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Monday, May 10, 2021

10 मई का शुभ का दिन

आजादी की पहली जंग
[अप्रैल, 1928 में 'किरती' के 1857 के गदर सम्बन्धी अंक में '10 मई का शुभ दिन' नाम से लेख छपा। इसके लेखक का नाम तो नहीं दिया गया, लेकिन यह शहीद भगत सिंह के साथियों का ही लेख है। सम्भवतः भगवतीचरण वोहरा का। वे बहुत 'अच्छे लेखक थे और 'किरती' से गहरे रूप में जुड़े हुए थे। मार्च, 1925 से लेकर जुलाई, 1928 तक भगत सिंह ने 'किरती' के सम्पादकीय विभाग में बहुत ही लगन से काम किया था। यह लेख उसी समय छपा था।.]

"ओ दर्दवाले दिल, दर्द हो चाहे हजार
दस मई का दिन भुलाना नहीं,
इसी रोज छिड़ी 'आजादी की जंग'
वक्त खुशी का गमी लाना नही।"

10 मई वह शुभ दिन है जिस दिन कि 'आजादी की जंग' शुरू हुई थी। भारतवासियों का गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए यह प्रथम प्रयास था। यह प्रयास भारत के दुर्भाग्य से सफल नहीं हुआ, इसीलिए हमारे दुश्मन इस 'आज़ादी की जंग' को 'गदर' और बगावत के नाम से याद करते हैं और इस 'आज़ादी की जंग में लड़नेवाले नायकों को कई तरह की गालियाँ देते हैं। विश्व के इतिहास में ऐसी कई घटनाएँ मिलती हैं, जहाँ आज़ादी की जंग को कोई बुरे शब्दों में याद किया जाता है। कारण यही है कि वह जंग जीती न जा सकी। यदि विजय हासिल होती तो उन जंगों के नायकों को बुरा-भला न कहा जाता, बल्कि वे विश्व के महापुरुषों में माने जाते और संसार उनकी पूजा करता।
आज दुनिया गैरीबाल्डी और वाशिंगटन की क्यों बड़ाई व इज्जत करती है, इसलिए कि उन्होंने आज़ादी की जंग लड़ी और उसमें सफल हुए। यदि वे सफल न होते तो वे भी ''बागी' और 'गदरी' आदि भद्दे शब्दों में याद किए जाते। लेकिन वे सफल हुए, इसलिए वे महापुरुषों में माने जाने लगे। इसी तरह यदि 1857 की आज़ादी की जंग में तात्या टोपे, नाना साहिब, झाँसी की महारानी, कुमार सिंह (कुँवर सिंह) और मौलवी अहमद साहिब आदि वीर जीत हासिल कर लेते तो आज वे हिन्दुस्तान की आज़ादी के देवता माने जाते और सारे हिन्दुस्तान में उनके सम्मान में राष्ट्रीय त्यौहार मनाया जाता।

हिन्दुस्तान के मौजूदा इतिहासों को, जो कि हमारे हाथों में दिए जाते हैं, पढ़कर हिन्दुस्तानियों के दिलों में उन शुर-वीरों के लिए कोई अच्छी भावनाएँ पैदा नहीं होतीं, क्योंकि उन 'आजादी की जंग' के नायकों को कातिल, डाकू, खूनी, धार्मिक जनूनी व अन्य कई बुरे-बुरे शब्दों में याद किया गया है और उनके विरोधियों को राष्ट्रीय नायक बनाया गया है। कारण यह है कि 1857 की "आजादी की जंग" के जितने इतिहास लिखे गए हैं, वे सारे के सारे ही या तो अंग्रेजो ने लिखे हैं जो कि जबरदस्ती तलवार के जोर पर, लोगों की मर्जी के खिलाफ हिंदुस्तान पर कब्जा जमाए बैठे है और या अंग्रेजो के चाटुकारों ने। जहां तक हमे पता है, इस आजादी की जंग का एकमात्र स्वतंत्र इतिहास लिखा गया, जो कि बैरिस्टर सावरकर ने लिखा था और जिसका नाम "1857 की आजादी की जंग"(The history of the Indian war of Independece 1857) था। यह इतिहास बड़े परिश्रम से लिखा गया था और इंडिया ऑफिस  की लायब्रेरी से छान-बिनकर, कई उद्धरण दे देकर सिद्ध किया गया था कि यह राष्ट्रीय संग्राम था और अंग्रेजो के राज से आजाद होने के लिए लड़ा गया था । लेकिन अत्याचारी सरकार ने इसे छपने ही नही दिया और अग्रिम रूप से जब्त कर लिया। इस तरह लोग सच्चे हालात पढ़ने से वंचित रह गए।

