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Saturday, September 30, 2023

कुआं हमारे पूर्वजों की धरोहर है

आज कल सब कुएं की बात कर रहे है मेरे घर में दो कुआ था। एक कुआ बाहर  द्वार पर है ठाकुर जी के मंदिर से सटा हुआ ये मंदिर भी हमारे घर का जिसका मन आए अपना पूजा पाठ करे। जिसका मन था अपना रस्सी लाता था पानी निकालता था चला जाता था... कभी किसी को पानी के लिए नही रोका हमने और तो हमारे पूर्वजों ने ऐसे दसियो कुएं खुदवा रखे थे गांव भर में...। शाम को बैठकी भी होती थी यहां तमाम विषयों को लेकर खासकर क्रिकेट से लेकर राजनीति तक कुछ भी नही छूटता था। बहुत  लोगो की अनगिनत यादें इससे जुड़ी हुई है।

अब मंदिर कुछ ऐसा दिखता है.... कुएं को पाटा नही गया है.. बाकी सबके घर के हैंडपंप लगा हुआ है हैंडपंप क्या होता है बटन दबाकर हर हर गंगे होता है..!
ये हमारा पंपू सेट मशीन... अंगिनत यादों को समेटे.. अब भले
खंडहर हो चला है लेकिन इसका भी एक जमाना था .. 70 के
दशक में इसे नीदरलैंड के इंजीनियर साहब लोग बनाए थे.... यहां से भी लोग आते थे बटन दबाते थे पानी ले जाते थे अपने मन का ..हमारे दादाजी कभी नहीं टोके किसी को भी ना ही किसी को टोकने देते थे पानी के लिए .. भले सामने वाले से मारा मारी हुआ हो लेकिन पानी हमेशा ऑन रहता था किसी भी समय... आजकल लोग घड़ी देखते हैं यहां कोई समय नहीं देखा जाता था.. जिसे बोल दिए पानी देंगे उसे दे ही देते थे भले अपना कल भराए खेत... पैसा रूपया कुछ नहीं जिसका मन में आया दे दे कुछ भी नही तो रहने दे।

मेरे दादाजी इस मशीन पर अकेले रात में सोते थे रात में.. नाग देवता लोग भी आते जाते रहते थे पर किसी की हिम्मत नही थी इन्हे कोई मारे दादाजी मना किए थे इन्हें कोई नही छुएगा एक बार इनके घर में ही इनके बड़े भाई साहब ने एक सांप को मार दिए थे तो नाराज हो गए थे....! बाकी यहां झुंड लगता था लोगो का नहाने के लिए जो यहां नहाए हैं बचपन में उनका एक अलग ही अनुभव रहा  होगा..। 

ये टैंक जिसे हौदा भी बोलते थे हम लोग इसमें डूबकर नहाने का एक अलग ही मजा था।



जस का तस का देखिए सब पड़ा हुआ है। मैंने सोचा हैं इसे बनवाऊंगा जल्द ही काम लगवाने वाला हु। 

2005_7 तक के बाद यहां का काम खत्म हो चला था। घर में कोई ऐसा नही था जो ये सब काम देखें। सब पढ़ लिखकर बाहर ही निकल गए। खेती बारी कौन देख ही रहा है आज के समय में। पहले की तरह खेती बारी भी नही रह गई हैं। जहा तक मुझे लगता है गांव के युवा जो बाहर जाकर मेहनत मजदूरी करते है उतना तो अपने यहां सब्जियां उगाकर कमा लेंगे साथ में 2 चार गाय भैंस पाल ले तो क्या ही कहना ..! लेकिन भेड़ चाल में सब निकल पड़े है गांव गलियों को छोड़कर खैर इसपर चर्चा फिर कभी करूंगा किसी और ब्लॉग में।
ये ठीक पंपु सेट मशीन के पीछे ही है हमारे। ये पूर्वजों की विरासत में से एक है "बिशुन बाबा" हर दिवाली यहां दीया बारा जाता है। सभी गांव वालो के लिए पूजनीय है। इसके बगल में एक और कुआ हैं इतना पुराना होने के बाद भी इसमें साफ जल बना हुआ है।
ये रहा काली माई का तीर्थ स्थल में .. मेरे पूर्वजों में  एक काली बाबा थे जो यहां तपस्या किए थे इसी नीम के पेड़ के नीचे काली माई स्थापित हो गई कोई हिला ना सका ये नया मंदिर बनवाया लोगो ने लेकिन माई पेड़ के नीचे ही रही जस की तस माई की महिमा अपरंपार है..!
जय हो माई सबका कष्ट हरिए माई। माई के यहां अलग ही सुकून मिलता है।
ये देखिए यहां भी एक कुआ है जो अब वक्त के साथ खंडहर हो चला है। गांव वालों को कम से कम साफ सफाई रखनी चाहिए इधर ये तरांव गांव में पड़ता है मेरे गांव से कुछ ही दूरी पर नदी उस पार।
ये मेरे देवकली गांव की गांगी नदी क्या ही कहना? इसे देखकर कौन कहेगा की पानी के लिए तरसा होगा कोई। भले अब पीने लायक नही रह है लेकिन है तो है खेती बारी में इस्तेमाल होता ही है। बाढ़ आने के बाद ये पुल डूब जाता हैं। लेकिन घबराने की कोई बात नहीं रहती है एक दूसरा रास्ता भी है जो सबके लिए आराम दायक है।
ये पुल है जो नया नया बना है इसकी तवस्वीर सही से नही ले पाया मैं, बाढ़ में इसी का इस्तेमाल होता है। तराव वालों के लिए ये एक वरदान ही समझिए पहले जब बाढ़ आता था तो ये सबसे कट जाते थे। देवकली वालो को ये दिक्कत की खेत खलिहान सबके लगभग इधर ही है नदी पार। 

