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Tuesday, October 31, 2023

श्री राम जन्मभूमि मंदिर विवाद: संपूर्ण घटनाक्रम पर एक नजर

1528 : अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे हिन्दू भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं। मुगल बाबर ने यह मस्जिद बनवाई थी, जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था। मुगल बादशाह बाबर के के कमांडर मीर बाकी ने बाबरी का निमार्ण कराया था।

1853: हिन्दुओं का आरोप है कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ। हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा

1859: ब्रिटिश सरकार ने तारों की एक बाड़ खड़ी करके विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिन्दुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दे दी

1885 : मामला पहली बार अदालत में पहुंचा। महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे एक राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की अदालत ने याचिका खारिज कर दी थी।

1934 : अयोध्या में एक बार फिर दंगे हुए और मस्जिद के कुछ हिस्सों को नुकसान भी पहुंचाया गया। बाद में राज्य सरकार के खर्च पर मस्जिद में सुधार कर दिया गया।

1949: विवादित ढांचे के बाहर केंद्रीय गुंबद में रामलला की मूर्तियां स्थापित की गई।

1950: रामालला की मूर्तियों की पूजा का अधिकार हासिल करने के लिए गोपाल  विशारद ने फैजाबाद जिला अदालत में याचिका दायर की।

1950: परमहंस रामचंद्र दास ने पूजा जारी रखने और मूर्तियां रखने के लिए याचिका दायर की।

1959: निर्मोही अखाड़ा ने जमीन अधिकार दिए जाने के लिए याचिका दायर की।

1961: उत्तर प्रदेश सुन्नी केंद्रीय वक्फ बोर्ड ने स्थल पर अधिकार के लिए याचिका दायर की।

1984: विश्व हिंदू परिषद ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने और राम जन्म स्थान को स्वतंत्र कराने व एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया।

1 फरवरी 1986 : स्थानीय अदालत ने सरकार को पूजा के लिए हिंदू श्रद्धालुओं के लिए स्थान खोलने का आदेश दिया।
विरोध में बाबरी एक्शन कमेटी का गठन।
 
1989: भाजपा का वीएचपी को औपचारिक समर्थन जुलाई में भगवान " रामलला विराजमान" नाम से पांचवा मुकदमा दाखिल।
1989: राजीव गांधी की सरकार ने बाबरी मस्जिद या नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी।

14 अगस्त 1989 : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित ढांचे के लिए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।

सितंबर,1990: लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली। सांप्रदायिक दंगे हुए । नवंबर में आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार किया गया। भाजपा ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस लिया।

अक्टूबर,1991: कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद के आस पास की 2.77 एकड़ भूमि को अपने अधिकार में लिया।

6 दिसंबर 1992: हजारों में की संख्या में कर सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद को ढहा दिया। एक अस्थायी राम मंदिर का निर्माण किया..!
16 दिसंबर 1992:  मस्जिद की तोड़ फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन।

3 अप्रैल 1993: विवादित स्थल में जमीन अधिग्रहण के लिए केंद्र ने 'अयोध्या में निश्चित क्षेत्र अधिग्रहण कानून' पारित किया। अधिनियम के विभिन्न पहलुओं को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कई रिट याचिकाएं दायर की गईं। इनमें इस्माइल फारूकी की याचिका भी शामिल। उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 139ए के तहत अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर रिट याचिकाओं को स्थानांतरित कर दिया जो उच्च न्यायालय में लंबित थीं।

 24 अक्टूबर 1994 : उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक इस्माइल फारूकी मामले में कहा कि मस्जिद इस्लाम से जुड़ी हुई नहीं है।

जनवरी 2002: अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यकाल में एक अयोध्या विभाग शुरू किया जिसका काम विवाद को सुलझाने के लिए दोनो पक्षों से बातचीत करना था।

अप्रैल 2002 : उच्च न्यायालय में विवादित स्थल के मालिकाना हक को लेकर सुनवाई शुरू।

मार्च -अगस्त,2003:  13 मार्च को  न्यायालय ने असलम उर्फ भूरे मामले में कहा, अधिग्रहित स्थल पर किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधि की अनुमति नहीं है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर  भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दावा था कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष मिले।

 जुलाई ,2009: लिब्रहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी 

30 सितम्बर 2010 : उच्चतम न्यायालय ने 2:1 बहुमत से विवादित क्षेत्र को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच तीन हिस्सों में बांटने का आदेश दिया।