इस जंग की असफलता के बाद जो जुल्म और अत्याचार निर्दोष हिंदुस्तानियों पर किया गया, उसे लिखने की ना तो हमारे में हिम्मत है और न ही किसी और में। यह सब कुछ हिंदुस्तान के आजाद होने पर ही लिखा जाएगा। हां, यदि किसी को इस जुल्म, अत्याचार, और अन्याय का थोड़ा सा नमूना देखना हो तो उन्हें मिस्टर एडवर्ड थॉमसन की पुस्तक, "तस्वीर का दूसरा पहलू" ( The other side of the medal) पढ़नी चाहिए, जिसमें सभ्य अरे जो की करतूतों को उधाड़ा है और जिसमें बताया गया है कि किस तरह नील हैवलॉक, हॉट्स,हडसन कूपर और लॉरेंस ने निर्दोष हिंदुस्तानी स्त्री-बच्चों तक पर ऐसे- ऐसे कह रहे थे कि सुनकर रोए खड़े हो जाते हैं और शरीर कांपने लगता है।

इस बात का ख्याल कर के स्वतंत्र व्यक्तियों को शर्म आएगी की यह लोग भी, जिनके बुजुर्ग इस जंग में लड़े थे, जिन्होंने हिंदुस्तान की आजादी की भाजी पर सब कुछ लगा दिया था और जिन्हें इस पर गर्व होना चाहिए था, वे भी, जंग को आजादी की जंग कहने से डरते हैं। कारण्य की अंग्रेजी अत्याचार ने उन्हें इस कद्र दबा दिया था कि यह सर छुपा कर ही दिन काटते थे। इसलिए उन बुजुर्गों की यादगार मनानी जा स्थापित करनी तो दूर, उनका नाम लेना भी गुनाह समझा जाता था।

लेकिन हालात कुछ ऐसे बन गए कि विदेशों में बसे हिंदुस्तानी नौजवान 10 मई के दिन को राष्ट्रीय त्योहार बनाकर मनाने लगे। और कुछ हिनी (हिंदुस्तानी) नौजवान यहां भारत में भी त्योहार मनाने की कुछ कोशिशें करते रहे हैं। सबसे पहले, जहां तक पता चलता है, त्यौहार इंग्लैंड में "अभिनव भारत" बैरिस्टर सावरकर के नेतृत्व में सन 1907 में मनाया। इस त्यौहार को मनाने का खयाल कैसे आया, कथा इस तरह है (गुलामों में खुद तो ऐसे यादगारी दिन मनाने के ख्याल कम ही पैदा होते हैं)-

"1907 में जब अंग्रेजों ने विचार किया कि 18 57 के गदरियो पर जीत हासिल करने की पचासवीं वर्षगांठ बनानी चाहिए। सो 57 की याद ताजा करने के लिए हिंदुस्तान और इंग्लैंड के प्रसिद्ध अंग्रेजों के अखबारों ने अपने-अपने विशेषांक निकाले, किए गए और लेक्चर दिए और हर तरह के इन कथित ग दरियों को बुरी तरह कोसा गया। यहां तक की जो कुछ भी इनके मन में आया, सब ऊल- जलूल इन्होंने गदरियों के खिलाफ कहा कई कुफ्र किए। इन गालियों और बदनाम करने वाली कार्रवाई के विपरीत सावरकर ने 1857 स्तानी नेताओं-नाना साहिब, महारानी झांसी, तात्या तोपे, कुंवर सिंह, मौलवी अहमद साहिब की याद मनाने के लिए काम शुरू कर दिया, ताकि राष्ट्रीय जंग के सच्चे-सच्चे हालात बताएं जाएं। यह बड़ी बहादुरी का काम था और शुरू भी अंग्रेजी राजधानी में किया गया। आम अंग्रेज नाना साहिब और तान के अक्टूबर को शैतान के वर्ग में समझते थे, इसलिए लगभग सभी हिंदुस्तानी नेताओं ने इस आजादी की जंग को आने वाले दिन में कोई हिस्सा ना लिया। लेकिन मि. सावरकर के साथ सभी नौजवान थे। हिंदुस्तानी घर में एक बड़ी भारी यादगारी मीटिंग बुलाई गई। खवास किए गए और कश्मीर ली गई कि उन बुजुर्गों की याद में एक हफ्ते तक कोई अय्याशी की चीज इस्तेमाल नहीं की जाएगी। छोटे-छोटे पैंफलट 'ओ शहीदों' (Oh! Martyrs) से इंग्लैंड और हिंदुस्तान में बांटे गए। छात्रों ने ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज और उच्च कोटि के कॉलेजों में छातियों पर बड़े-बड़े, सुंदर- सुंदर बैज लगाए जिन पर लिखा था, "1857 के शहीदों की इज्जत के लिए!" गलियों -बाजारों में कई जगह झगड़े हो गए। कॉलेज में एक प्रोफेसर आपे से बाहर हो गया और हिंदुस्तानी विद्यार्थियों ने मांग की कि वह माफी मांगे, क्योंकि उसने उन विद्यार्थियों के राष्ट्रीय नेताओं का अपमान किया है और विरोध में सारे के सारे विद्यार्थी कॉलेज से निकल आए। कई की छात्रवृत्तिया मारी गई, कईयों ने उन्हें खुद ही छोड़ दिया। कईयों को उनके मां-बाप ने बुलवा लिया। इंग्लिश तान में राजनीतिक वायुमंडल बड़ा गर्म हो गया और हिंदुस्तानी सरकार बड़ी हैरान हो गई चैन हो गई।"
    (बैरिस्टर सावरकर का जीवन पृष्ठ 45-46, चित्रगुप्त रचित)
इन हालात की खबर जहाँ भी पहुँची, विदेशों में वहाँ-वहाँ दस मई का दिन बड़ी सज-धज से मनाया गया और लोगों में बड़ा जोश आ गया कि अंग्रेज किस प्रकार हमारे राष्ट्रीय वीरों को बदनाम करते हैं। उन्होंने रोष के रूप में मीटिंगें कीं और उनकी याद में 10 मई का दिन हर वर्ष मनाना शुरू कर दिया। काफी समय बाद अभिनव भारत सोसायटी टूट गई और इंग्लैंड में यह दिन मनाना बन्द हो गया, लेकिन कुछ समय बाद अमेरिका में हिन्दुस्तान गदर पार्टी स्थापित हो गई और उसने उसे हर बरस मनाना शुरू कर दिया गदर पार्टी के स्थापित होने के दिन से लेकर अब तक अमेरिका में यह दिन सज-धज से मनाया जाता है। बड़ी भारी मीटिंग होती है, जिसमें सब हिन्दुस्तानी एकत्र होते हैं। उसमें इन 1857 के शूर-वीरों के जीवन और कारनामे बताए जाते हैं। इस तरह इन शहीदों की याद साल-दर-साल ताजा की जाती है और ऐसी कविताएँ-

