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Tuesday, February 11, 2025

कुंभ एक धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम है न कि राजनीतिक


भारत में इस समय कुंभ चल रहा है। दुनिया भर के लोग यहां पहुंचे छोटे से लेकर बड़े तक। लाखों करोड़ों की भीड़ उत्साह से भरी हुई । इस बीच एक दुखद घटना भी घटी जो कि नहीं घटनी चाहिए थी । इस लेकर बहुत राजनीति भी हुई । वो भी राजनीति करने लगे जिन्होंने कुंभ मेले का प्रबन्धक एक मुस्लिम को बना रखा था जिनके कार्यकाल में भगदड़ मची थी रेलवे का पुल टूटा था और दो लाख से ज्यादा तो गुमशुदा हुए। और भी न जाने क्या क्या हुआ? जिन्हें सैफई महोत्सव से फुरसत नहीं मिला वो क्या कोई धार्मिक आयोजन करवाएंगे होंगे... बस माहौल बिगाड़ने आता है। 
आजकल कुकुरमुत्तों की तरह पत्रकार हो गए हैं। जिसे देखो वही माइक कैमरा लेकर पत्रकार बना हुआ है। गिद्ध पत्रकारों जमावड़ा लगा हुआ है जिनका  काम सिर्फ कुंभ खिलाफ नकारात्मक प्रचार प्रसार करना है। 
जया बच्चन प्रयागराज में नहीं रहती। उत्तर प्रदेश में ही नहीं रहती। गंगा जी में कुंभ मेले में मरे लोगों की लाशें फेंके जाने का कोई साक्ष्य नहीं है। फिर भी जुबान दराजी कर रही हैं और उत्तर प्रदेश को बदनाम कर रही हैं। रामगोपाल यादव ने भी कहा  कि लाशों को बालू में दफना दिया गया है  अब क्या बोला जाए दो कौड़ी के समाजवादियों को। इनके अध्यक्ष जी खुद फालतू बयान देने में लगे रहते हैं जिससे अराजकता फैलती है।

कांग्रेस बड़े नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा था कि "गंगा में डुबकी लगाने के लिए इन लोगों में कंपीटिनशन लगा रखा है। लेकिन गंगा में स्नान करने से गरीबी दूर होती है क्या, भूखे पेट को रोटी मिलती है क्या? मैं किसी की आस्था पर चोट करना नहीं चाहता। अगर किसी को दुख हुआ तो माफी चाहता हुं। लेकिन हजारों रुपए खर्च करके डुबकियां मार रहे हैं और जब तक टीवी पर अच्छे नहीं आता तबतक डुबकी मारते रहते हैं।"
भाजपा के विरोध में सनातन धर्म एवं संस्कृति का मजाक बनाकर रख दिया है इन लोगों ने जो कही से भी ठीक नहीं है।

तब में और अब में बहुत अंतर है ... आज के समय में निजी और सार्वजनिक दोनों साधन आसानी से उपलब्ध हैं। सड़के चौड़ी और बेहतरीन बन चुकीं हैं जिससे काफी समय बचता है, ट्रेनों में बढ़ोतरी हुई है कई सारी चल रही हैं पहले के मुकाबले, जहां एक लेन की पटरी थी दो लेन हो चुकी है। पहले लोगों को सोचना पड़ता था आने जाने में अब नहीं सोचता है कोई भी। लोगों के पास जब मोबाइल फोंस आए हैं सबकुछ आसान सा हो चुका है। ऐसा नहीं है कि सब पहले बहुत ज्यादा अमीर और पैसे वाले हो चुके हैं पर लोगों का थोड़ा बहुत लाइफ स्टैंडर्ड तो बढ़ा ही है..लोग अपने निजी वाहनों से निकल ले रहे हैं।
सोशल मीडिया पर फोटो वीडियो सबको डालने का शौक है ... खास मौके का सब इंतजार करते हैं.. कुंभ तो बहुत बड़ा मौका है। जमकर प्रचार प्रसार हुआ है खासकर सोशल मीडिया प्लेटफार्म का बहुत बड़ा योगदान है। वैसे इससे पहले भी लोग आते ही थे लेकिन इतने बड़े स्तर पर कभी नहीं।

