Showing posts with label नक्सलवाद. Show all posts
Showing posts with label नक्सलवाद. Show all posts

Wednesday, April 9, 2025

मोदी सरकार मार्च 2026 तक पूरे देश से नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए संकल्पित है

नक्सलवाद की लड़ाई में सरकार तनिक भी पीछे नहीं हटी है। गृह मंत्री ने जो कहा था वो जमीनी स्तर पर दिख रहा है। नक्सलवाद ने देश का बहुत नुकसान किया है और इसकी वजह से देश के कुछ इलाके पिछड़े ही रह गए और विकास की राह ताकते रह गए। डेढ़ दो सालों से जो से जो एक्शन लिया जा रहा है सरकार द्वारा और सुरक्षा बलों ने जिस तरह से ऑपरेशन चलाया है निश्चिंत ही प्रशंसनीय है।  गृह मंत्री अमित शाह अगस्त 2024 और दिसंबर 2024 को छत्तीसगढ़ के रायपुर और जगदलपुर आए थे। वे यहां अलग-अलग कार्यक्रमों में शामिल हुए थे। इस दौरान उन्होंने अलग-अलग मंच से नक्सलियों को चेताते हुए कहा था कि हथियार डाल दों। हिंसा करोगे तो हमारे जवान निपटेंगे। वहीं, उन्होंने एक डेडलाइन भी जारी की थी कि 31 मार्च 2026 तक पूरे देश से नक्सलवाद का खात्मा कर दिया जाएगा। शाह की डेडलाइन जारी करने के बाद से बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन काफी तेज हो गए हैं।

अभी हाल ही में एक हुए एक ऑपरेशन में 18 नक्सली मारे गए जिसमें 11 महिला नक्सली शामिल थी। इन मारे गए नक्सलियों में एक 25 लाख इनामी नक्सली दरभा डिविजन सचिव कुड़हामी जगदीश उर्फ बधुरा भी शामिल है। नक्सली जगदीश एक दर्जन से अधिक घातक नक्सली घटनाओं में वांछित था, जिसमें 2013 का झीरम घाटी हमला भी शामिल है। इस घटना में कांग्रेस के कई नेता मारे गए थे।

नक्सलवाद के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस की नीति के चलते वर्ष 2025 में अब तक केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा तैयार किए गए आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में मुठभेड़ों में कम से कम 130 नक्सली मारे गए हैं। इनमें से 110 से ज्यादा बस्तर संभाग में मारे गए, जिसमें बीजापुर और कांकेर समेत सात जिले शामिल हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से 105 से अधिक नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और 2025 में अब तक 164 ने आत्मसमर्पण कर दिया है। वहीं इससे पहले वर्ष 2024 में 290 नक्सलियों को न्यूट्रलाइज़ किया गया था, 1090 को गिरफ्तार किया गया और 881 ने आत्मसमर्पण किया था। अभी तक कुल 15 शीर्ष नक्सली नेताओं को न्यूट्रलाइज़ किया जा चुका है। 


सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि अभी कोई विरोध प्रदशर्न देखने को नहीं मिला उन तमाम वामपंथी संगठनों और लोगों का जो इनके समर्थन  में लिखते और बोलते हुए दिख जाते थे। अर्बन नक्सल ने युवाओं को प्रभावित तो किया ही है पर इस समय सब शांत हो चले हैं। कुछ भी बोले तो लेने के देने पड़ जाएंगे। आज के समय में इनका प्रोपोगेंडा पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। मोदी सरकार रुथलैस अप्रोच के साथ वामपंथी उग्रवाद के पूरे इकोसिस्टम को ध्वस्त कर रही है।  नक्सलवाद की एक ही विचारधारा है - विध्वंस और हिंसा।  मानव अधिकार के आड़ में अपने लिए ही संवेदना बटोरना नक्सलियों की रणनीति रही है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के हिंसा के शिकार इन लोगों के जख्म नक्सलवाद की अमानवीयता और क्रूरता के जीवंत प्रतीक हैं।

साफ संदेश है नक्सलवाद को की क्रांति तुम्हारे खून से होगी बंदूक छोड़ दो वरना दौड़ा दौड़ा कर ठोके जाओगे। देखा जाय तो पूरी प्लानिंग के तहत जवाबी कार्रवाई हुई है। जब से विष्णु देव साय छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने हैं तब से बहुत कुछ बदलाव देखने को मिला है। इतनी तेजी से भारी मात्रा नक्सलियों का सफाया कभी नहीं हुआ था। आमने- सामने की लड़ाई पुरी से तरह सुरक्षाबल हावी  दिखे हैं। पहले केवल हमारे जवानो की जाने जाती थी लेकिन अब इसके उलट हो रहा है कारण मजबूत राजनीतिक इच्छा शक्ति बिना इसके ये असंभव था । प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के कुशल नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में एक नया इतिहास रचा जा रहा है। सबसे पहले देखने वाली बात है कि ऑपरेशन सीधा गृह मंत्रालय से ऑपरेट किया जा रहा हैं केंद्रीय सुरक्षा बलों के नेतृत्व में वो भी और साथ में डीआरजी भी शामिल है। उन्हें सबकुछ दिया जा रहा जिसकी वो मांग करते आए थे। मेरे ख्याल से  सिर्फ वहीं लोग ऑपरेशन में शामिल हैं जो जंगल  ट्रेनिंग और वारफेयर में बेस्ट हैं।  