'ओ दर्द-मन्द दिल, दर्द दे चाहे हजार 
दस मई का दिन भुलाना नहीं।
इस रोज छिड़ी जंग आज़ादी की
बात खुशी की गमी लाना नहीं।'

आदि पढ़ी जाती हैं। विशेषतः 1914-15 में यह पंक्तियां प्रत्येक पुरुष की जीभ पर चढ़ी हुई थी, क्योंकि उस समय भी एक और आजादी की जंग लड़कर हिंदुस्तान को आजाद करवाना चाहते थे। लेकिन यह प्रयास भी असफल हुआ, जिसमें हजारों नौजवानों ने भारत माता फौजी स्वार्थी है लेकिन हमारी गुलामी को न काटा जा सका।
10 मई का दिन क्यों मनाया जाता है? इसका कारण क्या है कि 10 मई के दिन ही अपनी जंग शुरू हुई थी। 10 मई को मेरठ छावनी के 85 वीरों ने चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया था। उनका कोर्ट मार्शल किया गया और प्रत्येक जवान को 10 साल सख्त कैद की सजा दी गई। बाद में 11 सिपाहियों की कैद पर कर 5 साल कर दी गई थी। लेकिन यह सारी कार्रवाई थी इस तरीके से की गई थी कि जिसमें हिंदुस्तानी सिपाहियों के गर्व और मान को भारी चोट पहुंचती थी, वह दृश्य बड़ा दर्दनाक था। देखने वालों की आंखों से टप टप आंसू गिरते थे। सारे के सारे भूत बने हुए थे। वे 85 जो उनके भाई थे, सभी दुखों-सुखों में शरीक थे, उनके पैरों मैं बेड़ियां डाली हुई थी उनका अपमान सहज करना मुश्किल था, लेकिन कुछ बन नहीं सकता था।
अगले दिन "घुड़सवार और पैदल सेना ने जाकर जेल तोड़ दी, अपने साथियों को छुड़ा लिया, करो के घरों को फूंक डाला। वी जिस यूरोपीय को पकड़ सके, उसे मार डाला और दिल्ली की ओर चढ़ाई कर दी। ग़दर का आरंभ हुई इसी दिन हुआ और 10 मई से ही खेला जाता है।"

गदर आंदोलन को जानने के लिए यहां क्लिक करे-

सो पाठकों ने ऊपर लिखी घटनाओं से देख लिया है कि दस मई का दिन क्यों और कब से मनाना शुरू किया गया। पाठक यह सब हाल पढ़कर देख सकते हैं कि उनका क्या फर्ज है। क्या उन्होंने उस आज़ादी के लिए, जिसलिए कि हजारों-लाखों हिन्दुस्तानियों ने लगा दिए थे और हजारों लगाने के लिए तैयार बैठे थे, आज तक कुछ किया है या नहीं? यदि आज तक उन्होंने कुछ नहीं किया तो वे कौन-सा मुहूर्त देख रहे हैं? आज़ादी की जंग में शामिल होने के लिए तो साल के 365 दिनों में से 365 ही पवित्र हैं। हर पल भारत माता तुम्हारा इन्तजार कर रही है कि तुम उसकी जंजीरें तोड़ने के लिए अपना फर्ज़ पूरा हो या नहीं। क्या इनसान बनकर आज़ादी हासिल करोगे? इसी सवाल के जवाब से भारत का भविष्य निर्भर करता है।