9 मई 2011: उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या जमीन विवाद में उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाई।

21 मार्च 2017: सीजेआई जेएस खेहर ने संबंधित पक्षों के बीच अदालत के बाहर समाधान का सुझाव दिया।

7 अगस्त 2017 : उच्चतम न्यायालय ने तीन सदस्यीय पीठ का गठन किया जिसने 1994 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की।

8 फरवरी 2018 : सिविल याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई शुरू की।

20 जुलाई 2018 : उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा।

27 सितम्बर 2018 : उच्चतम न्यायालय ने मामले को पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष भेजने से इनकार किया। मामले की सुनवाई 29 अक्टूबर को तीन सदस्यीय नई पीठ द्वारा किए जाने की बात कहीं।

29 अक्टूबर 2018: उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई उचित पीठ के समक्ष जनवरी के पहले हफ्ते में तय की जो सुनवाई के समय पर निर्णय करेंगी।

24 दिसम्बर 2018 : उच्चतम न्यायालय ने सभी मामलों पर चार जनवरी 2019 को सुनवाई करने का फैसला किया।

4 जनवरी 2019 : उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मालिकाना हक मामले में सुनवाई की तारीख तय करने के लिए उसके द्वारा गठित उपयुक्त पीठ दस जनवरी को फैसला सुनाएगी।

8 जनवरी 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ का गठन किया जिसकी अध्यक्षता प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने की। इसमें न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति एनवी रमन्ना, न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ शामिल थे।

10 जनवरी 2019 : न्यायमूर्ति यूयू ललित ने मामले से खुद को अलग किया जिसके बाद उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई 29 जनवरी को नई पीठ के समक्ष तय की।

25 जनवरी 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मामले की सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ का पुनर्गठन किया। नई पीठ में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एसए नजीर शामिल थे।

29 जनवरी 2019 : केंद्र ने विवादित स्थल के आसपास 67 एकड़ अधिग्रहीत भूमि मूल मालिकों को लौटाने की अनुमति मांगने के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 26 फरवरी 

2019 : उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता का सुझाव दिया और फैसले के लिए पांच मार्च की तारीख तय की जिसमें मामले को अदालत की तरफ से नियुक्त मध्यस्थ के पास भेजा जाए अथवा नहीं इस पर फैसला लिया जाएगा। 

8 मार्च 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता के लिए विवाद को एक समिति के पास भेज दिया जिसके अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एफएम आई कलीफुल्ला बनाए गए।

9 अप्रैल 2019: निर्मोही अखाड़े ने अयोध्या स्थल के आसपास की अधिग्रहीत जमीन को मालिकों को लौटाने की केन्द्र की याचिका का उच्चतम न्यायालय में विरोध किया।

10 मई 2019: मध्यस्थता प्रक्रिया को पूरा करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने 15 अगस्त तक की समय सीमा बढ़ाई।

11 जुलाई 2019 : उच्चतम न्यायालय ने 'मध्यस्थता की प्रगति' पर रिपोर्ट मांगी।

18 जुलाई 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति देते हुए एक अगस्त तक परिणाम रिपोर्ट देने के लिए कहा।

1 अगस्त 2019 : मध्यस्थता की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को दी गई। 2 अगस्त 2019 : उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता नाकाम होने पर छह अगस्त से रोजाना सुनवाई का फैसला किया।

6 अगस्त 2019 : उच्चतम न्यायालय ने रोजाना के आधार पर भूमि विवाद पर सुनवाई शुरू की। 4 अक्टूबर 2019: अदालत ने कहा कि 17 अक्टूबर तक सुनवाई पूरी कर 17 नवम्बर तक फैसला सुनाया जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कहा।

16 अक्टूबर 2019 : उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा।

19 नवम्बर 2109: उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या में पूरी 2.77 एकड़ विवादित जमीन राम लला को दी, जमीन का कब्जा केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगा। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को मुस्लिमों को मस्जिद बनाने के लिए एक मुनासिब स्थान पर पांच एकड़ भूमि आवंटित करने का भी निर्देश दिया।

स्रोत: राष्ट्रीय सहारा अखबार, बीबीसी हिंदी, पीटीआई आदि

Wednesday, July 7, 2021

इस्लामिक कट्टरपंथियों को मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी है