छत्तीसगढ़ सरकार ने भी अपनी नई आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के तहत कई प्रोत्साहन शुरू किए हैं, जैसे आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक सहायता, नौकरी और शिक्षा की सुविधाएं प्रदान करना। इस नीति का असर दिख रहा है, क्योंकि हाल के महीनों में आत्मसमर्पण की संख्या में वृद्धि हुई है।
बस्तर संभाग में नक्सलवाद के खिलाफ अभियानों के साथ-साथ विकास कार्यों पर भी जोर दिया जा रहा है। सड़कें, स्कूल, अस्पताल और बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने के लिए कई परियोजनाएं शुरू की गई हैं। सरकार का मानना है कि विकास और सुरक्षा के संयुक्त प्रयासों से नक्सलवाद को जड़ से खत्म किया जा सकता है। शाह के दौरे से स्थानीय लोगों में भी उम्मीद जगी है कि बस्तर जल्द ही नक्सल मुक्त होकर एक नई पहचान बनाएगा।

मां दंतेश्वरी की कृपा से बस्तर नक्सलवाद के दंश से उबर रहा है, पूर्ण विश्वास है कि मां ऐसा भी दिन दिखाएंगी जब बस्तर नक्सलवाद के गढ़ के रूप में नहीं बल्कि अद्वितीय आदिवासी संस्कृति और रमणीय प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाएगा।
मेरी प्रभु राम से भी यह प्रार्थना है कि उनका ननिहाल नक्सलवाद के दंश से अविलंब मुक्त हो।
जय श्री राम
जय मां दंतेश्वरी।।

Saturday, April 10, 2021

रणनीति बदलने की जरूरत

लेखक- मारूफ रजा
सामरिक विश्लेषक
        बीजापुर में सर्च ऑपरेशन - फोटो : ANI

माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर में हुई मुठभेड़ के दौरान बंधक बनाए गए सीआरपीएफ के कोबरा कमांडर राकेश्वर सिंह मनहास को सामाजिक कार्यकर्ता धर्मपाल सैनी और आदिवासी नेता तेलम बोरइया की मौजूदगी में छोड़ दिया है। तीन अप्रैल को बीजापुर के तरेम के जंगल में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में सीआरपीएफ, एसटीएफ और डीआरजी के 22 जवान शहीद हो गए थे। इस घटना के बाद क्या इस बात की समीक्षा होगी कि आखिर क्यों माओवादी मध्य भारत के जंगल में लगातार सफल होते जा रहे हैं?
बस्तर में सुरक्षा बलों के भारी-भरकम दस्ते पर घात लगाकर किया गया माओवादियों का यह हमला मध्य भारत के माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में किए गए अतीत के दूसरे हमलों जैसा ही था। अक्सर घात लगाने का उनका तरीका अतीत में किए गए हमले जैसा ही होता है। सुरक्षा बलो पर या तो तब हमला किया जाता है, जब जंगलों में थका देने वाले ऑपरेशन के बाद वे कैम्प की ओर लौट रहे होते हैं या फिर जब वह ऐसे पुलिस कैम्प में होते हैं, जिसकी पुख्ता सुरक्षा न हो। ऐसे जनसंहार को रोकने के तरीके हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए ऊपर से नीचे की ओर देखने के दृष्टिकोण की जरूरत है, न कि नीचे से ऊपर की ओर देखने वाले दृष्टिकोण की। माओवादियों ने विगत तीन दशकों में भारत के मध्य हिस्से में विस्तार किया है और वह समय-समय पर पशुपति (नेपाल) से लेकर तिरुपति (दक्षिण भारत) तक लाल गलियारे में अपनी ताकत दिखाते रहते हैं। कुछ वर्ष पूर्व अपने चरम में देश के दो सौ जिले माओवादी हिंसा से प्रभावित थे और उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आधिकारिक तौर पर कहा था कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए माओवादी हिंसा सबसे बड़ी चुनौती है)

दिल्ली से किए जाने वाले प्रयास आज भी पहले जैसे ही अनियमित हैं। एक समस्या देश की संघीय प्रकृति और राज्य सरकारों के विरोध से जुड़ी हुई है। यह चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र सरकार के समग्रता में किए जाने वाले प्रयास को बाधित कर सकता है। एक राज्य के विद्रोही किसी दूसरे राज्य के वोट बैंक नहीं हो सकते! यह दुखद है कि नागरिकों की सुरक्षा के मामले में राजनीति अक्सर अतीत की चूकों का अनुसरण करने लगती है। इस क्षेत्र में जरूरत से अधिक तनाव झेलते हुए पुलिस जवान पर्याप्त वरिष्ठ नेतृत्व के काम करते रहते हैं।

एक दशक पहले सीआरपीएफ के एक डीजीपी ने मुझे बताया था कि उनके लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि कैसे वह सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारियों (आईजी और डीआईजी) को शहरों की आरामदायक जिंदगी से बाहर निकालकर जंगलों में तैनात बल की कमान संभालने के लिए भेजें। हमारे प्रायः सारे पुलिस बल का नेतृत्व आईपीएस अधिकारी करते हैं और उनमें से अनेक पुलिस के कार्य में दक्ष है और ये नक्सलियों या उग्रवादियों से मुकाबला करने के लिए सिविल सेक से नहीं जुड़े हैं। इसके अलावा उनके पास न तो नक्सली हिंसा से लड़ने का अनुभव है और न ही वह दिलचस्पी । वे ऑपरेशनल एरिया में तैनाती के प्रति अनिच्छुक होते हैं। एक तरीका है कि सेना के उग्रवाद विरोधी ऑपरेशन के अनुभव वाले वरिष्ठ अधिकारियों (कर्नल से लेकर जनरल) को केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ के जवानों का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी जाए। यदि सेना गृह मंत्रालय या पीएमओ के अधीन आने वाले एनएसजी या एस्टेब्लिशमेंट 22' (विशेष सीमांत बल) के लिए अधिकारी उपलब्ध करा सकती है, तो फिर माओवाद विरोधी अभियान के लिए क्यों नहीं? इसी तरह से ऐसे ऑपरेशन में हेलीकॉप्टर के इस्तेमाल के बारे में भी विचार करना चाहिए।