(इस लेख को "भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज" नामक पुस्तक में छपा है । जिसे ब्लॉग पर  पाठको के लिए प्रकाशित के प्रकाशित किया गया है।)


Saturday, January 2, 2021

काकोरी के शहीदों के लिए प्रेम के आँसू

जनवरी, 1928 के 'किरती' ने काकोरी के शहीदों सम्बन्धी एक सम्पादकीय नोट भी प्रकाशित किया। यह भगतसिंह का लिखा हुआ तो नहीं है, लेकिन उनके साथी भगवतीचरण वोहरा का हो सकता है। निश्चय ही, यह भी ऐतिहासिक दस्तावेज़ है, जिसे नीचे दिया जा रहा है।



काकोरी केस के चार वीरों को फाँसी पर लटका दिया गया। वे लाड़-प्यार से पले शूरवीर हँसते-हँसते शहादत प्राप्त कर गये। भारतमाता के चार सुपुत्र अपने शीश देश और राष्ट्र के नाम अर्पण कर गये। उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा, अपना फर्ज पूरा कर दिया। वे इस पंच भौतिक शरीर की कैद से आजाद हो गये और हम गुलामों को अपनी गुलामी के दुखड़े रोने के लिए पीछे छोड़ गये!!!

जिस देश में देशभक्ति गुनाह समझा जाता हो, जिस देश में आज़ादी की ख्वाहिश रखना बगावत समझा जाता है, जहाँ लोक कल्याण की सजा मौत हो, जहाँ देशभक्तों की गरदन में फाँसी का रस्सा डाला जाता हो, उस देश की हालत ख्याल में तो भले ही आ जाये, लेकिन बयान नहीं की जा सकती। किसी देश की अधोगति इससे ज्यादा क्या हो सकती है। लेकिन जिस देश में यह अन्याय नित्य प्रति होते हों, जहाँ ऐसे अत्याचार दिन-प्रतिदिन ही होते रहें यदि वहाँ के निवासी ऐसे-ऐसे अन्यायों, ऐसे अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठानी तो दूर, आह तक न भर सकते हों तो उस देश के निवासियों की हालत कैसी होगी?
हिन्दुस्तान गुलाम है। इसकी बागडोर विदेशियों के हाथ है। इससे प्रेम करना मौत को पुकारना है। इसकी आज़ादी के सपने देखना घर-बार, बाल-बच्चे छोड़कर जलावतनी की जिन्दगी गुज़ारना है। इस महीवाल के प्रेम ने कई सोहनियों को गहरे समुद्रों में डुबोया। इसके प्रेम ने कई प्रेमियों के दल के दल खत्म किये। इसका प्रेम अगाध है, अथाह है। इसके प्रेमी बेअन्त हैं, असंख्य हैं। न इस प्रेम का स्वर पता चलता है, न इसके प्रेमियों को ताव आती है यहाँ तो 'चुप भाई चुप' वाली बात है।

यह जुल्म कब तक रहेगा? इस अन्याय का भाण्डा कब फूटेगा? बेगुनाहों को कब तक शहीद किया जायेगा? देश-प्रेमियों को कब तक गोली का निशाना बनाया जायेगा? कब तक इस गुलामी डायन का और मुँह देखना पड़ेगा? आजादी देवी के दर्शन कब तक होंगे? अभी कितनी शहीदियाँ प्राप्त करनी होंगी। अभी और कितनों को फाँसी पर चढ़ाया जायेगा? रब्बा! वह दिन कब आयेगा, जब ये शहीदियाँ रंग लायेंगी। ईश्वर, वह दिन कब देखेंगे जब हमारा बगीचा हरा-भरा होगा? यहाँ से पतझड़ का कूच कब होगा? उल्लू कब तक इस बाग में डेरा जमाये बैठे रहेंगे? बुलबुलें किस दिन फिर यहाँ चहचहायेंगी? ये पिंजरे कब टूटेंगे? आज़ादी कब लौटेगी, उजड़े कब फिर बसेंगे?

लोगो! भारत माता के चार सुन्दर जवान फाँसी चढा दिये गये। वे नौकरशाही के डसे, दुश्मनी का शिकार हो गये। कौन बता सकता है कि वदि वे जीवित रहते तो क्या-क्या नेकी के काम करते, कौन-कौन से परोपकार करते? कौन कह सकता है कि उनके रहने से संसार पहले से सुन्दर और रहने योग्य न दिखायी देता? वे बीर थे, आज़ादी के आशिक थे। उन्होंने देश और कौम की खातिर अपनी जान लुटा दी। वे अपनी माँओं की कोख को सफल बना गये।

यदि भारतमाता आजाद होती तो इनके बलिदानों का मोल पड़ता। यदि आज हिन्दुस्तान में कुछ जान होती तो ये बलिदान बेकार न होते। हाय! आजादी के वीर चले गये। उन्हें किसी ने न पहचाना, उन्हें किसी ने न कहा, आप शूरवीर हो, आप बहादुर हो। वह जगह धन्य है, जहाँ आप जन्म-पले! जहाँ आप खेले। वे राहें धन्य हैं, जहाँ आप चले, जहाँ आप कूद-भागे। वीर, मातृभूमि के लाड्ले स जा₹ वीर चले गये! वे अपना जन्म सफल कर गये!

