुछ कठोर क़दम भी उठाए, मगर जब उनकी प्राथमिकता ही आंदोलनों के अधिकार और दूसरी अन्य गैर-जरूरी मसलों पर हो, तो आज जागने से कोई फायदा नहीं। 

आज परिस्थितियों ऐसी नहीं है जिसपर सियासत की जा सके और ना ही किसी आम आदमी के पास इतना समय हैं की वो इन सवालों से वार-पलटवार कर ऐसे बकैतो को सारे बाज़र शर्मशार करे। मगर जब सभ्य समाज में मानवीय मूल्यों की संवेदनशीलता पर 'लाशनऊ' जैसा तंज, राजनैतिक द्वेष से किया जाए, तब इसको ना तो बर्दाशत किया जा सकता हैं और ना ही भुलाया जा सकता हैं। इसलिए समाज के ऐसे धूर्त व कपटी शकुनियों की बकैती का जवाब देना आवश्यक हैं, क्योंकि खुद महात्मा गांधी जी भी इस बात पर विश्वास करते थे की शिक्षा ही मानव के सर्वांगीण विकास व अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हैं। इसीलिए हम जैसे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के स्नातकों पर ये ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती हैं ।

नोट:-  व्यंग्य शैली में लिखे इस लेख में किसी भी व्यक्ति, समाज या समूह का अपमान का आशय नहीं हैं। यह एक भाव-अभिव्यक्ति अतः आप इसे उसी परिपेक्ष्य में लें।

(लेखक  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक और हिंदी पत्रकारिता में डिप्लोमा  है।)

Tuesday, September 22, 2020

उन्होने अपने इसी आचरण से महामना के मूल्यों और उद्देश्यों का यथोचित प्रतिनिधित्व किया है।

लेखक:- गौरव राजमोहन नारायण सिंह

आज जिस पत्र के आलोक में मेरी भावनाओं ने मुझे इस संदेश को लिखने पर मजबूर किया है, उसके बारे में जहां एक तरफ मुझे पीड़ा हो रही है तो दूसरी तरफ गर्व की अनुभूति। आज माननीय उपसभापति, राज्यसभा, श्री हरिवंश नारायण जी का माननीय राष्ट्रपति व उप-राष्ट्रपति जी को लिखा गया वह मार्मिक पत्र विभिन्न संचार-माध्यमों द्वारा जब प्रकाशित हुआ तो मेरी भावनाओं आकस्मिक रूप से प्रतिस्फुटित हो गई। मानवीय संवेदनाओं से संदर्भित इस पत्र में उन्होने गत 20 सितंबर को राज्यसभा की कारवाई में हुई उस अशोभनीय घटना के बारे में बेहद संयम और सहनशीलता के साथ मार्मिक वर्णन किया है।

यह पत्र एक बार पुनः उनके सरल, सहज और सौम्य व्यक्तित्व को दर्शाता है। उनके इस गांधीवादी आचरण और आदर्शों ने राज्यसभा की उस महान उदारवादी परंपरा को भी जीवंत किया है, जो हमारे लोकतंत्र में बसी उस निष्ठा व आस्था को और मज़बूत करने का काम करती है। गत 20 सितंबर को हुई उसी घटना में पूरे देश ने देखा की किस प्रकार पीठ और आसंदी पर कुछ विपक्षी सांसदों ने वो किया जिसकी कल्पना सभ्य समाज में नहीं की जा सकती। देश ने देखा की किस प्रकार की अभ्रद्रता सदन में उप-सभापति और राज्यसभा कर्मचारियों के साथ कुछ सांसदों द्वारा की गई, जिससे पूरा देश शर्मसार है।   

लेकिन जेपी और अटल जैसे आदर्शवादियों के अनुयायी श्री हरिवंश ने जिस प्रकार से लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के माध्यम से न सिर्फ अपनी आपत्ति, पत्र के माध्यम से जताई बल्कि अपने स्वभाव के अनुरूप उन विपक्ष के प्रदर्शंकारी सांसदों से आज सुबह संसद परिसर में अपने घर से चाय के साथ मिलने भी पहुंचे और उनके स्वास्थ्य की जानकारी भी ली। यही घटना उनकी सादगी और समवेशी आचरण का प्रतिबिंब है। मुझे खुद इस बात का गर्व है की श्री हरिवंश, जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मेरी यही संकाय के अर्थशास्त्र विभाग के पुरा छात्र है, उन्होने अपने इसी आचरण से महामना के मूल्यों और उद्देश्यों का यथोचित प्रतिनिधित्व किया है।

