Showing posts with label कृष्णकांत उपाध्याय. Show all posts
Showing posts with label कृष्णकांत उपाध्याय. Show all posts

Thursday, July 7, 2022

"दो धर्मों की संक्षिप्त व्याख्या"

इस देश में धर्म केवल एक ही है, भावनाएँ भी केवल एक ही धर्म की आहत होती हैं, अपमान केवल एक ही धर्म का होता है, बात भी उसी धर्म की होती है, वोट भी वही धर्म देता है, बुद्धिजीवी वर्ग, राजनीतिक लोग, मिडिया, न्यायालय भी उसी धर्म के अपमान को अपमान मानता है, इस धर्म का अपमान होने पर गला काटना, जुबान कटना जायज ठहरा दिया जाता है, और तो और जब इस धर्म की बात होती है तो देश में बेरोजगारी, महंगाई, अर्थव्यवस्था, विकास, शिक्षा सब कुछ ठीक रहता है और वो धर्म है "इस्लाम"

इसके उलट इस देश में एक और धर्म है जिसकी भावनाएं आहत नहीं होती, उस धर्म का अपमान करने पर आप "प्रगतिशील व्यक्तित्व" के धनी माने जाते हैं, इस धर्म का अपमान करना "अभिव्यक्ति की आजादी" माना जाता है, बुद्धिजीवी वर्ग, राजनीतिक लोग, मिडिया, न्यायालय भी इस धर्म के अपमान को अपमान नहीं मानता है, इस धर्म के आराध्यों को काल्पनिक कह दिया जाता है, इस धर्म के अपमान पर गला या जुबान नहीं काटा जाता है, इस धर्म के बारे में वो भी ज्ञान दे सकता है जिसने कभी इस धर्म में विश्वास भी नहीं किया हो, इस धर्म के बारे में बात करने पर देश में महंगाई, बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था सब बढ़ने और गिरने लग जाते हैं और यह धर्म है "हिंदू"

वैसे भी हिंदू धर्म का अपमान होना ही चाहिए, इस धर्म के लोग अपने भगवान के नाम पर ही शराब से लेकर बहुत सारी नशा कर जाते हैं तो इस देश में "मां काली के अपमान" से भावनाएं आहत हो भी जाएं तो क्या?

पहले आप बंद कीजिए भगवान के नाम पर नशा करना फिर आपकी भावनाएँ आहत करने का प्रयास कोई नहीं कर पाएगा और हो सके तो अपने संस्कृति, धर्म को थोड़ा जानिए, समझिए और बचाइए वरना आप भी "तलवारों की नोक पर सलवारें" पहनना शुरू कर देंगे.....

सबको जागईए...

लेखक:- कृष्णकांत उपाध्याय 

Saturday, May 14, 2022

साक्ष्यों के बल पर हिन्दू अपना हक ले रहा है

लोग रामायण, महाभारत, गीता जैसे धर्मग्रंथों से ही सीखते हैं और आज के लोग उसको फालो भी कर रहे हैं... 

महाभारत में जब पांडव का बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास खत्म हुआ तो उन्होंने अपना राज्य इंद्रप्रस्थ को कौरवों से मांगा, और इसके लिए पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण को अपना दूत बना कर भेजा, भगवान श्रीकृष्ण युद्ध नहीं चाहते थे और पांडव भी युद्ध नहीं चाहते थे। 
भगवान श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र की भरी सभा में शांति का प्रस्ताव रखते हैं और पांडवों का इंद्रप्रस्थ मांगते हैं लेकिन दुर्योधन कहता है कि वह इंद्रप्रस्थ नहीं देगा और पूरी हस्तिनापुर की धृतराष्ट्र सभा मौन रहते हैं। इस पर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ठीक है दुर्योधन पांडवों को केवल पांच गांव ( अविस्थल, वकरास्थल, मकांडि, वरणाव्रत और एक कोई भी गांव) लेकिन दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण के इस शांति प्रस्ताव को ठुकराते हुए बोलता है कि “मैं पांडवों को एक सई की नोक के बराबर भी भूमि नहीं दूंगा”। दुर्योधन के इस जवाब पर भगवान श्रीकृष्ण उठकर जाते हैं तब दुर्योधन भगवान श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का आदेश देता है फिर भगवान अपना विराट रूप दिखाते हैं।

फिर महाभारत का युद्ध होता है और पांडव इंद्रप्रस्थ के साथ साथ पूरा हस्तिनापुर हासिल करते हैं। धर्म ग्रंथ में उलेखित इस पंक्तियों का सार इतना ही है कि युद्ध कोई नहीं चाहता है सभी शांति चाहते हैं। 

अब इस दौर में अयोध्या आंदोलन के नायक रहे स्वर्गीय डॉक्टर अशोक सिंघल जी भी महाभारत का मर्म जानते थे इसीलिए उन्होंने उस समय मुस्लिम समाज से अपिल की थी आप हिंदूओं को उनका केवल तीन स्थल “अयोध्या, मथुरा, काशी” दे दीजिए, हिंदू तीन लाख मंदिरों को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों पर अपना दावा कभी नहीं करेगा लेकिन मुस्लिम समाज और उनके तथाकथित बुद्धिजीवी सेकुलर गिरोह ने वही काम किया जो धृतराष्ट्र की सभा में दुर्योधन ने किया कि “हम सुई के नोक के बराबर भी भूमि नहीं देंगे” 