बातें करनी आसान हैं, बड़कें मारनी आसान हैं चगल-चगल करना और बात है, कुर्बानी देना और बात है। परीक्षा अलूणी चट्टान है, इसे चाटना आसान नहीं है। परीक्षा से बड़े-बड़े तौबा कर उठे थे। परीक्षा के आगे कोई जिगर वाला ही टिक सकता है। इन वीरों ने किस हिम्मत, किस बहादुरी से परीक्षा दी है इनकी बहादुरी कभी भूल सकती है? धन्य हैं इनके माँ-बाप, जिन्होंने उन्हें जन्म दिया धन्य हैं ये स्वयं, जो बलिदान के पुंज, आत्मत्याग की मिसाल हैं।

जब कभी आजादी का इतिहास लिखा जायेगा, जब कभी शहीदों का जिक्र होगा, जब कभी भारतमाता के लिए बलिदान करने वालों की चर्चा होगी तो वही 1. राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी 2. रामप्रसाद बिस्मिल, 3. रोशन सिंह और 4. अशफ़ाकृउल्ला का नाम ज़रूर लिया जायेगा। उस समय आने वाली पीढ़ियाँ इन शहीदों के आगे शीश झुकायेंगी और इन वीरों के बहादुरी भरे किस्से सुन-सुन सिर हिलायेंगी। उस समय ये कोम का आदर्श माने जायेंगे, इन बुजुर्गों की पूजा होगी। आज हम कमजोर हैं, निःशक्त हैं। आज हम गिरे हुए हैं, झूठे हैं। आज हम अपनी दिली भावनाएँ नहीं बता सकते क्योंकि हम कायर हैं, डरपोक हैं, आज हमें सच कहने से डर लगता है, क्योंकि कानून की तलवार हमारे सिरों पर लटकती दिखायी देती है। इससे यह नहीं कह सकते, 'काकोरी के शहीदो! आपने जो किया,भारतमाता के बन्धन तोड़ने के लिए किया। आपने जो कष्ट उठाये, वह हिन्दुस्तान को आजाद करवाने के लिए उठाये।' आज हम यह नहीं कह सकते कि 'आपने अपने मतानुसार अच्छा किया। गुलामों की अवस्था कितनी गिर जाती है। गुलामों में कितनी गिरावट आ जाती है। दैवी गुण उनमें से किस तरह भाग जाते हैं। वे कितने ढोंगी और पाखण्डी बन जाते हैं। वे कितने बुज़दिल व कायर बन जाते हैं। वे सच्ची-खरी बातें मुँह पर नहींकह सकते। वे दिल में कुछ और रखते हैं और बाहर कुछ और। उनकी हालत कितनी दयनीय हो जाती है।
इस हालत को सुधारने का एक ही साधन है, इस दुर्दशा को बदलने का एकमात्र इलाज है, इस दुर्दशा की एक ही दवा है, और वह है आज़ादी। आज़ादी कुर्बानियों के बगैर नहीं मिल सकती। शहीदों की इज्जत करने से, शहीदों के कारनामे याद करने से कुर्बानी का चाव उमड़ता है । जो कौम शहीदों को शहीद नहीं कह सकती, उसे क्या खाक आज़ाद होना है?

लोगो! देखे हैं आशिक सूली पर चढ़ते? वे मौत से मजाक करते थे। वे मौत पर हँसते थे, उन्हें मृत्यु का भय नहीं था। वे यार की गली में शीश तली पर रखकर आये थे। उन्हें डर क्या था, वे तो आये ही मरने थे। मृत्यु का तो वे पहले ही वरण कर चुके थे, जीवन की आशा तो वे पहले ही छोड़ चुके थे। वे तो गाते थे
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है।

कहाँ वे और कहाँ हम? वे तो किसी और हो देश के निवासी थे। वे तो गुरीबों की आह सुनकर मैदान में उतरे थे। वे तो हिन्दुस्तान से भूख- नंग को दूर करने आये थे। वे तो मज़दूरों और किसानों का हाल पूछने आये थे। वे तो किसी ऊँचे आदर्श के पुजारी थे। वे तो किसी ऊँचे स्वप्न की उड़ान में मस्त थे। वे तो बे नज़ारे देखते थे, जहाँ न भूख है, न नग्नता। जहाँ न गरीबी है, न अमीरी जहाँ न जुल्म है न अन्याय। बस जहाँ प्रेम है, एकता है, जहाँ इन्साफ़ हैं, आज़ादी है, जहाँ सुन्दरता है। पर हम? हम?...हाय रे!

