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Friday, June 7, 2024

सदमे में संतुष्टि

२०२४ के आम चुनाव की मतगणना की लाइव रिपोर्टिंग देखता, मेट्रो की एसी में भी माहौल की गर्मी महसूस करता हुआ अपने गंतव्य पर जा रहा था।
सभी दलों के उत्साही और नितांत खलिहर कार्यकर्ताओं ने गाजे बाजे और फूलमालाओं के साथ अपनी-अपनी पार्टियों के दफ्तरों में बेटे के विवाह जैसा माहौल बनाया हुआ था। कुछ हुड़दंगी टाइप लठ्ठमार कार्यकर्ताओं ने मतगणना केन्द्रों के बाहर हर परिस्थिति के हिसाब से पूरी तैयारियों के साथ डेरा डाल रखा था।
सुन्दर-सुन्दर समाचार वक्ताओं ने अच्छे रंग-रोगन के साथ मुंह चभोर कर अपने से भी अधिक बने-संवरे विभिन्न दलों के बड़बोले प्रवक्ताओं के साथ जमघट लगाया हुआ था।
सारी तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं, सभी प्रवक्ताओं ने अपनी-अपनी पार्टियों के जीतने की घोषणा कर दी थी। बस मतगणना शुरू होने की देर थी। 
विपक्षियों ने हर बार की तरह ईवीएम वाली बात की चर्चा एकाध दिन पहले से ही शुरू कर दी थी।

और फिर मतगणना शुरू हुई, तमाम बयान पर बयान आने लगे, अलग-अलग सीटों के रुझान आने लगे, न्यूज चैनलों में चीनी मिलों से भी अधिक तीव्रता वाले हूटर बजने लगे।
कभी कोई आगे होता कभी कोई। पहले एक डेढ़ घंटे में ये रुझान आया कि इस बार का परिणाम वैसा नहीं होने वाला जैसी उम्मीद सबने पाल रखी थी। अब तो खैर विपक्षी पलट ही गये हैं जो मुझे उम्मीद भी थी पर कल तक जैसा माहौल था वैसे में उन्होंने भी ऐसी उम्मीद नहीं लगाई होगी।
सत्ता पक्ष के बड़बोलों के चेहरे उतरने लगे थे और विपक्षी बड़बोलों के चेहरे की चमक बढ़ती जा रही थी।
धीरे-धीरे विपक्षी गठबंधन की सीटों की संख्या बढ़ने लगी और सत्ता के बड़बोलों के चेहरे रुआंसे होने लगे। एक चैनल पर तो एक निर्गम मतानुमान बताने वाले महानुभाव रोने लगे थे।

हद्द तो तब हो गई जब सत्ता के नीति नियंता स्वयं कुछ देर के लिए अपनी सीट से पीछे चले गये वो भी तब जब पिछले दो बार में उप-विजेता कभी उनके आसपास भी नहीं फटक पाया था और बाद में पिछ्ले नतीजों के मुकाबले बहुत ही कम अंतर से विजयी हुए।

दोपहर तीन बज चुके थे। मैं गंतव्य पर पहुंच कर कूलर चला आराम से लेटा हुआ था। बहुत से यार दोस्त हर्षोल्लास के साथ और बहुत से रोते हुए फोन कर चुके थे। रोने वालों में कुछ हाईकमान से दुखी थे, कुछ पिछले विजयी सांसदों से, कुछ हाईटीसेल से तो कुछ ने जनता पर ही सारा दोषारोपण कर दिया था।
खुश होने वालों को बधाई और रोने वालों को सांत्वना दे देकर मेरा मन भी थोड़ा उबाऊ हो चुका था। एक अस्पष्ट बहुमत की ओर अग्रसित नतीजे देखकर संभावित कारणों पर भी मन विचरण करने की कोशिश कर रहा था।
थोड़ी देर तक यूं ही पक्ष-विपक्ष की जीत-हार के कारणों पर मंथन करने के पश्चात मैंने सोचा चलो ट्वीटर के धुरंधर ज्ञानियों और ट्वीटरियों की राय पढ़ी जाये शायद वहां से कुछ सार्थक जानकारी मिल सके‌।
यही सब सोचकर मैंने ट्वीटर खोला तो देखा इधर अलग ही खेल चल रहा है। कोई सत्ता की हार का दोष पार्टी के एक अन्य युवा और प्रसिद्ध नेता, जिनको भावी नायक की तरह देखा जाता था, के मत्थे मढ़ने में लगे हैं तो कुछ लोग धार्मिक कट्टरवाद या तृप्तिकरण की बात कर रहे हैं। एकाध लोग पुराने सांसदों के नकारेपन जैसे दुर्लभ कारणों की भी चर्चा करते दिखे। पढ़कर लगा देश बदल रहा है, काम पर वोट दे रहा है। पर तभी कुछ ऐसे क्षेत्रों कै नतीजे दिखे जहां का कायाकल्प होने के बावजूद वहां के प्रत्याशी भारी अंतर से हार गये हैं।

कुछ ऐसे भी ट्वीटरिये दिखे जो मन में तो चार सौ पार ना होने से फूट-फूटकर रो रहे होंगे पर बाहर से सवा दो सौ को ही अपार जनसमर्थन और मास्टरस्ट्रोक बता रहे थे कि लगातार तीन बार में भी इतनी सीटें लाना चार सौ पार से कम नहीं है।
ये बुद्धिजीवी लोग हाईटीसेल के नकारे पालतुओं को बचाव का आधार दे रहे थे और साथ ही बड़बोलों को खींसें निपोरने का भी जो शाम तक सच ही साबित हुआ।
शाम तक हाईटीसेल इसी बचाव लाइन पर चल रहा था और प्रवक्ताओं ने भी यही धुन बजानी शुरु कर दी थी।
कुछ अतिउत्साहित निकम्मों ने हार का ठीकरा ऐसे ही किसी अनचाहे मौके के लिए खिलाये पिलाये गये अध्यक्ष जी के मत्थे फोड़ उनका ही ढ़ोल बजाना शुरू कर दिया। ये सब देखकर विपक्ष के एक अध्यक्ष जी राहत की सांस ले रहे थे।

शायद अपने छोटे से जीवनकाल में पहली बार देख रहा था कि दोनों ओर से ही नैतिक विजय की ढपली बजा बड़बोलों की जमात नाच रही थी। आत्मावलोकन की सुध किसी को नहीं थी। सत्ता पक्ष में सबको सदमा लगा था पर शायद बचाव के नये नये तरीकों में उन्होंने खुद को संतुष्ट कर लिया था।
सबने पार्टी के मुखिया जी की एक फेमस लाइन "आपदा में अवसर" की राह पर चलकर "सदमे में संतुष्टि" ढूंढ ली थी।