मुस्लिम समाज और उनके पैरोकार सेकुलर हिंदू भी वही काम किया और दावा नहीं छोड़ा, उन्होंने दावा अयोध्या पर भी नहीं छोड़ा, वो दावा काशी और मथुरा पर भी नहीं छोडऩे को तैयार हैं जबकि काशी में तो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है कि वो मंदिर ही है। नंदी की मूर्ति, ज्ञानवापी कुआं से लेकर के श्रृंगार गौरी माता की मंदिर तक सारे साक्ष्य उपलब्ध हैं। फिर भी मुस्लिम समाज दावा नहीं छोड़ रहा है। 

जो शांति चाहता है वह रास्ता ढूंढने का काम करता है लेकिन मुस्लिम समाज हठधर्मिता नहीं छोड़ रहा है। यही कारण है कि हिंदू समाज को सुप्रीम कोर्ट से 400 साल बाद अपने आराध्य के लिए हक लेकर आना पड़ा है। यही सब कार्य पिछले कई सालों से हिंदू समाज को अंदर ही अंदर संगठित करने का काम कर रहा था और आज हिंदू समाज संगठित हो चुका है कुछ सेकुलर हिंदुओं को छोड़कर करके। 
          जो महाभारत में भी थे जो जानते थे कि पांडव सच के साथ हैं, धर्म के मार्ग पर हैं फिर भी उन्होंने अधर्म का साथ दिया। जिनमें भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, महारथी कर्ण और नारायणी सेना।

जो काम भगवान श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र की सभा में किया था आज वही काम हिंदू समाज कर रहा है अपना विराट रुप दिखा रहा है उसी का नतीजा है काशी के बाबा विश्वनाथ धाम में जो कोर्ट का फैसला आया है। 

 मुस्लिम समाज ने बाबा धाम के सर्वे को रोक दिया था इसीलिए कोर्ट ने कहा अब सर्वे केवल श्रृंगार गौरी मंदिर का ही नहीं बल्कि पूरे मस्जिद का भी होगा। 
         चार दिन के अंदर रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल होगा। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि पीएसी लगाकर सर्वे कराया जाए और अगर कोई सर्वे में बाधा उत्पन्न करता है तो उस पर एफआईआर दर्ज किया जाए और उसको जेल भेजा जाए। सर्वे अंदर बैरिकेडिंग हटाकर होगा। सर्वे के दौरान अगर कहीं ताला बंद है तो उसे तोड़कर सर्वे पूरा किया जाएगा। 

तो आज हिंदू समाज जागृत हो चुका है इसीलिए वह अब केवल इंद्रप्रस्थ या पांच गांव लेकर संतुष्ट नहीं होगा उसे अब पूरा हस्तिनापुर भी चाहिए और यही कारण है कि मथुरा, काशी दोनों स्थलों का केस कोर्ट में है और कुतुबमीनार से लेकर कश्मीर के मार्तंड मंदिर तक सब पर हिंदू समाज ने अपना दावा किया है। हिंदू समाज की जागृति ही है जो आपको कोर्ट लेकर जा रही है क्योंकि वहाँ युद्ध से नहीं बल्कि साक्ष्यों के बल पर हिंदू अपना हक ले रहा है। 

हिंदू जागृति का ही फल है कि आज के दौर में सेकुलर राजनीतिक दल प्रत्यक्ष रूप से हिंदू समाज के खिलाफ और मुसलमानों का खलीफा बनने की कोशिश भी नहीं कर रहा है और जिसने किया भी है उसका हश्र पिछले कई सालों से क्या है रहा है वो भी किसी से छुपा नहीं है। 

इसलिए मुस्लिम समाज और तथाकथित सेकुलर गिरोह भविष्य में इस तरह के और स्थलों के लिए तैयार रहे क्योंकि देश में तीन लाख से अधिक मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है ( सुब्रमण्यम स्वामी और स्वर्गीय डाँ अशोक सिंघल जी के अनुसार)। दो मंदिर तो बनारस में ही हैं जिनको तोड़कर मस्जिद बनाया गया है। 

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन।
रग-रग हिन्दू मेरा परिचय।।

बोल डमरू वाले की जय....

 लेखक: कृष्णकांत उपाध्याय

Saturday, April 23, 2022

सिस्टम को समझने के ताजा तारीन तथ्य

लेखक: कृष्णकांत उपाध्याय

भाजपा सरकार बनाती हैं, कांग्रेस और लेफ्ट सिस्टम बनाते हैं जो उनके सत्ता में ना रहने पर भी अपना काम बखूबी कर सके और आज वही सिस्टम अपना काम कर रहा है, 
यह सिस्टम ही है जो रामनवमी और हनुमान जयंती के शोभायात्रा पर पथराव के बाद मौन हो जाता है और जैसे ही इन उपद्रवियों पर कार्यवाही होती है तो कोर्ट स्वतः संज्ञान लेते हुए रोक लगा देता है। यह सिस्टम ही है जो हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार के समय कोर्ट स्वतः संज्ञान नहीं लेता है। 
यह सिस्टम ही है जो करौली, खरगौन, जहांगीरपुरी में हिंदुओं पर हमला होने के बाद दौरा करने नहीं जाता है लेकिन जैसे ही दंगाइयों पर कार्यवाही होती है तो पंहुचना शुरू हो जाता है। ( औवैसी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, लेफ्ट आज दौरा करने जा रहे हैं जहांगीरपुरी)इनमें से कोई भी करौली, खरगौन, लोहरदगा का दौरा नहीं किया। 
 