किसी का आदर्श कमाना, आप खाना और बच्चों को पालना होता है। किसी का आदर्श स्वयं को ऊँचा उठाने का होता है। किसी का आदर्श गरीबों, दुखियों को लूटकर धन-दौलत इकट्ठा करना होता है, किसी का आदर्श अपने सुन्दर शरीर को तकलीफ़ से दूर करने का होता है। किसी का आदर्श कुछ होता है, किसी का कुछ। लेकिन उनका आदर्श देश था। उनका आदर्श हिन्दुस्तान की आजादी था उनका कोई स्वार्थ नहीं था उनके खाने के लिए, उन्हें ओढ़ने के लिए किसी बात की कमी न थी । वे तो जो कुछ करते थे, लोक-कल्याण की खातिर, लोक-सेवा के लिए करते थे। वे इतने बलिदान के पुंज निकले, कि स्वयं को हमारे ऊपर वार दिया। आइये, इन वीरों को प्रणाम करें।

मातृभूमि के लाड़लो! क्या हुआ यदि डर के मारे आज हम आपका नाम भी लिखने से घबराते हैं? क्या हुआ जो आज हम दिल की बातें कहने में झिझकते हैं? क्या हुआ यदि आज हिन्दुस्तान में मुर्दानोशी छायी है और आपका नाम लेने से ही षड्यन्त्रकारी बन जाते हैं? क्या हुआ यदि कोई हिन्दुस्तानी आपको भला- बुरा भी कहे, लेकिन समय आयेगा जब आपकी कद्र होगी, जब आपको शहीद कहा जायेगा, जिस तरह 1857 के गदर को अब ' आज़ादी की जंग' कहा जाता है। समय सिद्ध कर देता है, समय सच्ची-सच्ची कहलवा देता है, समय किसी का लिहाज़ नहीं करता। उस समय आप अपनी असली शान से चमकेंगे और उस समय हिन्दुस्तान आप पर बलिहारी जायेगा।

शहीद वीरो! हम कृतघ्न हैं, हम तुम्हारे किये को नहीं जानते। हम कायर हैं, हम सच-सच नहीं कह सकते। हमें आप माफ करो, हमें आप क्षमादान दो। हमें मौत से भय लगता है, हमारा दिमाग सूली का नाम सुनते ही चक्कर खा जाता है। आप धन्य थे। आपके बड़े जिगर थे कि आपने फाँसी को टिच्च समझा। आपने मौत के समय मजाक किये! पर हम? हमें चमड़ी प्यारी है, हमें तो जरा-सी तकलीफ़ ही मौत बनकर दिखने लगती है। आजादी! आजादी का तो नाम सुनते ही हमें कँपकँपी छिड़ जाती है। हाँ! गुलामी के साथ हमें प्यार है, गुलामी की ठोकरों से हमें मजा आता है! आपकी नस-नस से, रग-रग से आज़ादी की पुकार गूँजती थी लेकिन हमारी रग-रग से, हमारी नस-नस से, गुलामी की आवाज़ निकलती है। आपका और हमारा क्या मेल? हमें आप क्षमा करो, आप हमारे केवल यह प्रेम के अश्रु ही स्वीकार करो।

कहो, धन्य हैं, काकोरी के शहीद...!

Saturday, September 5, 2020

गदर आंदोलन की कुछ व्यथा

सितम्बर, 1927 के 'किरती' में एक बहुत महत्त्वपूर्ण लेख 'गदर लहर' की कुछ व्यथा' छपा था। यह एक अखबार से लेकर छापा गया था। लेखन-शैली और विचारों से यह लेख शहीद भगवतीचरण वोहरा का हो सकता है।
पहले मैं यह बता दूं कि विप्लववाद का क्या अर्थ है । फिर मैं आगे चलूँगा हर गिरी हुई कौम हमेशा गिरी नहीं रहती और उस कौम के वीर उसकी उन्नति का यत्न करते हैं कुर्बानियाँ देते हैं, अब यह सोचना है कि कुर्बानियाँ कई तरह से दी जाती हैं। कौमों को उठाने का यत्न भी कई-कई तरीकों और हिम्मत से किया जाता है। एक तो देश में शिक्षा का प्रचार करना। यह भी कोई छोटी-सी बात नहीं। दूसरे, लोगों को उनके हक बताने और उन्हें हासिल करने के लिए सरकार के आगे प्रार्थना करना। उसे (ऐसे दल को) हम माडरेट कहते हैं। यह शब्द उस समय इस्तेमाल होता है, जब देश उस स्थिति से कुछ ऊपर उठ जाता है। दूसरा दर्जा होता है गर्म दल का, जिस तरह 1907 में लोकमान्य तिलक जी की पार्टी थी या आजकल महात्मा गांधी जी का प्रचार कहा जा सकता है। लेकिन जिस समय इन दोनों रास्तों पर चलने से भी सफलता नहीं मिलती तो तेज नौजवानों का एक दल कुछ और आगे बढ़ता है वह हाथोहाथ काम करना चाहता है, मरना और मारना चाहता है और इस ढंग से ही जीत प्राप्त करना चाहता है। उसे (ऐसे लोगों को) अंग्रेज़ी भाषा में रिवॉल्यूशनरीज ( Revolutionaries ) कहते हैं। इस आरोप में वे गुप्त काम करते हैं और बाद में बदलकर खुल्लमखुल्ला लड़ाई करने को तैयार हो जाते हैं, जिस तरह कि आयरलैण्ड वाले अब तक लड़ते रहे हैं। यह काम जब तक गुप्त रहता है, तब तक उसे दबाने का यत्न किया जाता है। इस स्थिति में उन्हें हिन्दुस्तानी भाषा में विप्लववादी कहते हैं, उर्दू में इन्कलाबी कहा जाता है। यह शब्द इज़्ज़त और निन्दा, दोनों के लिए इस्तेमाल हो सकता है, अर्थात जब तक देश कमजोर है, तब तक वहाँ खुशामदी अधिक होते हैं, तब तक वहाँ उन्हें सभी लोग बुरा कहते हैं और शासक तो उनके दुश्मन होते ही हैं, लेकिन बाद में उन्हें ही देशभक्त कहा जाता है।