मैं उनकी सादगी को नमन करता हूं और आपसे आग्रह करता हूं की आप सभी कृपया श्री हरिवंश जी का पत्र  पढ़े।

Tuesday, June 30, 2020

चीनी छलावा: भारत और भारत-प्रशांत क्षेत्र के माध्यम से एक निकास योजना

लेखक:- गौरव राजमोहन नारायण सिंह
छात्र, काशी हिन्दू वश्वविद्यालय

(नक्शा अक्साई चिन और चीन के साथ विवादित क्षेत्रों को दर्शाता है। इसके साथ ही यह कुछ ऐसी जगहों को भी दिखाता है जहाँ उनके हाल के सीमा विवाद हैं।)


जॉन फिट्जगेराल्ड कैनेडी का चीन के बारे में विचार उनकी एक अभिव्यक्ति से पता लगता है की,"चीनी शब्द 'संकट' लिखने के लिए दो ब्रश स्ट्रोक का उपयोग करते हैं। एक ब्रश स्ट्रोक खतरे के लिए होता है तो दूसरा अवसर के लिए । एक संकट में, खतरे से अवगत रहें लेकिन अवसर को पहचानें"। आज जब दुनिया वुहान वायरस के कठिन दौर से गुजर रही है, तब कैनेडी के द्वारा किए गए उपरोक्त अवलोकन चीनी विचार प्रक्रिया और उनके वैचारिक दृष्टिकोण्ड के बारे में बहुत कुछ बताता हैं। चीन के साथ हमारी सीमा पर आज जो कुछ हम देखते हैं उसे इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए। स्थिति और तर्क को बेहतर समझने के लिए, सभी को यह सोचने की जरूरत है कि जब चीन से उत्पन्न वायरस ने पूरी दुनिया को अनिश्चितता में धकेल दिया, तो वह जिम्मेदार देश भारत, वियतनाम, ताइवान, जापान और भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र के अन्य द्वीपीय राष्ट्रों के साथ सीमागतिरोध को क्यों उकसा रहा है। इसके अलावा अनुवर्ती तर्क यह है कि इन सभी देशों के साथ विवादास्पद परिस्थिति को निर्मित करने बाद जिसे पश्चिमी देशों में संवेदनशील मसलों का हिस्सा बनाया गया है उसपर अभी भी चीनी शीर्ष नेतृत्व कुछ कार्यवाही करने या कहने की स्थिति में क्यों नहीं नज़र आ रहा । यह एक गंभीर प्रश्न है, जिसका निहित उत्तर अवसर है।