यह सिस्टम ही है जो हिंदुओं पर अत्याचार को मिडिया में बहस का हिस्सा नहीं बनने देता है बल्कि बहस इस पर शुरू कर देता है कि “बुलडोजर चलाना वैध या अवैध”। 
यह सिस्टम ही है जो हिंदूओं पर हुए पथराव पर सामने नहीं आता है तब सामने आता है जब पता चलता है कि शोभायात्रा की अनुमति ही नहीं ली गई है। यह सिस्टम ही है जो दिल्ली को बेवजह बंधक बनाए रखता है और कोर्ट मौन रहता है। 
यह सिस्टम ही है जो राणा अयूब जैसी पत्तलकारिता करनेवाली को देश के बाहर जाकर देश के खिलाफ बोलने के लिए आदेश दे देता है यह कहकर कि 10-12 करोड़ की चोरी कोई बड़ी चोरी नहीं होती है।

यह सिस्टम ही है जो हिंदुओं के पलायन पर मौन रहती है।
यह सिस्टम ही है जो कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर विधानसभा में ठहाके लगाकर मजाक उड़ाता है।
यह सिस्टम ही है जो मिडिया को दंगाइयों के साथियों का बयान चैनलों पर दिखाती है लेकिन दंगाइयों के जुल्म के शिकार हुए लोगों को चैनलों पर नहीं दिखाते हैं।
यह सिस्टम ही है जो हिंदुओं की गंगा और यमुना दोनों हैं जो पूज्यनीय हैं उन्हीं को सेक्लुरिजम के नाम पर गंगा-जमुनी तहजीब सिखाती है। यह सिस्टम ही है जो बहुत चालाकी से जयकारों(भारत माता की जय, जय श्री राम, वंदेमातरम) को नारों में तब्दील कर देती है। 

यह सिस्टम ही है जो यह बताती है कि यूपी में ब्राह्मण नाराज है लेकिन यह नहीं बताती कि मुस्लिम सपा को एकतरफा वोट कर रहे हैं जिससे हिंदुओं का वोट एकजुट हो जाए। 
यह सिस्टम ही है जो अयोग्यताओं से परिपूर्ण व्यक्तियों को पद देकर सिस्टम का हिस्सा बनाता है और अंत में यही सिस्टम हिंदू समझ नहीं पाते हैं और हिंदू का विरोध करते हैं, साथ नहीं देते हैं, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित या सहयोग करना तो दूर उनकी टांग खिंचकर गिराते हैं, जातियों में बंटकर लड़ते हैं और कटते है।

 कल राजस्थान की कांग्रेस सरकार के कुकृत्य ने यह साबित भी कर दिया कि सिस्टम के संदर्भ में मेरा विचार सही है, कल राजस्थान के अलवर जिले में एक 300 साल पुराना शिव मंदिर तोड़ दिया गया बल्कि मंदिर तोड़ा ही नहीं गया है पहले भगवान शिव के शिवलिंग को ड्रिल मशीन से उखाड़ा गया, अन्य मूर्तियों को तोड़कर कचरे में फेका गया फिर मंदिर को तोड़ा गया। 
अलवर में शिव मंदिर तोड़ा गया - फोटो : Social Media

अब इसी घटना को देखिए और अपने विचारों के तराजू में तौलिए जहांगीरपुरी में अवैध कब्जों पर बुलडोजर चला तो सिस्टम का एक एक सैनिक अपने अपने काम पर लग गया क्योंकि वहां मामला मुसरिम का था लेकिन राजस्थान के अलवर में जो कांग्रेस सरकार ने किया उस पर सिस्टम का एक एक सैनिक शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुंह डालकर बैठ गया क्योंकि यहां बात हिंदुओं की थी। यह वही सिस्टम है जो मस्जिद की अवैध दीवार पर कोर्ट तक चला जाता है और शिव मंदिर को तोडऩे पर खामोश हो जाता है। यह वही सिस्टम है जो जहांगीरपुरी में अवैध कब्जे पर चले बुलडोजर पर स्वतः संज्ञान लेता है लेकिन अलवर के शिव मंदिर पर मौन है। 

यह वही सिस्टम है जो मिडिया में जहांगीरपुरी का “बुलडोजर वैध या अवैध” पर बहस कराना शुरू कर देता है लेकिन 300 साल के धरोहर के रूप में खड़े शिव मंदिर को तोड़ने पर कोई बहस नहीं होती। यह वही सिस्टम है जो जहांगीरपुरी में दौरा पर दौरा ( ओवैसी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधि मंडल) करता है, लेकिन अलवर का 300 साल पुराना शिव मंदिर तोडें जाने पर कोई नहीं जाता।
यह वही सिस्टम है जो जहांगीरपुरी पर फेसबुक, ट्विटर, मिडिया में आकर “अल्पसंख्यकों पर अत्याचार”, “संविधान खतरे में”, “लोकतंत्र की हत्या” बताता है लेकिन 300 साल धरोहर रूपी शिव मंदिर पर सिस्टम अंधा, बहरा, लूला, लंगडा, गूंगा तक हो जाता है। 
इस सिस्टम से निपटने के लिए हर किसी को आदत डाल लेनी चाहिए। क्योंकि जब तक आप केवल सरकार बनाएंगे तब तक आप कोई भी वैचारिक लड़ाई नहीं जीत पाएंगे लेकिन जिस दिन आप सिस्टम बनाना शुरू कर देंगे उस दिन आप बड़े से बड़ा वैचारिक युद्ध जीत जाएंगे। 
वैसे भी इस सिस्टम के रहते हुए अब इस देश में किसी गजनी, खिलजी, बाबर, औरंगजेब की जरूरत नहीं है जो अयोध्या में राम मंदिर की जगह बाबरी, काशी में विश्वनाथ मंदिर की जगह ज्ञानवापी, मथुरा में जन्मस्थान से लगाकर मस्जिद खड़ी कर दे, उसके लिए इस देश का सेक्लुरिजम से ग्रसित हिंदू ही काफी हैं....!




