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Wednesday, December 16, 2020

जय खालिस्तानी छोड़ो किसानी..!

लेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय
अरे ये क्या हो रहा है? इतना शोर क्यों मच रहा है? अरे भैया कुछ नहीं ये किसान आंदोलन चल रहा है। वो सब तो ठीक है पर जो आवाज गूंज रही तनिक उसको भी सुनो की बस हल्ला हूं मचाने से ही सब किसान हो जाएंगे। "खालिस्तान जिंदाबाद" का नारा लग रहा है..! कोई कह रहा है इंद्रा को देख लिए , जनरल वैद्य को देख लिए, मोदी क्या चींज है? मोदी मरजा तू ...! मतलब सारी हदे पार की जा रही है किसान आंदोलन के नाम पर। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का खुलकर समर्थन किया जा रहा है। अभी कुछ दिन पहले ही दिल्ली पुलिस ने कुछ खालिस्तानी और इस्लामिक आतंकियों को धर दबोचा है।
अमेरिका के वॉशिंगटन में जो हुआ वो कत्तई बर्दाश्त करने के लायक नहीं है। भारतीय किसानों के आंदोलन को समर्थन की आड़ में कुछ मुट्ठी भर लोगो ने  भारतीय दूतावास के पास स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा को खालिस्तानी झंडे से ढककर भारत विरोधी नारे लगाए गए। वाह भैया वाह देखने वाली बात है कि अमेरिका की नागरिकता लेकर मज़े ले रहे है और चिंता सता रही है भारत के किसानों की..! ये जो विभाजनकारी एजेंडा चला रहै  है इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। 
किसानो को भटकाना- भड़काने  वाले कभी किसानों के हितैषी नहीं हो सकते है। जितने भी आंदोलन में बैठे है उन्हे "तथाकथित किसान" बोला जाए तो इसमें कुछ ग़लत नहीं है। किसानों को लेकर कानून बहुत पहले भी बने है देश पर इतना बवाल कभी नहीं है और किसानों कोई फर्क नहीं पड़ता है। बहुतों को तो फसल काटने और बोने से फुर्सत नहीं है वो क्या आंदोलन करेंगे?  नए कृषि कानून को किसी ने ढंग से पढ़ा भी नहीं होगा  फिर भी कुछ मुट्ठी भर नक्सलवादी विचारधारा वाले , विपक्षी दल , तथाकथित किसान संगठनों आदि लोगो ने इसको लेकर उलुल जुलुल भ्रामक फैला रहे है। एक महिला नेता स्टेज पर आती और कहती है मेरा चप्पल चोरी हो गया इसके पीछे मोदी कि साजिश है..! हद है किसानों के कंधो पर बंदूक रख चलाने वालो को मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी हो गया है।
उद्योग संगठन एसोचैम ने कहा है कि किसानों के आंदोलन से हर रोज 3500 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। इससे पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की अर्थव्यस्था पर काफी चोट पहुंची है। संगठन का कहना है किसान आंदोलन की वजह से माल की ढुलाई पर असर पड़ा है और सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है।इस वजह से देश में फल और सब्जियों की कीमतें बढ़ गई हैं।
खैर जब संसद में बहस करना था तो विपक्ष वाले हल्ला हूं मचा रहे थे। उपसभापति हरिवंश नारायण जी के साथ सदन में कृषि बिल के दौरान विपक्ष के  माननीय सांसदों द्वारा हिंसक व्यवहार किया गया था। जो संसद में ऐसी नीच हरकत करने से नहीं डरते उनके लिए सड़कछाप आंदोलन में उतरना कोई बड़ी बात नहीं..!

Monday, November 9, 2020

जब साहसिक कदम ने बचाया था देश!

अरे क्या हुआ? आज कौन सा बड़ा दिन है जो सब चर्चा किए जा रहे है। ओह! ट्रंप चुनाव हार गए और बाइडेन राष्ट्रपति बन गया अमेरिका का यही का? इसी की चर्चा हो रही है न! अरे नहीं भैया इसकी नहीं कुछ और ही बात हो रही है। इसकी चर्चा नहीं हो रही तब किसकी हो रही है?_सच मे भैया आपकी यादास बहुत ही कमजोर है जो प्रधानमंत्री के "नोटबंदी" जैसे बड़े फैसले को फूल गए। कुछ याद आया 8 नवंबर 2016 जब माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी ने ये  घोषणा किया की  "भाईयो बहनों देश को भ्रष्टाचार और काले धन रूपी दीमक से मुक्त कराने के लिए एक और सख्त कदम उठाना ज़रूरी हो गया है। आज मध्य रात्रि यानि 8 नवम्बर 2016 की रात्रि 12 बजे से वर्तमान में जारी 500 रुपये और 1,000 रुपये के करेंसी नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे यानि ये मुद्राएं कानूनन अमान्य होंगी"।  ये एक ऐतिहासिक और साहसिक फैसला साबित हुआ। कितने लोगो कि खटिया खड़ी हो गई थी उनको समझ में नहीं आया कि करे क्या? तभी तो बोरा भर - भर के नोट कचड़े में तो कहीं नाले नदी में फेंका गया था। अधजले नोट इसके सबूत है आखिर इतना नोट आया कहा से? देश कि जानी मानी महिला नेता के गले में लाखो रुपयों के नोट का माला पहनाया गया था नोटबंदी होते ही सबकी औकात का पता चला गया। आखिर लूटा हुआ पराया धन से कोई कब तक घर भरता अपना एक न एक दिन झट से जाना ही था।
नक्सलियों और आतंकियों की भूखमरी आ गई नोटबंदी की वजह से। नक्सलियों का हजारों करोड़ों रुपया पानी में मिल गया जब देश में नोटबंदी लागू कर दी गई । झारखंड में कई नक्सलियों के खाते सीज हो गए जहां से करोड़ों रुपए मिले। ये लोग गांव वालो को धमका के गाव से ही वसूला हुआ नोट बदलना चाह रहे थे पर सरकार ने ऐसा डंडा मारा कि सारी हेकड़ी अन्दर चली गई। वहीं हाल आतंकियों का हुआ करीब 12 लाख करोड़ रुपए नकली नोट छाप के रखे थे ये पाकिस्तान के खुफिया एजेंसी आई .एस .आई वाले जिसको एक झटके तहस - नहस कर दिया गया। इसका एक फायदा ये हुआ कि आतंकियों की फंडिंग पहले जैसी नहीं रह गई  इनकी भी भूखमरी आ गई। अब कुछ बचा नहीं तो सब खुल के बाहर आने लगे आतंक फैलाने के लिए और भारतीय सेना तैयार थी पहले इनको इनके ठिकाने तक पहुंचाने के लिए। नोटबंदी के बाद कश्मीर में वो चेहरे भी खुलकर सामने आने लगे जो मुफ्त में पाकिस्तानी या विदेशी  फंडिंग पर पलते थे जैसे ही नोटबंदी हुई ये 100-50 के लिए पत्थरबाज के रूप उभर के सामने आने लगे जिन्हें तथाकथित विपक्षी नेता, सेक्युलर बुद्धिजीवी वर्ग भटके हुए लोगों कि संज्ञा दे दिए थे।

पूरा विपक्ष नोटबंदी का घनघोर और पुरजोर विरोध किया था पर संसद में बहस ही नहीं किया। एकदम से हल्ला हूं मचा दिया था। नोटबंदी को सबसे बड़ा घोटाला का नाम देने लगा! कश्मीर में तो अलगावादी नेताओ की कमर टूट गई थी। इधर पंजा खडंजा पंजा पर गिर गया था। उत्तर प्रदेश में तो साइकिल पंक्चर हो गई और हाथी भूखमरी से मरने लगी पर नोटबंदी के कारण ना पंक्चर बना ना ही हाथी का पेटे भर पाया! हा हा हा.हा..।
अब चुप करो हम भी कुछ जानकारी देने जा रहे है सुनो। _जी भैया सुनाइए .. एक बार बहुत पहिले  की बात है जून या जुलाई का महीना था साल 2011 में जब हाथी सत्ता में थी तब पूरा विधानसभा गूंजा था। मामला था नेपाल के रास्ते पड़ोसी जिलों में हो रहे नकली नोटो के कारोबार का जिसमे विपक्ष का आरोप था पुलिस  कारोबारी को पकड़ती है पर वह चंद दिनों के बाद ही रिहा हो जाते है। सरकार को ऐसे लोगो पर रसुका लगाना चाहिए। तब उस वक्त संसदीय कार्य मंत्री लालजी वर्मा ने विपक्षी सदस्यों का जवाब देते हुए कहा था कि" साल 2008 में 55 जिलों में नकली नोटो का कारोबार हो रहा था। वर्ष 2009 में 61 जिले प्रभावित हुए।सरकार ने नकली नोटों के कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए प्रभावी कारवाई की। ऐसे कारोबारियों ठोस कार्रवाई के लिए पुलिस महानिदेशक की अध्यक्षता में राज्यस्तरीय समिति गठित की गयी। सीमावर्ती (नेपाल) जिलों जहां ज्यादा जाली नोट पाये जाने जब्त किये जाने की घटनाएं हुई, वहा जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिलास्तरीय समितियां बनायी गयीं। इसका नतीजा हुआ कि वर्ष 2010 में यह कारोबार 34 जिलों में सिमट गया। इस साल 30 जून 2011 तक 20 जिले ऐसे कारोबार से प्रभावित रह गये हैं।" लालजी वर्मा ने ये भी स्वीकार किया था कि बैंकों के अलावा एटीएम से भी जाली नोटों की निकासी होती है।
बहुत हंगामा मचा था उस दिन क्या सपा? क्या रालोद? आदि सभी पार्टियों ने प्रदेश सरकार पर खूब आरोप प्रत्यारोप लगाया था जिसमे भाजपा भी प्रमुख रूप से शामिल थीं। लेकिन देखने वाली ये है कि नोटबंदी का कांग्रेस के साथ मिलकर  सबने विरोध किया और नहीं हाथी भी भड़क गई जो नकली नोटो के कारोबार को कुचलने की बात थी। महत्वपूर्ण ये की कमल ने इसपर अमल किया और  देश में एक नई क्रांति लाई।

मत पूछो जितना बिजली बिल, पानी का बिल , टैक्स आदि जितना भी बकाया था सबका अचानक से भुगतान हो गया नोटबंदी के दौरान। घाटे चल रहा बिजली विभाग का मानो स्वर्णिम काल था सबने बिजली बिल का पैसा भर दिया बनारस का उदाहरण दू तो। नोटबंदी के दौरान जो लोग जूठा ही गरीबी रोना रोते थे उनका पोल खुल गया नोटबंदी के समय। सबसे ज्यादा दिक्कत लूट - घसूट करने वालों को हुई। आम जनता को बहुत कोशिश किया गया भड़काने और भटकाने का पर किसी की एक न चली सबने सरकार के साहसिक कदम का समर्थन किया भले ही थोड़ा कष्ट झेलना पड़ा पर राष्ट्रहित में हमारे देश की जनता ने बखूबी अपना फर्ज निभाया था।
_अरे वाह भैया क्या खूब जानकारी दी मजा आ गया लेकिन एक वर्ग ऐसा भी था जो सेना के साथ बॉर्डर पर जाकर लड़ने की कसमें खाता था बेचारे एटीएम और बैंक में लाइन लगाकर लगाकर जाते जाते थक कर चूर गए..!