चीन इस महामारी का उपयोग देश और विदेश दोनों में आनेवाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए कर रहा है। चीनी नेतृत्व के बारे में बात करें तो वुहान वाइरस के दौरान व्याप्त दुश्वारीयों के बाद प्रीमियर ली और राष्ट्रपति शी के बीच एक बड़ा मतभेद दिखाई दिया हैं। साथ ही हांगकांग में लंबे समय से चल रहे लोकतंत्र-समर्थित विरोध ने भी चीनी नेतृत्व की छवि को धूमिल किया है, जिसकी पश्चिमी देशों में तीखी आलोचना हुई है। हॉन्गकॉन्ग के लिए प्रस्तावित सुरक्षा बिल ने पुनः तनाव की परिस्थिति का निर्माण किया है जो कि महामारी के प्रतिबंध के दौरान शांत हुए थे दूसरी ओर ताइवान के विश्व मंच पर अधिक जुड़ाव और स्वीकार्यता ने बीजिंग को झकझोर कर रख दिया है। समस्याओं को जोड़ते हुए, अमेरिका के साथ व्यापार संबंधों में सुधार ने भी एक गंभीर रूप ले लिया है। महामारी के अमेरिका में अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक पहुंचने के बाद से शत्रुता और बढ़ी है। इसने चीन के लिए राजनयिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर कई समस्याएं पैदा की हैं और इस प्रकार, चीन में कई मैन्युफैक्चरिंग और मानसी अब अन्य पसंदीदा व्यापारिक स्थलों जैसे भारत, वियतनाम, बांग्लादेश, आदि पर जा रहे हैं या जाने की प्रक्रिया मे है, जो कि विश्वास के घाटने और मूल-देश के दबाव के कारण से हुआ हैं। इसे चीन में भारी छटनी हुई है और दशकों बाद चीन के औद्योगिक उत्पादन में रिकॉर्ड कमी आई है। अर्थव्यवस्था मंदी के कगार पर है, बैंक उधार देने में असमर्थ हैं और इसलिए, चीन की महत्वकांशी ओबीओबी परियोजना पर भी ग्रहण लग गया है। कई राष्ट्र अब अपने ऋणों को दूर करने के लिए चीनी की ओर रुख कर रहे हैं कुछ राष्ट्र अपनी प्रतिबद्धताओं पर पुनर्विचार करके चीन के इस ऋण जाल रणनीति से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सबसे बुरी खबर यह है कि चीन अपने चेहरे बचाने की कोशिश में भी नाकाम रहा। चीन द्वारा उपलब्ध चिकित्सा आपूर्ति और महत्वपूर्ण उपकरणों को अस्वीकार कर दिया गया है और भारत सहित कई देशों द्वारा इन्हें वापस भेज दिया गया है। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि यह सब चीन के लिए ठीक नहीं है और इसलिए पैक में अपने अंतिम कार्ड का उपयोग करते हुए, चीन ने इस महामारी जैसे प्रमुख मुद्दों से सभी का ध्यान भटकाने के लिए कई मोर्चों पर सीमाओं पर तनाव बढ़ा है। और कवरेज और रुझानों को आधार माने तो चीन काफी हद तक इसमें सफल रहा है। इस प्रकार, इस विचलन में सबसे बड़ा योगदान चीन-भारत सीमा गतिरोध को जाता है।
आज लद्दाख के विभिन्न प्रमुख सामरिक क्षेत्र जैसे मोगरा-हॉट सिंस, गालवान वैली, पैंगॉन्ग त्सौ झील और फिंगर एरिया, डेपसांग प्लेन, दौलत बेग ओल्डी, दरबुक, चुमार, चुशुल और डेमचोक सार्वजनिक प्रवचन में हैं। समाचार पाठकों और भावुक अनुयायियों के लिए ये घरेलू नाम बन गए हैं। प्रत्येक समाचार चैनल, अंग्रेजी और हिंदी दोनों, प्रचलित मुद्दे पर लंबाई से रक्षा और रणनीतिक विशेषज्ञों के साथ 7 से 11 बजे के प्राइम घंटे के दौरान गहन चर्चा करते है। यह अब एक संघर्ष से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति दोनों में एक फ्लैशप्वाइंट बन गया है क्योंकि यह चार दशकों के बाद था जब एक हिंसक झड़प में 20 बहादुर भारतीय सैनिकों की मौत हो जाती है, जिन पर लोहे की छड़, पत्थर और बेसबॉल बैट में कटिली तार लपेट कर चीनियों ने हमला किया। यह सब 15-16 जून की रात में गैलवान घाटी के पैट्रोलिंग पॉइंट 14 में हुआ था गालवान घाटी हालिया संघर्ष क्षेत्रों में से एक है जहां भारतीय गश्ती दल ने चीनी को 6 जून की विघटन योजना पर सहमति के रूप में वापस जाने के लिए कहा। जब गश्ती दल ने तम्बू और वॉच टॉवर के अवैध निर्माण पर आपत्ति जताई, तो चीनी सैनिकों ने भारतीय गश्ती दल पर हमला कर दिया। इसलिए, एक भयंकर प्रतिशोध में भारतीय बलों ने न केवल उन संरचनाओं को नष्ट कर दिया, बल्कि लगभग 35 पीएलए सैनिकों को भी मार गिराया, जिनकी अमेरिकी खुफिया द्वारा पुष्टि की गई है। चीनी ने भी इस बात पुष्टि की है कि उनके कमांडिंग अधिकारी कार्रवाई में मारे गए है। हालांकि, चीनी विदेशी कार्यालय गतिरोध रोकने के नाम पर अपनी तरफ से हताहतों की संख्या को लेकर चुप है। उसी अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि गालवान में पीएलए की यह पूर्व निर्धारित कार्रवाई उनके लिए एक बड़ी शर्मिंदगी थी। यह भारतीय सैनिकों की डीब्रीफिंग के माध्यम से भी सही है, जो कार्रवाई में मौजूद थे, जैसा कि भारतीय सेना द्वारा रिपोर्ट किया गया था इसके अलावा, गालवान में चीनी जीत का कोई भी प्रचार उसके किसी भी मीडिया आउटलेट से नहीं निकला है, जो अब हर दिन अपनी सेना के सैन्य अभ्यास का जश्न मनाता है और पीएलए के प्रशिक्षण वीडियो का भी खुलकर प्रचार करता है। यह पूरी घटना तीन चीजों को स्पष्ट रूप से सिद्ध करती है, एक कि गालवान में उत्तेजक कार्रवाई की योजना बनाई गई थी और थिएटर कमांड स्तर पर इसे मंजूरी दी गई थी, अर्थात इसे पश्चिमी कमान के चीनी जनरल द्वारा अनुमोदित किया गया था, दूसरा यह कि चीनी सलामी स्लाइसिंग रणनीति अब प्रभावी है और इसका अनुकूल उत्तर हमेशा दिया जाएगा और तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस घटना ने चीनी सेना की तथाकथित ताकत का भंडाफोड़ किया है और विश्व मंच पर उनके लिए यह घटना एक बड़ी शर्मिंदगी का कारण बनी है। हालांकि, दोनों सेनाओं के बीच पैंगोंग त्सो और फिंगर एरिया, गोगरा-हॉटस्प्रेग्स और डेपसांग प्लेन में टकराव जारी है। पिछले 6 वर्षों में भारत ने बड़े पैमाने पर चीनी से सटे इलाकों में आधारभूत संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) के विकास के कारण चीनी घुसपैठ काफी बढ़ी गयी है। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 255-किलोमीटर DSDBO (दरबूक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी) सड़क के पूरा होने के बाद चीनी बौखला गए हैं, जो LAC के लगभग समानांतर चलता है। सड़क की ऊंचाई 13,000 फुट और 16,000 फुट के बीच है, जिसके निर्माण में भारत की सीमा सड़क संगठन (BRO) ने लगभग दो दशक बाद पुरा कर लिया है।
नक्शा 255 किमी लंबे डीएसडीबीओ
 (दरबूक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी) सड़क के नवनिर्मित और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण को दर्शाता है।