हम किसी डर के कारण चाहे उन्हें बुरा कहें, लेकिन वास्तव में वे किसी से भी कम 'देशभक्त' नहीं होते, बल्कि हम यह कह सकते हैं कि वे दूसरे शोर मचाने वालों से देश का अधिक दर्द रखने वाले होते हैं। उनकी कोई सहायता नहीं करता। अपने-पराये सभी बुरा-भला कहते हैं और शासक तो जो करते हैं उसका पूछना ही क्या है। वे वीर फिर भी डटे रहते हैं और ज़रा भी घबराते नहीं। तो क्या वे किसी से कम देशभक्त होते हैं? मैं तो कहूँगा कि दुनिया में 'End Justifies the means' अर्थात परिणाम से ही पता चल जाता है कि उनके द्वारा इस्तेमाल किये तरीके अच्छे थे या बुरे? यदि परिणाम अच्छा हो तो झूठ बोला हुआ हत्या किया गया भी ठीक हो जाता है, और यदि असफलता हो तो शान्ति से होने वाला काम भी बुरा ही कहा जाता है।

क्या वाशिंगटन को उस समय बागी कहकर दबाने की कोशिश नहीं की गयी थी? क्या यदि वह उस समय दुश्मनों के हाथ आ जाता तो उसे फाँसी न मिलती? क्या स्काटलैण्ड का वीर वालीस सच्चा देशभक्त नहीं था? क्या उसे फाँसी नहीं दी गयी? इस देश में काम ऐसे ही होता है। इटली की हालत देख लो, मैजिनी जैसों ने भी तो गुप्त सोसायटियाँ बनायीं, उनके परिश्रम का ही यह फल हुआ कि गैरीबाल्डी जैसे वीर ने दो-दो हाथ कर दिखाये दूर क्या जाना है, अभी कल की बात है कि रूस उठा है। कितने आदमी फाँसी पर चढ़े और बागी ठहराये गये। क्या ये सच्चे देशभक्त नहीं थे? इस बात का जवाब आज रूसवालों से पूछिये तो। इन बेचारों को 'निहिलिस्ट' और 'अनाकृष्ट' अर्थात दुनिया में 'अराजकता फैलाने वाले' और 'खून-खराबा करने वाले' कहा जाता था। उनके परिश्रम के फलस्वरूप ही आज वहाँ पंचायती सरकार बनी हुई है।

हाँ, ये लोग जो निराश होने से खून-खराबे पर उतारू हो जाते हैं वे पहले गुप्त सोसायटियाँ बना लेते हैं। उन्हें अंग्रेजी में Revolutionaries और हिन्दी में 'विप्लववादी' कहा जाता है। यदि संसार में देखा जाये तो यह बात कि जोरावर को सात कौडी सौ हुआ करती हैं, ठीक लगती है, क्योंकि जितनी देर एक पक्ष का जोर रहा उतनी देर तो कमजोर बागी, अनार्किस्ट, निहिलिस्ट, विप्लववादी इन्किलाब-पसंद कहलाते हैं, लेकिन जब दूसरा पक्ष ताकतवर हो जाता है तो वे सच्चे देशभक्त, कौम के परवाने हो जाते हैं और दूसरे जालिम, अत्याचारी, लालची आदि बन जाते हैं। शिवाजी मराठा यदि राज कायम न कर पाता और जालिम औरंगज़ेब के दाँत खट्टे न कर पाता तो वह डाकू ही कहलाता, लेकिन आज हम भी उसे महापुरुष कहते हैं। खैर!यह खयाल कि कोई इन्किलाब करे और खून-खराबे से न डरे, झटपट नहीं आ जाता। धीरे-धीरे शासक लोग जुल्म करते हैं और लोग दरख्वास्तें देते हैं, लेकिन अहंकारी शासक उस तरफ ध्यान नहीं देते। फिर लोग कुछ हल्ला करते हैं, लेकिन कुछ नहीं बनता। उस समय फिर आगे बढ़े हुए नौजवान इस काम को सँभालते हैं। यदि किसी देश में शान्ति हो और लोग सुख-चैन से बैठे हों तो वहाँ उतनी देर इन विचारों का प्रचार नहीं हो सकता, जब तक कि उन्हें कोई ऐसा बड़ा भारी नया विचार न दिया जाये, जिस पर कि वे परवानों की तरह कुर्बान हो जायें। या 'जुल्म' इस बात के लिए लोगों को तैयार करते हैं। यदि हम अपने देश की ओर ध्यान दें तो इस बात का स्पष्ट पता चल जाता है।