Thursday, December 23, 2021

हाथी जितना सुस्त होगा कमल उतना ही खिलेगा।

लेखक: कृष्णकांत उपाध्याय

मैं खुद को चुनाव विशलेषक नहीं मानता, लेकिन अभी कुछ दिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर अवध और पूर्वांचल के क्षेत्रों में जाना हुआ, तो मालूम पड़ा की भाजपा वापसी कर रही है लेकिन जैसी वापसी भाजपा के लोग बता रहे हैं। भाजपा वैसी वापसी नहीं कर रही है जैसी 2017 में प्रचंड बहुमत थी, वापसी 230+ सीटों के साथ कर रही है क्योंकि तथाकथित किसान आंदोलन का खामियाजा उठाना पड़ेगा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में बाकी पूर्वांचल, अवध और बुंदेलखंड में भाजपा मजबूत नजर आ रही है और यहां जौनपुर और आजमगढ़ को छोड़ दें तो भाजपा हर जगह से एकतरफा निकल रही है।

भाजपा के वापसी का कारण एक नहीं अनेक प्रमुख कारण हैं जैसे-  
               
गावों में 18 घंटे बिजली का रहना, गावों तक सड़कों का जाल बिछना (कुछ क्षेत्रों को छोड़कर), कोरोना काल से ही मुफ्त राशन, लाकडाउन के समय महिलाओं के जनधन अकाउंट में तीन माह तक ₹500 तक देना, किसानों के अकाउंट में सलाना ₹6000 का वितरण, अयोध्या दिपोत्सव, अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि का निर्माण, काशी में बाबा काशी विश्वनाथ जी का कारीडोर, मुफ्त कोरोना वैक्सीन, इत्यादि। ये सारी चीजें भाजपा को जमीनी स्तर तक पहुंचने में मदद की हैं। 

योगी आदित्यनाथ की छवि - 

सबसे अधिक अगर भाजपा को जमीन से जोडने का काम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बुलडोज़र चलाने वाली छवि ने कार्य किया है। 
इस सब से प्रदेश के लोगों को लगा की उत्तर प्रदेश में कोई पहला मुख्यमंत्री है जो बाहुबलियों को घुटने टेकने पर मजबूर किया है। शहर में किसी को लगे या ना लगे लेकिन गावों में लोग इससे प्रभावित हुए हैं।

विपक्ष के बयान वीरों के घातक बयान- 

भाजपा को मजबूती देने का कुछ काम तो विपक्ष में बैठे बयान वीरों ने ही किया है जैसे - अखिलेश यादव का कोरोना वैक्सीन पर दिया गया ज्ञान, अखिलेश यादव का जिन्ना के प्रति दिया गया ज्ञान भी इस कड़ी में भाजपा को आगे कर रहा है और अभी हाल ही में कई सपा नेताओं द्वारा लडकियों के शादी की उम्र को लेकर दिया गया बयान भी भाजपा को मजबूती देने का काम किया है।

इस बयान वीरों की श्रृंखला में केवल समाजवादी पार्टी के बयान वीर नहीं है बल्कि इस देश के सबसे बड़े बयान वीर माननीय श्री राहुल गांधी जी भी आगे ही हैं। उनका हिंदू और हिंदुत्व पर हर तीसरे दिन दिया जाने वाला बयान प्रियंका वाड्रा के मंदिर दर्शन और तिलक को तिरस्कृत कर रहा है। एक तरफ प्रियंका वाड्रा मंदिर में जाकर कांग्रेस को प्रदेश में तीसरे नंबर की पार्टी बनाने की कोशिश कर रही हैं तो राहुल गांधी अपने हिंदू-हिंदुत्व ज्ञान से कांग्रेस को और नीचे धकेल रहे हैं।

औवैसी फैक्टर - 

वैसे तो असुद्दीन औवैसी को विपक्ष की पार्टियां भाजपा की B टीम कहती हैं और उनका ये कहना गलत नहीं है क्योंकि औवेसी जहाँ भी चुनाव लड़ते हैं वहां मुस्लिम मतों में बिखराव कर भाजपा को मदद ही करते हैं। उदाहरण के तौर पर सबसे पहले महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया फिर उसके पश्चात बिहार में आरजेडी और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया। अब जहां मुस्लिम मतों का बिखराव होगा वहां विपक्षी पार्टियों को नुकसान तो होगा ही और यही नुकसान भाजपा को फायदा पहुंचाता है। 

बसपा का जमीनी स्तर पर कमजोर होना - 

भाजपा के जीत का आखिरी कारण और मजबूत कारण बसपा का जमीनी स्तर पर कमजोर होना है। हाथी जितना सुस्त होगा कमल उतना ही खिलेगा। क्योंकि बसपा का कोर वोटर समाजवादी पार्टी को कभी वोट नहीं करता है और ना ही कभी करेगा। इसका उदाहरण 2019 के लोकसभा चुनावों में देखा जा चुका है सपा- बसपा गठबंधन के बावजूद बसपा का कोर वोटर सपा को वोट नहीं किया और नतीजा सपा अपने घर की सीटें भी हार गई। बसपा के न जीतने की स्थिति में बसपा के वोटर भाजपा को वोट करेंगे और भाजपा मजबूत होती जाएगी...