Saturday, May 4, 2024

ईकोसिस्टम का ओवरटाइम

किसी भी व्यक्ति को अपनी पूरी बात रखने का अधिकार होता है इसका मतलब ये नही कि वो कुछ भी अनाप-शनाप बकता जाय। सरकार का विरोध करना है करिए, कोई व्यक्ति विषेश आपको पसंद नही है कोई बात नही या फिर फिर किसी राजनीतिक दल के घोर विरोधी बने रहे लेकिन इन सबके विरोध में देश विरोधी बाते करना कहा तक सही है ? इसे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं लुच्चई ही कहा जायेगा। वैसे आज के समय में चरित्र हनन करना हो या मुख से किसी के लिए अपशब्द निकालना बहुत ही आसान काम हो चला है।  राजनीति में सबकुछ जायज है इसका मतलब ये नही की जेल में बंद होने के बाद भी अपने पद से इस्तीफा न दे, जब नैतिकता मर जाती है तो यही होता है। राजनितिक घाघो की फेहरिस्त लंबी है एक से बढ़कर एक घाघ पड़े हुए है। इन आत्ममुग्ध बौनो को लगता है जो ये कह रहे है वही सही है ,बाकी सब गलत है। हर बात स्क्रीन काली कर देने वाला लोकतंत्र की हत्या रोज करवाता है तो कोई बल्लीमारान में पकौड़े तलकर लोकतंत्र की रक्षा कर रहा है। प्रधानमंत्री ने बोला ही था रोजगार नहीं है तो पकौड़ा तलो,बल्लीमारान वाला वहा पकौड़ा तल खूब कमा रहा है। काला कौवा कांव-कांव करते नही थकता है उसे पता है की उसे सिर्फ श्राद्ध पक्ष में सम्मान मिलेगा लेकिन वो नही मानता है उसे रोज कांव- कांव कर गाली सुनना हैं क्योंकि गाली सुनने पर उसे अलग तरीके का ऊर्जा प्राप्त होता और एक तरह से संतुष्टि मिलती है।

विश्वविद्यालय में गंध मचाने वाला विचाराधारा की बात करता था अपने क्षेत्र में पीटे जाने के बाद यकायक उसकी विचारधारा को लकवा मार गया लाल सलाम करने वाला अब कहता है "डरो मत". अरे इतने बड़े क्रांतिकारी है, विचारों में परिवर्तन तो आना ही था। हास्यपद तो ये रहा की इसकी तुलना भगत सिंह से करने लग गए थे सब, स्तर इतना गिर गया है राजनीति  में की क्या ही बोला जाय? कुछ तथाकथित छात्र संगठनो का कहना था की ये देश का अगला प्रधानमंत्री होगा , सिंगरेट फूंकते कुछ छात्र इसे अपना हीरो बना लिए थे...वैसे भी आजकल सोशल मीडिया का जमाना है हर कोई चमका जा रहा है या चमकाया जा रहा है। तथाकथित पत्रकार महोदय लोग इसीलिए रखे गए हैं। संघर्षों की ऐसी कहानी सुनाएंगे और लिखेंगे की उसे देखकर इनके मालिक को भी लगता है ये मैने कब किया? एक जर्मन शेफर्ड है वो रह रहकर भोंकता रहता है और खुद की तुलना उसने नेताजी सुभाषचंद्र बोस से कर दी थी वो भी जर्मनी रहकर फांसीवादी सरकार का विरोध काट रहा है ... अरे बुड़बक वो नेताजी ब्रिटिश साम्राज्य से लोहा लिए थे,ये देश की जनता की चुनी हुई सरकार है... यार कितना भौंकता है ये जर्मन शेफर्ड  इसे देखकर रास्ते में लगा बोर्ड पर लिखा "शराबी कुत्तों से सावधान" याद आ जाता है..!

बाप के नाम पर मुख्यमंत्री बनने वाले को लगता है की वो बहुत बड़े जमीनी नेता हैं और उनके आगे कोई है ही नहीं। खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने वाले आत्मुग्धता में डूबे हुए हैं। बाप को जिन्होंने लाठी लाठी पिटवाया था उनके साथ जुड़ जाए इतना ही नही बाप जिसको मेहरारू बनाने पर तुले हुए थे उसको बुआ बना लिए बस यही राजनीति है। भले विदेश में जाकर इंजीनियरिंग पढ़ा हो इन्होंने लेकिन सोशल इंजीनियरिंग में पूरे फेल  दिखे है। कहा क्या कब बोलना चाहिए शहुर नही सीखे फुल पप्पू को टक्कर दे रहे है..! ऐसा समाजवाद हावी है इनके ऊपर की ये आतंकियों और माफियाओं के कब्र पर फातिहा पढ़ने निकले जाते है हद तब हो जाती है जब "अज्ञात हमलवार" द्वारा मारे जा रहे भारत विरोधी तत्वों पर सवाल उठाने लग जाते है ... ये हर जगह हर मुद्दे पर बोलने लग जाते है बाते ऐसा करेंगे जैसे उनकी पार्टी क्षेत्रीय नही बल्कि राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है। जमीन से उखड़ते जा रहे है उखड़ चुके है बल्कि ये लेकिन कोई सुधार नहीं आया है इनमे जस के तस  अहंकार में डूबे हुए है।
यही हाल नौवीं फेल का है। इस नौवीं फेल को लगता है कि इसका आईक्यू लेवल भारत के पढ़े लिखे लोगो से ज्यादा है। बाप चारा खाकर जेल चल गया और ये गरीब गुरबा बनते है। मूस मारने वाला कहानी तो सबने सुना ही होगा  आजकल तो गरीब गुरबा मटन मुर्गा मारकर खाता है , हवाई यात्रा करते हुए आकाश में जल का फल निगलता है वो भी नवरात्रि के दिन वीडियो डालता है, सावन में तथाकथित दत्तात्रेय ब्राह्मण के साथ मटन वाली तस्वीरें सब देखे ही होंगे, अब जनता का खून नही पी पा रहे है तो यही सही। बाकी लालटेन में मिट्टी का तेल हो तो अपने पृष्ट भाग में डालकर जो कीड़ी है उसे मार सकते है बड़ी राहत मिलेगी।