Friday, November 6, 2020

पत्रकार , पत्तलकार और सरकार।

अरे  क्या हो रहा है? क्यों इतना पुलिस वाले भीड़ लगाए हुए है? लगता है कोई बहुत बड़ा आतंकी हाथ लगा है। नहीं भैया ध्यान से देखिए ये तो एक पत्रकार है जिसे ये पुलिस वाले घसीट के लेके जा रहे है। अरे हा यार ये तो "पूछता है भारत वाला " है ! एक पत्रकार के ऊपर इस तरह की कार्यवाही महाराष्ट्र सरकार की   नपुंसकता को दर्शाता है। आखिर एक पत्रकार को बार - बार परेशान कर के आप अपना उल्लू सीधा नहीं करते सकते है। जो कुछ भी हुआ या हो रहा है बिल्कुल उचित नहीं है। सत्ता सुख में कोई इतना अंधा कैसे हो सकता है कि जो मन में आए वो करे।इस तरह तो हर कोई अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करता रहता है पर जो महराष्ट्र में जो हुआ उसके ऊपर चुप्पी साधे बैठे है। कांग्रेस जब से केंद्र में सत्ता से बाहर हुई है तब से उसे भारत में लोकतंत्र खतरे नजर आ रहा है पर महाराष्ट्र में हुआ जो उसका क्या? वो लोग भी नजर नहीं आ रहे है जो नक्सल गतिविधियों को समर्थन करने वाले पत्रकारों तनिक भी विरोध होता हुआ देखते है तो उनके  मुंह से निकलता है "प्रेस की आजादी छीनी जा रही है"! वो पत्रकार भी इसका घटना विरोध करते हुए नजर नहीं आ रहे है जो आतंकवादियो के घर जाकर शोक व्यक्त करना अपना परमो धर्म समझते है और इसे स्वंतत्र पत्रकारिता का नाम देते है। मानता हूं सभी पत्रकारों का अपना - अपना अलग विचार है पर इसका मतलब ये तो नहीं कि एक पत्रकार होकर पत्रकार पर हुई इस घटिया कार्यवाही  का विरोध ना करें। 
सब टक्कर है टीआरपी की न कहा बीस - बीस सालों से न्यूज चैनल अचानक से एक पत्रकार  दो तीन सालों में अपना न्यूज चैनल खड़ा कर देता है और पूरी टीआरपी अपनी ओर खींच लेता है तो जलन होगी न तमाम बड़े तथाकित न्यूज चैनलो को। नया दौर के हिसाब से आप भी चैनल में बदलाव कीजिए और जनता के बीच लोकप्रियता हासिल कीजिए। लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि आप पत्रकारिता के क्षेत्र से होकर किसी पत्रकार का समर्थन ना करे जब उसके साथ किसी किस्म ज्यातिकी और बदसलूकी हो रही हो। इस समय सभी पत्रकारों एकजुट होना चाहिए क्योंकि जो हो रहा है या हुआ वो कल को इनके साथ भी हो सकता है।  

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के सामने अर्णब की गिरफ्तारी को लेकर प्रदर्शन हुआ। दूरदर्शन के वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने ऑप इंडिया को दिए बयान में कहा कि आज कल सोशल मीडिया पर नया ट्रेंड चल रहा है पत्तलकार यानी जो पत्तल लेकर बैठे रहते है कि कोई सरकार उनके पत्तल में कुछ दाने डाल दे  इस इंतजार में बैठे रहते है तो देखिए जो आज नहीं निकले वो मैं मानता हूं दरअसल वो पत्तलकार है क्योंकि वो सरकारों के दम पर सरकारों के पैसों से, सरकारों कि जो सहानभूति थी और सरकारों से फेवर लेकर पलते रहे है। उन्होंने आगे कहा कि , आप ये सोचिए की पुलिस वालें एक हो जाते है अगर एक पुलिस वाले पर हमला होता है तो , वकील एक हो जाते है अगर एक वकीलो पर हमला होता है तो , जज एक हो जाते है जब जजो पर हमला हो जाता है सबकी कौम हो जाती है लेकिन पत्रकारों की कौम क्यों नहीं होती क्योंकि पत्रकारों की कौम सबसे ज्यादा अगर कह सकते है तो सबसे ज्यादा हिन्दुस्तान में सरकारों का  कोई फेवर लेकर रही  तो पत्रकारों की कौम रही है। लुटियंस लॉबी कौन नहीं जानता? ये खान मार्केट गैंग क्या है? ये सब वही लोग है जो सरकारो से फेवर लेकर जिंदा रहे है। इसीलिए आज इनको लगता है कि महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ बोलेंगे कल को अगर केंद्र में सोनिया या राहुल गांधी की सरकार आ गई, अगर कांग्रेस समर्थित सरकार आ गई तो हम विरोध में बोलेंगे तो कल को हमें बंगले कैसे मिलेंगे? हमे विदेश यात्राएं जो मिलती वो कैसे मिलेंगे या हमे जो फेवर मिलते है वो कैसे मिलेंगे? ये दलाली करते है इसलिए खामोश बैठे। जो घर बैठे है इसीलिए वास्तव में मैंने इन्हें पत्रकार मानता नहीं। वो यही नहीं रुके ऑप इंडिया के अजित भारती से बात करते वक्त प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और एडिटर्स गिल्ड पर निशानाा साधते कहा की पत्रकारिता सेे जुड़ी हर बड़ी संस्था अब बेकार हो चुकी है। प्रेस क्लब की भूमिका क्या है? प्रेस क्लब की भूमिका बहुत बड़ी भूमिका है। प्रेस क्लब आजकल चुनाव लड़ने का इंजॉय करने का अड्डा बन के रह गया है। अर्नब गोस्वामी को छोड़िए इससे पहले भी बहुत से हजारों पत्रकारों की गिरफ्तारी हो चुकी है उस वक्त तो  प्रेस क्लब आगे नहीं आया। एडिटर्स गिल्ड के ऊपर भी जमकर बरसते हुए बोले कि हमारा एक कैमरा पर्सन साहू छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की गोली का शिकार हुआ था उस वक्त जो एडिटर्स गिल्ड ने जो बयान जारी किया था  हमारे जो कैमरा पर्सन साहू है उनका नाम तक नहीं था। इतना शर्मनाक स्टेटमेंट पत्रकार के मौत होने पर और दूसरी तरफ बर्मा में यानी म्यांमार कुल 4 पत्रकार गिरफ्तार हुए थे इन चारों पत्रकारों का बकायदा नाम देकर उसका विरोध किया गया था। जो एडिटर्स गिल्ड एक पत्रकार की हत्या पर, नकल जब उसको मारते हैं उसके खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते हैं वह एडिटर्स गिल्ड किस काम के? यह बिकी हुई कलम के लोग हैं! वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने तथाकथित लोगों पर निशाना साधते हुए का की आकार पटेल, तीस्ता सीतलवाड़ यह कोई पत्रकार है क्या? ये सब अपने को पत्रकार कहते है। आप पूरे देश में पूछिए एडिटर्स गिल्ड के बारे में सबसे पूछिए ये लोग ढकोसले बाज लोग है सबको पता है इनमें से कोई भी असली पत्रकार नहीं रह गया है। 2-4 नाम होंगे इनमें से विरोध कर रहें है। आलोक मेहता का उदहारण देते हुए कहा कि उन्होंने ट्वीट का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे कुछ लोग है जिनकी रीड की हड्डी है जो लोग आवाज उठाते हैं। लेकिन बाकी एडिटर्स गिल्ड , ऑफ़ प्रेस क्लब  या बाकी तमाम संस्थाएं हैं सब irrelevant हो चुकी है। इनका सिर्फ एक काम है कि सिर्फ मोदी का विरोध करना है और इनको किसी भी चीज कोई मतलब नहीं है क्योंकि मोदी ने इनकी दुकानदारी , दलाली बंद कर दी है । 

अजीत भारती के अगले सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि मैं भी अर्णब के चैनल पर जब रिपोर्टिंग देखा था उनके पत्रकार उछल कर रिपोर्टिंग करते थे मैंने कहा ये क्या हो रहा है? मैंने ट्विटर पर सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया है। मैंने कहा ये पत्रकारिता नहीं है लेकिन आज अर्णब को गिरफ्तार कर लिया गया तो मैं यह कहूंगा कि आपकी पत्रकारिता ऐसी है वैसी है। मैं राजदीप  की पत्रकारिता को जानता हूं घनघोर विरोधी हूं मै रवीश की जो एकतरफा पत्रकारिता है उसका घनघोर विरोधी हूं। लेकिन जब राजदीप पर कुछ लोगों ने हमला किया था जब वो एक रेस्टोरेंट में गए थे मैंने उसका भी विरोध किया था क्योंकि मै ये मानता हूं पत्रकार चाहे लेफ्ट विंग का हो या राइट विंग का हो उसके ऊपर अगर हमल हो रहा हो तो आपको बोलना चाहिए। क्योंकि आप राइट और लेफ्ट इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आपके पास डेमोक्रेसी है, संविधान की दी हुई ताकत है। मीडिया के पास आ जाती है इसीलिए आप लेफ्ट और राइट कर रहे हैं। अगर आपके पास आजादी ही नहीं होगी तो आप लेफ्ट क्या करोगे राइट क्या करोगे? आपको सिर्फ एक ही दिशा में चलना होगा वो होगा तानाशाही इसीलिए इसके खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है। कैबिनेट कुछ नहीं होता है जो लोग कैबिनेट  लगा रहे है दरसअल वो किसी न किसी आड़ में छिपने कोशिश कर रहे हैं। उनका मन साफ नहीं वो अर्णब की तरक्की से जले हुए हैं। देखें बहुत सारे पत्रकार इसलिए भी परेशान है जो लोग आवाज नहीं उठा रहे हैं क्योंकि उनको लग रहा है कि अरे इतनी जल्दी उसने टीआरपी लेली, अरे इसने हमारी टीआरपी खत्म कर दी, अरे इतनी इतनी जल्दी इतना पैसा बना लिया, दो - दो चैनल खड़े कर दिए और 1 साल के अंदर इसके दोनों चैनलों ने सतरह - अट्ठारह 20 साल से खड़े चैनलों का बाजा बजा दिया। तो ये उस बात से भी परेशान है। अरे कंपटीशन है आप रहिए ना आप में दम है तो आप अर्णब से कंपटीशन कीजिए ना, आप टीआरपी में कंपटीशन कीजिए, अर्णब से बड़ा एम्पायर खड़ा कीजिए लेकिन आप नहीं खड़ा कर पाएंगे तो आप कहेंगे कि ये तो पत्रकारिता नहीं है। आप कौन होते हैं पर सर्टिफिकेट देने वाले? राजदीप पत्रकार है क्या? राजदीप जो कुछ करते रहे पत्रकार है, रवीश जो करते रहे हैं वह पत्रकारिता है क्या? पत्रकारिता का सर्टिफिकेट कोई दे नहीं सकता ! कोई माई का लाल ऐसा है नहीं  हिंदुस्तान में जिसने घर में छापाखाना खोल रखा हो कि मैं पत्रकारो का सर्टिफिकेट दूंगा तो वो ही पत्रकार होगा। किसी के मां ने इतना दूध नहीं पिलाया है कि वह पत्रकारों को सर्टिफिकेट बांटे। मैं भी पत्रकार हूं आप भी पत्रकार हैं, अर्णब भी पत्रकार है और प्रदीप भंडारी भी पत्रकार है सब पत्रकार हैं। और हम सब को इसके खिलाफ आवाज उठाना चाहिए। हम किसी भी आड़ में छिपने की कोशिश कर रहे है तो हम सब डबल स्टैंडर्ड है, हम लोग दोगले लोग है।

देश कि जनता मूर्ख नहीं है उसे ही पता है कौन गलत है कौन सही है इसीलिए देश कि जनता गिरफ्तारी का विरोध कर रही है भारत के अनेक राज्यों में इसका पुरजोर विरोध हो रहा है। महाराष्ट्र सरकार में बैठे फासीवादी सोच के लोग सत्ता का दंभ भर रहे है। उछलते हुए ऐसा करेंगे कि फिर कभी उठ नहीं पाएंगे। 


Sunday, November 1, 2020

तुम कश्मीरी हो भारत देश के

जब आग लगी है सीने,
अब क्या रखा है 
घुट - घुट के जीने में?
उठो तुम युवा हो कश्मीर के
भारत माता के जन्नत में 
तुम जन्म लिए हो
तुम पहचानो अपने आपको 
अलगाववादियों से बच के रहो
दूर रहो तुम आतंकवाद से
जिनको पत्थर से मारते हो
वो फौजी है तुम्हारे अपने देश के
अफवाहों से दूर रहो,केवल याद रखो
तुम कश्मीरी हो भारत देश के।
 
(आज से 4- 5 साल पहले मैंने इसको अपनी डायरी में लिखा था उस वक्त के माहौल को देखते हुए)