बहुत दिनों से लिखने का कुछ मन ही नही कर रहा था क्या लिखूं क्या नही लिखूं? बड़ा ही गजब का माहौल चल रहा है देश में। श्रीराम को काल्पनिक कहने वाले उन्हे न्याय दिलाने का झूठा ढकोसला करने लगे है।  तरह-तरह के प्रपंच रचे जा रहे है। सत्ता की तड़प इतनी है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता को तहस नहस करने की साजिश रची जा रही है। देश के विकास मार्ग में बाधा बन रहे शत्रुओं का विनाश जरूरी हो गया है। आखिर कब तक भारत विरोधी एजेंडा चलता रहेगा और मौन होकर देखते रहेंगे? कोई आदिल आदित्य बनकर लव जिहाद करता है हिंदू लड़कियों की जिंदगी बर्बाद हो जाती है इसके खिलाफ किसी ने बोला तो पूरा विपक्ष हाय हाय करके लोकतंत्र की दुहाई देने लग जाता है और सेक्युलरिज्म का ढोंग रचता है। इन तथाकथित लोगो को एक लड़की की इज्जत नहीं दिखती है ये सिर्फ अपना मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने में लगे हुए है। धर्मांतरण का नंगा नाच चल रहा है जहा हिन्दू लड़कियों के साथ आए दिन लव जिहाद हो रहा है। पहले नाम छिपाकर शादी की जाती है और बाद में जबरन इस्लाम कबूल करवाया जाता है।
मदरसों में क्या कम धूमगजड़ मची है वहा तो आए दिन खबर निकलती है की 45 साल मौलवी ने 12 साल के बच्चे या बच्चियों का रेप किया। यह कैसी मजहबी  शिक्षा दी जा रही है मदरसो में जहा ये  हैवान मासूमों की जिंदगी बर्बाद कर रहे है। यहां कोई लिबरल क्रांतकारी पत्रकार  क्यों नही दिख रहे है ? क्यों नही इनकी सच्चाई दुनिया के सामने ला रहे है? वैसे देखा जाय तो मदरसों में बम बनाने ट्रेनिंग दी जाती है। सांप्रदायिक शिक्षा के नाम पर देशभर में संचालित मदरसे केवल अपनी कट्टरवादी तालीम के लिए ही बदनाम नहीं है, बल्कि हिंसक गतिविधियों एवं विस्फोटक सामग्री के भंडारण केंद्र होने के आरोप पहले भी मदरसों पर लगते रहे हैं। खबरों में सत्य तो दिख ही जाता है जब बम बनाते हुए मदरसे में ब्लास्ट हो जाता है जिसकी गूंज सबको सुनाई और चीथड़ो में पड़ी जिहादियो की लाश दिखाई देती है और । इन अवैध प्रयोगशालाओं के ऊपर जितना जल्दी हो  प्रतिबंध लगा देना चाहिए सरकार को  नही तो ये इसी तरह की आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते रहेंगे।

वहा कश्मीर में बैठा अब्दुल गजवा ए हिन्द की साजिश रचता है। रेहड़ी लगाने वाला अब्दुल खुद को बॉम्ब से उड़ा देने का
दम भरता है क्योंकि उसे यकीन है कि मरने के बाद  जन्नत नसीब होगी और बहत्तर हूरो से मुलाकात। अब्दुल का लड़का भी इसी नक्शे कदम पर चलता है और इनका जो लीडर होता है वातानुकूलित कमरे में बैठकर मजा लेते है। इनके बच्चे विदेश घूमते है और अब्दुल का लड़का सड़क पर पंचर ही बनाता है जिन्दगी भर जबतक उसे आका का फरमान ना आ जाय की कुर्बनी देनी है। अब्दुल जिहाद करता है उसके जीवन का एक ही मकसद है सिर्फ जिहाद और जिहाद! कहा जाता है की आतंकवाद का कोई धर्म या मजहब नहीं होता है तो फिर आंतकियो को मरने के बाद दफनाया क्यों जाता है ? क्या इनको समुद्र में नही फेंक देना चाहिए ताकि ये जलजीवो का निवाला बन सके ! 