एक वर्ग ऐसा है जिसे बात- बात पर विरोध प्रदर्शन करना होता है। होता इनसे कुछ नही है सिवाय बकइती के लेकिन ज्ञान दुनिया भर का देंगे। बोलेंगे ऐसे मानिए सरकार ने सबसे बड़ा अन्याय इन्ही के साथ किया है क्योंकि ये फलाने जाति से ताल्लुक रखते है। खुद को राजवंश और बड़े घराने का खून बताने वाले ये तथाकथित लोगो का अलग ही रोना है। अरे यार अगर सर्वश्रेष्ठ बनने का दंभ भरते हो तो बना लो पार्टी और कूद पड़ो राजनीति में कौन रोक रखा है तुम्हें..? उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के समय तथाकथित ब्राह्मणों पर  अत्याचार हो रहा था और लोकसभा में इन तथाकथित राजपूतों पर होने लगा है... हद है लालू मुलायम जैसे भी थे अपनी पार्टी बनाकर बड़े नेता बने न.. आप भी बन जाओ ये लोकतंत्र है, चलने चलाने का हुनर होना चाहिए। पैदा होते ही कोई सत्ता नही पा जाता है । विरोध करने की भी एक सीमा होती है , मजहबी लोगो को अपना बाप बनाएंगे तो गाली ही सुनेंगे । वो विदेशी कोख से जन्मा बोलता  है कि "राजाओं-महाराजाओं का राज रहा। जो भी वो चाहते, कर देते थे। किसी की जमीन चाहिए तो उसे हड़प लेते थे। कांग्रेस पार्टी और हमारे कार्यकर्ताओं ने देश की जनता के साथ मिलकर आजादी प्राप्त की, लोकतंत्र लेकर आए और संविधान दिलवाया। फिर चाय वाले ने प्रतिक्रिया व्यक्त की तो धुआं धुआं हो गया  "शहजादे ने तो राजा-महाराजा को बुरा-भला कह दिया। लेकिन भारत के इतिहास में जो अत्याचार नवाबों ने किए, सुल्तानों ने किए.. उनकी बात पर तो शहजादे के मुंह पर ताला लग जाता है।"

वैसे  कांग्रेस बनी कैसे थी ? कांग्रेस की स्थापना ही क्यों हुई थी? मुझे नही पता पर एक जगह पढ़ा था की "ऐ लन ऑक्टेवियन ह्यूम इटावा के ब्रिटिश कलेक्टर थे और १८५७ में भारतीय क्रांतिकारियों से बचने के लिए मंदिर में छिपे थे और फिर वहाँ से साड़ी पहन के भागे थे। इन्होंने एक संगठन की स्थापना की ताकि १८५७ जैसी ब्रिटिश विरोधी स्थिति पुनः ना उत्पन्न हो और ब्रिटिश सरकार के वफ़ादार नेताओं का एक संगठन बनाया। उस संगठन का नाम कांग्रेस था। क्या ही बोला जाय ये दूसरो पर लांछन लगाते है जिनका खुद का इतिहास ही काला और गंध से भरा हुआ है। तमिल नाडू में अपने बाप के हत्यारों के साथ मिलकर सरकार बना लेना ही तो राजनीति है।

वामपंथियों को कितना भी गरियाया जाय नही सुधरने वाले है। पहले तो इनका अस्तित्व ही नही बचा है ले देकर केरल में ही सिमट चुके है वो भी न जाने कब चला जाए हाथ से..! इनको कभी प्रश्न नही देखा हू पिछले कई सालों से राड़ की तरह छाती पीट रहे है। कॉमरेड गांजा फूंकने के बाद विश्वविद्यालय में फिलिस्तीन बचाओ की राजनीति करते हैं। इस समय तो छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का ताबड़तोड़ ठुकाई हो रहा है उसे लेकर इनके दिल में जो दर्द करारा उठ रहा है देखने लायक है.. ये प्रजाति ही ऐसी है जिसे जबतक पीटा जाय शांत नही रहते है कुछ न कुछ खुरपात करते ही रहते है.. पप्पू भी लगता है इन्ही लोगो से अपना मेनिफेस्टों इन्ही लोगो से लिखवाया होगा। लेफ्ट लिबरल की विचधारा रखने वाले कहते है "धर्म अफीम का नशा है" लेकिन जब बात इस्लाम की आती है तो तथाकथित सेकुलर लिबरल मुस्लिम लेखक बुद्धिजीवी पत्रकार आदि मजहबी कट्टरपंथ वाला रंग अपना दिखाने लग जाते है। देश के संसाधनों पर मुस्लिमों का पहला हक है कहने वाले  पूर्व प्रधामंत्री मनमोहन सिंह हंस के वेश में बगुला हैं, मोदी जी कहे थे न एक बार "डॉ साहब रैन कोट पहनकर नहाते थे"। एकबार फिर से यही बात बोलकर पूरे विपक्षी में खेमे में भूचाल ला दिया है और विपक्ष पूरा मौका देने से चूक नही रहा है। हिंदू शरणार्थियों के लिए संसद में रोकर भागने वॉक आउट करने वाली हिडिंबा का  क्या ही कहना? रंग बदलने में गिरगिट से भी आगे निकली। आने वाले समय में इसका और इसके पार्टी का हाल  वामपंथियों से भी बुरा होगा तब तक कर ले हम्मा हम्मा रंभा बंबा..!

चुनावी  विश्लेषण वाले तथाकथित पत्रकार 4 जून को मातम मानते हुए नजर आएंगे फिलहाल प्रेशर कुकर की सीटी वाला काम रहे है वरना कुकर तो फट ही जाएगा..! मन की शांति के लिए विरोधी इन्हें पढ़ते है और इनके यूट्यूब चैनल पर जाकर देखते हैं। यकीन मानिए दो जून की रोटी तक नही पचेगी इन खलिहर खैरातियो से  कर ले बकइती जितना करना आखिर में यही सब करने का तो खैरात मिलता है। बाकी कोई नही टक्कर में चाय वाला फिर से आ रहा है पूर्ण बहुमत में .. चाय वाला चौकीदार बना था पिछले चुनाव में इस साल परिवार बन चुका है सबका और  देश जिसका परिवार बन के खड़ा हो गया हो उसे कौन रोक सकता है ..!

Friday, August 11, 2023

चुम्मा विमर्श

और दद्दा राम राम कैसन हो का हाल चाल है? ठीक है अपना बताओं? हम्हू मस्त है बाकी संसद में बवाल हो गया है "फ्लाइंग किस" को लेकर.. ई का होता है बे? तनिक विस्तार में समझाओ .. दद्दा इसका मतलब है कि दूर से ही हाथ को मुंह से लगाकर हवा में इशारा कर देना... ई कवन किया बे? वही राजनीति का पप्पू और कौन करेगा.. हाहा बेटा हम्हू सब जानते है रोज टीवी और अखबार के माध्यम से सब देखते और समझते है...  तब काहे पूछे इसके बारे में पूछे? हम देखना चाह रहे थे तुम कितना जानते हो इसके बारे में? ... अरे दद्दा आजकल ई हे राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है.. हा सही बोले। साला संसद में सांसदों का रवैया देखने लायक है। हद हो गई बात आंख मारने से लेकर "हवाई चुम्मा" तक चली गई शर्मनाक है..! ये इससे भी शर्मनाक मणिपुर में जो हुआ एक कलंक है उसपर यशश्वियो की चुप्पी और कुछ  तथाकथित लोगो का अनर्गल प्रलाप की राजनीति ने देश की छवि को काफी हद तक ठेस पहुचाई है। खैर संसद में छिछोरापन कही से भी ठीक नही है। ... अरे दद्दा इस शर्मनाक हरकत का भी बचाव किया जा रहा है एक बिहार की कांग्रेसी नेता कह रही थी की "बूढ़ी को को फ्लाइंग किस देंगे" भले पप्पू पचपन का होय गया हो..
सही बोले  शायद वो "साठे में पाठा सिद्धांत" मानती हैं... गज़ब का तर्क कुतर्क चल रहा है दद्दा.. हाहा हाहा