जैसा कि आप ऊपर के नक्शे में देख सकते हैं, इस सड़क का रणनीतिक महत्व यह है कि यह लेह को काराकोरम दर्रे के डीबीओ बेस से जोड़ती है, जो चीन के झिंजियांग स्वायत्त क्षेत्र को लद्दाख से अलग करती है। DBO दुनिया की सबसे ऊंची हवाई पट्टी है, जिसे मूल रूप से 1962 के युद्ध के दौरान बनाया गया था लेकिन 2008 तक छोड़ दिया गया, जब भारतीय वायु सेना (IAF) ने इसे LAC के साथ अपने कई उन्नत लैंडिंग ग्राउंड (ALG) में से एक के रूप में पुनर्जीवित किया। इसके अलावा, यह डीएसडीबीओ सड़क तिब्बत-झिंजिंग राजमार्ग के उस खंड तक भारत को सैन्य पहुंच प्रदान करती है, जो अक्साई चिन से होकर गुजरती है। यह सड़क लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश अक्साई चिन पर LAC के लगभग समानांतर चलती है, जिसे चीन ने 1950 के दशक में कब्जा कर लिया था, जिसके कारण 1962 का युद्ध हुआ था। DSDBO सड़क के उद्भव से चीन को घबरा गया है क्योंकि यह सड़क उस राजनीतिक बढ़त को स्तर देता है जिसका उसने वर्षों से आनंद लिया। गालवान घाटी में हुए उस दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण को इस संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए क्योंकि झड़प स्थल के पास, भारतीय सेना के इंजीनियर रेजिमेंट और बीआरओ द्वारा निर्मित एक 4 स्पैन ब्रिज है। यह श्योक-गाल्वन नदी के संगम से 3 किमी पूर्व में और पैट्रोलिंग पॉइंट 14 के पश्चिम से 2 किमी की दूरी पर स्थित है। यह एक करीबी जानकारी दे सकता है कि 15-16 जून की रात में जो झड़प हुई थी, वह पूरी तरह से सड़क पर वर्चस्व के लिए थी जिसमें हमारे 20 बहादुर जवानों ने हमारे देश की सेवा में सर्वोच्च बलिदान दिया इन सामरिक क्षेत्रों में चीन द्वारा बनाया गया तनाव 1962 के युद्ध के समाप्त होने के बाद से कभी भी संघर्ष में नहीं था, लेकिन नए क्षेत्रों में भड़कने वाला तनाव और कुछ नहीं है, लेकिन व्यापक विदेशी कठिनाइयों को दूर करने का अवसर देगा। छलावे की योजना है जो चीन को अपनी घरेलू और वर्तमान मुद्दे को संक्षेप में समझना अच्छा है, लेकिन फिर भी यह प्रश्न अनुत्तरित है कि चीन जब भी घर और विदेश दोनों ही जगह, मुसीबत में होता है तो वो हमेशा अन्य देशों के साथ सीमा या जल सीमा (नौवाहन सीमा) विवादों में क्यों साथ आता है। यह सवाल बहुत प्रासंगिक है और चीन भारतीय सीमा विवादों की अंतर्दृष्टि के माध्यम से इसका जवाब दिया जा सकता है।
(नक्शा पश्चिमी (अक्साई चिन) क्षेत्र में सीमा के भारतीय और चीनी दावों को दर्शाता है, मैकार्टनी-मैकडोनाल्ड लाइन, विदेशी कार्यालय लाइन, साथ ही साथ चीनी सेना की प्रगति के रूप में उन्होंने चीन-भारतीय युद्ध के दौरान क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया।)