 जब से अनुच्छेद 370 और 35A निष्क्रिय हुआ है जम्मू कश्मीर में तब से कुछ लोगो का दुकान ही बंद हो गया है। ऐसा लग रहा है कि भूखों मर रहे है और कोई पानी तक ना दे रहा है इनको। कुछ दो कौड़ी के नेता 370 को वापस लागू करने की बात करते है जिसकी जितनी कड़ी भर्त्सना की जाए कम है। सिर्फ निंदा करने से कुछ नही होगा इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए । कुछ तो ऐसे है जो चीन की मदद से 370 की बहाली की बात कर रहे थे क्या ऐसे लोगो का मुंह नही तोड़ देना चाहिए? कुछ रद्दी लोग 370 को रद्द करने से नाराज है और पाकिस्तान से बात करने की बाते करते है। इनकी छटपटाहट साफ देखी जा सकती है जो लूट मचाकर रखा था इन लोगो सब बंद हो गया। पत्थरबाजी और आगजनी कश्मीर में खुलेआम होती थी सुरक्षा बलो पर और हाथ में राइफल होते हुए भी जवान पत्थर का जवाब गोली से नहीं दे सकता था। पत्थरबाजो को भटका हुआ नौजवान कहा जाता था जो पैसे लेकर ये सब करते थे। जब से 370 हटा है इन पत्थरबाज जिहादियों नामो निशान मिट गया है।तथाकथित लेफ्ट विंग मीडिया ,पत्रकार और विपक्ष के नेताओ ने कोई कसर नही छोड़ी है भारत और भारतीय सेना को बदनाम करने में। क्या-क्या आरोप नही लगा सुरक्षा बलो और सेना के जवानों पर कोई हत्यारा कहता तो कोई बलात्कारी। चुल्लू भर पानी डूब मरना चाहिए ऐसे नीच लोगो को जो देश के रक्षकों के ऊपर सवाल उठाते रहे है ऐसे लोगो के जीने का कोई अधिकार नही है।

सांप फुफकार रहा है तो उसके फन कुचल देना चाहिए वरना ऐसा विष फैलेगा की सांस लेने का भी वक्त नही मिलेगा और प्राण पखेरू उड़ जायेंगे। जैसे तो तैसा करने में ही भलाई है। बहुत हो चुकी है शांति और अमन की आशा वाली बाते। जो बोली से नही सुधरेगा उसे गोली से जवाब से देना चाहिए।

Thursday, August 6, 2020

भारत के निर्माण का शुभारम्भ हो चुका है।


( 5 अगस्त 2020, को श्रीराम मंदिर निर्माण कार्य शुभारंभ कार्यक्रम में पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अपने विचार व्यक्त  किए )
 
श्रद्धेय महंत नृत्यगोपाल जी महाराज सहित उपस्थित सभी संत चरण, भारत के आदरणीय और जनप्रिय प्रधानमंत्री जी, उत्तर प्रदेश की मा. राज्यपाल जी, उत्तर प्रदेश के मा. मुख्यमंत्री जी, सभी नागरिक सज्जन माता-भगिनी।
 
आज आनंद का क्षण है, बहुत प्रकार से आनंद है। हम सबने एक संकल्प लिया था। मुझे स्मरण है कि तब के हमारे संघ के सरसंघचालक बाला साहब देवरस जी ने, हम सबको आगे कदम बढ़ाने से पहले यह बात याद दिलाई थी कि बहुत परिश्रम के साथ बीस-तीस साल काम करना पड़ेगा, तब कभी ये काम संपन्न होगा। हमने बीस-तीस साल काम किया, तीसवें साल के प्रारंभ में हमें संकल्प पूर्ति का आनंद मिल रहा है। सबने जी जान से प्रयास किये एवं उनमें से अनेक लोगों ने बलिदान भी दिए। वे सब आज सूक्ष्म रूप में यहाँ उपस्थित हैं। ऐसे भी अनेकों हैं जो प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं हो सकते, परिस्थिति के कारण वे यहाँ आ नहीं पाये। रथ यात्रा का नेतृत्व करने वाले अडवानी जी अपने घर पर बैठ कर इस कार्यक्रम को देख रहे होंगे। कितने ही लोग ऐसे हैं जो आ भी सकते हैं पर परिस्थिति ही ऐसी है कि बुलाये नहीं जा सकते। वो भी अपनी-अपनी जगह से इस कार्यक्रम को देख रहे होंगे। मैं पूरे देश में देख रहा हूँ कि आनंद की लहर है, सदियों की आस पूरी होने का आनंद है।
 