अरे हंस मत पगले तुझे क्या पता हंगामा तब नहीं हुआ जब गोविंदा ने शिल्पा शेट्टी से चुम्मा उधार मांगा, तब भी नहीं हुआ जब अमिताभ बच्चन ने सुश्री किमी काटकर जी को जुम्मे के दिन के चुम्मे का वादा याद दिलाया....हंगामा हुआ भी तो एक युवक के तथाकथित हवाई चुम्मा मात्र देने पर हुआ..!
क्या चुम्मे लेने देने पर सिर्फ महिलाओं का ही कॉपीराइट है, पुरुष समाज अगर हवाई चुम्मे तक की बात कर दे तो हंगामा खड़ा काहे हो जाता है? ये कैसा समाज बना रहे हैं हम, क्या यही गांधीजी के सपनों का भारत है? शर्मनाक... 

अरे दद्दा भोजपुरी वाला पुराना गाना याद आ गया उसमे भी एक महिला ही गाती है "ए गो चुम्मा दे दी राजा जी बन जाई जतरा हमार" अभी एक नया निकला है जिसमे लड़की कह रही "ना चेक लेहब ना देहब उधारी काहे से की ई चुम्मा ह भारी" तो लड़का गाता है "गन्ना बेच के चुम्मा लेहब हम बैसाख में देबू चाहे एक लाख में.. चाहे चीनी हमरी मिल जाय डार्लिंग खाक में चुम्मा लेहब हम एक लाख में ...." वाह बेटा वाह पूरा रिसर्च करके बैठें हो...!  दद्दा चुम्मा पर अच्छा खासा रिसर्च किया जा सकता है बहुत कुछ निकलकर सामने आ सकता है.. अब लड़किया कहती है  मैं दाढ़ी रखने वाली कल्चर के खिलाफ हु चुम्मा लेने में दिक्कत होती है अब इन्हें कौन बताए की "दाढ़ी निकाल दो तो कुछ लड़के लप्पु सा सचिन लगने लगते है" कौन सचिन बे? हैदर वाला दद्दा तेंडुलकर मत समझ लेना वैसे भी ये फ्रेंच कट दाढ़ी रखते थे कभी... हाहा हा 
अच्छा तो अब चलते है काम पर फिर मिलते है शाम को इसी दुकान पर ... हा दद्दा इस बीच भोजपुरी में गया हुआ "पाण्डेय जी का बेटा हु चिपक के लेता हु " वाले गाने का विश्लेषण किया जाएगा और सुना है वामपंथियों ने "ब्राह्मण वादी चुम्मे" का विरोध किया है.... अबे  चल निकल ससुरे हरदम बकैति करता रहता है... इतना पढ़ाई में दे दिया होता पीएचडी कर रहा होता... अरे दद्दा क्या ही बताऊं उसके एक चुम्मे ने पूरा सेमेस्टर बर्बाद कर दिया....बड़ी गंभीर समस्या है दद्दा के लिए चाय पकौड़ी इंतजाम किए रहना मिलते है को निकलते है काम पर चूमना चूमाना तो लगा रहेगा......!



Monday, May 8, 2023

मरने से अच्छा करो धरना

जंतर मंतर पहुंचने से सारा काम हो जाता है। ना जाने कौन सा तंत्र किया हुआ है उधर पूरी भीड़ उमड़ी रहती है... अरे यार दिल्ली देश की राजधानी है इधर काम ना हुआ तो समझो कही ना होगा... हा वही कांड की ही बात कर रहा हूं एक कांड को छिपाने के लिए दूसरा कांड किया जाता है जिसको नाम दिया जाता है "आंदोलन"। तथाकथित उमड़ी भीड़ दिल्ली में जाकर बास- बल्ली गाड़कर या बम्बू के सहारे तंबू लगाकर बैठ जाती है। खाने पीने की व्यस्था भी हो जाती है। बकायदा कूलर पंखा एसी टीवी और तो और जरूरत पड़ने पर आर्केस्ट्रा का भी प्रबंध कर दिया जाता है। अब क्रांति ऐसे ही हो जायेगी क्या ? लाखो करोड़ो का खर्चा होता है भाई क्रांतिकारी ऐसे ही थोड़ी पैदा हो जाते है..!   

क्रांति का स्तर तो इतना बढ़ गया है की अब ट्रैक्टर खेतो की बजाय सड़को पर करतब दिखाने लगा है। क्रांति का मुख्य फैक्टर अब ट्रैक्टर हैं। वो एक बीता जमाना था जब हरित क्रांति होती थी अब हर क्रांति के लिए ट्रैक्टर की आवश्यकता पड़ती है।  वो कैसे इसकी जानकारी तो कोई बढ़िया फैक्ट चेकर ही दे सकता है। मैं तो बस यहीं कहूंगा की बिना ट्रैक्टर के जोताई नही होगी और जोताई नही होगी तो बोवाई कैसे होगी...! इस्तेमाल तो हल का भी होता था पर ये लोग बैलों पर अत्याचार नही करते बेचारा बेजुबान पशु है। आधुनिकता का जमाना है और जमाने के साथ चलना चाहिए। एक ही जीवन है कब क्या हो जाए कोई इसका ठिकाना है... कुछ लोग यही सोचकर कहते है पूरा जीवन हमे आंदोलन करते हुए बिताना है। क्रांति के बीज  बोने वालों के आगे हमारे आपकी क्या बिसात? अरे कौन जात?  कौन जात?.. अरे कौन जात वाला पत्रकार याद आ गया बिना इसके जिक्र के तो क्रांति की कहानी अधूरी मानी जाएगी.....! खैर मुझे क्या लेना देना मै तो ठहरा संघी जन्मजात..!