चीन-भारत सीमा विवाद को बेहतर ढंग से समझने के लिए इस नक्शे पर एक नजर डालने की जरूरत है, जिसने विभिन्न वर्षों में तत्कालीन ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के बीच हुई विभिन्न सीमाओं का सीमांकन किया है। इसके अलावा, यह मानचित्र वास्तविक सीमा के रूप में जॉनसन लाइन के भारतीय दावे का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें अक्साई चिन शामिल है, जबकि इसके विपरीत चीन अक्साई चिन को अपना क्षेत्र बता कर उसपर दावा करता हैं। यह नक्शा 1962 के युद्ध के दौरान चीनी आक्रामकता की सीमा को दर्शाता है। इसके साथ यह वास्तविक नियंत्रण रेखा का सीमांकन भी करता है। यह झिंजियांग-तिब्बत रोड के मार्ग को भी दिखाता है जो 1962 में युद्ध के सबसे बड़े कारणों में से एक था।
इन रेखाओं और सीमाओं पर अलग-अलग समय में बातचीत या सीमांकन से स्पष्ट होता है कि लद्दाख का यह क्षेत्र हमेशा पीढ़ियों-दर-पीढ़ियों से तिब्बत (अब चीन द्वारा कब्जा किए गए) और भारत के बीच संघर्ष का कारण रहा है। प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में इस संदर्भ में बहुत कुछ नहीं है, लेकिन आधुनिक इतिहास के दस्तावेज़ों के आधार पर कोई भी यह स्पष्ट रूप से देख सकता है कि समस्या का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजों द्वारा भारत को विरासत के रूप में दिया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत के ब्रिटिश मानचित्रों पर जॉनसन-अर्दग और मैकार्टनी-मैकडोनाल्ड दोनों लाइनों का इस्तेमाल किया गया था। 1908 तक, अंग्रेजों ने मैकडोनाल्ड लाइन को सीमा के रूप में इस्तेमाल किया, लेकिन 1911 में, चीन में शिनहाई क्रांति का परिणाम स्वरूप केंद्रीय शक्ति का पतन हुआ और प्रथम विश्व युद्ध के अंत तक, ब्रिटिश ने आधिकारिक तौर पर जॉनसन लाइन का इस्तेमाल किया। इन विरोधाभासों के साथ-साथ उन्होंने चौकी स्थापित करने या जमीन पर वास्तविक नियंत्रण का दावा करने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया। अक्साई चिन मुद्दे पर कभी भी चीन ने तिब्बत की सरकारों के साथ अंग्रेजों ने चर्चा नहीं की थी और यह सीमा विवाद भारत की स्वतंत्रता के तत्पश्चात तक बना रहा। आज़ादी के बाद यह मामला और भी पेचीदा हो गए क्योंकि भारत में नेहरू सरकार ने 1958 तक चीनी के साथ इस सीमा मुद्दे पर चर्चा नहीं की, जब तक की शिनजियांग-तिब्बत रोड की खबरें सार्वजनिक हुईं, और भारतीय मीडिया की सुर्खियां बनी। अपरिपक्व फॉरवर्ड नीति और अप्रभावी सैन्य तैयारी के कारण नेहरू सरकार ने लगभग 38 हजार वर्ग किमी का इलाका खोया (यानी अक्साई चिन) साथ ही सीमा का सीमांकन नहीं हुआ और एक चीज़ जिसका आज भी हम दंश झेल रहे है वो यह है की एक घोषित कार्य या संघर्ष-विराम सीमा (जैसे LOC जो हमारी पाकिस्तान से लगती कार्य/संघर्ष सीमा है) भी आज लद्दाख में नहीं है। 1967 के नाथुला और चोला संघर्ष में जीत की संभावनाओं के बारे में खुद को खुश करके 1962 को छिपाने की कोशिश करने वाले हर राजनीतिक तबके को एक ही सवाल का जवाब देने की जरूरत है कि तब से दो शक्तिशाली पड़ोसी, एक कार्मिक सीमा या सीमांकित संघर्ष-विराम को निर्धारित करने में सक्षम नहीं थे। इस तथ्य को भी समझने और गहराई से सोचने की जरूरत है कि अब तक भारत सरकार ने सीमा पर व्यवस्थाओं जैसे हथियारों के इस्तेमाल, सैनिकों के आचरण, गश्त आदि पर एक काल्पनिक (notional) LAC पर चीनी के साथ बातचीत की है, जो भारत और चीन दोनों में अलग है, अर्थात भारतीय नक्शे एक अलग एलएसी का सीमांकन करते हैं जबकि  चीनी नक्शे में अलसी का अलग सीमांकन हैं। और यह सब हमें एक बहुत ही बेतुकी वास्तविकता में लाता है कि शांति और स्थिरता के हर उपाय पर चर्चा की जाती है और दो पक्षों इसे लागू भी कर देते है लेकिन बिना एक सीमांकित संघर्ष विराम या कार्मिक सीमा के।