Wednesday, October 28, 2020

झण्डे पे झंडा दे मारो डंडा।

लेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय

क्या हुआ? शोर काहे मचा रहे हो? अरे भैया वो देखो तब पूछना शोर काहे मचा रहे है? अरे ई तो गजब हो रहा है पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लग रहा है। कवनो चीन का समर्थन करने कि बात कर रहा है। ध्यान से सुनिए का - का कह रहा है? कहेगा का वही 370 जो बेहूदगी से भरा हुआ था उसी की बहाली की बात कर रहा है। कह रहा है चीन हमारी मदद कर सकता है 370 की वापसी में और हम चीन का समर्थन करते है। मतलब चीन आक्रमण करके कश्मीर को कब्जा में लेले..लगता है पगला गया है अभी चीन को गलवान में मुंह की खानी पड़ी थी। क्या कर सकते है रसरी जल गया पर बल नहीं गया है। वाह रे! देश विरोधी नारे और बयान देकर कह रहा है हम कश्मीर के लोगो को न्याय दिलाने की बात कर रहे हैं। एक महिला नेता भी नजर आ रही है अरे! ये तो सीधा देश के आन बान और शान पर हमला कर रही है यानी तिरंगा पर। ये तो वही है जो कभी तिरंगा को जलाने की बात करती है तो कभी खून से भिगोने की। इहा तो लाल सलाम वाले भी खड़े है वाह का बात है धर्म को अफीम का नशा कहने वाले अब इस्लामिक जिहादियों के साथ गठबंधन कय लिए है। खैर लाल सलाम के नाम धरती को खून से रंगने की साज़िश तो इनकी भी जोर शोर से चल रही है। एक दो नहीं पूरे ६ दलो गठबंधन है 370 की वापसी इनका मकसद है जो कभी पूरा नहीं होगा।
गला फाड़ - फाड़ कर ये लोग भारत को भारत में ही गाली दे रहे है और नागरिक भी भारत के फिर भी तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग कहता है यहां अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है ! कितना शर्मनाक है जब सरकार ऐसे लोगो पर कार्यवाही करती है पूरा विपक्ष इकट्ठा हो जाता है इनका बचाव करने के लिए। संसद में बवाल खड़ा कर दिया जाता है मानो संसद पर हुआ आतंकवादी हमला  किसी को याद ही नहीं। अरे याद तो सबकुछ रहता है तभी तो आतंकियों की बरसी मनाई जाती है इन तथाकथित लोगो द्वारा। 

कश्मीर अगर धरती का स्वर्ग बताया जाता है पर इस्लामिक आतंकियों और जिहादियों ने जो तबाही मचाई है यहां उसका जिक्र कर दिया जाय तमाम बुद्धिजीवियों   सेक्युलर पत्रकारों और नेताओं को मिर्ची लग जाती हैं। वो आपको सांप्रदायिक बताते हुए कट्टर , जाहिल ,अनपढ़ मूर्ख और धार्मिक हिंसा का समर्थक की संज्ञा देने लग जाएंगे। एक पत्रकार ऐसा भी है देश में जो आपको अंधभक्त और फट्टू संघी भी बोलेगा। पर तिरंगा विरोधी बयानों पर चुप बैठ जाते है सब के सब मानो तिरंगा तो बस तीन रंगों में रंगा हुआ मामूली सा कपड़ा है। हर मुद्दे को लेकर खुद को देश की आवाज़ कहने वाले तथाकथित सेक्युलर लिबरल बुद्धिजीवी न जाने कहां खो जाते है जब देश कि इज्जत से कोई खिलवाड़ करने कि कोशिश करता है। खैर देश कि जनता समझदार है इन लोगो के बहकावे मे आने वाली नहीं है। सरकार और सुप्रीम कोर्ट को भी चाहिए  ऐसे लोगो के राजनीतिक पार्टी और इनके ऊपर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दे बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा । 
आखिर कब तक ऐसे गद्दारों को खुली हवा में सांस लेने के लिए छोड़ा जाए? बात देश के सम्मान की है कोई भी ऐरा- गैरा कुछ भी कह के आसानी नहीं बच सकता है। बात साफ है अगर इस देश मे अगर किसी सांसद या मुख्यमंत्री तो "तू" कहना अपमानजनक हो सकता है फिर  तिरंगा तो देश कि जान है जिसके खातिर हिमालय की चोटियों पर हजारों वीर योद्धाओं ने अपने प्राणों की आहुति तक दे दी है। ये वही तिरंगा है जिसे सैनिक फहरा के आता है या इसमें लिपट कर। 

Wednesday, October 21, 2020

अखण्ड भारत की पहली आजाद सरकार "अर्जी हुकूमत - ए - आजाद हिन्द"


क्या कह रहे हो? क्या हुआ? आज कौन सा बड़ा दिन है? अरे इतना भी नहीं जानते हो भैया की आज ही के दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 21 अक्टूबर 1943 में "आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की थी। 77 साल पहले देश से बाहर बनी 'आज़ाद हिंद सरकार' अखंड भारत की सरकार थी, अविभाजित भारत की सरकार थी। ब्रिटिश राज का सर्वनाश करने के लिए नेताजी की भी हद तक जा सकते थे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को शामिल किए जाने का पुरजोर विरोध किया था जिसके बाद उन्हें जेल डाल दिया गया। उन्होंने ने भूख हड़ताल शुरू कर दिया फिर क्या अंग्रेजो को थक हार के जेल से निकाल कर उन्हें उनके ही घर में नजरबंद कर दिया गया था। नेताजी इसी दौरान ब्रिटिश हुकूमत के आंख में धूल झोंक कर भारत से जर्मनी भाग गए। वहां युद्ध का मोर्चा देखा और युद्ध लड़ने की ट्रेनिंग ली।
जहां उन्होंने हिटलर से मिलकर भारतीय युद्ध बन्दी सैनिकों की मदद से सेना का गठन किया था।
जर्मनी में रहने के दौरान उन्हें जापान में रह रहे आज़ाद हिंद फ़ौज के संस्थापक रासबिहारी बोस ने आमंत्रित किया। डॉक्टर राजेंद्र पटोरिया अपनी किताब 'नेताजी सुभाष' में लिखते हैं, "4 जुलाई 1943 को सिंगापुर के कैथे भवन में एक समारोह में रासबिहारी बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस के हाथों में सौंप दी।" इसके बाद सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई जिसे जर्मनी, जापान, फिलिपींस, कोरिया, चीन, इटली, आयरलैंड समेत नौ देशों ने मान्यता भी दिया था।

नेताजी की आजाद हिंद सरकार का अपना अलग बैंक भी था। 1943 में बने आजाद हिंद बैंक ने 10 रुपए के सिक्के से एक लाख रुपए तक के नोट जारी किए थे। सबसे बड़ी उपलब्धि ये थी कि इन्होंने जापान की मदद से अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह को स्वाधीन भूमि के रूप में प्राप्त किया। आजाद हिन्द सरकार ने नेताजी के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फ़ौज को बेहद शक्तिशाली बना दिया। फ़ौज को आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करने की दिशा में जन, धन और उपकरण जुटाए। इतना ही नहीं आजाद हिंद सरकार के पास अपना डाक टिकट और अपना गुप्तचर तंत्र भी था। नेताजी ने आजाद हिन्द फौज में महिला रेजिमेंट की स्थापना की जिसका नाम था "रानी  झांसी रेजिमेंट" जिसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी सहगल के हाथो में थी। लोग आज के जमाने में महिला सशक्तीकरण  की बात करते है नेताजी के आजाद हिन्द सरकार ने इसको साबित किया। । नेताजी सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि आज़ादी की इच्छा हर भारतीय के दिल में उठे तो भारत को स्वतंत्र होने से कोई रोक नहीं सकेगा। इसके लिए उन्होंने अपने लेखों, भाषणों में लिखना-बोलना शुरू किया। उन्होंने 'फॉरवर्ड' नाम से पत्रिका के साथ ही आज़ाद हिंद रेडियो की स्थापना की और जनमत बनाया।  नेताजी की आजाद हिन्द फौज ने आखिर सांस तक लड़ाई लड़ी। तृतीय विश्व युद्ध में अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी में  6 और 9 अगस्त को परमाणु बम से हमला कियाा गया जिसके बाद जापान नेेे सरेंडर  दिय। अंग्रेजी फौज को कोहिमा और इंफाल के मोर्चे पर कई बार आजाद हिंद फौज ने धूल चटाई। जापानियों के सरेंडर ने सब कुछ बिगाड़ कर रख दीया था। बेहद कठिन परिस्थितियों में आजाद हिंद फौज के सैनिकों ने आत्मसर्पण कर दिया और उसके बाद लाल किले में इनके ऊपर मुकदमा चलाया गया। जब यह मुक़दमा चल रहा था तो पूरा भारत भड़क उठा और जिस भारतीय सेना के बल पर अंग्रेज़ राज कर रहे थे, वे विद्रोह पर उतर आए। नौसैनिक विद्रोह ने ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में अंतिम कील जड़ दी। अंग्रेज़ अच्छी तरह समझ गए कि राजनीति व कूटनीति के बल पर राज्य करना मुश्किल हो जाएगा।उन्हें भारत को स्वाधीन करने की घोषणा करनी पड़ी। ऐसे बहुत से किस्से पड़े हुए है नेताजी के आजाद हिन्द सरकार और उसकी फौज की। बाकी नेेेेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है।

जय हिन्द

Sunday, October 18, 2020

सुदर्शन तैयार रखना आगे बहुत लड़ैया रे

लेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय

क्या कह रहे हो ? क्या हो रहा है देश में? यहां हर कोई अपने आप को राजनीति में युवा और जुझारू नेता कहता है भले सिर के बाल झड़ गए हो। एक कहावत है न "उम्र पचपन का दिल बचपन का"।उम्र भले 50 के पार चली गई हो तो क्या फर्क पड़ता है प्रधानमंत्री पद के लिए तो अभी भी युवा ही है। मुंह से बोलने से नहीं होता है न उसके लिए मेहनत और संघर्ष करना पड़ता हैं। यहां तो कुछ और ही है बैठे बिठाए राज पाठ मिल गया है। कहने को लोकतंत्र है पर राजनीतिक पार्टियां तो परिवारवाद के दम पर ही चल रही है।पिता के बाद पुत्र ही पार्टी का कार्यभार संभालेगा। महलों में पलने वाले ये लोग कहते है "हमारी पार्टी गरीबों के हक लिए लड़ती है"। राज्य में सरकार टूटने के डर से पार्टी के विधायकों के साथ पांच सितारा होटलों के वातानुकूलित कमरे बैठकर मस्त तंदूरी रोटी तोड़ने वाले लोग भी कहते है "हमारी पार्टी किसानों और बेरोजगारों के हक लिए लड़ती है"! मतलब अब ऐसे गंभीर चर्चे महलों और पंचतारा कमरों में बैठकर होते हैं। विधान सभा और संसद तो बस हंगामा खड़ा करने लिए है वहा कोई सार्थक वार्तालाप थोड़ी न कि जा सकती है इससे लोकतंत्र खतरे में जो आ जायेगा।

इनकी खुद की संतान ब्रिटेन , अमेरिका , ऑस्ट्रेलिया आदि जगहों पर शिक्षा लेने जाती हैं। दूसरों के बच्चो से ये लोग चाहते है कि इनके लिए आंदोलन करे ,जगह- जगह पर आगजनी और हिंसा करे , दूर कश्मीर में कही सेना के जवानों पर पत्थर फेंके, आतंकी जिहादी नारे लगाए, नक्सलियों के गुण गाए आदि। ऐसे संकीर्ण मानसिकता वालो को बस अपना घर भरना रहता है  भले दूसरे का घर उजड़ जाए। सत्ता के भूखे- प्यासे लोग विदेशी शत्रुओं का समर्थन करने से भी बाज नहीं आते है। अभिव्यक्ति आजादी के आड़ में देश जाए भाड़ में कहते है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भी एक ऐसी ही विचारधारा पनप चुकी है जो खुद को बुद्धिजीवी वर्ग समझती है ऐसे लोगों का खुलेआम समर्थन करते है। ये सबकुछ तथाकथित छात्रों और प्रफेसरो की वजह से होता है जो सिर्फ अपनी ही बात करते है और दूसरे कत्तई सुनना नहीं चाहते है। ये वही लंपट लोग है जो राजशाही का विरोध करते है पर वर्तमान में  चल रहे परिवारवाद या वंशवाद की राजनीति पर इनको सांप सूंघ जाता है। बहुत क्रांतिकारी दिखाते है सब खुद को लेकिन किसी तथाकथित पार्टी का अध्यक्ष का लड़का विदेश पढ़कर आता है जो भारतीय राजनीति से एकदम अनिभिज्ञ है उसे अपना भैया बना लेते है ये लोग इस तरह बना बनाया एक प्लेटफॉर्म मिल जाता है और वंशवाद फूल जाता है। ऐसी ही तथाकथित लोग ब्राह्मणवाद का विरोध करते हैं जिसके बारे में यह तनिक जानते भी नहीं है। ऐसे लोगो से सतर्क रहना चाहिए खासकर युवाओं जो इनके बहकावे में देश विरोधी तत्वों का समर्थन करने लग जाते है। भड़काना, भटकाना और लड़वाना इनका मुख्य कार्य होता है। किसी भी व्यक्ति जो अपना जीवन शांति से जी रहा है उसके जीवन में भूचाल का लाने से तनिक से भी नहीं हिकिचाते है। इनका समूल विनाश करना बहुत जरूरी गया है। इनके ऊपर सख्त कार्रवाई की जरूरत है नहीं वो दिन दूर जब भारत अंदर खोखला हो चुका होगा। कहने तात्पर्य यही है कि शैतान और उसकी नाजायज औलाद लाख कोशिश करेंगे तहलका मचाने की तुम सुदर्शन चक्र तैयार रखना।