ऐसा नहीं है कि सपा मजबूत नहीं है लेकिन अभी की सपा कमजोर हो गई है। 2012 में जब सपा प्रचंड बहुमत से सरकार में आई थी तो वो वक्त अलग था। उस समय मुलायम सिंह यादव, आजम खां, शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल यादव जैसे नेता का जमीन पर पकड़ और अपने मतों को जोड़े रखने की राजनीतिक कौशल मजबूत थी। उस समय नरेन्द्र मोदी गुजरात से बाहर नहीं निकले थे। नरेन्द्र मोदी का लहर नहीं था। उस समय योगी आदित्यनाथ जी का प्रदेश राजनीति में जन्म नहीं हुआ था वो एक लोकसभा और आस पास तक ही सीमित थे। लेकिन आज अखिलेश यादव अकेले हैं ना मुलायम सिंह यादव सक्रिय हैं ना आजम खां जो अपने पारम्परिक मतों के बिखराव को रोक लें। शिवपाल सिंह यादव का दल तो अखिलेश यादव से मिल गया लेकिन दिल मिलने में वक्त लगेगा क्योंकि ये चुनावी मिलन है पारिवारिक मिलन नहीं और इसीलिए दल मिले हैं दिल नहीं। और जब तक दिल मिलेंगे तब तक देर हो गई होगी....

बाकी समय का इंतजार करें। 

( लेखक  इलहाबाद विश्वविद्यालय से आधुनिक इतिहास एंव हिंदी विषयों में स्नातक और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से शिक्षा शास्त्र में स्नातक हैं। हिन्दी एंव शिक्षाशास्त्र से परास्नातक किया हैं।)
 

Thursday, July 16, 2020

"युवा मुक्त कांग्रेस”