यह पूरे मसले की जड़ है। शुरुआती वर्षों में भारतीय नेतृत्व की ओर से सीमा मुद्दे को मुखरता से हलन करने वो की कीमत है जो हम अभी चुका रहे हैं। इन सभी वर्षों के दौरान चीनी ने अपने स्वयं के लाभ के लिए इस अनसुलझे सीमा का शोषण किया है और अब वह उन्हें हल करने में कोई रुचि नहीं रखता हैं क्योंकि यह उनके संकट की स्थिति के दौरान एक सुरक्षित निकास द्वार के रूप में करता है। चीनी जो गलत सूचनाओं और धोखे के स्वामी हैं, वो चीन हमेशा शांति और दोस्ती के नाम पर भारत के साथ बेहतर आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाएगा। यह तथाकथित भ्रामक शांति सिर्फ व्यापार के लिए है। शांति और पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंध बस एक धोखा और कुछ भी नहीं, यह एक आवरण जो चीन इन महत्वपूर्ण मुद्दों को, न केवल भारत के साथ, बल्कि अन्य देशों के साथ भी, छिपाने के लिए उपयोग करता है। इस रणनीति का चीन ने उपयुक्त समय पर उपयोग करने का काम किया है। भारत का चीन के साथ 48 बिलियन अमरीकी डालर का व्यापार घाटा है, जो इस भ्रामक शांति और लाभकारी रिश्ते में एकतरफा आर्थिक लाभ की तस्वीर दिखा रहा है। भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र में कई राष्ट्रों का व्यापार और कर्ज के संदर्भ में चीन पर बहुत अधिक निर्भरता दिखाई देती है, इस बात का उपयोग रणनीतिक और सामरिक दोनों स्तरों पर करता आया है। वह अपनी शक्ति से दुनिया का "नेक्स्ट अमेरिका या अंकल सैम" बनने की इच्छा रखता है। किसी भी कम्युनिस्ट शासन की तरह, चीन वास्तविकता की तुलना में भ्रामक प्रचार पर अधिक निर्भर करता है। दशकों से चीन द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे धोखे और विभाजन की रणनीति अब सभी के सामने आ गई है।