व्यवस्था की जिम्मेदारी पूरी तरह से सरकार और प्रशासन की बनती है। इस आधुनिकता के दौर में तमाम तरह के भ्रामक खबरों को लेकर एक्शन लेना सरकार का काम है और किसी भी तरह की हुड़दंगई ना हो ये भी सुनिश्चित करना सरकार का काम है। आप इससे पीछे नहीं हट सकते हैं। प्रशंसा होगा तो आलोचना भी होगा।

पुरा भारत एक ही विशेष दिन कुंभ नहाले ये भी संभव नहीं है । लगभग सभी अपने गांवों शहरों से इक्कठे निकल ले रहे हैं। नियंत्रित करना आसान नहीं है पर अराजकता रोकना शासन प्रशासन का काम है। कुछ लोग भगदड़ में मरने वालों को कह रहे हैं उन्हें मोक्ष मिला है तो थोड़ा वाणी पर संयम रखे। कोई वहां मरने नहीं गया था। अब सबकुछ बढ़िया से निकले यही सब चाहते हैं। व्यस्था में थोड़ी चूक हुई लेकिन समय रहते सब संभाल लिया गया। ढंग से जांच होना बनता है जैसा प्रत्यक्ष दर्शियों ने बताया है ।

Tuesday, May 18, 2021

तथाकथित एजेंडो का पिटारा "टूलकिट"

आज बहुत बढ़िया बारिश हुई मानो बहुत दिनों बाद सुकून मिला हो। तीन चार दिन से उमस भरी गर्मी ने हाल बेहाल कर दिया था। इस लॉकडाउन में घर से बाहर निकलना खतरे से खाली नही। सबकुछ रुक सा गया है। पढ़ाई लिखाई तो एक तरह से बर्बाद ही हो चुकी है। इस वुहान वायरस ने झकझोर कर रख दिया है। कुछ तथाकथित न्यूज मीडिया वाले भी कम नही है इसको "इंडियन वेरिएंट" नाम से प्रचारित कर रहे है। बताइए भला जिसकी उत्पत्ति चीन में हुई हो उसे इंडियन वेरिएंट कहना कहा तक ठीक है? बात यही तक नही रह जाती कोई इस कोरोना वायरस को वुहान वायरस कह देता है तो उल्टा उसपर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं।
लाशों की तलाश में निकले पत्रकार आजकल चमक रहे है। सोशल मीडिया के माध्यम से उलूल-जुलूल तथ्यों को लोगो के सामने परोस रहे है। दूसरी लहर ने इनके सूखे जीवन में बरखा कर दी और फिर से जीवन हरा-भरा हो गया है। कुछ मिल भी नही रहा था एजेंडा चलाने के लिए कुछ नही तो यही सही। अब श्मशान घाट के मुर्दे तो बोलेंगे नही कोई तो चाहिए न जो इनकी आवाज बने। पिछले साल करोड़ों भारत में लोग मर रहे थे इनके अनुसार इस बार कुछ नही तो बीस-पच्चीस लाख तो ये मार ही दिए होंगे अपने जादुई आंकड़े का हवाला देकर। देखिए क्या क्या करते है ये लोग इनको ऐसे ही थोड़ी न विदेशियों द्वारा "कोरोना पत्रकार" के टाइटल से नवाजा जा रहा है। 

अफवाह फैलाया जा रहा है की सरकार वुहान वायरस से मरने वालों के आंकड़ों को छिपा रही है। अगर सरकार को छिपाना होता चार हजार से ज्यादा लोगो की मृत्यु हो रही इसे ही न छिपा देती। लाशों को समुद्र या सागर में फेंक दिया जाता जल जीवो का आहार बनने के लिए किसी को खबर ही नहीं लगती। लाशों का तमाशा करके रोजी रोटी चलाया जा रहा है इसके विरोध में बोल दो तो "डर का माहौल है" अब कोई आजाद देश में  पत्रकारिता भी नही कर सकता क्या? पत्रकारों की आजादी छीनी जा रही है!  नकारात्मक खबर दिखाकर वाहा-वाही लूटी जा रही है दुनिया भर से कि "अरे देखो कितना बेहतरीन पत्रकार है सत्य को दिखा रहा है!" 
अफवाह क्या सरासर झूठ बोला जा रहा है इन तथाकथित पत्रकारों द्वारा। गांव समाज से  जुड़ा हुआ  व्यक्ति देखेगा इसको टेलीविजन या सोशल मीडिया पर वो यहीं मानेगा न की इतने बड़े पत्रकार है झूठ थोड़ी बोलेंगे। कुछ नही सब वामपंथी, तथाकथित लिबरलो का एजेंडा है।