Tuesday, October 13, 2020

राजनीति अगर जुआ है तो खेलने वाला भी युवा है।

लेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय
क्या कह रहे हो? तुमसे तुम्हारा हक छीना जा रहा है तुमको आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया जा रहा है। आखिर ऐसी नाइंसाफी क्यों हो रही तुम्हारे साथ कभी इसपर तर्क - वितर्क किये हो? सोचना और समझना केवल मुंह से बोल देने कोई युवा नहीं हो जाता है। तुम्हारे ही कंधे पर बंदूक रखकर वो अपनी वंशवादी परंपरा को बचाते है और इनकी रक्षा में तुम अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करते हो। तुमको मिलता क्या है इसके बदले में? सिवाय उपहास, बहिष्कार और तिरस्कार के। काम निकल जाने के बाद तुम्हारी अवहेलना की जाती है तब तुमको ख्याल आता है कि तुम "युवा" हो। धिक्कार है ऐसे युवाओं पर जो जातिवाद, पंथवाद, क्षेत्रवाद और धर्म के नाम पर राजनीतिक दलों का समर्थन  करते है। कुछ तथाकथित नेताओ के आगे पीछे घूमते रहते है और उनकी जय करते है। यहां तक तो ठीक है पर इन नेताओ की औलादों का भी चरण चुम्बन करने लगोगे तो तुम्हारा अधिकार छिनेगा नहीं तो क्या होगा? जिंदगी भर मेहनत और संघर्ष तुम किये और फल कल कोई और ले गया। दरअसल आजकल केे युवा खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं रही है आजकल के युवाओं में यह बस अपने जाति के नेताओं के चक्कर में पड़कर अनर्गल एवं अनावश्यक मुद्दों का समर्थन करने लगे है जो किसी भी समाज के लिए हितकारी नहीं है। आजकल के युवा खुद गुटों में  बट गए हैं और इन तथाकथित नेताओ के खातिर एक दूसरे से सिर फुटौव्वल , बिना तथ्यों के बहसबाजी और  वाद - विवाद करने लग जाते हैं। हद तो तब हो जाती है जब एक दूसरे केेे घोर विरोधी नेता या राजनीतिक दल सत्ता में बैठने के लिए गठबंधन कर लेेते हैं और यह तथाकथित युवा नेता ताकते रह जाते हैं। फिर एहसास होता है कि हम युवाओं के साथ दगाबाजी हुई हैं पर इससे कोई सीख नहीं लेते और चले जाते हैं जूठन पत्तल चाटने के लिए। 
बड़ा ही हास्यास्पद लगता है जब कोई अधेड़ उम्र या उम्रदराज का नेता कहता है कि "युवाओं को राजनीति से दूर रहना चाहिए" लेकिन ये वो क्यों भूल जाते है जब चुनाव सर पर आता है तो ये युवा ही प्रचार - प्रसार करते है तमाम राजनीतिक दलों के लिए किसी बूढ़े की बस बात नहीं है कि तपती धूप गर्मी में या कड़कती सर्दियों में जाके गांव - गांव घूम के पोस्टर चिपकाए। ठीक है युवाओं को राजनीति से दूर रहना चाहिए तो तमाम राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि अपने दल के नाम जोड़कर फलनवा युवा मोर्चा , ढिकनवा युवा संगठन भी बर्खास्त या समाप्त कर दे। आप देश के तमाम शिक्षण संस्थानों , विश्वविद्यालयो और महाविद्यालयों में जितने भी छात्र संगठन सबकी विचारधारा किसी न किसी राजनीतिक दल जुड़ी रहती है इससे भी मुंह नहीं फेरा जा सकता है। सभी छात्र नेताओं को समर्थन यही राजनीतिक दलों के लोग ही करते है सिर्फ अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए। मेरे ख्याल से ये सब भी बंद हो चाहिए क्योंकि जब कोई युवा छात्र संघ के अध्यक्ष का चुनाव जीतते है तब इन्हीं माननीय लोगो पैर छूकर आशीर्वाद लेने जाते है और उन मित्रो या साथी छात्रों को भूल जाते है जिनके वजह से मुकाम पाए है।

 क्या सिर्फ युवा तमाम राजनीतिक दलों के राजनीतिक रोटियां सेकने वाले को राजनीतिक बावर्ची है जिसका काम हो गया तो दुत्कार कर भगा दो? वो राजनीतिक दल जो समाजवाद के नाम पर अस्तित्व में आए पर हकीकत में कभी परिवारवाद से आगे बढ़ ही नहीं पाए वो देश चलाने की बात करते है और युवाओं को कहते है तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ है। युवाओं का साथ देने वाली बात उस समय खारिज हो जाती है जब किसी काबिल युवा के स्थान पर किसी बड़े माननीय नेता के पुत्र को पार्टी का अध्यक्ष बना दिया जाता है। बात पूरी तरह से साफ है खुद को युवा कह देने भर से अब काम नहीं चलने वाला है सोच और राजनीतिक समझ को मजबूत करना होगा वरना "युवा जोश कट्टर सोच" बस नारों में रह जायेगा। जातिवाद , पंथवाद क्षेत्रवाद आदि जैसे संकीर्ण दायरों से खुद मुक्त करना होगा और राष्ट्रवादी विचारधारा को अपनाना होगा जो रगो - रगो में राष्ट्रीयता का संचार करती है।
एकमात्र ऐसी विचारधारा जो सभी युवाओं को बिना किसी मतभेद के एक - दूसरे जोड़कर रखने का काम करेगी। युवक चाहे तो वो सबकुछ कर सकता है जो वो चाहे। संसार का इतिहास युवाओं से भरा हुआ है। युवक चाहे तो सरकार बदल जाए या तख्ता पलट कर दे। युद्धों का इतिहास उठा के देखिए बलिदानी युवाओं के रक्त से लथपत मिलेगा। भारत में भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु का बलिदान कौन भूल सकता है जो हसते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए ताकि भारत माता का उद्धार हो सके। इनके विचारो से सम्पूर्ण भारत में क्रांति की लहर जाग उठी लोगो के दिलो में उनके प्रति आदर और सम्मान और बढ़ गया। वर्तमान में देखे तो भारत में युवाओं की कोई कमी नहीं बस जरुरत है तो जोश जज्बा और जुनून की जो सिर्फ राष्ट्रवादी विचारधारा से ही उत्पन्न होगी। जिस दिन मन में ये भावना आ गई कि राष्ट्र से बढ़कर कोई नहीं है तो उस दिन युवाओं को राजनीति में कोई वंशवादी या परिवारवादी , जातिवादी आदि राजनीतिक दल चाह कर भी मात नहीं दे पाएगा। आज का युवा अगर कल को देश का बागडोर संभालना चाहता है तो उसे गुलाम मानसिकता को त्यागना ही पड़ेगा। अंत में यही कहना चाहूंगा उठो तुम युवा हो भारत देश के ,गहरी नींद से जागो अपने अंदर झाको और खुद के अस्तित्व को पहचानो। 

वन्देमातरम!
 

Saturday, October 10, 2020

माइक कैमरा और एक्शन!

लेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय
ये क्या हो रहा है? कौन इतना हल्ला हूं क्यों मचा हुआ है? तू तू मै - मै कर के बात हो रही है। ऐसे तू तड़ाक कय के कौन बतियाता है भाई?  अरे! किसी ने टेलीविज़न चला रखा है। सब समाचार देख रहे है। तीखी बहस हो रही है चिल्ला चिल्लाकर। सब टीआरपी का खेल है भैया नहीं तो कौन इतना गला फाड़ता है। कवनो समाचार चैनल लगाइए सब अपना एजेंडा चलाए जा रहे है। जनता को क्या देखना है ये जनता नहीं ये खुद तय करते है डंके की चोट पर। बहस के दौरान स्टूडियो में हाथापाई तक हो जाती है और गाली गलौज तो आम बात हो चुकी है आजकल के नेताओ के लिए। पत्रकार कहता है ये मेरा न्यूज चैनल मेरी मर्जी जो मन तो दिखाऊं मुझे कोई रोक नहीं सकता है। न्यूज़ दिखाते दिखाते वक्त हर चैनल एक ही बात दोहराता है "सबसे पहले हमारे चैनल ने इस खबर को दिखाया है।" कोई ख़बर दिखाते हुए आराम से बोलता तक नहीं है इतनी हड़बड़ी मची रहती हैं मानो इनसे बड़ा कोई सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र नहीं है। "हम सिर्फ सच दिखाते है झूठ नहीं" के वाले चोचले भी चलते रहते हैं। हर खबर पर हमारी नजर , अफवाहों से रहे दूर, सनसनी, आर पार की जंग कर देंगे बेनकाब और मच गया दंगल मानो मीडिया जगत है पूरा का पूरा जंगल।
पत्रकारिता यही तक सीमित नहीं रहती है कुछ शांतिप्रिय पत्रकार भी हैं जो अपने आपको बहुत बड़ा बुद्धिजीवी भी समझते हैं। इनका काम आतंकियों और नक्सलियों के घर जाकर संवेदना व्यक्त करना होता है। वे कहा तक पढ़े है और कौन सी डिग्री हासिल किए है बताकर उनका महिमा मंडन करना होता है। इन जिहादी आतंकियों को भटका हुआ नौजवान बताकर इनके एनकाउंटर पर सवाल खड़ा करते है। हद तब और हो जाती है जब क्रूर नक्सलियों को ये लोग "क्रांतिकारी" बताने लग जाते हैं। न्यूज चैनलों पर बैठकर देश विरोधी एजेंडा चलाते है और कुछ मुट्ठी भर राजनीतिक पार्टियां इनका समर्थन करती है। टीआरपी लेने की ऐसी होड़ मची रहती हैं मानो दो कुत्ते आपस में मांस के टुकड़े के लिए छीना झपटी कर रहे हो। रात को 9 बजे सबका शो चलता है "प्राइम टाइम" यहां बाजी मारने के लिए टीवी की स्क्रीन तक काली कर दी जाती है और कहा जाता है आज का अंधेरा ही सच्चाई है। किसी मुद्दे को ऐसा तोड़ - मरोड़ के पेश किया जाता है कि मुख्य जानकारी से जतना अनिभिज्ञ रह जाती है और ये अपना एजेंडा फैलाने में कामयाब हो जाते है। अब उदाहरण के तौर पर नागरिकता संशोधन कानून को ही ले लीजिए इसको लेकर धड़ल्ले से भ्रामक फैलाया जा रहा था। झूठ कपास बोलना आजकल के पत्रकारों ने भी सीखा लिया है खैर आजकल यही ख़बरें तो धूम मचा रही है।
माइक ,कैमरा और एक्शन! लीजिए आप बन गए पत्रकार अब उड़ाइए अफवाह सरेआम बाज़ार। अब तो पत्रकारिता ऐसा व्यासाय बन गया है जो अफवाह उड़ाने, दंगा भड़काने , देश को तोड़ने आदि का कार्य कर रहा है। ऐसे संकीर्ण मानसिकता वाले पत्रकारों का बहिष्कार करना अनिवार्य हो गया हैं। ये पत्रकार नहीं चाटुकार हो गए है जो जनता को भक्त और चमचा की संज्ञा देने लग जाते हैं पर कही ना कहीं मूर्ख तो ये मुट्ठी भर लोग इसी जनता में ही निकलेंगे जो खुद को भक्त और चमचा कहलवाने में गौरांवित महसूस करते होंगे। बिना तथ्यो के तर्क - कुतर्क किए हुए इन लोगो का मन नहीं भरता है। फिर कहते है हमारा चैनल है 
नंबर वन ! आपको रखे आगे।