21 वीं सदी के युग में जहां सूचना का युद्ध दुनिया के सामाजिक व्यवस्था में गहराता चला गया है, किसी भी देश को अब पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तरह रणनीतिक लाभ नहीं है। वुहान वायरस ने एक ही झटके में चीनी भ्रामक नीति को नाकाम कर दिया। आज 120 से अधिक राष्ट्र वायरस की उत्पत्ति की जांच करने के लिए कह रहे हैं, जिसके कारण डब्ल्यूएचओ की भूमिका पर भी जांच की बात है, जिसमें चीन की मदद करने और जानकारी छुपने का आरोप लगाया गया है। इस वायरस ने चीनी नेतृत्व का असल चेहरा उजागर किया है जो संकट की शुरुआत के बाद से विफल रहा है, जिसके कारण उसकी विश्वसनीयता और छवि को एक गंभीर चोट लगी है। यहां तक की नेता भी चीन में आपस में ही एक सत्ता के खेल में लगे दिखाई देते हैं हांगकांग और ताइवान मुद्दे अब विश्व के केंद्र मे आ गए हैं। अपना चेहरा बचाने के लिए चीन जो कुछ भी करना चाहता है वह विफल हो रहा है और इसी कारण उसकी राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त दरारों का उपयोग अमेरिका कर रहा है। विश्व व्यवस्था बदल गई है और चीनी प्रभुत्व कम हो गया है। भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र के देशों के साथ कई सीमा और नौवाहन सीमा विवादों के माध्यम से चीन की छलावे की योजना का भीभंडाफोड़ हुआ है। चाहे भारत हो या जापान या वियतनाम या कोई अन्य भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र का कोई देश, हर कोई चीनी आक्रामकता के खिलाफ खड़ा है। चीन के खिलाफ इन देशों के रवैये में इस बदलाव को अब पश्चिमी दुनिया का काफी समर्थन भी प्राप्त हुआ है। पश्चिमी मीडिया में इन मुद्दों पर सक्रिय रूप से बहस हो रही हैं, जो चीन-विरोधी भावना को और मजबूत करने का काम रही हैं। इसलिए भारत व अन्य देशों के साथ सीमा और नौवहन सीमा विवाद के माध्यम से अपनी समस्याओं से बचाने की इस योजना चीन पूरी तरह से विफल रहा है।




Friday, June 26, 2020

"बलवान का सम्मान" : गौरव राजमोहन नारायण सिंह

लेखक का नाम गौरव राजमोहन नारायण सिंह (हृतिक सिंह) 
छात्र ,काशी हिन्दू विश्वविद्यालय।

(हाल ही में सीमा पे भारत और चीन के बीच हुए मुठभेड़ में  भारतीय सेना की शौर्य गाथा को दर्शाती हुई ये कविता और सवाल पूछने या सबूत मांगने वालों के मुंह पर कड़ा तमाचा।)

बलवान का सम्मान 
मन व्यथित, विचार हैं खंडित, सवालों का सैलाब है,
इस देश में बलवानों का क्यों नहीं सम्मान हैं।