नक्सली और चरमपंथी रोजगार और आधारभूत ढांचे से वंचित स्थानीय लोगों से समर्थन जुटाते हैं। माओवादियों से निपटने के लिए तीन स्तरीय रणनीति पर काम हो सकता है: (1) आवश्यक सैन्य बल का इस्तेमाल (2) स्थानीय लोगों की बुनियादी मुश्किलों के समाधान के साथ ही आधारभूत ढांचे का समयबद्ध निर्माण (3) जमीनी स्तर पर स्थिति के नियंत्रित होने और सैन्य ऑपरेशन के कम होने के बाद स्थानीय लोगों की राजनीतिक मांगों को सुलझाने के लिए बातचीत की पहल।

(इस लेख का स्रोत अमर उजाला  अखबार है। जिसे  राष्ट्रचिंतक ब्लॉग पर प्रकाशित किया गया है )

Tuesday, April 6, 2021

आतंकवादी है ये

लेखक- अवधेश कुमार

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में माओवादियों ने फिर साबित किया कि आतंकवाद की तरह खून और हिंसा के अलावा उनका कोई मानवीय उद्देश्य नहीं। पूरा देश शहीद और घायल जवानों के साथ है। करीब चार घंटे चली मुठभेड़ में 15 माओवादियों के ढेर होने का मतलब उनको भी बड़ी क्षति हुई है। साफ है कि वे भारी संख्या में घायल भी हुए होंगे। किंतु, 2223 जवानों का शहीद होना वड़ी क्षति है। 31 से अधिक घायल जवानों का अस्पताल में इलाज भी चल रहा है। इससे पता चलता है कि माओवादियों ने हमला और मुठभेड़ की सघन तैयारी की थी।
जो जानकारी है माओवादियों द्वारा षडयंत्र की पूरी व्यूह रचना से घात लगाकर की गई गोलीबारी में घिरने के बाद भी जवानों ने पूरी वीरता से सामना किया, अपने साथियों को लहूलुहान होते देखकर भी हौसला नहीं खोया, माओवादियों का घेरा तोड़ते हुए उनको हताहत किया तथा घायल जवानों और शहीदों के शव को घेरे से बाहर भी निकाल लिया। कई बातें सामने आ रही हैं। सुरक्षाबलों को जोनागुड़ा की पहाड़ियों पर भारी संख्या में हथियारबंद माओवादियों के होने की जानकारी मिली थी। छत्तीसगढ़  के माओवाद विरोधी अभियान के पुलिस उप महानिरीक्षक ओपी पाल की माने तो रात में बीजापुर और सुकमा जिले से केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कोबरा बटालियन, डीआरजी और एसटीएफ के संयुक्त दल के दो हजार जवानों को ऑपरेशन के लिए भाजा गया था। माओवादियों ने इनमें 700 जवानों को तर्रेम इलाके में जोनागुड़ा पहाड़ियों के पास घेरकर तीन ओर से हमला कर दिया। इस घटना के बाद फिर लगता हैं मानो हमारे पास गुस्से में छटपटाना और मन मसोसना ही विकल्प है। यह प्रश्न निरंतर बना हुआ है  कि आखिर कुछ हजार की संख्या वाले 
हिंसोन्माद से ग्रस्त ये माओवादी कब तक हिंसा की ज्वाला धधकाते रहेंगे? ध्यान रखिए माओवादियों ने 17 मार्च को ही शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा था। इसके लिए उन्होंने तीन शर्ते रखी थीं - सशस्त्र बल हटे, माओवादी संगठनों से प्रतिबंध खत्म हों और जेल में बंद उनके नेताओं को बिना शर्त रिहा किया जाए। एक ओर बातचीत का प्रस्ताव और इसके छठे दिन 23 मार्च को नारायणपुर में वारूदी सुरंग विस्फोट में पांच जवान शहीद हो गए। दोपहर में सिलगेर के जंगल में घात लगाए माओवादियों ने हमला कर दिया था। ऐसे खूनी धोखेबाजों और दुस्साहसों की लंबी श्रृंखला है। साफ है कि इसे अनिश्चितकाल के लिए जारी रहने नहीं दिया जा सकता। यह प्रश्न तो उठता है कि आखिर दो दशकों से ज्यादा की सैन्य -असैन्य कार्रवाइयों के बावजूद उनकी ऐसी शक्तिशाली उपस्थिति क्यों है? निस्संदेह, यह हमारी पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यहीं से राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रश्नों के घेरे में आती है। पिछले करीब ढाई दशक से केंद्र और माओवाद प्रभावित राज्यों में ऐसी कोई सरकार नहीं रही जिसने इन्हें खतरा न बताया हो। यूपीए सरकार ने आंतरिक सुरक्षा के लिए माओवादियों को सबसे बड़ा खतरा घोषित किया था। केंद्र के सहयोग से अलग-अलग राज्यों में कई सैन्य अभियानों के साथ जन जागरूकता, सामाजिक-आर्थिक विकास के कार्यक्रम चलाए गए हैं, लेकिन समाज विरोधी, देश विरोधी, हिंसाजीवी माओवादी रक्तबीज की तरह आज भी चुनौती बन कर उपस्थित हैं। हमें यहां दो पहलुओं पर विचार करना होगा।