ये भी मेरे पूर्वजों की धरोहर है ...: ब्रह्म बाबा का मंदिर.. बाबा जगदीशानंद हमारे पूर्वजों में से एक...  यहां लोगो आते जाते रहते है बाबा सबकी सुनते है.. ये कुंवरपुर गांव में है सैदपुर तहसील जिला गाजीपुर.. आप लोग भी इस देव स्थान पर आ सकते है.. खास बात क्या की प्रांगण दसियो बिस्सा में फैला हुआ है कुआ भी मिलेगा और तो और यहां कोई पंडा पुजारी वाला फालतू लफड़ा भी नही है..एक लोग हमारे खानदान के है जो बैठते है इधर देखते रहते है सब ब्राह्मण आदमी है तो पूजा पाठ छोड़ कहा जाएंगे... बाकी शांति भरपूर मिलेगी ... यहां की बात ही कुछ और है बाबा किसी को निराश नहीं होने देते है जो यहां जो आया है कष्ट उसके दूर ही हुए है... बाबा के बारे में दसियो कहनिया किस्से है लिखूंगा आराम से कभी....!
                        जय हो ब्रह्म बाबा 

खास बात का है  हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित किया गया जितना भी कुआ है सैकड़ों वर्ष तक पुराने है,सबमें पानी अभी तक है और सबके सब देव स्थल हैं .... अगल बगल के गांव में दूसरो के द्वारा अब तक बनवाया गया सब सुख गया है.....! यूंही नहीं ब्राह्मण घराने में हमारा परिवार/ खानदान बड़ा है और लोग इज्जत करते है।फिलहाल इतना ही आगे की कड़ी में सिर्फ गांव के मंदिरो के बारे में विस्तृत रूप से चर्चा करूंगा। 

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Tuesday, September 8, 2020

अपने गांव में घूमते हुए जब मै रेलवे लाइन के पास पहुंचा।

ये नजारा शाम के वक्त का हैं जब मै अपने गांव देवकली (गाजीपुर यूपी में है) को घूमने निकला। पास ही में एक छोटा सा तरांव रेलवे स्टेशन है ।  मै तो कुछ पौधे लेने के लिए निकला था जोकि रेलवे लाइन के उस पार मिल रहा था आते वक्त शाम को मैंने ये तस्वीर ले लीं।
ये रहा उत्तर प्रदेश वन विभाग का पौधशाला। रास्ते में आते बहुत कुछ देखने को मिला। जिनकी तस्वीरें मैंने अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर ली। 
पौधशाला के अंदर की तस्वीर है । जहां छोटे छोटे पौधों की नर्सरी देखी जा सकती है। चाहे कोई  भी पौधा ले लीजिए 7 रुपए का ही मिलेगा। करीब 3 बजे घर से पैदल ही निकला था घूमने के लिए हलका धूप और छांव था। 
बिना इस पुल के यहां तक पहुंचना नामुमकिन सा था । ये पुल हाल ही में बना है जो देवकली और तराव को जोड़ता है। पुराने पुल पे तो बाढ़ का पानी लगा हुआ था तो यही एक आसान रास्ता दिखा।  चलते वक्त कुछ पंक्षी दिखे जो आमतौर बहुत कम देखने को मिलते है अब गांव में।

चलते चलते रास्ते ताड़ के बगीचों से गुजर कर निकलना था आखिर में ये जगह इसीलिए तो जानी जाती है। 
तस्वीरों में साफ देख सकते है ताड़ के पेड़ को जिसके फल से ताड़ी निकलती है भोग विलास डूबे हुए लोग इसका आनंद हर तरीके से उठाते है। बहुत पहले भोजपुरी  में गाना भी निकलता था " हमके ताड़ वाली ताड़ी चाही..!" ताड़ी पीना कोई गलत चीज नहीं पर हर चीज की अपनी एक हद होती है। चलते चलते रेलवे लाइन के पास आ पहुंचे तेज धूप निकल चुकी थी तपती हुई इस वक्त रेलवे के कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहे थे। ना जाने कितने ट्रेनें इधर गुजरती होंगी और ना जाने कितने अनगिनत  यात्री यात्रा का लुत्फ उठाते हुए अपनी मंजिल को पहुंचे होंगे। तब बहुत से नजारे वो खिड़कियों से देखते होंगे। 