 



Wednesday, March 22, 2023

जमने जमाने की बात

          "चाय का ही जमाना चल रहा है आजकल"

वक्त और जमाना एक साथ चलते रहते है । वक्त के साथ जमाना भी बदल जाता है..! नया जमाना हो या पुराना जिसका किसी से जमा ही नही वो कहता फिरता है "जमाना हमसे है हम जमाने से नहीं.." जब प्रेमी प्रेमिका पीछे पड़ जाए तो प्रेमिका कहती है.. "ओहो हो छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा" तब प्रेमी कहता है "कोई कहे कहता रहे कितना भी हमको दीवाना हम है नए तो फिर अंदाज क्यों हो पुराना" राह चलते हुए बुजुर्ग कहते है एक हमारा जमाना था की साइकिल नही मिलती थी हमे जल्दी चलाने के लिए एक ये है आजकल नए लड़के जो  अभी माई के पेट से अभी निकले नहीं की  सीधा हीरो होंडा उड़ाते फिर रहे है..!  बीड़ी फूंकते हुए मजदूर अपने लड़के से कहता है पढ़ लो बचवा हम तो अपने जमाने में मास्टर साहब का मजा लेते थे  आज जिंदगी हमारा मजा ले रही है।  जमना जमाना तो चलता रहेगा पर ये मेरा जमाना तुम्हारा जमाना वाला भसड़ कभी खत्म नही होने वाला है। लोग भूल जाते है वक्त के साथ कितना परिवर्तन हुआ है।
इन सबके बीच तो एक बात तो ही भूल ही गए जो गांव देहात में स्टाइल मारने वाले हर लौंडे पर सटीक बैठता है " बाप जिए अंधेरा में लइका बने पॉवर हाउस" वाह रे जिंदगी का कवनो ठिकाना कब कौन बाजी मार जाय..! 

एक फिल्मबाज चचा मिल गए राह चलते हुए लगे अपनी कहानी बया करने की एक जमाना था जब सिनेमा हॉल में कवनो फिलम नही छोड़ता था आज देखो दो वक्त की रोटी के लिए जद्दो-जेहद करना पड़ रहा है। मास्टर जी कहते थे बेटा पढ़ लो लेकिन हमको हमारे बड़का घराने के होने का घमंड था लेकिन जमाना एक सा नही रहता बदल जाता है। हमहु बोले अरे चचा छोड़ो सब ना तो वो अब सिनेमा हाल ही रहा वो पार्टी का दफ्तर बन गया दुकान खुल गई  और और ना ही मास्टर साहब मास्टर रह गए मास्टर साहब तो अब प्रिंसिपल बन गए है। बाकी आप अपने बाप दादाओं की जायदाद पाकर अय्याशी किए जिंदगी भर और अभी कौन सा आप किसी से कम खेत परती छोड़कर और अधिया देकर नल्ले घूमेंगे तो भूखे ही मरेंगे न.... इतना कहना ही था कि चचा ताव में बोल पड़े का जमाना आ गया है आजकल का लड़का सब जबान लड़ाने लग गए है बात करने का लहजा भुला गए है..। अब सच तो कड़वा ही लगता है लोगो को चाहे इस जमाने के हो या उस जमाने के अपनी काली हकीकत सबको बुरी लगती है। चचा तो फिलमबाज थे पर आजकल के लौंडो को क्या हो गया है वो तो एक दम से "चिलमबाज" हो गये है और जाते फिरते है "दम मारो दम मिट गए हम, लगाओ सुबह शाम दस बोतल रम" जमाना है भइया जमाना क्या सकते है ..! एक जमाना तो "पुरब के ऑक्सफोर्ड" का भी था जब यहां से कलेक्टर निकलते थे लेकिन आज चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बनने की होड़ लगी हुई है..! पहले कहा पीसीएस का फॉर्म भरना ही बेइज्जती मानते थे सब भरते भी तो तो छुप छिपाकर आईएएस से नीचे बात ही नही होती थी। लेकिन तब का ऑक्सफर्ड अब खस्ताहाल हो गया है। मरे हुए शहर की रंगत थी तो यूनिवर्सिटी से ही वर्तमान में तो विरान हो चला है। ये भी एक जमाना है जहां छात्रों को सिर्फ सरकारी नौकरी से ही कमाना है। हमारा क्या है हमे तो पहले से ही जमाने ने ठुकराया है बाकी बचा खुचा जो उससे था उसने भी औकात दिखा दी बोली दूर रहो मुझसे मैने भी कह दिया अगर तुम मिल जमाना छोड़ दूंगा मैं....!


Friday, January 27, 2023

अरे बिहार के लोगो नमस्कार...!

लौरिया विधानसभा क्षेत्र के सुधि जनों
नमस्कार 

वैसे तो मैं इस विधानसभा क्षेत्र का टैक्सपेयर निवासी हूँ और कार्यक्षेत्र की व्यस्तताओं की वजह से आमतौर पर घर आना जाना कम ही हो पाता है किंतु इस वर्ष मकर संक्रांति के सुअवसर पर घर आना संभव हुआ है।
स्वयं को ईमानदार मैंने इसलिए भी नहीं कहा क्योंकि आज के आभासी सामाजिक प्रकटीकरण के भीषण दौर में मैं स्वघोषित ईमानदारी का ढ़ोल पीटता भीड़ का हिस्सा होना नहीं चाहता जहाँ हर शख्स स्वयं को अधिक ईमानदार घोषित कर अपनी बड़ाई सुनना चाहता है।
कल एक कार्यवश फतेहपुर चौक जाना हुआ और कुछ ऐसा दृश्य दृष्टिगोचर हुआ कि मैं उसपे लिखने से रोक नहीं पा रहा हूँ।

तो आप सबको और अधिक असमंजस की स्थिति में ना रखते हुये कल की वो घटना बताता हूँ जिसने ये पोस्ट करने के लिए मजबूर कर दिया।

तो हुआ यूँ कि मैं एक व्यक्तिगत कार्य से दोपहर में घर से फतेहपुर चौक जाने के लिए निकला। लंबे अवसर के बाद घर आया था तो सोचा आज साईकिल चलाने का आनंद लिया जाये वर्ना मेट्रोसिटी की भागमभाग में ये अवसर कहाँ प्राप्त होता है। अतः मैंने साईकिल निकाली और चल पड़ा। चहुँओर भारतीय गणराज्य के 74वें गणतंत्र दिवस तथा विद्यादायिनी माँ सरस्वती के पूजनोत्सव में जुटे हर्षोल्लासित बच्चे दिख रहे थे। सुबह की धुंध के बाद मौसम भी खुशगवार हो चुका था। मच्छरगावाँ बाज़ार होते हुये मैं फतेहपुर चौक तक पहुँचा। रास्ते में मुझे दिखा कि बाज़ार से चौक तक सड़क की स्थिति कुछ ठीक नहीं है हाँ बीच बीच में यत्र तत्र अव्यवस्थित तरीके से हुआ मरम्मत का कार्य भी दिखा। (ठीक तो वैसे बाजार से शनिचरी चौक तक की भी नहीं है किंतु उसकी बात फिर कभी)। 