Monday, October 5, 2020

लाश लकड़ी और रोटी

लेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय

अरे ये क्या वो देखो क्या हो रहा है? लकड़िया जलाई जा रही है और क्या? अरे बुड़बक तनिक ध्यान से देखो उसमे मासूम लड़किया भी जल रही है ! ओ तेरी ई सब का हो रहा है कुछ लोग इसी पे रोटिया सेक रहे है घी में चपोर-चपोर के खाने के लिए। कौन है ये लोग? अरे नहीं जानते हो ये वही लोग है सालो - साल पंचतारा होटलों के वातानुकूलित कमरों में आराम से बैठकर तंदूरी का चाव से मज़ा लेते है। ये मौका बार - बार नहीं मिलता है इस तरह जलती हुई लकड़ियों पे रोटी सेकने का। देखो सब कितना मज़ा लेकर खा रहे है रोटिया। ऐसी रोटियों में गजब की ताकत होती है, जो इसको खा लेता है वो बुद्धिजीवी हो जाता है। गिद्ध तो सीधा लाश को नोच - नोच कर खा जाते है पर ई लोग जलती हुई लाश पर रोटी सेंक कर खाने का दम रखते है। कवनो ज्यादा फर्क नाही है गिद्धों में और इनमें सिवाय इसके की  गिद्ध पक्षी और ये मनुष्य है। जलती हुई लाश पर रोटियां सेकने की परंपरा तो कई दशकों से चली आ रही है फिर चाहे वो लड़की की हो, जवान का हो, किसान का हो या विशेष जाति - धर्म का हो इसीलिए ये आवाम भी दशकों से परेशान है। 
रोटी को भी विशेष नाम दिया गया है "राजनीतिक रोटी" जो हर कोई सेके जा रहा है। मत पूछिए बड़ी लंबी होड़ लगी हुई हैं ,गजब की भीड़ और मारामारी है। हर कोई अपना हक मांग रहा है नहीं किसी से भीख मांग रहा है। मजाल किसी की कोई रोककर देखा दे इनको अरे भाई झुझारू नेता - परेता लोग है ये नहीं जलती हुई लाश पर रोटी सकेंगे तो कौन सेकेगा? ओ कुछ पत्रकार भी है का लाइन में लगे हुए है नमक, मिर्च, मसालों के साथ अब बिना इसके सब्जी तो बन नहीं सकती न। नीछान सादि रोटियां मज़ा थोड़ी न देंगी तो ये भी आ जाते है माल मटेरियल लेकर। झूठ कपास , उलुल - जुलूल , इधर - उधर की फालतू बकैती करने वाले कुछ मुट्ठी भर डिजाइनर पत्रकारों का काम होता जब लकड़ियां जल कर राख हो जाय तब उसको क्षितिर - वितिर कर के उसको हवा में उड़ा देना। इन्हें क्या मालूम कि लोगों पर क्या गुजर रही होगी जिनके मृत परिजनों के जलती हुई चिता पर ये घिनौना खिलवाड़ होता है ?  यह सब एक साजिश और षड्यंत्र के साथ किया जाता है इस देश की एकता और अखंडता को तोड़ने के लिए। जब कोई भी व्यक्ति जाति विशेष का भूखा मरता है कोई नहीं जाता उसका खोज खबर लेने  के लिए पर जहां कोई उसके साथ दुर्घटना या अनहोनी हो जाती है तो सब उसके घर में इतनी भीड़ लगा देते है कि इनसे बड़ा कोई उसका हितैषी ही नहीं है। मौका मिला नहीं शुरू हो गए दलितों की तुष्टिकरण की राजनीति करने। कभी सवर्णों से लगाव तो कभी पिछड़ों से जुड़ाव बस जहां इनकी राजनीतिक रोटी को आग मिल जाय देखने के खातिर और का रखा है जीवन में! आरोपी अगर मुस्लिम हो तो ऐसी चुप्पी साध लेंगे की मानो जैसे कोई सांप सूंघ गया हो, इसी को कहते है मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति।  इन सबका फायदा मिशनरी वालो भी फायदा उठाते है धर्मपरिवर्तन करके दलित को ईसाई बनाकर। एक ग़लत धरना उत्पन्न की जाती है दलितों के सामने तुम्हारे साथ हिंदू धर्म में अपमान और अत्याचार हो रहा है। आओ इशू प्रभु के शरण में। यह अब एक एजेंडा नहीं है तो क्या है? किस नजरिए से देखा जाए इसको? जब कोई भी अपराध होता है तो बिना जांच - पड़ताल के विवादित और भड़काऊ बयान देने के तथाकथित सेकुलर समाजवादी लिबरल गैंग सक्रिय हो जाता है। एक मंच पर खुलेआम लोगों के सामने एक क्षेत्रीय पार्टी का नेता दूसरे समाज के मा, बहन - बेटियों को गरियाता है पर इस पर मीडिया में कोई शोर शराबा देखने को नहीं मिलता है क्योंकि वह नेता पिछड़े वर्ग का है। जब विकास दुबे जैसा अपराधी मारा जाता है तब शोर-शराबा होने लग जाता है 'ब्राम्हण को कैसे  मार दिए'? मतलब जो सही है उसको नहीं दिखाएंगे जो गलत है उसके लिए लड़ मर जाएंगे वाह क्या गजब है हम किस अजीबो - गरीब भारत में जी रहे है जहां हिन्दू धर्म तोड़ने की साजिश रची जा रही है कुछ गद्दारों द्वारा सिर्फ सत्ता सुख के लिए। जघन्य अपराध करने वालों के लिए समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए चाहे वो किसी भी जाति , धर्म या मजहब का हो। उसको कड़ी से कड़ी सजा मिले पर इस तरह जलती हुई लाश पर रोटियां सेंकने वालों को सबक सिखाने सख्त जरुरत है।

Saturday, October 3, 2020

एक उम्मीद की किरण जो जागी थी इस देश को बदलने की।

                         शिवम कुमार पाण्डेय



दिन बुधवार 17 अगस्त 2011, सुबह-सुबह अखबार पर ध्यान गया राष्ट्रीय सहारा पृष्ठ 9, "हजारे के साथ हजारों", पूर्वांचल भी खड़ा हुआ अन्ना के साथ" में हेडलाइन छपा था।
16 अगस्त 2011, मंगलवार सुबह वही हुआ जिसका अंदेशा था।अनशन से पहले ही दिल्ली पुलिस ने अन्ना हजारे और उनके चार सहयोगियों को सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। फिर क्या था देश के विभिन्न हिस्सों में गिरफ्तारी के खिलाफ हो हल्ला शुरू हो गया हर जगह निंदा ,नारेबाजी, विरोध प्रदर्शन होने लगा, इस बीच खबर आई कि उन्हें 7 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इस पर लोगों ने कहा, '1975 में जैसे इमरजेंसी लगाकर सारे देश को बंधक बना दिया गया था आज वैसी ही स्थिति है'। पूर्वांचल के विभिन्न जिलों में सुबह अन्ना की गिरफ्तारी की खबर मिलते ही जनाक्रोश भड़क गया क्या वकील, क्या नेता क्या, क्या सामाजिक कार्यकर्ता, क्या नौजवान, क्या महिलाएं, क्या छात्र क्या बच्चे, सभी उनकी गिरफ्तारी से आहत थे। इसी बीच एक वृद्ध ने कहा कि अगर आज जेपी यानी जयप्रकाश नारायण जिंदा होते तो व्यथित होकर यही कहते कि 36 साल में भी सत्ता का चरित्र नहीं बदला।

बात भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल बिल की मांग को लेकर हुई थी और देखते-देखते यह लोकतंत्र की हिफाजत के लिए संघर्ष और व्यवस्था में परिवर्तन के बड़े मकसद में तब्दील हो गई थी।सरकारी स्तर पर अन्ना को रोकने की जो कोशिश हुई उसका प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों ही तकाजा साथ तौर पर  अदूरदर्शिता का शिकार होते दिख रहा था।महिलाएं, छात्र तमाम अन्य तबकों ने सड़कों पर निकल कर जतला दिया था कि यह देश किसी सरकार और सत्ता पर काबिज पार्टी से ज्यादा उस परंपरा का है जिसे अहिंसक मूल्यों की गांधीवादी परंपरा कहते हैं।
अन्ना हजारों के रोल मॉडल बन चुके थे।सब के मुंह से अन्ना - अन्ना की आवाजें निकल रही थी एक उम्मीद की किरण जो जागी थी इस देश को बदलने की।
इनकी इस लड़ाई को इतिहास की लंबी यात्रा से जोड़कर देखा जा रहा था। लोक बनाम तंत्र की या विभाजक रेखा किसी दूसरे ने नहीं मात्मा गांधी ने खींची थी जब गोली खाने की पूर्व संध्या पर लिखे अपने आखिरी दस्तावेज में उन्होंने लिखा था 'लोकतंत्र के विकास क्रम में यह अवस्था आने ही वाली है जब लोक और तंत्र में सीधा मुकाबला होगा और उस मुकाबले में लोक की जीत हो इसकी हमें आज से तैयारी करनी है'।
26 जून 1975 की सुबह सूरज अभी आंख भी नहीं खुल पाया था कि इंदिरा गांधी ने सारे देश को जेल में बदल दिया था। पता नहीं यह क्यों है कि तंत्र अपने सारे काले कारनामे सूरज उगने से पहले ही करता है। 1942 में भी ऐसा ही हुआ था और गिरफ्तार गांधी कहां ले जाए गए देश को लंबे समय तक पता नहीं चला। 1975 में दिल्ली से जयप्रकाश को गिरफ्तार कर कहां ले गए किसी को पता नहीं चला। लेकिन लोक अपने पाले आई गेंद का पता कर लिया और फिर खेल कुछ यूं हुआ कि आजादी के बाद पहली बार केंद्र से कांग्रेसी सरकार का बिस्तर बन गया तब जो बंधा से आज तक बना ही हुआ है। अब जब तक उनका बिस्तर लगता है अभी तो दूसरों के सहारे।
अन्ना हजारे ने भी कदम कदम पर अपना आंदोलन जिस तरह खड़ा किया था इसमें इतनी दूर तक आने की संभावना नहीं थी।इस आंदोलन का असली काम तो यह था कि भ्रष्टाचार को पैदा करने वाली अवस्था बदलनी है। अन्ना का कहना था कि या लंबी लड़ाई है जिसे हमें सावधानी से लड़ना है दूसरी बात उन्होंने यह कहा कि जब किसी सरकार को उखाड़ दिया गिराने का आंदोलन नहीं बल्कि साफ शब्दों में भी बोले कि इनको गिराकर क्या होगा जो आएंगे वह कैसे हैं यह भी तो हम देख रहे हैं। सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। इस आंदोलन की आड़ में जो अपनी राजनीति की छोरियां तेज कर रहे थे उन्हें सीधी चोट थी।लेकिन वह यहीं नहीं रुके उन्होंने आगे यह भी कहा कि अगर सरकार इस आंदोलन का गलत ढंग से मुकाबला करेगी तो जाएगी और इस तरह जाएगी तो मैं उसकी फिक्र नहीं करता हूं। देश जिस तरह जाग उठा है, उसके बाद दो ही बातें होंगी या तो सरकार अपना रवैया बदले गिया सरकार ही बदल जाएगी। अब चुनना सरकार वालों का है।उन्होंने कांग्रेस के दुष्प्रचार का सीधा जवाब दिया कि "अन्ना हजारे संसद की सर्वोपरिता को नहीं मानते हैं।" हम उसे पूरी तरह मानते हैं उसका पूरा सम्मान करते हैं, कानून बनाने के उसके अधिकार को भी स्वीकार करते हैं।

ऐसी तमाम बातें उस दौर में हमें सुनने और देखने को मिला उस वक्त केजरीवाल किरण बेदी और विपक्ष के तमाम लोग अन्ना हजारे समर्थन में खड़े दिखे। लोगों में आक्रोश था कांग्रेस को लेकर जो 2014 के लोकसभा में कांग्रेस के लिए काल बन के आया अब सत्ता भाजपा के हाथ में आ गई । इससे पहले अन्ना के चेले अरविंद केजरीवाल उसी कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई जिसके विरोध इन्होंने जंग छिड़ी थी हालांकि यह सरकार 49 दिनों में ही गिर गई। इससे पहले 2013-14 विधानसभा के चुनाव में केजरीवाल ई आम आदमी पार्टी को 28 सीट कांग्रेस को आठ और भाजपा को 24 सीट मिली थी। कांग्रेस की 15 साल से शीला दीक्षित सरकार को बहुत बड़ा झटका लगा। केजरीवाल ने हर वह काम किया है जो उन्होंने चुनाव से पहले वादा किया था कि नहीं करेंगे। यह उनका राजनीतिक चाल था इसके बाद अन्ना हजारे का महत्व खत्म हो गया सब जान गए थे किन का राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है यह भी कोई दूध के धुले नहीं। यह सब के सब बरसाती मेंढक हैं और कुछ नहीं। ऐसी तमाम प्रतिक्रियाएं हर तरफ से आ रही थी। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद इनका जन लोकपाल बिल वाला आंदोलन शांत सा हो गया। कुछ कांग्रेसियों का कहना था सब एक बहाना था कांग्रेस को पूरी तरह से खत्म करने के लिए। जिसमें यह सफल में हुए नतीजा 2014 लोकसभा चुनाव। ऐसी तमाम आलोचनाओं का सामना करना पड़ा अन्ना को। केजरीवाल आज के दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हुए पूर्ण बहुमत के साथ और अन्ना तो मानो जैसे गुमनामी में जी रहे हैं।