  लेखक:- कृष्णकांत उपाध्याय 

कांग्रेस इस देश की सबसे पुरानी पार्टी है। लेकिन यह पुरानी पार्टी अब जर्जर हो चुकी है और ढहने लगी है क्योंकि समय रहते इस पार्टी को मरम्मत नहीं किया गया। शायद इसीलिए अब इस पार्टी के नेता इस पुरानी पार्टी में रहने से डरने लगे हैं और सब इसे छोड़कर जाने लगे हैं। वैसे तो इस पार्टी से अलग जिसने भी राह चुनी वो संघर्ष किया और उस संघर्ष की आग में तपकर सोना हो गया चाहे वो ममता बनर्जी हों या शरद पवार जैसे कद्दावर नेता। ममता बनर्जी कांग्रेस से अलग होकर ही तृणमूल कांग्रेस पार्टी बनाई और आज पश्चिम बंगाल में सत्ता पर काबिज हैं। इसी तरह शरद पवार ने भी कांग्रेस से अलग होकर पार्टी बनाई संघर्ष किया और महाराष्ट्र की राजनीति में “मराठा छत्रप” बनकर उभरे और कांग्रेस को उनके इशारों पर चलने के लिए मजबूर कर दिया। लेकिन इन जैसे कांग्रेस के कद्दावर नेताओं के चले जाने से कांग्रेस बिखरी नहीं थी लेकिन अब बिखर रही है और इस पार्टी के मठाधीश इस गलतफहमी में जी रहे हैं कि इससे कुछ नहीं होगा लेकिन वो शायद यह भूल गए कि ये नब्बे का दशक नहीं है उस समय की तरह आज केवल टीवी और अख़बारों का दौर नहीं है। अब समय बदल चुका है टीवी अखबारों से आगे सोशल मीडिया, इंटरनेट ना जाने कितने माध्यम से आज के मतदाता जुड़े हुए हैं। लेकिन ये बात कांग्रेस और उसके आलाकमान समझ नहीं पा रहे हैं। शायद इसीलिए वो ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, जितिन प्रसाद, अशोक तंवर, दिपेंद्र हुड्डा, मिलिंद देवड़ा आदि जैसे जमीनी स्तर पर काम करने वाले युवा नेताओं की पीढ़ी से दूरी बना ली है और यही दूरी आज कांग्रेस को ढहा रही है। कांग्रेस के युवा नेता उपेक्षित हो रहे हैं और अपना नया ठिकाना तलाश रहे हैं इस कड़ी में वो कांग्रेस को छोड़कर जा रहे हैं। इस लिस्ट में सबसे पहला नाम ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम आता है। भारतीय राजनीति में सिंधिया परिवार को कौन नहीं जानता‌। इसी परिवार की मुखिया राजमाता विजया राजे सिंधिया बीजेपी की संस्थापक सदस्य रहीं उनके बाद उनके पुत्र माधवराव सिंधिया कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे और इनके ही पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के कद्दावर नेता, सांसद और केंद्रीय मंत्री रहे लेकिन 2019 के चुनाव में हार जाने के बाद कांग्रेस में उनको उपेक्षित कर दिया। मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस की तरफ से जिम्मेदारी सौंपी गई कि कांग्रेस के वनवास को खत्म करें और उन्होंने अपनी काबिलियत साबित करते हुए मध्य प्रदेश में कांग्रेस को ना केवल मजबूती से खड़ा किया बल्कि कांग्रेस को सत्ता में ले आए पर अब बारी थी कांग्रेस पार्टी की कि उनको इस मेहनत का इनाम दिया जाए। लेकिन ऐसा हुआ नहीं उनकी मेहनत का इनाम गांधी परिवार के करीबी और भरोसेमंद कमलनाथ को मिला और ज्योतिरादित्य सिंधिया हासियें पर चले गए। लेकिन जमीनी नेता अपनी जमीन बचाने के लिए हमेशा हाथ पैर मारता है। सिंधिया ने खुद का किला ढहता देख पार्टी बदल ली और मध्य प्रदेश की कांग्रेस की सरकार गिर गई। सरकार गिराना बड़ी बात नहीं है पर सिंधिया जैसा कांग्रेस ने अपना भविष्य खो दिया। वही हाल राजस्थान में राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट के साथ हुआ। मेहनत पांच साल सचिन पायलट ने किया और मेहनत का फल गांधी परिवार के करीबी अशोक गहलोत को मिला। हालांकि राजस्थान में सरकार बच गई है पर कितने दिनों तक बची रहेगी ये कहना कठिन है। लेकिन सरकार से ज्यादा नुकसान कांग्रेस के भविष्य को हुआ है सचिन पायलट जैसे नेता का यूं पार्टी छोड़कर चले जाना दुर्भाग्य ही है और इस दुर्भाग्य से निपटने की बजाय कांग्रेस पार्टी सचिन पायलट को एहसान गिना रही है कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि कांग्रेस ने उन्हें कम उम्र में सांसद, केन्द्रीय मंत्री, उप मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष बना दिया लेकिन कांग्रेस पार्टी और सुरजेवाला ये भूल गए कि सचिन पायलट ने ये सारे पद अपनी काबिलियत के आधार पर कमाएं। कांग्रेस और सुरजेवाला पार्टी सदस्यता, चुनाव टिकट दे सकते हैं पर जनता नहीं, जनता नेता खुद कमाता है नेताओं की असल कमाई ये जनता ही होती है और यही छोटी सी बात आज के दौर में कोई नेता नहीं समझ पा रहा है और यही गलती कांग्रेस कर रही है पर सच्चाई यही है कि सचिन पायलट ने जो भी कांग्रेस से पाया है वह अपनी काबिलियत के दम पर पाया है और उतना ही कांग्रेस को दिया भी है शायद इसीलिए कपिल सिब्बल ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि “ आखिर हम लोग कब जागेंगे जब सारे घोड़े अस्तबल से चले जाएंगे तब” इशारा साफ है कि कांग्रेस में अभी भी कुछ बदला नहीं है लेकिन कांग्रेस में बदलाव बहुत जरूरी है। भारतीय राजनीति में कांग्रेस के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है लेकिन जिस तरह कांग्रेस परिवार मोह में युवा नेताओं को किनारे कर रही है उससे साफ है कि कांग्रेस पार्टी अपनी पकड़ भारतीय राजनीति में खोती जा रही है। कहीं ऐसा ना हो कि कांग्रेस अपने युवा नेताओं को मौका ना दे और इसी तरह सारे युवा नेता कांग्रेस छोड़कर जाते रहें और एक दिन कांग्रेस बस बुजुर्गों नेताओं की पार्टी बनकर रह जाए। जिस तरह भाजपा कांग्रेस के कद्दावर युवा नेताओं में भविष्य तलाश रही है उससे तो साफ जाहिर है कि भाजपा भविष्य की राजनीति देख रही है। भाजपा जानती है कि मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ही हैं जो राज्य के सत्ता की बागडोर अच्छे से सम्भाल सकते हैं कि वैसे ही सचिन पायलट में भी भाजपा राजस्थान में भविष्य की राजनीति देख रही है लेकिन इसमें अड़चन उसके खुद के नेता हैं जो युवा और सक्षम भी हैं राजस्थान में राज्यवर्धन सिंह राठौर जैसे नेता की अगली पीढ़ी भाजपा को सिंचने के लिए तैयार हो रही है। जितना जल्दी ये बात कांग्रेस समझ जाएं उतना ही उसके लिए बेहतर होगा। गांधी परिवार से अलग होकर भी कांग्रेस को भविष्य तलाश करनी ही पड़ेगी क्योंकि कांग्रेस कितना ही राहुल गांधी को युवा नेता बनाने की कोशिश कर ले लेकिन वो युवा नेता नहीं है। राहुल गांधी की उम्र अगले लोकसभा चुनाव तक ट्रेन में टिकट बुकिंग करते समय आरक्षण में छूट पाने वाली श्रेणी में आ जाएगी। बाकी कांग्रेस के आलाकमान की इच्छा पर कांग्रेस और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को इतना याद रख लेना चाहिए कि भारत के मतदाता कांग्रेस के आलाकमान के हिसाब से नहीं चलते हैं। अगर कांग्रेस के आलाकमान ने अपने रवैए में बदलाव नहीं किया और यही हाल रहा कांग्रेस का तो “कांग्रेस मुक्त भारत” का तो पता नहीं पर हां “युवा मुक्त कांग्रेस” जरूर देखें को मिल जाएगा...