भारत में नेताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, एक्टिविस्टों का एक वर्ग माओवादियों की विचारधारा को लेकर सहानुभूति ही नहीं रखता उनमें से अनेक इनको कई प्रकार से सहयोग करते हैं। राज्य के विरुद्ध हिंसक संघर्ष के लिए वैचारिक खुराक प्रदान करने वाले ऐसे अनेक चेहरे हमारे आपके बीच हैं। इनमें कुछ जेलों में डाले गए हैं, कुछ जमानत पर हैं। इनके समानांतर ऐसे भी हैं, जिनकी पहचान मुश्किल है। गोष्ठियों, सेमिनारों, लेखों, वक्तव्यों आदि में जंगलों में निवास करने वालों व समाज की निचली पंक्ति वालों की आर्थिक सामाजिक दुर्दशा का एकपक्षीय चित्रण करते हुए ऐसे तर्क सामने रखते हैं, जिनका निष्कर्ष यह होता है कि बिना हथियार उठाकर संघर्ष किए इनका निदान संभव नहीं है। अब समय आ गया है जब हमारे आपके जैसे शांति समर्थक आगे आकर सच्चाइयों को सामने रखें। अविकास, अल्पविकास, असमानता, वंचितों, वनवासियों का शोषण आदि समस्याओं से कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। केंद्र और राज्य ऐसे अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम चला रहे हैं, जो धरातल तक पहुंचे हैं। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए जा रहे और बने हुए आवास, स्वच्छता अभियान के तहत निर्मित शौचालय, ज्योति योजनाओं के तहत बिजली की पहुंच, सड़क योजनाओं के तहत दूरस्थ गांवों व क्षेत्रों को जोड़ने वाली सड़कों का लगातार विस्तार, किसानों के खाते में हर वर्ष 6000 भुगतान, वृद्धावस्था व विधवा आदि पेंशन, पशुपालन के लिए सब्सिडी जैसे प्रोत्साहन, आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य सेवा, कई प्रकार की इंश्योरेंस व पेंशन योजनाएं को साकार होते कोई भी देख सकता है। हर व्यक्ति की पहुंच तक सस्ता राशन उपलब्ध है। कोई नहीं कहता कि स्थिति शत प्रतिशत बदल गई है, लेकिन बदलाव हुआ है, स्थिति वेहतर होने की संभावनाएं पहले से ज्यादा मजबूत हुई हैं तथा पहाड़ों, जंगलों पर रहने वालों को भी इसका अहसास हो रहा है।

इसमें जो भी इनका हित चिंतक होगा वो इनको झूठ तथ्यों व गलत तर्कों से भड़का कर हिंसा की ओर मोड़ेगा, उसके लिए विचारों की खुराक उत्पन्न कराएगा, संसाधनों की व्यवस्था करेगा या फिर जो भी सरकारी, गैर सरकारी कार्यक्रम हैं, वे सही तरीके से उन तक पहुंचे, उनके जीवन में सुखद बदलाव आए इसके लिए काम करेगा? साफ है माओवादियों के थिंक टैंक और जानबूझकर भारत में अशांति और अस्थिरता फैलाने का विचार खुराक देने वाले तथा झन सबके लिए संसाधनों की व्यवस्था में लगे लोगों पर चारों तरफ से चोट करने की जरूरत है। निश्चित रूप से इस मार्ग की बाधाएं  हमारी राजनीति है। तो यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आखिर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई में राजनीतिक एकता कैसे कायम हो?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विशेषज्ञ है। इनका यह लेख "राष्ट्रीय सहारा" अखबार में आज प्रकाशित हुआ है)

Wednesday, December 16, 2020

जय खालिस्तानी छोड़ो किसानी..!

लेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय
अरे ये क्या हो रहा है? इतना शोर क्यों मच रहा है? अरे भैया कुछ नहीं ये किसान आंदोलन चल रहा है। वो सब तो ठीक है पर जो आवाज गूंज रही तनिक उसको भी सुनो की बस हल्ला हूं मचाने से ही सब किसान हो जाएंगे। "खालिस्तान जिंदाबाद" का नारा लग रहा है..! कोई कह रहा है इंद्रा को देख लिए , जनरल वैद्य को देख लिए, मोदी क्या चींज है? मोदी मरजा तू ...! मतलब सारी हदे पार की जा रही है किसान आंदोलन के नाम पर। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का खुलकर समर्थन किया जा रहा है। अभी कुछ दिन पहले ही दिल्ली पुलिस ने कुछ खालिस्तानी और इस्लामिक आतंकियों को धर दबोचा है।
अमेरिका के वॉशिंगटन में जो हुआ वो कत्तई बर्दाश्त करने के लायक नहीं है। भारतीय किसानों के आंदोलन को समर्थन की आड़ में कुछ मुट्ठी भर लोगो ने  भारतीय दूतावास के पास स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा को खालिस्तानी झंडे से ढककर भारत विरोधी नारे लगाए गए। वाह भैया वाह देखने वाली बात है कि अमेरिका की नागरिकता लेकर मज़े ले रहे है और चिंता सता रही है भारत के किसानों की..! ये जो विभाजनकारी एजेंडा चला रहै  है इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। 
किसानो को भटकाना- भड़काने  वाले कभी किसानों के हितैषी नहीं हो सकते है। जितने भी आंदोलन में बैठे है उन्हे "तथाकथित किसान" बोला जाए तो इसमें कुछ ग़लत नहीं है। किसानों को लेकर कानून बहुत पहले भी बने है देश पर इतना बवाल कभी नहीं है और किसानों कोई फर्क नहीं पड़ता है। बहुतों को तो फसल काटने और बोने से फुर्सत नहीं है वो क्या आंदोलन करेंगे?  नए कृषि कानून को किसी ने ढंग से पढ़ा भी नहीं होगा  फिर भी कुछ मुट्ठी भर नक्सलवादी विचारधारा वाले , विपक्षी दल , तथाकथित किसान संगठनों आदि लोगो ने इसको लेकर उलुल जुलुल भ्रामक फैला रहे है। एक महिला नेता स्टेज पर आती और कहती है मेरा चप्पल चोरी हो गया इसके पीछे मोदी कि साजिश है..! हद है किसानों के कंधो पर बंदूक रख चलाने वालो को मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी हो गया है।
उद्योग संगठन एसोचैम ने कहा है कि किसानों के आंदोलन से हर रोज 3500 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। इससे पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की अर्थव्यस्था पर काफी चोट पहुंची है। संगठन का कहना है किसान आंदोलन की वजह से माल की ढुलाई पर असर पड़ा है और सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है।इस वजह से देश में फल और सब्जियों की कीमतें बढ़ गई हैं।
खैर जब संसद में बहस करना था तो विपक्ष वाले हल्ला हूं मचा रहे थे। उपसभापति हरिवंश नारायण जी के साथ सदन में कृषि बिल के दौरान विपक्ष के  माननीय सांसदों द्वारा हिंसक व्यवहार किया गया था। जो संसद में ऐसी नीच हरकत करने से नहीं डरते उनके लिए सड़कछाप आंदोलन में उतरना कोई बड़ी बात नहीं..!