Monday, September 28, 2020

सामाजिक परिवर्तन सदा ही ताकत और विशेष सुविधाएं मांगने वालो के लिए भय पैदा करता है।

लेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय

क्या कह रहे हो तुम्हारी आवाज दबाई जा रही है, तुम पर जुल्म किया जा रहा है।इसीलिए जुलूस निकाल रहे हो तभी मैं कहा इतनी भीड़ क्यों है। पर ये भगत सिंह की  तस्वीर का इस्तेमाल क्यों कर रहे हो? ओ क्रांति का दूसरा नाम भगत सिंह है! सड़को पर क्रांति होगी तोड़ - फोड़ की जाएगी , वाहनों को फूंका जाएगा रेलवे ट्रैक उखाड़ा जाएगा सबकुछ अस्त - व्यस्त कर दिया जाएगा, और डीजे लगा के नाच गाना किया जाएगा। इसी को छात्र , बेरोजगारों और किसानों का आंदोलन बोला जाएगा। वाह यार वाह गजब की क्रांति है यार पर ट्रैक्टर जो किसानों का मदद करता है उसको फूंक कर भगत सिंह जिंदाबाद के नारे लगाकर उनका अपमान करना  क्या यही विचार है?
भगत सिंह के नाम पर फलनवा - ढिकनवा मोर्चा संगठन बनाके लोगो को भड़काना, महौल खराब बिगाड़ना आदि करना आम बात हो गई है। हद तो तब हो जाती है जब किसी आतंकवादी या नक्सल गतिविधियों में शामिल व्यक्ति की तुलना शहीद भगत सिंह से कर दी जाती है चंद मुट्ठी भर नेताओ और बुद्धिजीवियों द्वारा।
कोई उनका ऐसा पोस्टर लगाता है मानों ये कोई क्रांतिकारी नहीं  गुंडा या माफिया हो ! मतलब एक कट्टा खोस दिया जाता है उनके जेबा में । अरे भाई थोड़ा तो रहम करो इनपर ये कोई मामूली व्यक्ति नहीं है ये वही हैं जिसने कहा था "सामाजिक परिवर्तन सदा ही ताकत और विशेष सुविधाएं मांगने वालो के लिए भय पैदा करता है। क्रांति एक ऐसा करिश्मा हैं जिसे प्रकृति स्नेह करती है और जिसके बिना कोई प्रगति नहीं हो सकती - न प्रकृति में और न ही इंसानी कारोबार में। क्रांति निश्चय ही बिना सोची - समझी हत्याओं और आगजनी की दरिंदा मुहिम नहीं है और न ही यहां - वहां चंद बम फेंकना और गोलियां चलाना है; और न ही यह सभ्यता के सारे निशान मिटाने तथा समायोचित न्याय और समता के सिद्धांत को खत्म करना हैं। क्रांति कोई मायूसी से पैदा हुआ दर्शन भी नहीं और न ही सरफरोशों का कोई सिद्धांत हैं। क्रांति ईश्वर विरोधी हो सकती हैं लेकिन मनुष्य विरोधी नहीं।"
असेम्बली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और दत्त द्वारा बांटे गए पर्चे में लिखा था "बहरो को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की आवश्यकता। होती हैं," प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलीयां के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं। देखा जाए तो बम को वैज्ञानिक तरीके से बनाया गया था और उसे खाली जगह फेंका गया था ताकि किसी को हानि ना पहुंचे नहीं अगर ऐसा नहीं होता तो कोई जिंदा ही नहीं बचता इस पर्चे को पढ़ने के लिए।
भूख हड़ताल का भी ढकोसला आजकल बहुत चलता है भारतीय राजनीति में युवा लोग भी कोई दूध के धुले नहीं है इस मामले को लेकर आज भूख हड़ताल शुरू होती है किसी मुद्दे को लेकर और अगले दिन अनार के जूस के साथ खत्म हो जाती है। सोचिए 114 दिन के भूख हड़ताल में कितनी यातनाएं झेलनी पड़ी होंगी शहीद भगत सिंह और उनके साथियों को।

आजकल के युवा पीढ़ी को चाहिए कि भगत सिंह के बारे में अच्छे से जाने पढ़े और समझे की कोशिश करे किसी के बहकावे आने की जरूरत नहीं है। शहीद भगत सिंह का "युवक" और "विद्यार्थी और राजनीति" नामक लेख काफी लोकप्रिय और प्रसिद्ध है जिसको एक बार अच्छे से जरूर पढ़ना चाहिए।
कितनो को तो ये भी नहीं पता होगा की 23 मार्च, 1931 को शाम सात बजे भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी देकर उनकी लाशों के टुकड़े - टुकड़े किए गए।फिर फिरोजपुर , सतलुज नदी में बहाया गया। सब बहुत जल्दबाजी में किया गया। टुकड़े करने और अधजली हालत का प्रमाण 24 मार्च ,1931 को शहीद भगत सिंह की बहिन बीबी अमर कौर व अन्य देशवासियों  द्वारा खून - सने पत्थर ,रेत और तेज धार हथियार से कटी अधजली हड्डियां हैं, जिन्हें आजकल खटकड़कलां गांव में प्रदर्शित किया गया है।भगत सिंह पर बनी तमाम फिल्मों में इस सच्चाई को कभी  दर्शाया नहीं गया और युवाओं के बीच में भी कई तरह के भ्रम उत्पन्न किए गए। इतिहास हमसे  मांग करता है कि हम अपनी सूझ बूझ से बलिदानी शहीदों को समझे और संकीर्णता का शिकार होने से बचें । युवाओं को शहीद भगत सिंह का यह कथन गांठ बांध लेना चाहिए - "पढ़ो ,आलोचना करो , सोचो व इसकी (इतिहास की) सहायता से अपने विचार बनाने का प्रयत्न करो।"

Monday, September 21, 2020

ना खाता न बही हम जो करे वही सही


विपक्ष के नेता तो सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करने में लगे रहते हैं। जब संसद में बोलने की बात आती है किसी भी मुद्दे पर तो हल्ला हु मचाने लग जाते हैं और ऐसी ऐसी हरकतें करते हैं कि पूछिए मत ऐसा तो स्कूल में बच्चे लोग भी नहीं करते होंगे अपने क्लास में। रविवार के दिन जो कुछ भी हुआ संसद में इसकी जितनी निंदा की जाए उतना कम है। इतिहास में इस तरह की घटना कभी नहीं घटी। टीएमसी के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने उपसभापति के पास जाकर उनके माई को तोड़ दिया और उनके सामने ही रूल बुक को  फाड़ दिया। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह जी कहां पीछे रहने वाले थे उन्होंने भी जमकर हंगामा किया और मार्शल से धक्का-मुक्की भी की। जिस तरह सांसदों ने सदन में हंगामा किया तोड़फोड़ और धक्का-मुक्की की उससे राज्यसभा की मर्यादा तार-तार हो गई। इन दो कौड़ी के नेताओं के भारी हंगामे और शोरगुल के बीच ही कृषि से जुड़े विधेयक पारित हो गए। 
संविधान की बात करने वाले ने संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए यह दर्शा दिया कि ना खाता न बही हम जो करे वही सही। कानून बनाने वालों ने कानून की जबरदस्त खेल लिया उड़ाई नजारा तो यह था कि गैलरी और लोकसभा से विपक्षी सदस्य राज्यसभा में आकर हंगामा करने लग गए। करुणा महामारी को लेकर जो प्रोटोकॉल बनाया गया था उसको भी लोगों ने तोड़ कर रख दिया वह भी उस समय जब 40 के करीब सांसद कोविड-19 संक्रमित पाय गए हैं। मत पूछिए ऐसी भषण मची हुई थी कि किसी को कुछ होश या ख़बर ही नहीं था कि जो वो कर रहे है उससे देश की जनता पर क्या असर पड़ेगा? हर मुद्दे को लेकर भटकाने की कोशिश हमेशा से विपक्ष की चाल रही है। जब कुछ नहीं मिलता है तो शोर - शराबा करके संसद का समय और जनता का पैसा दोनों ही बर्बाद कर देते है। भारतीय संसद के लिए कोई नई बात नहीं है अभी हाल ही में देख सकते हैं 2019 अगस्त में जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाए जाने पर पीडीपी के दो सांसदों नजीर अहमद लवे और एमएम फैयाज़ ने संसद में ही अपने कपड़े फाड़ दिए थे।  पीडीपी के सांसदों द्वारा संसद में कपड़े फाड़ने पर सभापति वेंकैया नायडू ने दोनों सांसदों को सदन से बाहर भेज दिया था। इतना ही नहीं इन दोनों ने संविधान की प्रतिलिपि को भी फाड़ दिया था। एआईएमआईएम के  नेता असदुद्दीन ओवैसी ने लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 की कॉपी फाड़ दी थी इसको लेकर काफी हंगामा भी हुआ था। 
समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान की काली करतूत को कैसे भुला जा सकता है जब तीन तलाक के मुद्दे की चर्चा के दौरान लोकसभा में उन्होंने बीजेपी सांसद रमा देवी पर अभद्र टिप्पणी कर दी थी। रमा देवी स्पीकर की जगह पर बैठी हुई थी और आजम खान बोल रहे थे "तू इधर उधर की बात ना कर...", बाकी जो हुआ वह तो संसद का काला इतिहास है और इससे आप भली-भांति वाकिफ होंगे। 

13 फरवरी 2014 को तेलंगाना राज्य के मुद्दे को लेकर लोकसभा में जो हुआ उसने पूरे देश का सिर शर्म से झुका दिया था। भारतीय संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले अभूतपूर्व घटनाक्रम में  लोकसभा में माइक तोड़े गए और मिर्ची स्प्रे किया गया, जिससे तीन सांसदों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा तथा बाद में सीमांध्र क्षेत्र के 16 सदस्यों को निलंबित कर दिया गया। हंगामे के बीच ही सदन में तेलंगाना विधेयक भी पेश कर दिया गया था। उस समय की लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा था कि ,"इससे देश एवं संसद शर्मसार हुई तथा यह एक धब्बा है।" सदन में अप्रत्याशित हंगामा और अफरातफरी उस समय मच गई जब कांग्रेस से निष्कासित सदस्य एवं आंध्र प्रदेश के विभाजन का विरोध कर रहे उद्योगपति एल राजगोपाल ने काली मिर्ची स्प्रे करना शुरू कर दिया था ।लोकसभा के 16 सांसदों को पांच दिनों के लिए सिर्फ निलंबित किया गया था । इन सांसदों में तेलुगू देशम के पांच, कांग्रेस के पांच, वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष वाई. एस. जगनमोहन रेड्डी सहित दो सांसद और कांग्रेस से निष्कासित छह में से पांच सांसद शामिल थे। तेलंगाना बिल के विरोध के नाम पर लोकसभा में जमकर बवाल हुआ था । सांसदों ने बिल की कॉपियां फाड़ दी थी। स्पीकर का माइक तोड़ने की कोशिश की गई इतना ही नहीं सांसदों ने लोकसभा की कई मेजें और शीशे भी तोड़ दिए थे। ना जाने क्या क्या हो गया था  उस दिन संसद की गरिमा को तार तार कर दिया था जैसा की वर्तमान में भी देख सकते है।
इन  नेताओं की दो कौड़ी हरकतों की वजह से हमेशा से संसद की आत्मा को ठेस पहुंचता रहा है बाकि सब समझदार है क्या गलत क्या सही है का निर्णय लेने का।