Friday, July 10, 2020

वारदात होने जाने पर छाती पीटते हुए हम और आप विधवा विलाप करने लग जाते हैं

लेखक :- कृष्णकांत उपाध्याय , रिसर्च स्कॉलर(शिक्षा शास्त्र),  काशी विद्यापीठ विश्वविद्यालय

        (तस्वीर - रिपब्लिक भारत)
विकास दूबे एनकाउंटर में मारा गया। वह पुलिस से भागने की कोशिश कर रहा था और पुलिस पर फायरिंग भी की जिससे जवाबी कार्रवाई में मारा गया। जो की सबको पहले से ही पता था कि ऐसा ही कुछ होगा और हुआ भी वैसा ही। पर अब कुछ लोग कह रहे हैं कि विकास दूबे को इसलिए मारा गया है ताकि वो बता न सके की उसकी कौन मदद कर रहा था। अरे भाई आप भी जानते हो कि कौन मदद करता है इन जैसे अपराधियों की। आज विकास दूबे जैसे अपराधियों की खादी और खाकी में पैठ कोई नई बात नहीं है। हर बड़े अपराधी को राजनीति संरक्षण प्राप्त है और हर अपराधी को को बढ़ाने में राजनीति को मदद करने वाले हम और आप हैं। सब कुछ सारा खेल हमारे सामने खेला जाता है फिर भी हम आंखों पर पट्टी बांध  कर उनको बढ़ावा देने में सहायता करते हैं और वारदात होने जाने पर छाती पीटते हुए हम और आप विधवा विलाप करने लग जाते हैं। फूलन देवी जैसी डकैत को पहली बार जब कोई नेता अपनी पार्टी का टिकट देकर चुनाव में भेजता है तो हम और आप ही उसको जीताकर संसद सदस्य बनने में सहायता करते हैं, पूर्वांचल में बाहुबली माफिया मुख्तार अंसारी, धन्नजय सिंह, बिहार में शहाबुद्दीन इन सबको खादी और खाकी दोनों का संरक्षण प्राप्त है। हम सब लोग जानते हैं कि उनको संरक्षण देने वाले कौन हैं फिर भी हम लोग उनके समर्थक में आवाज लगाते हैं और चुनाव में उनका झंडा बुलंद करते हैं तो विकास दूबे को जिंदा पकड़कर पूछताछ करके ऐसा क्या पता चलता जो हमें और आपको पता नहीं है और खादी और खाकी के चेहरे सामने आ भी जाते तो हम और आप क्या कर लेते वो फिर प्रशासन की आंखों में आंखें डाल बात करते अदालतों में मामले लंबित होते और फिर आकर हमसे आपसे वोट मांगते और हम और आप वोट देकर उनको माननीय बनाते जो अपने खिलाफ सारे मामले रफा दफा करवा लेते। इस देश में तब तक कुछ भी बदलने वाला नहीं है जब तक हम उनको बढ़ावा देते रहेंगे इसलिए ये विकास दूबे को मारकर खादी और खाकी को बचाया गया है ये विधवा विलाप फिजूल है....

अगर आप सोच रहे हैं कि विकास दूबे को अदालत से सजा मिलनी चाहिए थी तो आपको बता दूं कि अदालत ने उसे एक मर्डर केस में उम्र कैद की सजा दी थी और वह 8 पुलिस जवानों को शहीद करने वाली वारदात जमानत पर बाहर आकर की थी। वो लोग बड़े मासूम हैं जो सोचते हैं कि विकास दुबे को अदालत के ज़रिए सज़ा दिलाई जा सकती थी। ऐसा ही होता तो कृष्णानंद राय के हत्यारे संसद और विधानसभा में नहीं बैठे होते। मऊ दंगों के समय खुली जीप में कौन बंदूक़ लहराते हुए घूम रहा था सबने देखा है। राजू पाल के हत्यारे को ज़मानत पाने से रोकने के लिए पुलिस को तरह-तरह की तिकड़म नहीं करनी पड़ती। जज को गवाह चाहिए होते हैं। गवाह भी जानते हैं कि कल इन्हीं गुंडों की पार्टियाँ भी सत्ता में आ सकती हैं। जब अदालत भी जानती है कि विकास दूबे जैसे अपराधियों पर किस तरह के केस हैं तो अदालत इन जैसों को जमानत ही क्यों देती है क्या अदालत यह नहीं जानती कि ये अपराधी सुधर नहीं सकते हैं चाहे कुछ भी हो जाए फिर क्यों अदालत समाज के इन दुश्मनों को बाहर खुलेआम वारदातों को बढ़ाने के लिए जमानत दे देती है...
आखिर क्यों????
पर इतना ही कहूंगा कि विकास दुबे का जिस तरीक़े से सफाया हुआ वही एकमात्र तरीका था।।

Thursday, June 25, 2020

“नेपोटिज्म - परिवारवाद - वंशवाद, तीनों शब्द एक ही है पर मौजूद हर जगह है...”

लेखक का नाम कृष्णकांत उपाध्याय, रिसर्च स्कॉलर (शिक्षाशास्त्र) महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ विश्वविद्यालय

“नेपोटिज्म - परिवारवाद - वंशवाद,  तीनों शब्द एक ही है पर मौजूद हर जगह है...”