इंच-इंच पर मारते-मारते, जिन्होंने अपने शीश दिए,
मार-मार कर दुश्मन को ही, सीमा पार धकेल दिए।

बिन गोली न गोले से, जिन्होंने माँ की सुरक्षा की,
हाथ बंधे थे फिर भी ऐसे, शूरवीरों ने रक्षा की।

जहाँ आज वीर बलवानों का, होना गौरवगान हैं,
वहाँ आज सिर्फ राजनीत का, पूरा बोलबाला है।

जो आजतक ये न जानते, लद्दाख कहाँ ग़लवान कहाँ है
वे आज चिल्ला कर कहते, देखो कब्ज़ा वहाँ हुआ है।

सेना पर सवाल का प्रचलन, व्यवहार में नया निम्न हुआ,
जयचंदों की राजनीति में, अब कुछ और न बचा हुआ।

शर्म करों नादानों तुमको शौर्य का कुछ मोल नहीं, 
दुर्ग के दरवाजों को क्यों, खोलने से फुर्सत नहीं ।

क्या लिखूं ऐसे लोगों पर, जिनके लिए कोई शब्द नहीं
बार-बार लौट आता हूँ ,क्या बलवानों का मोल नहीं ।

मेरे इन सवालों का, न कोई जायज़ उत्तर है,
आँख में आँसू हृदय में पत्थर, प्रलाप ही प्रलाप हैं।

द्रवित मन की उत्कंठा पर, एक ही मेरा जवाब हैं
इस देश में बलवानों का कहीं नहीं सम्मान हैं ।।

- गौरव राजमोहन नारायण सिंह (हृतिक सिंह)

एक हिन्दू की आवाज़

लेखक का नाम गौरव राजमोहन नारायण सिंह (हृतिक सिंह) 
छात्र ,काशी हिन्दू विश्वविद्यालय।

एक हिन्दू की आवाज़

सात दशक से दबते-दबते, देखों चला आया हूँ मैं....
समय-समय परिभाषित होता, देखों चला आया हूँ मैं।।

धर्म-जाति-संप्रदाय पर देखों, आज भी बटता आया हूँ...
हिंदुत्व कि अग्निपरीक्षा, देता-चला मैं आया हूँ।।

धर्मनिरपेक्षता कि सूली पर, देखों चढ़ता आया हूँ...
राजनीति के इस शतरंज का, मोहरा बनता आया हूँ।।

पर! देख सोच यह दुःख होता है, जिनके लिए संघर्ष किया...
उनकी-ही नज़रो में मेरा, आज मोल अब शुन्य हुआ।।

अरे! तुम भूले पर मैं ना भुला एक-एक बलिदान को...
उन वीरों की वीर कथा को, आज ज़रा तुम याद करो।।

परिवर्तन के महा-यज्ञ में, जिसने अपना सर्वस्व दिया...
उस, माह-तपस्वी, तेज-प्रतापी, हिन्दू को तुम याद करो।।

ये ना थे हिन्दू, ना थे मुस्लिम, वे थे एक धर्म-रक्षक...
इन दिव्य आत्माओं को-ही-तो, हिन्दू कि संज्ञा देते हैं।।

धर्म-जाति पर भिड़नेवाले, ये ज़रा-सा भूल जाते हैं...
कि, उनकी पृष्ठभूमि भी तो एक, हिंदुस्तानी सपूत की हैं।।

अरे! हिन्दू तो वह भवसागर है, जिसमें सब समाहित हैं...
इसमें हैं हिन्दू और हैं मुस्लिम, सिख-ईसाई भी तो है।।

अरे ! इसके अर्थ-को समझ लिया तो, समझ लिया ये हिन्द सारा...
अब इसकी रक्षा तुम्हरे जिम्मे, जिम्मे है ये हिन्द सारा।।

अरे! पाठक-श्रोता दोनों से ही,मेरा एक निवेदन है...
इसे प्रचारित और प्रसारित , करने की जिम्मेवारी हैं।।

जन-जन में भावना जगेगी, जगेगा एक संकल्प नया...
एक नई ऊर्जा, नई उमंग से, करे सृजन नए भारत का...करे सृजन नए भारत का...।।

( मधुशाला की गायन शैली से प्रेरित )