Thursday, September 17, 2020

जो भी राष्ट्रहित में बाधक हो उसका सर्वनाश करो

                लेखक - शिवम् कुमार पाण्डेय

राष्ट्रहित से बढ़कर कोई कुछ नहीं होना चाहिए। राजनीतिक दल सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी हद तक गिर सकते है  इस बात इतिहास साक्षी रहा है। चाहे वो जातिवाद की राजनीति हो या मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति कोई किसी से कम नहीं रहा है। सबने एक दूसरे को बराबर को टक्कर दी है चाहे वो कांग्रेस हो सपा हो , बसपा , आरजेडी   या कम्युनिस्ट पार्टी हो। देश को तोड़ने की बात करने वाले नक्सलियों को क्रांतिकारी तक बता दिया जाता है जिनका काम सिर्फ दूसरों को लूट मार कर खाने का है।  लाल सलाम के नाम पर ना जाने कितने निर्दोष लोगो को अपने जान से हाथ धोना पड़ा है। इस्लामिक  कट्टरपंथी जिहादियों का भी एक ही लक्ष्य है "गज़वा ए हिन्द" जिसके नाम पर ना जाने कितने बेकसूर मासूम कश्मीरी पंडितों  को जम्मू और कश्मीर में अपने घर से बेघर होना पड़ा है। घर फूंक दिया गया , मां - बहनों की इज्जत लूटी गई जिहाद के नाम पर। साफ साफ पोस्टर पर लिखा था हिन्दुओं घर छोड़ दो अपनी जान की सलामती चाहते हो तो अपने घर की महिलाओं को हमारे हवाले कर दो। 

वर्ष 2016 फ़रवरी में जेएनयू में लगे नारों को भला कौन भूल सकता है। कुछ मुठ्ठी भर छात्रों और वामपंथी संगठनों ने विश्वविद्यालय की कीर्ति एवं शिक्षा के स्तर पर ऐसे आघात किए जिनको देशभक्ति के श्रेणी में तो कत्तई नहीं रखा जा सकता।जिस समय सारा देश सियाचिन के जांबाज शहीदों को श्रद्धांजलि दे रहा था उस समय जेएनयू में भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी तथा अफजल हम शर्मिंदा हैं तेरे कातिल जिंदा है के नारे लग रहे थे। आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाई जा रही थी । वहां पोस्टर लगे जहां जिनमें लिखा था - शहीद अफजल गुरु की शहादत की पहली बरसी पर स्मृति सभा जिसमें अरुंधती राय, प्रो. जगमोहन , सुजितो भद्र , जेएनयू  के प्रो. एके रामकृष्णन के नाम भाषण देने वालों थे। डीएसयू के पोस्टरों में छापा गया कि कश्मीर के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को लाल सलाम। देश की एकता और अखंडता को खुलेआम चुनौती दी जा रही थी। जहां कहीं भी देश में भारतीय सेना के विरुद्ध विद्रोही गतिविधियां हैं उन सब के समर्थन में जेएनयू में सेमिनार एवं प्रदर्शन आयोजित हो किए जाते रहे है विभिन्न संगठनों द्वारा। कश्मीर, असम ,मणिपुर और नागालैंड के विद्रोह संगठनों की उपस्थिति देखी जा सकती है। 

"भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाह अल्लाह इंशाह अल्लाह ,तुम कितने अफजल मारोगे हर घर से अफजल निकलेगा" अर्थात अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देशी विरोधी नारे लगाना और आतंकियों के एनकाऊंटर  पर मानव अधिकार की बाते करने वालो को तमाम राजनीतिक दलों का समर्थन प्राप्त था। एक तरफ भारतीय सैन्य बलों के जवानों पर पत्थबाजी होती थी जिसका जवाब चाहकर की भी हमारे जवान गोली से नहीं दे सकते थे और दूसरी तरफ ये तथाकथित सेक्युलर लोग इनपर कश्मीर में बलात्कार करने का आरोप लगाते थे। पूरी तरह से भारतीय सेना का मनोबल गिराने की नाकाम कोशिश की गई। जिस छाती से दूध पिया उसी में दांत गड़ाने का काम किया इन लोगो ने। इन देशद्रोहियों की भगत सिंह से की जा रही थी! करने वाले कांग्रेसी नेता थे जिनको को तो चुल्लू भर पानी में जाकर डूब मरना चाहिए। तनिक भी शर्म ना आयी की भगत सिंह की आत्मा क्या सोच रही होगी कि कैसे निकम्में लोग पैदा हो गए है देश में यानी सत्ता के लिए कुछ भी कर बैठेंगे। मार्क्स माओ स्टालिन लेनिन चे ग्वेरा और कस्त्रो ना जाने कितने विदेशियों को अपना आदर्श मानने वाले वामपंथियों ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को भी नहीं छोड़ा है।

उड़ी हमले में शहीद हुए जवानों पर भी गंदी राजनीति करने से कुछ लोग बाज नहीं आए। सेना के जवानों कहा जाता था कि "ये घूस देके भर्ती हुए है"। जब भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक करके आतंकियों को 72हुरो के पास पहुंचाकर अपने साथी जवानों का बदला लिया और ये दिखाया की हम घर में घुस कर मार सकते है तो इसको भी तमाम विपक्षी नेताओ ने मानने से इंकार कर दिया। सबको सबूत चाहने लगा था सेना के बहादुरी का हद तो तब हो गई जब राहुल गांधी ने कहा मोदी सेना के जवानों की खून की दलाली करते है।

 पिछले साल 14 फरवरी 2019 का ही मामला देख लीजिए  सीआरपीएफ के जवानों पर कायरतापूर्ण हमला हुआ था जिहाद के नाम पर जिसमें करीब 45 जवान शहीद हो गए थे। वायुसेना ने 26 फ़रवरी 2019 को एयर स्ट्राइक से इसका बदला लिया था जिसपर तथाकथित सेक्युलर लिबरल गैंग ने सवाल खड़ा कर दिया था। शुक्र है कि 5 अगस्त 2019 को संसद में माननीय गृहमंत्री अमित शाह ने धारा 370 और 35अ निष्क्रिय करने का बिल पारित कर दिया जिसे लेकर सालो से  अटकलें लगाई जा रही थी कि संघ और भाजपा सिर्फ बाते करती है इनके बस का कुछ नहीं है। अलगादवादी , हुरियत, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी वाले कहते थे 370 हटा तो आग लगा देंगे , तबाही मचा देंगे आदि उलुल- जुलूल भाषणों से वहां की अवाम और युवाओं को बरगलाने और भड़काने का काम करते थे। 370 हटा हम सब ने देखा और इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में से लिखा गया। जब से 370 हटा तब से आप देख सकते हैं जन्नत जाने वालों की लंबी लाइन लगी हुई है। हुर्रियत और अलगाववादी नेताओं की तो कमर तोड़ दी गई है। 

नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने यो ये जता दिया कि राष्ट्रहित में फैसले लेने से भाजपा सरकार तनिक भी संकोच नहीं करेगी। इसका भी विरोध हुआ समुदाय विशेष के लोगों ने दंगा करने की कोशिश की, देश का माहौल खराब किया गया। तमाम राजनैतिक पार्टियों को घिनौना चरित्र उजगार हुआ। सेक्युलर पत्रकारों , लिबरल बुद्धिजीवियों और वामपंथी संघठनो ने आग में पेट्रोल डालने का कार्य किया। शाहीन बाग इसका जीता जागता उदाहरण है। 

अयोध्या में श्री राम मंदिर निर्माण हो रहा है काफी लंबे सालो के बाद हिन्दुओं की आस्था को न्याय मिला। उत्तर प्रदेश के मुख्मंत्री भी "हिन्दू ह्रदय सम्राट" योगी आदित्यनाथ है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को भुलाया नहीं जा आखिर इन्हीं कार्यकाल में विवादित बाबरी ढांचा गिराया गया था। इन्होंने अपने राजनीति करियर दांव पर लगा दिया सिर्फ प्रभु श्री राम के लिए।आडवाणी , अशोक सिंघल , पूर्व प्रधान अटल बिहारी वाजपेई जी, देवी ऋतंभरा आदि लोगो के बिना ये आंदोलन संभव भी नहीं था। प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी ने 56 इंची सीने जोर दिखाया जिसका पूरे विश्व में गूंजा उठा। बहुत पहले नारा लगाया गया था "मिले मुलायम काशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम" वर्तमान में इसका सटीक उत्तर ये है "अजर अमर है जय श्री राम   मर गए मुल्ला काशीराम" । जैसी करनी वैसी भरनी जो आप करेंगे उसका दंश तो भोगना ही पड़ेगा। कारसेवकों के ऊपर गोलियां चलवाने से आप कौन से बड़का सेक्युलर बन गए! कांग्रेसियों कारामात को भी कोई नहीं भूल सकता ये तो हिन्दुओं को आतंकवादी बनाने लगे हुए थे "भगवा आतंकवाद" की संज्ञा देने लगे थे। साल 2008 में जिहाद के नाम पर होने वाले जगह जगह बम विस्फोटों को कौन भूल सकता है। सबसे महत्वपूर्ण 26/11 का मुंबई हमला जिसने पूरे देश को दहला दिया था। अभी वर्तमान में  देखिए कांग्रेसियों की करास्तनी राम मंदिर में लगने वाने गुलाबी पत्थराें के खनन पर राजस्थान सरकार ने रोक लगाा कर 25 ट्रक जप्त कर लिया। मतलब इन कांग्रेसियों  की बुद्धि अभी तक खुली नहीं है। खैर अंत में बस यही कहना चाहूंगा जो कोई भी राष्ट्रहित के मार्ग में बाधक होगा उसका सर्वनाश हो जाएगा।

Tuesday, July 14, 2020

सुदामा की रक्षा केवल श्रीकृष्ण कर सकते है

 लेेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय

(कलयुगी बहरूपिया जो खुद को भगवान वासुदेव समझ रहा है और साइकिल के पहिए को अपने अंगुलियों से नचाता हुआ दिखाकर लोगो को भ्रमित करता हुआ कि देखो ये " मेरा सुदर्शन चक्र")

जातिवाद और परिवारवाद कि राजनीति से पूरे उत्तर प्रदेश को बर्बाद करने वाले ये तथाकथित सेक्युलर समाजवादियों की अभी तक बुद्धि नहीं खुली है। ये फिर से जातिवाद का नंगा नाच करनें में लगे हुए है। हाल ही में हुए एक अपराधी के एनकाऊंटर को ये लोग जातिवाद का कोण देने में लगे हुए है। हद तो तब हो गई जब ये खुद तुलना भगवान श्रीकृष्ण से और मारे गए कुख्यात अपराधी कि तुलना सुदामा से करने में लगे हुए है मतलब इनका कहना ये है कि "सुदामा की रक्षा केवल श्रीकृष्ण कर सकते है"। इनके इस कथन में जातिवादी मानसिकता का क्रूर रूप नजर आ रहा है जो समाज का सिर्फ विनाश ही कर सकता है। अपराधियों को निर्दोष बताते हुए भी तनिक भी लज्जा नहीं आई इन बेशर्मो को उन आठ शहीद पुलिसकर्मियों की आत्मा भी इनको कोस रही होगी। आज कल ये समाजवादी योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी कहते हुए दिख जाएंगे पर ये वो ही लोग है जो कुछ दिन पहले  तक सरकार को ब्राह्मणवादी कह कर विरोध कर रहे थे। इनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है जब ये सरकार में थे यूपी की शिक्षा व्यस्था और कानून व्यस्था को पूरी तरह से बर्बाद कर के रख दिया था। आजकल ये भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेके अपने जातिवाद की राजनीति को हवा दे रहे है जब बात मथुरा कृष्ण जन्मभूमि  की बात आ जाय तो सेक्योरलिजम का नंगा नाच करने लग जाते है। जब कारसेवकों पर गोलियां चलवाने में इनके हाथ नहीं कांपे तो अपराधियों को निर्दोष साबित करना कौन सी बड़ी बात है इनके लिए। इन बहरूपियों को देखकर पौंड्रक की कहानी याद आ जाती है। पौंड्रक खुद को श्रीकृष्ण बताने वाले राजा पौंड्रक की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। नकली सुदर्शन चक्र, शंख, तलवार, मोर मुकुट, कौस्तुभ मणि, पीले वस्त्र पहनकर खुद को कृष्ण कहता था। पौंड्रक की हर गलतियों के लिए लोग श्रीकृष्ण को जिम्मेदार ठहराने लगे थे। इस बीच पौंड्रक ने श्रीकृष्ण को युद्ध की चुनौती दे डाली। इसके बाद युद्ध हुआ और पौंड्रक का वध कर श्रीकृष्ण पुन: द्वारिका चले गए। इसी कहानी से समझिए कि "चारो तरफ  फैलाते अंधेरा है, समाजवाद की आड़ में जालिमों का पहरा है"।