जैसे ही मैं चौक पर पहुँचा वहाँ मुझे एक पहचान के मिश्रा जी और गफूर भाई मिल गये। दोनों किसी कार्य से बेतिया जाने हेतु बस का इंतजार कर रहे थे। बोले - "अरे *** जी बड़े दिनों बाद मिले हैं आइये पान खाया जाये।" मिश्रा जी थोड़े नाराज लग रहे थे और थोड़े बदले बदले से भी वहीं गफूर भाई का मिज़ाज भी थोड़ा उखड़ा हुआ था। 
इन बातों से अनभिज्ञ मैंने महज उत्सुकतावश पूछ लिया कि "आपलोगों को पता है कि ये सड़क की हालत इतनी जर्जर क्यों है? और ये मरम्मत का कार्य इतने अव्यवस्थित तरीके से क्यूँ हुआ है?" 
मेरा इतना कहना था कि मिश्रा जी भड़क गये। बोले - "*** जी आप कैसे आदमी हैं जो इतनी बड़ी अभूतपूर्व खगोलीय घटना में कमी निकाल रहे हैं? कुछ शर्म वर्म है कि नहीं? इस अखिल विश्व के अभी तक ज्ञात देशों में से सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के निवासी आप पे लानत है। बिना मामले की गंभीरता एवं कार्य संपादित कराने वाले की दूरदर्शिता को जाने आपकी ऐसी ओछी टिप्पणी उचित नहीं है। आप ऐसा कर कैसे सकते हैं?" 
मिश्रा जी के यूँ धिक्कारने के पश्चात अपनी अनभिज्ञता पर मन ही मन स्वयं को कोसते हुये बड़े ही शर्म के साथ मैंने तनिक धीरे से कहा - "मिश्रा जी आप तो जानते हैं कि मैं यहाँ नहीं रहता और घर परिवार तथा दोस्तों के लिये ही मुश्किल से समय निकाल पाता हूँ। वो तो मैंने यूँ ही उत्सुकतावश पूछ लिया था और आप इतने नाराज़ हो गये जैसे मैंने ये पूछ लिया हो कि डोनाल्ड ट्रंप चुनाव क्यों हार गया। और इसमें लोकतंत्र की बात कैसे?"
मेरे इस प्रकार विनती करने के पश्चात मिश्रा जी ने अपने गुस्से को उदरस्थ करते हुये मुझे बताया (हालांकि उनकी नाराज़गी उनके ललाट पर लालिमा के रूप में अभी भी परिलक्षित हो रही थी) - "आप जाने कहाँ रहते हैं जो आपको कुछ पता नहीं होता है। और लोकतंत्र की बात मैंने इसलिए की थी क्योंकि लोकतंत्र ने राजनीति नामक एक ऐसा सर्प दिया है जो देश के विकास पर कुंडली मारे बैठा है। अभी कुछ दिनों पहले ही यहाँ के एक करूणहृदय न्यायप्रिय अतिलोकप्रिय सत्तासीन माननीय विधायक जी से सड़क की स्थिति देखी नहीं गई और उन्होंने इसकी मरम्मत कराई है और आप हैं कि उसमें भी कमी निकाल रहे हैं। लालू जी ने बसंती के गाल जैसी सड़क की बात की थी उससे अच्छे तो हमारे विधायक जी हैं जिन्होंने बसंती की इज्ज़त का पूरा सम्मान करते हुये चिकनी सड़क नहीं बनावाई एवं एक कुशल रफूगर जैसे सिर्फ फटी हुई जगह पर रफू करता है वैसा ही सड़क के साथ किया है। कदाचित् प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का उद्देश्य यही है। पूर्व में ऐसा ही अभूतपूर्व कार्य इन्होंने शनिचरी जाने वाली सड़क पर भी कराया था। क्या करें बेचारे इतने सज्जन आदमी हैं कि सज्जनता भी हर सुबह शाम इनको अष्टांग दण्डवत प्रणाम करके जाती है। जनता का दुख इनसे देखा नहीं जाता इतने सहृदय व्यक्ति हैं और न्यायप्रिय इतने कि अपने घर के बगल में स्थित सरकारी विद्यालय के बगल की सड़क इन्होंने तीन बार बनवाई जब तक निर्माण कार्य से संतुष्ट नहीं हो गये।"(ये लाइन कहते हुये मिश्रा जी के मुखमंडल पर एक अजीब सी ना समझ में आने वाली मुस्कान थी)

उन्होंने आगे कहा -"आपको ये तो पता है कि विधायक जी एक राष्ट्रवादी राष्ट्रीय पार्टी के नेता हैं। जो पार्टी इतनी राष्ट्रवादी है कि पार्टीविरोधी बात करने वालों को राष्ट्रविरोधी बात करने वाला बता सीधा पाकिस्तान का वीजा दे देती है और यही नहीं उसके नेता वहाँ तक छोड़ के आने की बात भी कहते पाये जाते हैं ऐसी पार्टी के सत्तासीन विधायक पर आप अकर्मण्यता का आरोप लगा रहे हैं? शर्म आनी चाहिए आपको।"
मिश्रा जी के रौद्र रूप को देख मैं सहम सा गया। तभी गफूर भाई के हँसने की आवाज़ ने मेरा ध्यान उनकी ओर आकृष्ट किया। तब गफूर भाई ने मुझे समझाया कि मिश्रा जी Sarcasm के मोड में हैं और मेरे आने से पहले तक वे दोनों भी इसी विषय में बातचीत कर रहे थे।

तब मिश्रा जी गंभीर हो गये और मुझसे कहने लगे - "**** जी क्या बतायें इस क्षेत्र को जाने किसकी नजर लगी है जो हमें ऐसे दिन देखने को मिल रहे हैं। ये वो विधायक जी हैं जिनका विजन आजतक कभी स्पष्ट नहीं रहा कि ये राजनीति में करने क्या आये थे, कर क्या रहे हैं और भविष्य में क्या करेंगे? राम जाने उनको स्वयं को भी यह ज्ञात है अथवा नहीं? मैं दावे से कह सकता हूँ कि ऐसा अकर्मण्य विधायक इस क्षेत्र के इतिहास में आजतक नहीं हुआ। भारतीय जनता पार्टी (हालांकि कुछ लोग इसको भारतीय जमात पार्टी भी कहते हैं) के एक अतिअतिरिक्त अतिउपेक्षित एवं थोथे विकासपुरूष के जीवंत परिचायक इस अल्पविकसित विधायक को एक वार्ड चलाने की समझ नहीं है और हम इनसे पूरे विधानसभा क्षेत्र की आस लगाये बैठे हैं तो हमसे बड़ा जाहिल और कौन होगा।
हमेशा अपने चरणलोलुपों द्वारा की जाने वाली चरणवंदना से आच्छादित रहने वाले नेताजी के लिए जनता की समस्याएं तो इनकी अधोजटाओं के घुंघराले बालों के त्याज्य गुच्छों के समान हैं। अपनी बिरादरी वालों को ठेकेदारी एवं अघोषित रौबदारी सौंपने की व्यस्तता के मध्य माननीय अपने अतिनिजी कार्यों के संपादन हेतु समय निकाल लेते हैं यही क्या कम है अन्यथा अगर कार्य प्राकृतिक नहीं होता तो अधोजटाओं सी मोहिनी मूरत वाले उनके चरणचुंबक स्वयं संपादित कर आगामी ठेकेदारी के लिये अपनी कर्तव्यपरायणता सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।"
इतना बोलते बोलते मिश्रा जी की साँस फूलने लगी फिर मैंने और गफूर भाई ने जैसे तैसे उन्हें चुप कराया और पान थूकते हुये गफूर भाई ने पनवाड़ी से पानी की बोतल माँगी। हमने मिश्रा जी को पानी पिलाया। तभी बस आ गई और मिश्रा जी तथा गफूर भाई को जाना पड़ा। मिश्रा जी जाने के मूड में तो नहीं लग रहे थे शायद उनकी बात अधूरी रह गई थी। 
फिर मैंने भी अपना काम निपटाया और घर की ओर चल पड़ा।
वापस आते हुये मैं सोच रहा था कि कह तो मिश्रा जी ठीक ही रहे थे।