इस तस्वीर को देखकर अपने बचपन की याद आ जाती है अपने दोस्तो के साथ खेलते घूमते हुए यहां तक पहुंचते थे कभी कभी तो यही सोचते विचारते थे कि रेल की पटरी कहा तक जाती होगी? 

एक बोर्ड दिखा जिससे साफ मालूम हुआ कि जहां आना था आ चुका हूं। यहां से लिप्टस और सागवन के पौधे लिए और घर को रवाना हुए। अब शाम रही थी तो रास्ते में अपने पूर्वजों की निशानी का भी हाल चाल लेते चले। रेलवे लाइन के पास में हमारी  जमीन थी सोचा देखते चलूं और साथ में पोखरिया पर (जगह का नाम) काली माई के दर्शन भी जाएंगे। लौटते वक्त और 2 तीन तस्वीरें ले ली मैंने । 


अब निकल पड़ा रास्ते घर की ओर सीधा वन विभाग के सामने से रेलवे लाइन पार करते ही एक रास्ता चला जा रहा है। 
बहुत पुराने जमााने की ट्यूबवेल मशीन यह एक मात्र जरिया था पानी का खेतो तक पहुंचाने का जिनके खेत नदी से दूरी पर थे। और अभी भी ये अपना कार्य कर रहा है।
ये रहा कली माई का मंंदिर जिसके जिसके दर्शन बहुत दिनों के बाद हुए। इस मंंदिर की महिमा अपरमपार है। माता जहां स्थापित है ज्यों की त्यों है।  इनकी मूर्ति को यहां स्थापित के मन्दिर का एक कमरा बना था पर किसी काम नहीं अब खाली ही पड़ा हुआ है और काली माता की मूर्ति वहीं नीम के छांव में विराजमान है। इसका भी अलग ही इतिहास है कहा जाता है कि मेरे पूर्वजों  में से एक काली बाबा यहां तपस्या किए थे जिसके चलते यहां काली माई आई और  इस स्थान को पवित्र कर दिया।
जय मां काली
मंदिर के पास में एक कुआ दिखा जो कभी गांव के लोगो की प्यास बुझाया करता था आजकल सुनसान पड़ा हुआ है। इस आधुुनिकता के जमाने में अब सबके घर में हैंडपंप लगा हुआ है किसी बाहर आने जाने की जरूरत भी नहीं पड़ती है। साथ में मोटर भी लगा हुआ है और बिजली हमेशा रहती है। स्टार्ट बटन दबाते ही हर हर पानी बहने लगता हैं ।इस कच्ची सड़क से लोगो के आने जाने में बहुत मदद मिलती है क्योंकि यही एक मात्र सहारा है गांव वालो का।


ये रहा ब्रह्म बाबा का मंदिर "जय हो ब्रह्म बाबा" । बाकी इधर उधर की तस्वीरें भी खींच लिया हूं।
इस बार लगभग सभी ने धान की  खेती पर जोर दिया है। जिन्होंने बाजरा बोया था सब भारी बरसात में बह गया। धान को इसी भारी बारिश का इंतेजार रहता है। नदी को देख के साफ कहा जा सकता है कितनी ज्यादा बारिश हुई होगी। 
इस पुल को देखिए डूब गया है जिससे लोगो को काफी दिक्कत सामना करना पड़ रहा है। 5 मिनट का रास्ता अब 20-25 मिनट का समय ले रहा है। कुछ दिनों में पानी पुल से नीचे उतर जाएगा इसमें घबाराने वाली कोई नई बात नहीं है यहां के लोगो के लिए।
पौधों को लेकर घर आ गये। अब इसको कल अच्छे से लगा दिया जायेगा। वृक्षारोपण का शाब्दिक अर्थ है। वृक्ष लगाकर उन्हें उगाना इसका प्रयोजन करना है। प्रकृति के संतुलन को बनाए रखना। मानव के जीवन को सुखी, सम्रद्ध व संतुलित बनाए रखने के लिए वृक्षारोपण का अपना विशेष महत्व है। मानव सभ्यता का उदय तथा इसका आरंभिक आश्रय भी प्रकृति अर्थात वन व्रक्ष ही रहे हैं। मानव को प्रारम्भ से प्रकृति द्वारा जो कुछ प्राप्त होता रहा है। उसे निरन्तर प्राप्त करते रहने के लिए वृक्षारोपण अती आवश्यक है।