जब से सुशांत सिंह राजपूत के आत्महत्या की खबर सामने आई है तब से देश में उनके फैन्स को झंकझोर कर रख दिया है और उन्होंने सोशल मीडिया पर बालीवुड के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। बालीवुड में मौजूद वंशवाद के खिलाफ देश के लोगों ने खुलकर बोलना शुरू कर दिया है। बालीवुड में मौजूद वंशवाद के जनक के रूप में धर्मा प्रोडक्शन के मालिक करण जौहर को जाना जाता है और करण जौहर बालीवुड में मौजूद वंशवाद के जनक हैं भी। करण जौहर ने बालीवुड में एक के बाद एक अभिनेता अभिनेत्री को लांच किया जिनका परिवार पहले से ही बालीवुड में मौजूद है चाहे वो वरुण धवन हो या आलिया भट्ट जैसे बड़े डायरेक्टर के बेटे बेटी। हाल ही में करण जौहर ने अपने बैनर तले अभिनेता चंकी पांडे की बेटी अन्नया पांडे को लांच किया। अन्नया पांडे ने अपनी फिल्म की “स्टूडेंट आफ द ईयर 2” की प्रमोशन करते वक्त कहा था कि उन्होंने भी बहुत स्ट्रगल किया है तब जाकर वह यहां पहुंची हैं तब सोशल मीडिया ने इस पर बहुत मजाक बनाया। ऐसा नहीं है कि बालीवुड में केवल करण जौहर ही वंशवाद के अग्रणी हैं ऐसे बहुत लोग हैं जो वंशवाद की वजह से ही आज बालीवुड में एक मुकाम हासिल कर पाए हैं। आलिया भट्ट, सोनम कपूर, रणबीर कपूर, अर्जुन कपूर, अरबाज खान, सोहेल खान, करीना कपूर, करिश्मा कपूर, सलमान खान, आमिर खान, फरहान अख्तर, वरूण धवन, रणवीर सिंह, परिनीति चोपड़ा, ऐसे बहुत लम्बी लिस्ट है जिसे यहां लिख पाना संभव नहीं है। पर क्या ये परिवारवाद, वंशवाद केवल और केवल बालीवुड में ही मौजूद है!
जी नहीं ऐसा नहीं है कि वंशवाद केवल बालीवुड में ही मौजूद है वंशवाद, परिवारवाद, भाई भतीजावाद हर जगह मौजूद है। भारत का इतिहास वंशवाद परिवारवाद से भरा हुआ है। चाहे वो बालीवुड, राजनीति या कोई भी क्षेत्र हो हर जगह आपको परिवारवाद वंशवाद देखने को मिल जाएगा। राजनीति में तो सभी जगह आपको परिवारवाद वंशवाद का नजारा देखने को मिल जाएगा। क्या कांग्रेस, क्या भाजपा, क्या अन्य पार्टियां सभी का वही हाल है । हर जगह आपको परिवारवाद वंशवाद की झलक देखने को मिला जाएगा। कांग्रेस तो उपर से लेकर नीचे तक परिवारवाद से ही चली आ रही है । नेहरू जी से लेकर राहुल गांधी, प्रियांका वाड्रा तक का सफर परिवारवाद से ही चलता आ रहा हैै। यही परिवारवाद आपको दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी और सरकार में मौजूद भाजपा में भी देख सकते हैं । जी हां आप भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा समय में देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के विधायक पुत्र पंकज सिंह, हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के पुत्र और मौजूदा समय में मंत्री अनुराग ठाकुर, ऐसे कई लोग हैं भाजपा में भी जो वंशवाद से ही आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन बात केवल दो पार्टियों की नहीं है देश में हर राज्य में परिवारवाद, वंशवाद भरा हुआ है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव का पूरा परिवार, बिहार में लालू प्रसाद यादव का परिवार, कर्नाटक में देवगौंड़ा का परिवार, महाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा की सरकार केवल इसलिए नहीं बन पाई क्योंकि बाला साहेब ठाकरे के पौत्र और उद्धव ठाकरे अपने पुत्र आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। ऐसे देश के हर राज्य में परिवारवाद वंशवाद सत्ता के साथ मिलकर सुख भोग रहा है। ऐसे ही पत्रकारिता में भी परिवारवाद शामिल है, राजदीप सरदेसाई और सागरिका घोष परिवारवाद की सीढ़ी चढ़ कर ही मौजूदा समय में यहां तक पहुंचें हैं।
हमारे देश में परिवारवाद तो खून में शामिल है। हम सब को पता है कि कोई भी व्यक्ति अगर किसी अच्छी जगह नौकरी कर रहा है तो वो पहले ये सोचता है कि वो अपने घर, रिश्ते में से किसी सदस्य को अपने या अपने परिचय द्वारा नौकरी दिला दे चाहे वो सदस्य योग्य हो या नहीं। यही से शुरू हो जाता है परिवारवाद, वंशवाद। ऐसे में हम कैसे कह सकते हैं कि केवल एक जगह या दो जगह पर ही परिवारवाद और वंशवाद पनप रहा है और फल फूल रहा है। सच तो यह है कि परिवारवाद, वंशवाद कि जड़ें हमारे समाज में बहुत गहराई तक जम चुकी हैं जिसको शायद ही कोई हटा या मिटा सकता है।
 देश में हर जगह हर क्षेत्र में नेपोटिज्म मौजूद है बस उसका स्वरुप अलग अलग है कहीं जातिगत नेपोटिज्म, कहीं समुदाय नेपोटिज्म, कहीं धर्म नेपोटिज्म व्यापत है, जाति धर्म समुदाय के नाम पर किया जाने वाला भेदभाव भी नेपोटिज्म का हिस्सा है और यह नेपोटिज्म देश के हर नागरिक के अंदर मौजूद है। अतः देश के हर नागरिक को पहले अंदर पनप रहे नेपोटिज्म ( परिवारवाद ) को खत्म करना होगा तभी हम बालीवुड, राजनीति या कोई भी क्षेत्र में व्याप्त परिवारवाद को खत्म कर सकते हैं तथा उनका विरोध कर सकते हैं। क्योंकि कहा गया है “हम सुधरें तो जग सुधरें”
जब तक समाज नहीं सुधरेगा तब तक सुशांत सिंह राजपूत जैसे प्रतिभावान आत्महत्या करते रहेंगे और उस आत्महत्या का जिम्मेदार समाज का हर व्यक्ति होगा और आप इसको नकार नहीं सकते हैं।