कांग्रेसियों का तो टूलकिट वायरल हो रहा है सोशल मीडिया पर जैसे किसान आंदोलन में विदेशी लड़की ग्रेटा थर्नबर्ग का हुआ था। टूलकिट एक माध्यम बन गया है भारत विरोधी एजेंडा चलाने का। भाजपा नेताओं का कहना है कि ये वो दस्तावेज है, जिसके माध्यम से कॉन्ग्रेस ने अपने नेताओं को कोरोना काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कुम्भ मेला को बदनाम करने के तरीके समझाए हैं। ये टूलकिट दिखाता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी किस तरह एक महामारी के वक़्त भी राजनीति का घिनौना खेल खेलने से बाज़ नहीं आती है।इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने और देश की संस्कृति को निशाना बनाने के निर्देश दिए गए हैं। ईद की भीड़ पर चुप रहने के विशेष निर्देश भी दिए गए हैं। कॉन्ग्रेस के ‘माननियों’ द्वारा इसमें अपने आईटी सेल को ईद और कुम्भ की तुलना करने से बचने की भी सलाह दी गई है।
टूलकिट में कार्यकर्ताओं से आस-पास के अंतिम संस्कार स्थलों से ‘शवों और अंत्येष्टि की तस्वीरों का नाटकीय रूप से उपयोग’ करने के लिए भी कहा गया है। इसके अलावा, स्थानीय कॉन्ग्रेस नेताओं को अस्पतालों में बेड ‘रोकने’ के सुझाव दिए गए हैं, जिसे कॉन्ग्रेस के इशारे पर ही मरीजों को दिया जाएगा। टूलकिट में गुजरात को कोविड के खिलाफ लड़ाई में असफल राज्य बताने के साथ ही कॉन्ग्रेस नेताओं को PM CARES पर भी सवाल उठाने का निर्देश दिए गए हैं। इतना ही नही कुछ भारतीय मीडिया संस्थानों के ‘मित्र पत्रकारों’ से कोरोना के नए स्ट्रेन को ‘इंडियन स्ट्रेन’ लिखवाने के निर्देश दिए गए है ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि खराब हो और इसका नतीजा मोदी को चुनाव में उठाना पड़े।
इन सब से एक बात समझ में तो आही गई होगी की कौन कितना बड़ा दूध का धुला हुआ है। खैर गिद्धों का काम ही क्या है? 

Friday, May 14, 2021

लाशों पर पत्रकारिता

आजकल बड़ा सुर्खिया बटोर रही है अनगिनत अनजान लाशे। कुछ तो माइक और लेकर बैठ जा रहे है श्मशान घाट पर फिर होता लाइव कवरेज जलती हुई लाशों का। देश विकट परिस्थितियों से जूझ रहा और ये मनहूसियत फैला रहे है अपने खूनी खबरों से। कुछ लोग कह रहे है सत्य दिखाना गलत है क्या? नही सत्य दिखाना गलत नही है पर किसी अनजान व्यक्ति के लाश को दिखाना कितना सही है? क्या ये अपमान नही है? श्मशान घाट पर रोज लाश जलती है लोग विभिन्न कारणों से अपने प्राण गवा देते है। जितना जीवन सत्य है उतना मृत्यु भी इस बात कोई झुठला नहीं सकता है। लेकिन असल मुद्दा तो ये है कि आजकल लोग वुहान वायरस से मर रहे है। सरकार को बदनाम करने के लिए लाशों को फुटेज मिल रहा है भले ही देश का नाम खराब हो इन तथाकथित लोगो कि पत्रकारिता चलनी चाहिए।