Monday, November 9, 2020

जब साहसिक कदम ने बचाया था देश!

अरे क्या हुआ? आज कौन सा बड़ा दिन है जो सब चर्चा किए जा रहे है। ओह! ट्रंप चुनाव हार गए और बाइडेन राष्ट्रपति बन गया अमेरिका का यही का? इसी की चर्चा हो रही है न! अरे नहीं भैया इसकी नहीं कुछ और ही बात हो रही है। इसकी चर्चा नहीं हो रही तब किसकी हो रही है?_सच मे भैया आपकी यादास बहुत ही कमजोर है जो प्रधानमंत्री के "नोटबंदी" जैसे बड़े फैसले को फूल गए। कुछ याद आया 8 नवंबर 2016 जब माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने ये  घोषणा किया की  "भाईयो बहनों देश को भ्रष्टाचार और काले धन रूपी दीमक से मुक्त कराने के लिए एक और सख्त कदम उठाना ज़रूरी हो गया है। आज मध्य रात्रि यानि 8 नवम्बर 2016 की रात्रि 12 बजे से वर्तमान में जारी 500 रुपये और 1,000 रुपये के करेंसी नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे यानि ये मुद्राएं कानूनन अमान्य होंगी"।  ये एक ऐतिहासिक और साहसिक फैसला साबित हुआ। कितने लोगो कि खटिया खड़ी हो गई थी उनको समझ में नहीं आया कि करे क्या? तभी तो बोरा भर - भर के नोट कचड़े में तो कहीं नाले नदी में फेंका गया था। अधजले नोट इसके सबूत है आखिर इतना नोट आया कहा से? देश कि जानी मानी महिला नेता के गले में लाखो रुपयों के नोट का माला पहनाया गया था नोटबंदी होते ही सबकी औकात का पता चला गया। आखिर लूटा हुआ पराया धन से कोई कब तक घर भरता अपना एक न एक दिन झट से जाना ही था।
नक्सलियों और आतंकियों की भूखमरी आ गई नोटबंदी की वजह से। नक्सलियों का हजारों करोड़ों रुपया पानी में मिल गया जब देश में नोटबंदी लागू कर दी गई । झारखंड में कई नक्सलियों के खाते सीज हो गए जहां से करोड़ों रुपए मिले। ये लोग गांव वालो को धमका के गाव से ही वसूला हुआ नोट बदलना चाह रहे थे पर सरकार ने ऐसा डंडा मारा कि सारी हेकड़ी अन्दर चली गई। वहीं हाल आतंकियों का हुआ करीब 12 लाख करोड़ रुपए नकली नोट छाप के रखे थे ये पाकिस्तान के खुफिया एजेंसी आई .एस .आई वाले जिसको एक झटके तहस - नहस कर दिया गया। इसका एक फायदा ये हुआ कि आतंकियों की फंडिंग पहले जैसी नहीं रह गई  इनकी भी भूखमरी आ गई। अब कुछ बचा नहीं तो सब खुल के बाहर आने लगे आतंक फैलाने के लिए और भारतीय सेना तैयार थी पहले इनको इनके ठिकाने तक पहुंचाने के लिए। नोटबंदी के बाद कश्मीर में वो चेहरे भी खुलकर सामने आने लगे जो मुफ्त में पाकिस्तानी या विदेशी  फंडिंग पर पलते थे जैसे ही नोटबंदी हुई ये 100-50 के लिए पत्थरबाज के रूप उभर के सामने आने लगे जिन्हें तथाकथित विपक्षी नेता, सेक्युलर बुद्धिजीवी वर्ग भटके हुए लोगों कि संज्ञा दे दिए थे।