Friday, July 3, 2020

साल 2014 से देश में लोकतंत्र खतरे में है


      लेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय

विदेशी विचारधारा से प्रेरित होकर कुछ लोग अपने देश और संस्कृति को गाली देने लग जाते हैं। ऐसे लोगों को समझाना बुझाना चाहिए अगर फिर भी नहीं समझते हैं तो इनका समाज में बहिष्कार करना कहीं से भी गलत नहीं है। इसे भारत का दुर्भाग्य कहेंगे कि यहां की माटी पर मुट्ठी भर लोग ऐसे हैं, जो पाश्चात्य विचारधारा का अनुगामी बनते हुए यहां की परंपरा और प्रतीकों का जमकर माखौल उड़ाने में अपने को धन्य समझते है।
विदेशी चंदों पर पलने  वाले ये लोग नक्सलवाद और अतंकवाद को बढ़ावा देते हुए मिल जाएंगे। इस देश की शिक्षा प्रणाली में यही लोग बैठे थे इन्होंने इतिहास की धारा को ऐसा मोड़ा की गोरी, गजनवी, बाबर, अकबर, नादिरशाह, तुर्की आदि सब महान हो गए। देश की सत्ता कांग्रेस के हाथ में थी और शिक्षा वामपंथियों के हाथ में देखने वाली बात ये है एक ने पूरे देश को बर्बाद किया दूसरे शिक्षा के माध्यम से देश को "मुल्क" बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। इतना ही नहीं वो अरबी लुटेरा मोहम्मद बिन कासिम जिसको हिन्दू राजा दाहिर ने 3 बार पराजित किया।जिसके घराने के लोगो ने आज के अफ़गानिस्तान, बलूचिस्तान, पाकिस्तान, पंजाब, इरान के कइ हिस्सों पर शासन किया ,पराजित होने के बाद बिन कासिम ने यही के स्थानीय  शक्तियों जैसे जाट,मेढ,भुट्टो,नेहुर, बाजरा, कालाकोकर, बौद्ध नरेशो को मिलाकर 712 ई.अरोर के भीषड युद्ध मे उम्मैयत खलिफ़ा के लिए हराकर कासिम ने ह्ज्जाज बिन कासिम को सिर कलम करके भेजा ,युद्ध से पूर्व राष्ट्रभक्त दाहिर ने कहा था कि युद्ध मे यदि जीता तो इतिहास बनकर देश याद करेगा और मरा तो  भी इतिहास लिखा जायेगा, किन्तु आज दाहिर को दो चार पंक्तियों मे पराजित नरेश के रूप मे किताबो मे पढाया जाता है। 
बलबन ने भी दाओब के हिंदुओं को कुचलने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ा। एक कड़वी लड़ाई हुई और बड़ी संख्या में हिंदुओं का कत्ल कर दिया गया और उनकी महिलाओं और बच्चों को गुलाम बना दिया गया। ऐसा सभी मुस्लिम शासकों  ने किया। ये लोग हमारे देश को लुटने आए थे और लुटे भी! सारा धन लेकर चले गए पर मन्दिरो ने उनका क्या बिगाड़ा था? जिसको ये लोग ध्वस्त कर के चले गए। इससे साफ पता चलता है कि आज तक जितने भी आक्रमण हुए है हमारी संस्कृति को बर्बाद करने के मकसद से हुआ है । इन सबके ऊपर सवाल खड़ा करके इनको गाली दिया जाय तो कुछ तथाकथित लोग सेक्योरिलिजम के नाम पर नंगा नाच करने लग जाते हैं। फ़्रेंच, डच ,और पुर्तगालियों से कामयाब ब्रिटिश थे जिन्होंने पूरे भारत को अच्छे से 200 साल तक लूटा।सोने की चिड़िया कहे जाने चाणक्य जैसे महान विद्वानो की धरती को पूरी तरह से धराशाही कर दिया गया। लॉर्ड मैकाले ने पूरी शिक्षा व्यस्था को बर्बाद कर दिया और पश्चिमी संस्कृति का प्रचार होने लगा। इन फिरंगियों ने अपने साथ थल,वायु और जल सेना के अतरिक्त भी एक सेना बना के रखी थी वो है "मिशनरी" जिसका कार्य भारतीय संस्कृति को बर्बाद करना और पैसे के बल पर लोगो को अपने धर्म शामिल करना था। आजादी के बाद अंग्रेज़ तो चले गए पर उनकी बनाई हुई संस्था कांग्रेस और मिशनरी यही रह गई जो अब तक देश को तहस - नहस करने में लगी हुई है। कांग्रसियों का जूठन खाने वाले मार्क्स , स्टालिन , लेनिन या माओ की औलादो का सांठ गांठ इन मिशनरियों से रहता है। ये सब दलितों और आदिवासियों के बस्ती में जाके उनको हिन्दू धर्म के खिलाफ भड़का के और थोड़े पैसे देकर आसानी से बहला फुसलाकर उनका धर्म परिवर्तन कर देते है। नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में मिशनरियों का फैलाया गया जाल किसी से छिपा नहीं है। ओडिशा के कंधमाल जिले के जले पटा आश्रम में जन्माष्टमी के दिन स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या, 2008 अगस्त की घटना है। इसके बाद वहा चर्च (मिशनरी वालों) की गतिविधियां बढ़ गई थी। हिन्दू जनमानस ये सब पता नहीं कैसे भुल जाता है? 
मुल्ला मौलवी का खेल कश्मीर में देखा जा सकता है जब 90 के दशक में 50 हजार से ज्यादा कश्मीरी पंडितों का नरसंहार किया गया जिहाद के नाम पर, हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया , घरों को फुक दिया गया। बड़े - बड़े पोस्टर लगे थे हिंदुओं तुम जाओ अपनी पत्नी , लड़की और बहनों को छोड़ दो! ऐसी क्रूरता जिसकी दिखाई गई जिसको बताने में आंखो से रक्त के आंसू बहने लगते है। इन सबको दरकिनार करते हुए  सत्ताधारियों ने मुस्लिम तुष्टिकरण की रजनीति को आगे रखा। पत्रकारों और पढ़े लिखे बुद्धिजीवियों ने भी इनका भरपूर साथ दिया। अफजल गुरु , याकूब मेमन आदि जैसे अतांकियो  के मरने पर हमारे देश में यही मुट्ठीभर लोगो द्वारा शोक व्यक्त किया जाता है।
 इन लोगो लिए साल 2014 से देश में लोकतंत्र खतरे में है क्योंकि 6 सालो में कश्मीर में आतंकियों का सफाया हो रहा है, धारा 370 जो बेहूदगी से भरा उसका नाश हो गया, नक्सलवादियों कि कमर तोड़ी गई , अयोध्या में राम मंदिर निर्माण कार्य का शुभारंभ हो गया, नागरिकता संशोधन कानून आदि। इतना ही नहीं चीन को भी मुंहतोड़ जवाब दिया जाता है इसके विपरित पिछली सरकार ने तो हिंदी- चीनी भाई भाई का माहौल बनाके रख दिया था। शुक्र है कि देश में संघ जैसा कोई राष्ट्रवादी संगठन भी है जिसने कदम कदम पर संस्कृति कि रक्षा की और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का काम किया नहीं तो इन कांग्रसियों और उसके सहयोगी विपक्षियों, लाल सलामी ,तथाकथित सेक्युलर झामपंथियो और मीडिया वालो ने हिंदुओं को ही आतंकी सिद्ध करने में लग गए थे।

Friday, June 26, 2020

"फौजी हुँ कोई मुजरिम नही": शिवम कुमार पाण्डेय

(एक फौजी की पुकार, ललकार चाहे जो कह लीजिए उनके भावनाओ को  समझते हुए मैंने ये कविता लिखी है)

फौजी  हुँ कोई मुजरिम नही
जो हर सवालो का जवाब दूँगा
जो भारत माँ को गाली दे उसको
 वही पे दफन कर दूँगा।
फौजी हूँ देश कभी झुकने नही दूँगा, 
जो झुकाने की कोशिश करे उसे 
कभी उठने नही दूँगा।
फौजी हुँ देश मे आतंक फैलने नही दूँगा,
जो आतंकी बना उसे जीने नही दूँगा।
कसम है माँ भारती की इस मिट्टी कि
 मैं तिरंगा कभी झुकने नही दूँगा।।
             
                    --शिवम कुमार पांडेय

Wednesday, June 24, 2020

मेरी कुछ राष्ट्रवादी कविताएं...

                 (1)
मुझे ये फिक्र नहीं आगे क्या होगा
जो मुझे करना है वो अच्छा  होगा
कोई राहों में बाधा अता है तो आए 
सबको ढकेल कर पूरा  फोड़ कर
निकल जाऊंगा राष्ट्रवाद के लिए।।

          (2)
भारत माता पुकार रही है 
शत्रुओं का विनाश करो
जोर लगाओ मार भगाओ
उन हिमालय पार वालो को
जमीन अपनी जल अपना
फिर काहे को उनसे डरना

           (3)
जनमेजय वाला यज्ञ करो,
 जहरीले सांपों को नष्ट करो 
दांत उखाड़ो उनके
जो अपनी ही मां के
 छाती में दात गड़ाए बैठे है
दूध के बजाय खून पी बैठे है..
रोती मातृभूमि को सुकून दो
 देशद्रोहियों को गोलियों से भून दो..


Friday, June 19, 2020

क्या है ये जवानी?

जवानी है ये जो रक्त  बहाता है
बाकि सब तो बकवास लगता है
यही जवानी है जो देश बचाता है
ना भटके जवानी संभल के रहना
हंस के मातृभूमि पर लुटाते रहना
जवानी है इसे बदनाम ना करना
सिर्फ मातृभूमि के नाम ही करना
भारत का औजार है पागल जवानी
दुश्मन के लिए होशियार है जवानी
शत्रुओं का नाश भी करती जवानी
ना समझो तुम इसको एक कहानी
जीवन का वसंत ऋतु है ये "जवानी"।

 

Wednesday, June 17, 2020

राष्ट्रवादियों को उकसाओगे तो जान से जाओगे।

सोमवार  देर रात पूर्वी लद्दाख की गलवान वैली में भारत और चीन की सेना के बीच हुए खूनी संघर्ष में भारत के 20 जवान शहीद हो गए। इनमें एक कर्नल संतोष बाबू शामिल है। चीन के करीब 43 सैनिकों के हताहत होने की खबर। 
भारत- चीन सीमा विवाद लंबे समय से चल आ रहा है पिछ्ल महीने 5-6 मई को चीन सेना एलएसी  पर भारतीय सीमा में घुसपैठ कि और तब से वह पेंगोंग लेक और गलवान घाटी जमे हुए है। उनको भारतीय सीमा से रेखा से हटाने के लिए अनेक स्तर पर चल रही थी पर "लातो के भूत  बातों से कहा मानते है" उल्टे गश्त पर गए भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया जिसका मुंहतोड़ जवाब इनको मिला। जवाबी कार्यवाही में भारत ने चीन के सैनिकों बड़ी संख्या में हताहत किया है। चीन ने कहा कि हमारी तरफ से 5 सैनिक मारे गए है बाद में अपने बयान से पलट गया और कहा कि हम संख्या के बारे में नहीं बताएंगे। उम्मीद है काफी गहरी चोट पहुंची है इनको ना तो बताते बन रही है और नाही छिपाए। ये भुल गए की ये 62 वाला भारत नहीं है घर में घुस कर मारना जानता है। सत्ता भी इस वक्त राष्ट्रवादियों के हाथ में है उकसाओगे तो जान से जाओगे। 
ये हिंसक झड़प क्षेत्र में ' यथास्थिति के एकतरफा तरीके से बदलने के चीनी पक्ष के प्रयास ' के कारण हुई।
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, हम अपने देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
आज पीएम मोदी ने लद्दाख में चीन से विवाद पर बयान जारी किया है. पीएम मोदी ने कहा है कि जिन जवानों की शहादत हुई है, वो व्यर्थ नहीं जाएगी. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हमें अपने जवानों पर गर्व करना चाहिए, वे मारते-मारते मरे हैं। 
भारत का साफ शब्दों में संदेश  है कि अगर किसी ने भी हमारी जमीन की तरफ आंख उठा के देखा तो उसकी आंखे फोड़ दी जाएंगी। खैर बैठकों का दौर जारी है गृह मंत्री विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री इस मुद्दों को लेकर काफी गंभीर है। तीनो सेनाओं के चीफ और सीडीएस से बातचीत हुई है सेना को खुली छूट मिल गई है और सबको अलर्ट कर दिया गया है जवानों की छुट्टियां रद्द कर दी गई है। मातृभूमि पुकार रही है शत्रुओं का नाश करो..