देखा जाए तो विदेशो में भारत से ज्यादा लोगो की मृत्यु हुई है इस वुहान वायरस से। अमेरिका को ही ले लीजिए उसकी स्थिति देखिए आपको खुद पता चल जायेगा कितनी भयावह स्थिति हो गई है पर वहा की मीडिया क्या अपने आम जनता की लाशों कवरेज दे रही है? अमेरिका छोड़िए यूरोप का ही उदारहरण ले लीजिए। एक तरह से अपना एजेंडा ही चला रहे है ये लोग इनका काम सिर्फ और सिर्फ भारत की छवि बिगाड़नी है। मोदी घृणा में ये कुछ भी करने को तैयार है।विपक्षी दलों नेता वैक्सीन न लगवाने का अपील कर रहे थे कुछ दिन पहिले तक। कुछ नेता तो वैक्सीन लगवाने से नपुंसक हो रहे थे। अब क्या हो रहा है ? अब लाशों का  ढिढोरा पीटा जा रहा है की सरकार गलत कदमों की वजह से मौतें हो रही है। वैक्सीन का उत्पादन क्यों नही हो रहा है? ऑक्सीजन को लेकर भी लोग बवाल खड़ा किए थे।

अब तो गंगा में लाशों के प्रवाह कि खबरे आना शुरू हो गई है। मानो ये घटना लिबरल मीडिया के लिए वरदान साबित हुई है। अब भारत की छवि और धूमिल करेंगे ये तथाकथित पत्रकार। निश्चिंत ही ये सरकारों की जवाबदेही है की आखिर लोग लाश को जल में प्रवाहित क्यों कर रहे है? क्या मामला है की दाह संस्कार करने वाले जगहों पर जल प्रवाह किया जा रहा है? कोरोना संक्रमित लाशो के लोग नजदीक नही चाहते है कही संक्रमण फैल ना जाय पर इसका मतलब ये भी नही की उस मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी ढंग से ना हो। किसी का भी परिवार हो चाहे निर्धन असहाय ही क्यों ना हो वो अपने जिगर के टुकड़े का शव क्षत- विक्षत तो नही होने देगा। कुंठित मानसिकता वालो का कुछ कहा नहीं जा सकता उनके लिए अपने जान और माल से बढ़कर कुछ भी नही हैं भले उनका पुत्र उनके सामने क्यों ना दम तोड़ दे। कोई तो पिता की लाश ही नही लेने जा रहा है मजबूरी में अस्पलताल वाले लाश को सामाजिक संस्थाओं के हवाले कर दे रहे है। गंगा में शव बहाना कोई आज की परंपरा नहीं है बहुत पुरानी है पर जल प्रदूषण के रोकथाम के लिए इसपर सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाया गया है। जो श्मशान में बैठकर लाइव कवरेज दे सकता है मानो पिकनिक मन रहा हो उनके लिए तो ये बहती गंगा में लाशे किसी अमृत से कम थोड़ी है !