(लेखक पेशे से इंजीनियर है और राष्ट्रचिन्तक से जुड़े हुए है)

Tuesday, September 6, 2022

आराम

आराम= आम ,राम और आरा 
यानी इस शब्द से फल भगवान और एक जिला निकलता है.... गर्मियों में घाम चाहे जितना लगे लोग आम दबाकर चूसते है खाते है बिना रुके थके .... हापुस चौसा लंगड़ा दशहरी, खाईब पूरा दोपहरी...

रही बात आरा जिला की तो एक नवयुवती के "लिपस्टिक" लगाने पर हिलने लगती है ... भोजपुरी के महान कलाकार पवन सिंह के गाएं है "जब लगावे लू लिपिस्टिक हिलेला आरा डिस्ट्रिक" इतना ही नही पूरा जिला हिलेगा तो भूकंप आ जाएगा न लेकिन फिर भी उस नवयुवती को जिला टॉपर बनाया जाता है... आदरणीय नीतिश कुमार जी को "लिपिस्टिक" पर प्रतिबंध लगाना चाहिए था ना की शराब पर....... इस बात को लेकर झूमने और चूमने वाले युवा क्रांतिकारियों में जबरदस्त भिड़ंत देखी गई है.....

एक आते है "राम" भगवान इनको कवनो फर्क ही नही पड़ा काटे कंकड़ पत्थर जंगल झाड़ी नग्न पैर चलते रहे है , जहा जहा गए छाप अपनी छोड़ते रहे ... बिना रुके बिना थके समुद्र से याचना किया , चाहते तो पहले ही तीर निकालकर चीर देते समुद्र को... लेकिन दिव्य शक्तियों का प्रयोग हर वक्त करने से मनुष्य "मरा" सिद्ध होता है, "राम" बनने के लिए पौरुष बल ही बड़ा होता है....सब्र और प्रतीक्षा बांध टूट गया जब "राम" के सामने तो ...प्रश्न उठता है यहां हम क्यों चले "आराम" करने।

ये शब्द "आराम" सुनने में ही अच्छा लगता है अब तो🙂


©शिवम कुमार पाण्डेय

Saturday, May 1, 2021

क्यों लाशनऊ तो हो सकता हैं, मगर मृत्युगढ़', 'मौत-राष्ट्र' और 'श्मशानस्थान' नहीं?


लेखक:- गौरव राजमोहन नारायण सिंह (हृतिक सिंह)


जब कोई व्यक्ति कुंठा में किसी की मृत्यु पर अपने बंद पड़े छापखाने को चलाने के निम्नस्तरीय प्रयासों में संवेदनशीलता की सारी सीमा पार कर दें, तब हम जैसे परेशान मगर स्वाभिमानी, ऐसे पुरस्कृत बकैताधिश्रेष्ठ को उन्हीं के स्तर पर उतर कर जवाब देने आना पड़ता हैं। सम्मानाधिपति, प्रत्रकार-श्रेष्ठ बकैत, जिन्होंने अपने दैवीय कधों पर राष्ट्रीय चिंतन व चेतना का सम्पूर्ण भार वहन करने का कष्ट लिया हैं, उनके लिए किसी भी शहर की अस्मिता को अपने शब्दकोशिय-ज्ञान के भंडार से चुनें, किसी निम्नस्तरीय व वीभत्सकारी शब्द से अलंकृत करना, कोई आश्चर्यजनक बात नहीं। महामारी के इस विनाशकारी प्रकोप से दूर, घर की चारदीवारी से बाहर न निकलनेवाले, अपनी गिद्ध-दृष्टि से किसी शहर के लाचार व्यक्ति की कहानी पर राजनीतिक घृणा व विष्ठा का मरहम लगाते है, तो हर उस व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के स्नातक को इस सागर-सी समावेशी भावना में संकीर्णता दिखाई देती हैं। 

अपनी संकुचित विचारधारा के मद में चूर बकैत-राज नें, लखनऊ का नाम बदल कर 'लाशनऊ' कर दिया। तर्क में बकैत-पुरुष, शुरुआत में एक बुज़ुर्ग पत्रकार की लाचारियों भारी मृत्यु से करते हैं, जिसका शोक हमें भी हैं, मगर उसमें बकैत-राज अपना प्रपंच ना जोड़े, ऐसा संभव कहाँ। पूरे देश में महामारी के इसी कठिन अवसर पर अपनी अवसादग्रस्त वैचारिक विपन्नता का प्रदर्शन, किसी की लाश से करना, क्या कोई भी सभ्य समाज में सोच सकता हैं! मगर जहाँ के पत्रकारिता जगत में स्वयंभू-श्रेष्ठाधिपति श्री बकैत-राज, अपनी दैवीय आभा से पूरे जगत को अलंकृत कर रहे हों, वहाँ न सिर्फ इसकी उम्मीद की जा सकती हैं, बल्कि इसे समाज में एक विशेष वर्ग की स्वीकारिता भी प्राप्त हो जाती हैं।

हमें मालूम हैं की कुछ चरमपंथी, नामपंथी, वामी-दंगाइयों के मसीहा पर एक व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी वाला इतना कुछ लिख दें, तो ज़ाहिर हैं, मसिहा-प्रेमियों की कुंठा कितनी होगी, राम ही जाने ! एक आम व्यक्ति अपने भावों के शब्द तभी देता है, जब किसी भी चीज़ की अति होती हैं। मानवीय मूल्यों व संवेदनाओं को बेचकर अपने हित साधना बिकुल भी सही नहीं हैं। आख़िर महामारी पूरे देश में फ़ैली है, तो फ़िर सिर्फ लखनऊ, भोपाल और अहमदाबाद ही क्यों? सिर्फ़ इनका ही नामकरण क्यों किया हैं, क्यों नहीं मुंबई का 'मुर्दाबई' नहीं हो सकता, मगर लखनऊ का 'लाशनऊ' हो सकता हैं !