सबसे पहले यह विचार महाराष्ट्र अर्थात मराठों में किसी महापुरुष को सूझा, लेकिन इसका प्रचार नहीं हो सका। फिर बंगाल में यह विचार आया। वीर वीरेद्यश सबसे पहले इस बात का प्रचार करने लगा। यह बात 1903 की है। लेकिन लोग पूरे आराम में रहते थे तो खामखा कोई दुख में पड़े, किसी ने भी उनकी बात न मानी। वे अपना ज़ोर लगाकर असफल होकर बैठ गये। यह पूरा विवरण रोल्ट कमेटी की रिपोर्ट में दिया है।

फिर 1905 के बंग भंग हो गया। लोगों ने दरख्वास्तें दी लेकिन लॉर्ड कर्जन ने कहा, 'सूरज पश्चिम से उग जाये लेकिन मैं बंगाल का विभाजन ऐसे ही रहूंगा।' फिर स्वदेशी का प्रचार हुआ। कई बेचारे निर्दोष ही जेलों में तूंस दिये गये। कर्जन ने अपनी 'टें' नहीं छोड़ी। बताओ उस समय जब लोग दुखी बैठे हों, तब उनमें इन बातों का प्रचार झटपट हो जाना ही हुआ कि नहीं? बस बम बनने लगे। खैर, 1908 में अलीपुर षड्यन्त्र केस चला। फिर तो काम और भी जोरों पर हो गया और 1916 तक होता रहा। फिर लोगों को डकैतियाँ डालनी पड़ी। कुछ दिन पहले एक बंगाली सज्जन ने भाषण दिया था कि लोग उन्हें डाकू कहते हैं। लेकिन आप यह तो बताओ कि तुम उन्हें एक पैसा भी देते हो। वे बेचारे अपना तो सबकुछ छोड़ बैठे हैं और आप उसकी सहायता नहीं करते तो आप सोचो कि वे क्या करें, क्या अपना काम रोक दें? मैं बहुतों से मिला हूँ, वे सच्चे संन्यासी हैं, देशभक्त हैं। खैर, अब हम अपने प्रदेश की ओर आते हैं। पहले-पहले यह हल्ला सरदार अजीत सिंह जी के समय हुआ था। सन् 1907 की बात है। दो कानूनों के खिलाफ आवाज उठायी गयी। जोश बढ़ता देखकर सरकार ने उनकी बात झटपट मान ली और शोर-शराबा रुक गया। वह जमाना चला गया। कहा जाता है कि 1909 में सरकार को चिन्ता हुई कि बंगाल की बीमारी कहीं पंजाब में भी न आ फैले। उन्होंने सरदार अजीत सिंह को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वे बचकर निकल गये। उसके बाद पंजाब में सिवाय दिल्लीवाले बम केस के और कोई शिगूफ़ा नहीं दीखता। वहाँ वह विचार भी बंगाल ने ही दिया था। लेकिन उन्होंने कितने लोगों को अपने साथ मिलाया था? कुल दस-बारह आदमी होंगे। साधारण लोग जलती आग में क्यों जाने लगे। चार को फाँसी मिली, कुछ को कैद कर दिया और बात खत्म हुई।

लेकिन झटपट अगले ही बरस 1915 में फिर पंजाब में गदर की तैयारियाँ नज़र आती थीं। तब दो बातें थीं - एक तो लड़ाई छिड़ गयी (प्रथम महायुद्ध अनु.); दूसरे, सरकार ने कामागाटामारू वालों पर अत्याचार किया। वह भी अमेरिका से, बेचारे विचार ही लेकर आये थे। लेकिन पंजाब में रहने वाले कितने लोगों ने उनका साथ दिया? सिवाय 1907 के कुछ आदमियों के कितने लोग थे उनके साथ? खैर, मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार संक्षेप में क्रान्तिकारी विचारों के विकास व प्रचार का कुछ वर्णन करने का यत्न किया है और यदि मुझे समय मिला तो एक लम्बा लेख लिखकर अन्य देशों के विस्तृत हाल समेत इसका वर्णन करने का यत्न करूंगा।

(एक अखबार से)
स्रोत: भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़