लेकिन आज सबसे बड़ा आनंद है, भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जिस आत्मविश्वास की आवश्यकता थी और जिस आत्मभान की आवश्यकता थी, उसका सगुण-साकार अधिष्ठान बनने का शुभारंभ आज हो रहा है। वह अधिष्ठान है उस आध्यामिक दृष्टि का, “सिया राममय सब जग जानहि”। सारे जगत को अपने में देखने और स्वयं में जगत को देखने की भारत की दृष्टि। इसी कारण से भारत के प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार आज भी विश्व में सबसे अधिक सज्जनता का व्यवहार होता है और इस देश का सबके साथ सामूहिक व्यवहार वसुधैव कुटुम्बकम का होता है। ऐसा स्वभाव और इसके साथ-साथ अपने कर्तव्य का निर्वाह, व्यवहारिक जगत की माया की सभी दुविधाओं में से रास्ते निकालते हुए, जितना संभव हो सके सबको साथ लेकर चलने की जो एक विधि बनती है, उसका अधिष्ठान आज यहाँ पर बन रहा है। परम वैभव संपन्न और सबका कल्याण करने वाले भारत के निर्माण का शुभारंभ आज उन हाथों से हो रहा है जिनके पास इस निर्माण के व्यवस्था-तंत्र का नेतृत्व है ये और भी आनंद की बात है।
आज सभी का स्मरण हो रहा है, और स्वाभाविक विचार भी आता है, कि अशोक जी आज यहाँ रहते तो कितना अच्छा होता, पू. महंत परमहंस दास जी आज होते तो कितना अच्छा होता। लेकिन उसकी जो इच्छा होती है वैसा ही होता है। परंतु मेरा यह विश्वास है कि जो यहाँ हैं वो अपने मन से और जो नहीं हैं वो सूक्ष्म रूप से आज यहाँ उस आनंद को ना केवल उठा रहे हैं अपितु उस आनंद को शतगुणित भी कर रहे हैं। इस आनंद में एक स्फुरण है, एक उत्साह है- हम कर सकते हैं, हमको करना है, यही करना है।
 
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः
हमें सबको जीवन जीने की शिक्षा देनी है। अभी कोरोना का दौर चल रहा है, सारा विश्व अंर्तमुख हो गया है एवं विचार कर रहा है कि कहाँ गलती हुई और आगे का रास्ता कैसे निकलेगा।
 
दो रास्तों को उसने देख लिया और वह विचार कर रहा है कि क्या कोई तीसरा रास्ता भी है? हाँ है ! ये मार्ग हमारे पास है। हम दे सकते हैं और इस मार्ग को दिखाने का काम हमको ही करना है। उसकी तैयारी करने के संकल्प करने का भी आज दिवस है। उसके लिए आवश्यक तप पुरुषार्थ हमने किया है। प्रभु श्रीराम के जीवन से लेकर आज तक अगर हम देखेंगे तो पायेंगे कि वो सारा पुरुषार्थ, पराक्रम, वीरवृत्ति हमारे रग-रग में है। हमने उसको खोया नहीं है, वो हमारे पास ही है। हम शुरू करेंगे तो हो जाएगा। इस प्रकार का विश्वास और प्रेरणा का स्फुरण आज हमको इस दिन से मिलता है और सभी भारतवासियों को मिलता है, कोई भी अपवाद नहीं है क्योंकि सबके राम हैं और सबमें राम हैं।
 
अब यहाँ भव्य मंदिर बनेगा, सारी प्रक्रिया शुरू हो गई है एवं दायित्व बाँटे गए हैं। जिनका जो काम है वो करेंगे। उस समय हम सब लोगों को क्या काम रहेगा ? हम सब लोगों को अपने मन की अयोध्या को सजाना और संवारना है। इस भव्य कार्य के लिए प्रभु श्रीराम जिस ‘धर्म‘ के विग्रह माने जाते हैं- वह जोड़ने वाला, धारण करने वाला, ऊपर उठाने वाला, सबकी उन्नति करने वाला धर्म और सबको अपना मानने वाला धर्म, उस धर्म की ध्वजा को अपने कंधे पर लेकर संपूर्ण विश्व को सुख-शांति देने वाला भारत हम खड़ा कर सकें, इसलिए हम सबको अपने मन की अयोध्या को बनाना है। यहाँ पर जैसे-जैसे मंदिर बनेगा, मन की अयोध्या भी साथ-साथ बनती चली जानी चाहिए। और इस मंदिर के पूर्ण होने से पहले हमारा मन मंदिर भी बनकर तैयार रहना चाहिए, इसकी आवश्यकता है।
 