पूरा विपक्ष नोटबंदी का घनघोर और पुरजोर विरोध किया था पर संसद में बहस ही नहीं किया। एकदम से हल्ला हूं मचा दिया था। नोटबंदी को सबसे बड़ा घोटाला का नाम देने लगा! कश्मीर में तो अलगावादी नेताओ की कमर टूट गई थी। इधर पंजा खडंजा पंजा पर गिर गया था। उत्तर प्रदेश में तो साइकिल पंक्चर हो गई और हाथी भूखमरी से मरने लगी पर नोटबंदी के कारण ना पंक्चर बना ना ही हाथी का पेटे भर पाया! हा हा हा.हा..।
अब चुप करो हम भी कुछ जानकारी देने जा रहे है सुनो। _जी भैया सुनाइए .. एक बार बहुत पहिले  की बात है जून या जुलाई का महीना था साल 2011 में जब हाथी सत्ता में थी तब पूरा विधानसभा गूंजा था। मामला था नेपाल के रास्ते पड़ोसी जिलों में हो रहे नकली नोटो के कारोबार का जिसमे विपक्ष का आरोप था पुलिस  कारोबारी को पकड़ती है पर वह चंद दिनों के बाद ही रिहा हो जाते है। सरकार को ऐसे लोगो पर रसुका लगाना चाहिए। तब उस वक्त संसदीय कार्य मंत्री लालजी वर्मा ने विपक्षी सदस्यों का जवाब देते हुए कहा था कि" साल 2008 में 55 जिलों में नकली नोटो का कारोबार हो रहा था। वर्ष 2009 में 61 जिले प्रभावित हुए।सरकार ने नकली नोटों के कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए प्रभावी कारवाई की। ऐसे कारोबारियों ठोस कार्रवाई के लिए पुलिस महानिदेशक की अध्यक्षता में राज्यस्तरीय समिति गठित की गयी। सीमावर्ती (नेपाल) जिलों जहां ज्यादा जाली नोट पाये जाने जब्त किये जाने की घटनाएं हुई, वहा जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिलास्तरीय समितियां बनायी गयीं। इसका नतीजा हुआ कि वर्ष 2010 में यह कारोबार 34 जिलों में सिमट गया। इस साल 30 जून 2011 तक 20 जिले ऐसे कारोबार से प्रभावित रह गये हैं।" लालजी वर्मा ने ये भी स्वीकार किया था कि बैंकों के अलावा एटीएम से भी जाली नोटों की निकासी होती है।
बहुत हंगामा मचा था उस दिन क्या सपा? क्या रालोद? आदि सभी पार्टियों ने प्रदेश सरकार पर खूब आरोप प्रत्यारोप लगाया था जिसमे भाजपा भी प्रमुख रूप से शामिल थीं। लेकिन देखने वाली ये है कि नोटबंदी का कांग्रेस के साथ मिलकर  सबने विरोध किया और नहीं हाथी भी भड़क गई जो नकली नोटो के कारोबार को कुचलने की बात थी। महत्वपूर्ण ये की कमल ने इसपर अमल किया और  देश में एक नई क्रांति लाई।

मत पूछो जितना बिजली बिल, पानी का बिल , टैक्स आदि जितना भी बकाया था सबका अचानक से भुगतान हो गया नोटबंदी के दौरान। घाटे चल रहा बिजली विभाग का मानो स्वर्णिम काल था सबने बिजली बिल का पैसा भर दिया बनारस का उदाहरण दू तो। नोटबंदी के दौरान जो लोग जूठा ही गरीबी रोना रोते थे उनका पोल खुल गया नोटबंदी के समय। सबसे ज्यादा दिक्कत लूट - घसूट करने वालों को हुई। आम जनता को बहुत कोशिश किया गया भड़काने और भटकाने का पर किसी की एक न चली सबने सरकार के साहसिक कदम का समर्थन किया भले ही थोड़ा कष्ट झेलना पड़ा पर राष्ट्रहित में हमारे देश की जनता ने बखूबी अपना फर्ज निभाया था।
_अरे वाह भैया क्या खूब जानकारी दी मजा आ गया लेकिन एक वर्ग ऐसा भी था जो सेना के साथ बॉर्डर पर जाकर लड़ने की कसमें खाता था बेचारे एटीएम और बैंक में लाइन लगाकर लगाकर जाते जाते थक कर चूर गए..!

Thursday, September 17, 2020

जो भी राष्ट्रहित में बाधक हो उसका सर्वनाश करो

                लेखक - शिवम् कुमार पाण्डेय

राष्ट्रहित से बढ़कर कोई कुछ नहीं होना चाहिए। राजनीतिक दल सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते है  इस बात इतिहास साक्षी रहा है। चाहे वो जातिवाद की राजनीति हो या मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति कोई किसी से कम नहीं रहा है। सबने एक दूसरे को बराबर को टक्कर दी है चाहे वो कांग्रेस हो सपा हो , बसपा , आरजेडी   या कम्युनिस्ट पार्टी हो। देश को तोड़ने की बात करने वाले नक्सलियों को क्रांतिकारी तक बता दिया जाता है जिनका काम सिर्फ दूसरों को लूट मार कर खाने का है।  लाल सलाम के नाम पर ना जाने कितने निर्दोष लोगो को अपने जान से हाथ धोना पड़ा है। इस्लामिक  कट्टरपंथी जिहादियों का भी एक ही लक्ष्य है "गज़वा ए हिन्द" जिसके नाम पर ना जाने कितने बेकसूर मासूम कश्मीरी पंडितों  को जम्मू और कश्मीर में अपने घर से बेघर होना पड़ा है। घर फूंक दिया गया , मां - बहनों की इज्जत लूटी गई जिहाद के नाम पर। साफ साफ पोस्टर पर लिखा था हिन्दुओं घर छोड़ दो अपनी जान की सलामती चाहते हो तो अपने घर की महिलाओं को हमारे हवाले कर दो। 

वर्ष 2016 फ़रवरी में जेएनयू में लगे नारों को भला कौन भूल सकता है। कुछ मुठ्ठी भर छात्रों और वामपंथी संगठनों ने विश्वविद्यालय की कीर्ति एवं शिक्षा के स्तर पर ऐसे आघात किए जिनको देशभक्ति के श्रेणी में तो कत्तई नहीं रखा जा सकता।जिस समय सारा देश सियाचिन के जांबाज शहीदों को श्रद्धांजलि दे रहा था उस समय जेएनयू में भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी तथा अफजल हम शर्मिंदा हैं तेरे कातिल जिंदा है के नारे लग रहे थे। आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाई जा रही थी । वहां पोस्टर लगे जहां जिनमें लिखा था - शहीद अफजल गुरु की शहादत की पहली बरसी पर स्मृति सभा जिसमें अरुंधती राय, प्रो. जगमोहन , सुजितो भद्र , जेएनयू  के प्रो. एके रामकृष्णन के नाम भाषण देने वालों थे। डीएसयू के पोस्टरों में छापा गया कि कश्मीर के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को लाल सलाम। देश की एकता और अखंडता को खुलेआम चुनौती दी जा रही थी। जहां कहीं भी देश में भारतीय सेना के विरुद्ध विद्रोही गतिविधियां हैं उन सब के समर्थन में जेएनयू में सेमिनार एवं प्रदर्शन आयोजित हो किए जाते रहे है विभिन्न संगठनों द्वारा। कश्मीर, असम ,मणिपुर और नागालैंड के विद्रोह संगठनों की उपस्थिति देखी जा सकती है। 

"भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाह अल्लाह इंशाह अल्लाह ,तुम कितने अफजल मारोगे हर घर से अफजल निकलेगा" अर्थात अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देशी विरोधी नारे लगाना और आतंकियों के एनकाऊंटर  पर मानव अधिकार की बाते करने वालो को तमाम राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त था। एक तरफ भारतीय सैन्य बलों के जवानों पर पत्थबाजी होती थी जिसका जवाब चाहकर की भी हमारे जवान गोली से नहीं दे सकते थे और दूसरी तरफ ये तथाकथित सेक्युलर लोग इनपर कश्मीर में बलात्कार करने का आरोप लगाते थे। पूरी तरह से भारतीय सेना का मनोबल गिराने की नाकाम कोशिश की गई। जिस छाती से दूध पिया उसी में दांत गड़ाने का काम किया इन लोगो ने। इन देशद्रोहियों की भगत सिंह से की जा रही थी! करने वाले कांग्रेसी नेता थे जिनको को तो चुल्लू भर पानी में जाकर डूब मरना चाहिए। तनिक भी शर्म ना आयी की भगत सिंह की आत्मा क्या सोच रही होगी कि कैसे निकम्में लोग पैदा हो गए है देश में यानी सत्ता के लिए कुछ भी कर बैठेंगे। मार्क्स माओ स्टालिन लेनिन चे ग्वेरा और कस्त्रो ना जाने कितने विदेशियों को अपना आदर्श मानने वाले वामपंथियों ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को भी नहीं छोड़ा है।

उड़ी हमले में शहीद हुए जवानों पर भी गंदी राजनीति करने से कुछ लोग बाज नहीं आए। सेना के जवानों कहा जाता था कि "ये घूस देके भर्ती हुए है"। जब भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक करके आतंकियों को 72हुरो के पास पहुंचाकर अपने साथी जवानों का बदला लिया और ये दिखाया की हम घर में घुस कर मार सकते है तो इसको भी तमाम विपक्षी नेताओ ने मानने से इंकार कर दिया। सबको सबूत चाहने लगा था सेना के बहादुरी का हद तो तब हो गई जब राहुल गांधी ने कहा मोदी सेना के जवानों की खून की दलाली करते है।

 पिछले साल 14 फरवरी 2019 का ही मामला देख लीजिए  सीआरपीएफ के जवानों पर कायरतापूर्ण हमला हुआ था जिहाद के नाम पर जिसमें करीब 45 जवान शहीद हो गए थे। वायुसेना ने 26 फ़रवरी 2019 को एयर स्ट्राइक से इसका बदला लिया था जिसपर तथाकथित सेक्युलर लिबरल गैंग ने सवाल खड़ा कर दिया था। शुक्र है कि 5 अगस्त 2019 को संसद में माननीय गृहमंत्री अमित शाह ने धारा 370 और 35अ निष्क्रिय करने का बिल पारित कर दिया जिसे लेकर सालो से  अटकलें लगाई जा रही थी कि संघ और भाजपा सिर्फ बाते करती है इनके बस का कुछ नहीं है। अलगादवादी , हुरियत, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी वाले कहते थे 370 हटा तो आग लगा देंगे , तबाही मचा देंगे आदि उलुल- जुलूल भाषणों से वहां की अवाम और युवाओं को बरगलाने और भड़काने का काम करते थे। 370 हटा हम सब ने देखा और इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में से लिखा गया। जब से 370 हटा तब से आप देख सकते हैं जन्नत जाने वालों की लंबी लाइन लगी हुई है। हुर्रियत और अलगाववादी नेताओं की तो कमर तोड़ दी गई है। 

नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने यो ये जता दिया कि राष्ट्रहित में फैसले लेने से भाजपा सरकार तनिक भी संकोच नहीं करेगी। इसका भी विरोध हुआ समुदाय विशेष के लोगों ने दंगा करने की कोशिश की, देश का माहौल खराब किया गया। तमाम राजनैतिक पार्टियों को घिनौना चरित्र उजगार हुआ। सेक्युलर पत्रकारों , लिबरल बुद्धिजीवियों और वामपंथी संघठनो ने आग में पेट्रोल डालने का कार्य किया। शाहीन बाग इसका जीता जागता उदाहरण है। 

अयोध्या में श्री राम मंदिर निर्माण हो रहा है काफी लंबे सालो के बाद हिन्दुओं की आस्था को न्याय मिला। उत्तर प्रदेश के मुख्मंत्री भी "हिन्दू ह्रदय सम्राट" योगी आदित्यनाथ है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को भुलाया नहीं जा आखिर इन्हीं कार्यकाल में विवादित बाबरी ढांचा गिराया गया था। इन्होंने अपने राजनीति करियर दांव पर लगा दिया सिर्फ प्रभु श्री राम के लिए।आडवाणी , अशोक सिंघल , पूर्व प्रधान अटल बिहारी वाजपेई जी, देवी ऋतंभरा आदि लोगो के बिना ये आंदोलन संभव भी नहीं था। प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी ने 56 इंची सीने जोर दिखाया जिसका पूरे विश्व में गूंजा उठा। बहुत पहले नारा लगाया गया था "मिले मुलायम काशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम" वर्तमान में इसका सटीक उत्तर ये है "अजर अमर है जय श्री राम   मर गए मुल्ला काशीराम" । जैसी करनी वैसी भरनी जो आप करेंगे उसका दंश तो भोगना ही पड़ेगा। कारसेवकों के ऊपर गोलियां चलवाने से आप कौन से बड़का सेक्युलर बन गए! कांग्रेसियों कारामात को भी कोई नहीं भूल सकता ये तो हिन्दुओं को आतंकवादी बनाने लगे हुए थे "भगवा आतंकवाद" की संज्ञा देने लगे थे। साल 2008 में जिहाद के नाम पर होने वाले जगह जगह बम विस्फोटों को कौन भूल सकता है। सबसे महत्वपूर्ण 26/11 का मुंबई हमला जिसने पूरे देश को दहला दिया था। अभी वर्तमान में  देखिए कांग्रेसियों की करास्तनी राम मंदिर में लगने वाने गुलाबी पत्थराें के खनन पर राजस्थान सरकार ने रोक लगाा कर 25 ट्रक जप्त कर लिया। मतलब इन कांग्रेसियों  की बुद्धि अभी तक खुली नहीं है। खैर अंत में बस यही कहना चाहूंगा जो कोई भी राष्ट्रहित के मार्ग में बाधक होगा उसका सर्वनाश हो जाएगा।