हमें याद है वो दिन जब इस देश में पहली महामारी की लहर आयी थी तब देश के तथाकथित 'बेस्ट सीएम' वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों व उनकी तथाकथित रणनीति की बकैत तारीफ़ करते नहीं थकते थे। रोज़ अपने बिगहा-भर लेख और रात की पंचायत में प्रपंच ! आंकड़े हो या फ़िर आखों-देखा हाल, कौन इस बात को झुठला सकता हैं की संक्रमण महानगरों से ही फैला चाहें धारावी हो या आनंद विहार, तस्वीरें तो झूठ नहीं बोलती। हम कैसे वो दिन भूल सकते हैं, जब इन्हीं महानगरों के सर्वेसर्वाओं के 'सु-राज' में भूखे-प्यासे मज़दूर मिलों का सफ़र पैदल तय करने पर मजबूर हुए थे। उस फेक न्यूज़ को कौन भूल सकता हैं जब बकैताधिराज ने सूरत से सीवान की रेल गाड़ी को नौ दिन में पहुँचा दिया था। आज जो संक्रमण तेज़ी से फैल रहा है उसकी ज़िम्मेदारी क्या इनकी नहीं थी, सवाल तो होना ही चाहिए। आज देश में संक्रमण से सबसे ज़्यादा मृत्यु दर जिन राज्यों की हैं, वहाँ संक्रमित व्यक्ति की पुकार और समस्या पर लाशनाऊ जैसे शब्द क्यों नहीं गढ़े जाते। क्यों उन प्रभावित राज्यों की मार्मिक चर्चा नहीं होती जहां 68,000 और 16,000 से ज़्यादा मृत्यु सिर्फ सिस्टम के फ़ेल होने के कारण चली गई। हॉस्पिटल में आग लगने और हादसों पर क्यों बकैत-राज की चर्चा और दृष्टि सिर्फ कुछ राज्यों पर ही पढ़ती है। इन गैर-मामूली सवालों का उत्तर सिर्फ इतना हैं की, क्योंकि बकैत-राज को भी तो किसी की गोदी में इठलाना हैं। आख़िर इसीलिए तो 'मृत्युगढ़', 'मौत-राष्ट्र' और 'श्मशानस्थान' जैसे अलंकरण नहीं इस्तेमाल किए गए जाते। 

धूर्त और कपटी होने की एक सीमा होती है। मग़र उसकी भी सीमा लांघ चुके बकैत-राज को इस विकट परिस्थितियों में 3,693 करोड़ रुपये 43 मुनिसिपल करपोर्टरों के बंगले पर ख़र्च करनेवाली सरकार से सवाल करने से परहेज़ क्यों होता हैं। क्यों वो विज्ञापन वाली सरकार से ये नहीं पूछते की 3 दिन में ऐसा क्या हुआ की ऑक्सिजन और बेड खत्म हो गए, क्यों आखिर 8 की जगह सिर्फ 1 ही पीएसए ऑक्सीजन प्लांट लगा, क्यों पिछले 6 साल से 30,000 बेड बढ़ानेवाले, एक भी बेड न बढ़ा सकें? क्या ये आंकड़े और तथ्य नहीं? अगर आज ये महानगरों के 'बेस्ट सीएम' जो फ़िर से अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए तालाबंदी कर रहे हैं, क्या उससे जो पुनः पलायन की स्थिति हो रही है, क्या वो संक्रमण नहीं फैला रहा हैं? इसका जिम्मेदार कौन हैं? 

जिस 'लहसुन बाघ' की सोच से कुंभ और भाजपा की रैलियों पर सवाल खड़े करते हैं, क्यों नहीं यही सवाल डकैत और उनके झुंड से पूछे जाते है की संक्रमण-काल में दिल्ली बॉर्डर पर क्यों बैठे हों, वहां दो गज़ की दूरी नहीं दिखती? क्यों दीदी की रैलियों की भीड़ में कोरोना नहीं होता? आख़िर मुनाफ़क़त क्यों बकैताधिश्रेष्ठ? 

लेकिन हमें लगता हैं की इसमें बकैत-श्रेष्ठ की गलती नहीं, क्योंकि जिसकी दिलचस्पी एक राज्य के चुनावों में भी केंद्र की एन्टी-इनकम्बेंसी को ढूढ़ने की हो, उसकी पत्रकारिता भी तो 'सु-सु दर्ज़े' की ही होगी। ऐसा बौद्धिक स्तर भगवान इसी गिरोह के प्रतिपादकों और उनके शुभचिन्तकों को ही दे। सवालों से बचकर अपने मफ़ाद की खबरों चलाकर पत्रकारिता का निष्पक्ष स्तंभ बताने का ढोंग बंद करो बकैताधिराज। किसी की मृत्यु पर अपना एजेंडा ठेलने से अपना ही चहरा मलीन करते हुए कब तक अपनी निम्न पत्रकारिता करोगें। हम इस बात से कभी इनकार नहीं करते कि परेशानी में हम सभी हैं, बहुत विकट परिस्थितियों से पूरा देश परेशान हैं। मग़र इस परिस्थिति में अपनी बंद पड़ी दुकान के लिए अवसर तलाश करना ये बिल्कुल भी सही नहीं है। आज ये जो स्तिथि बानी है इसका जिम्मेदार हर कोई हैं, खुले बाज़ार में नीचे होते मास्क और भीड़-भाड़, रैलियों में जाने वाले लोगो और उनको कवर करनेवाले पत्रकार, सभी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। ज़िम्मेदार तो वो भी है जिनके ऊपर ज़िम्मेदारी थी की न सिर्फ दूसरों को उनकी जिम्मेदारी बताए बल्कि उसके लिए कुछ कठोर क़दम भी उठाए, मगर जब उनकी प्राथमिकता ही आंदोलनों के अधिकार और दूसरी अन्य गैर-जरूरी मसलों पर हो, तो आज जागने से कोई फायदा नहीं। 

आज परिस्थितियों ऐसी नहीं है जिसपर सियासत की जा सके और ना ही किसी आम आदमी के पास इतना समय हैं की वो इन सवालों से वार-पलटवार कर ऐसे बकैतो को सारे बाज़र शर्मशार करे। मगर जब सभ्य समाज में मानवीय मूल्यों की संवेदनशीलता पर 'लाशनऊ' जैसा तंज, राजनैतिक द्वेष से किया जाए, तब इसको ना तो बर्दाशत किया जा सकता हैं और ना ही भुलाया जा सकता हैं। इसलिए समाज के ऐसे धूर्त व कपटी शकुनियों की बकैती का जवाब देना आवश्यक हैं, क्योंकि खुद महात्मा गांधी जी भी इस बात पर विश्वास करते थे की शिक्षा ही मानव के सर्वांगीण विकास व अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हैं। इसीलिए हम जैसे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के स्नातकों पर ये ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती हैं ।

नोट:-  व्यंग्य शैली में लिखे इस लेख में किसी भी व्यक्ति, समाज या समूह का अपमान का आशय नहीं हैं। यह एक भाव-अभिव्यक्ति अतः आप इसे उसी परिपेक्ष्य में लें।

(लेखक  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक और हिंदी पत्रकारिता में डिप्लोमा  है।)