Monday, October 5, 2020

लाश लकड़ी और रोटी

लेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय

अरे ये क्या वो देखो क्या हो रहा है? लकड़िया जलाई जा रही है और क्या? अरे बुड़बक तनिक ध्यान से देखो उसमे मासूम लड़किया भी जल रही है ! ओ तेरी ई सब का हो रहा है कुछ लोग इसी पे रोटिया सेक रहे है घी में चपोर-चपोर के खाने के लिए। कौन है ये लोग? अरे नहीं जानते हो ये वही लोग है सालो - साल पंचतारा होटलों के वातानुकूलित कमरों में आराम से बैठकर तंदूरी का चाव से मज़ा लेते है। ये मौका बार - बार नहीं मिलता है इस तरह जलती हुई लकड़ियों पे रोटी सेकने का। देखो सब कितना मज़ा लेकर खा रहे है रोटिया। ऐसी रोटियों में गजब की ताकत होती है, जो इसको खा लेता है वो बुद्धिजीवी हो जाता है। गिद्ध तो सीधा लाश को नोच - नोच कर खा जाते है पर ई लोग जलती हुई लाश पर रोटी सेंक कर खाने का दम रखते है। कवनो ज्यादा फर्क नाही है गिद्धों में और इनमें सिवाय इसके की  गिद्ध पक्षी और ये मनुष्य है। जलती हुई लाश पर रोटियां सेकने की परंपरा तो कई दशकों से चली आ रही है फिर चाहे वो लड़की की हो, जवान का हो, किसान का हो या विशेष जाति - धर्म का हो इसीलिए ये आवाम भी दशकों से परेशान है। 
रोटी को भी विशेष नाम दिया गया है "राजनीतिक रोटी" जो हर कोई सेके जा रहा है। मत पूछिए बड़ी लंबी होड़ लगी हुई हैं ,गजब की भीड़ और मारामारी है। हर कोई अपना हक मांग रहा है नहीं किसी से भीख मांग रहा है। मजाल किसी की कोई रोककर देखा दे इनको अरे भाई झुझारू नेता - परेता लोग है ये नहीं जलती हुई लाश पर रोटी सकेंगे तो कौन सेकेगा? ओ कुछ पत्रकार भी है का लाइन में लगे हुए है नमक, मिर्च, मसालों के साथ अब बिना इसके सब्जी तो बन नहीं सकती न। नीछान सादि रोटियां मज़ा थोड़ी न देंगी तो ये भी आ जाते है माल मटेरियल लेकर। झूठ कपास , उलुल - जुलूल , इधर - उधर की फालतू बकैती करने वाले कुछ मुट्ठी भर डिजाइनर पत्रकारों का काम होता जब लकड़ियां जल कर राख हो जाय तब उसको क्षितिर - वितिर कर के उसको हवा में उड़ा देना। इन्हें क्या मालूम कि लोगों पर क्या गुजर रही होगी जिनके मृत परिजनों के जलती हुई चिता पर ये घिनौना खिलवाड़ होता है ?  यह सब एक साजिश और षड्यंत्र के साथ किया जाता है इस देश की एकता और अखंडता को तोड़ने के लिए। जब कोई भी व्यक्ति जाति विशेष का भूखा मरता है कोई नहीं जाता उसका खोज खबर लेने  के लिए पर जहां कोई उसके साथ दुर्घटना या अनहोनी हो जाती है तो सब उसके घर में इतनी भीड़ लगा देते है कि इनसे बड़ा कोई उसका हितैषी ही नहीं है। मौका मिला नहीं शुरू हो गए दलितों की तुष्टिकरण की राजनीति करने। कभी सवर्णों से लगाव तो कभी पिछड़ों से जुड़ाव बस जहां इनकी राजनीतिक रोटी को आग मिल जाय देखने के खातिर और का रखा है जीवन में! आरोपी अगर मुस्लिम हो तो ऐसी चुप्पी साध लेंगे की मानो जैसे कोई सांप सूंघ गया हो, इसी को कहते है मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति।  इन सबका फायदा मिशनरी वालो भी फायदा उठाते है धर्मपरिवर्तन करके दलित को ईसाई बनाकर। एक ग़लत धरना उत्पन्न की जाती है दलितों के सामने तुम्हारे साथ हिंदू धर्म में अपमान और अत्याचार हो रहा है। आओ इशू प्रभु के शरण में। यह अब एक एजेंडा नहीं है तो क्या है? किस नजरिए से देखा जाए इसको? जब कोई भी अपराध होता है तो बिना जांच - पड़ताल के विवादित और भड़काऊ बयान देने के तथाकथित सेकुलर समाजवादी लिबरल गैंग सक्रिय हो जाता है। एक मंच पर खुलेआम लोगों के सामने एक क्षेत्रीय पार्टी का नेता दूसरे समाज के मा, बहन - बेटियों को गरियाता है पर इस पर मीडिया में कोई शोर शराबा देखने को नहीं मिलता है क्योंकि वह नेता पिछड़े वर्ग का है। जब विकास दुबे जैसा अपराधी मारा जाता है तब शोर-शराबा होने लग जाता है 'ब्राम्हण को कैसे  मार दिए'? मतलब जो सही है उसको नहीं दिखाएंगे जो गलत है उसके लिए लड़ मर जाएंगे वाह क्या गजब है हम किस अजीबो - गरीब भारत में जी रहे है जहां हिन्दू धर्म तोड़ने की साजिश रची जा रही है कुछ गद्दारों द्वारा सिर्फ सत्ता सुख के लिए। जघन्य अपराध करने वालों के लिए समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए चाहे वो किसी भी जाति , धर्म या मजहब का हो। उसको कड़ी से कड़ी सजा मिले पर इस तरह जलती हुई लाश पर रोटियां सेंकने वालों को सबक सिखाने सख्त जरुरत है।