Saturday, May 30, 2020

तथाकथित विचारधारा

आज का युवा कहा जा रहा है देखने वाली बात है। बिना जानकारी के बात करना एक ट्रेंड सा बन बन गया है युवाओं के बीच में जो बहुत ही हानिकारक है। पढ़ने लिखने की उम्र में ये तथाकित एजेंडे का शिकार हो रहे है और हर विचार को लेकर अपनी गलत अवधारणा बनाते हुए दिख जाएंगे जिसका जीता जागता उदाहरण है सोशल मीडिया। आप देखेंगे तो ये लोग किसी मुद्दे को लेके आपस में बहस करते है तो गाली देने पे उतारू हो जाते है और एक दूसरे का खानदान, जाति धर्म , आदि सब देखने लग जाते है। कोई कहता है मेरी ये विचारधारा है तो कोई कहता मुझे इस विचारधारा ने प्रभावित किया ये सही है फलाना ढिमका सब होता है भले कुछ ना जानते हो इन सबके बारे में इसके बावजूद भी एक दूसरे से भिड़ जाते है। क्या ये तथाकथित विचारधारा इनका पेट भरता है? या इनके कॉलेज की फीस भरता है और इनका खर्चा चलाता है? जी नहीं, इनमें से कुछ होता नहीं है दरअसल बात ये है कि ये पढ़ने के उम्र में इतना इन सबमें लीन हो जाते है कि तथाकथित विचारधारा वाले संगठन इन्हें बरगला देते है सोशल मीडिया के माध्यम गलत और उलूल जुलुल जानकारी देकर, इनके बीच अनेक भ्रांतिया पैदा कर देते है जो युवा सतर्क नहीं रहा इनके चंगुल में आसानी से फस जाता है। इसमें युवाओं कि भी कोई गलती नहीं है एक तथ्य तो ये भी है कि घर का माहौल कैसा है? देखा जाए तो बहुत कुछ इसपर निर्भर करता है। विचारधारा आजकल जाति को लेकर बन रही है और इसी पर एजेंडा चलाया जा जाता है जो कोई भी इसका समर्थन करता है वो स्वयं पैरो पर कुल्हाड़ी मारने का काम करता है । सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफॉर्म बन गया है जहां ये सब खेल बिना रोक टोक के चलता है। अभिभावकों को चाहिए कि अपने बच्चों पर ध्यान दे ताकि बाद में ना कहे कि हमारा बच्चा साफ सुथरा है इसे भड़काया गया है!
हद तो तब हो जाती है जब कोई आतंकी या नक्सली मारा जाता है सुरक्षा बलों द्वारा उसे ये तथाकथित विचारधारा संगठन (सक्रिय हो जाता है) कहता है कि " ये भटके हुए नौजवान है" इनका साथ देने के लिए कुछ तथाकथित नेता - परेता और पत्रकार दिख जाते है जिनका काम है देश का माहौल खराब करना। देखा जाए तो भारत में अराजकता बहुत फैल रहा है तमाम युवा इस अराजकता का शिकार हो रहे है। उम्मीद है सरकार इसमें कुछ ठोस कदम उठाने का कार्य करेगी और सोशल मीडिया को इन सबके लिए फटकार के साथ साथ कुछ सख्त कानून भी बनाए।

Friday, April 10, 2020

नक्सलवाद एक समस्या

लाल सलाम मुर्दाबाद, हिंदुस्तान जिंदाबाद !
लाल सलाम के नाम के पर देश में हिंसा भड़काया जा रहा है। नक्सलवादियों ने लाल सलाम के नाम पर ना जाने कितने बेगुनाहों को मौत के घाट उतार दिया ये कहते हुए कि हम मजदूरों और किसानों के हक ले लिए लड़ाई लड़ रहे है और हमारी लड़ाई सरकार से है आम लोगो से नहीं। सिर्फ दंतेवाड़ा जैसे जंगलों में 15000 से भी ज्यादा जवान नक्सली हमले में अपनी जान गवा बैठे है इतना तो  युद्ध (1948,1962 ,1965,1971 और 1999 की कारगिल में) में नहीं शहीद हुए होंगे। ये किसानों की बात करते है और इनके घर के चिराग को भी बुझा देते है जो देश सेवा के लिए आर्म्ड फोर्सेज में शामिल होते है। आजकल इनका एक नया एजेंडा चल रहा है "आज़ादी" जबकि देश को आज़ाद हुए 70 साल से ज्यादा हो गया है । एक विशेष वर्ग इनकी तुलना भगत सिंह और उनके साथियों से करने में लगा हुआ है जबकि ये उनके पैरों के धूल बराबर भी  नहीं है । उन्होंने ने तो अपनी  जिंदगी देश के नाम कर दी थी और हसते हुए फांसी पे झुल गए थे ताकि भारत माता का उद्धार हो सके पर लाल सलामी विचारधारा वाले अपनी ही धरती को अपने ही सपूतों के खून से रंगने की साजिश रच रहे है ।