यह मन मंदिर कैसा रहेगा, तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में बताया है –
 
काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥
जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई।प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥

हमारा हृदय भी राम का बसेरा होना चाहिए। सभी दोषों से, विकारों से, द्वेषों से एवं शत्रुता से मुक्त हो कर दुनिया की माया कैसी भी हो उस में सब प्रकार के व्यवहार करने के लिए समर्थ। हृदय से सब प्रकार के भेदों को तिलांजलि देकर, केवल अपने देशवासी ही नहीं अपितु संपूर्ण जगत को अपनाने की क्षमता रखने वाला इस देश का व्यक्ति, और ऐसा समाज गढ़ने का यह काम है। इस समाज को गढ़ने के काम का एक सगुण साकार प्रतीक, वो यहाँ खड़ा होने वाला है। यह प्रतीक हम सबको सदैव प्रेरणा देता रहेगा। भव्य राम मंदिर को बनाने का कार्य भारतवर्ष के लाखों अन्य मंदिरों के समान केवल एक और मंदिर बनाने का काम नहीं है अपितु देश के सारे मंदिरों में स्थापित मूर्तियों का जो आशय है, उस आशय के पुनर्प्रकटीकरण और उसके पुनर्स्थापन करने का शुभारंभ आज यहाँ बहुत ही समर्थ हाथों से हुआ है। इस मंगल अवसर पर, आनंद के इस क्षण में मैं आप सबका अभिनंदन करता हूँ और इस समय मेरे मन में जो विचार आए उसको आपके चिंतन के लिए आप सबके सामने रखता हुआ आप सब से विदा लेता हूं।
 
बहुत-बहुत धन्यवाद

“जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि”॥

(5 अगस्त 2020, अयोध्या में माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने राम मंदिर भूमि पूजन के शुभ अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए।)

सियावर रामचंद्र की जय!

जय सियाराम।

जय सियाराम।

आज ये जयघोष सिर्फ सियाराम की नगरी में ही नहीं सुनाई दे रहा बल्कि इसकी गूंज पूरे विश्व भर में है। सभी देशवासियों को और विश्व भर में फैले करोड़ों भारत भक्तों को, राम भक्तों को, आज के इस पवित्र अवसर की कोटि-कोटि बधाई।

मंच पर विराजमान यूपी की गवर्नर श्रीमती आनंदीबेन पटेल जी, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, पूज्य नृत्य गोपालदास जी महाराज और हम सभी के श्रद्धेय श्री मोहन भागवत जी, ये मेरा सौभाग्य है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मुझे आमंत्रित किया, इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने का अवसर दिया। मैं इसके लिए हृदय पूर्वक श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का आभार व्यक्त करता हूं।

राम काजु कीन्हे बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥

भारत, आज,भगवान भास्कर के सानिध्य में सरयू के किनारे एक स्वर्णिम अध्याय रच रहा है। कन्याकुमारी से क्षीरभवानी तक, कोटेश्वर से कामाख्या तक, जगन्नाथ से केदारनाथ तक, सोमनाथ से काशी विश्वनाथ तक, सम्मेद शिखर से श्रवणबेलगोला तक, बोधगया से सारनाथ तक, अमृतसर से पटना साहिब तक, अंडमान से अजमेर तक, लक्ष्यद्वीप से लेह तक, आज पूरा भारत,राममय है। पूरा देश रोमांचित है, हर मन दीपमय है। आज पूरा भारत भावुक भी है। सदियों का इंतजार आज समाप्त हो रहा है। करोड़ों लोगों को आज ये विश्वास ही नहीं हो रहा कि वो अपने जीते-जी इस पावन दिन को देख पा रहे हैं।

साथियों,

बरसों से टाट और टेंट के नीचे रह रहे हमारे रामलला के लिए अब एक भव्य मंदिर का निर्माण होगा। टूटना और फिर उठ खड़ा होना, सदियों से चल रहे इस व्यतिक्रम से रामजन्मभूमि आज मुक्त हो गई है। मेरे साथ फिर एक बार बोलिए, जय सियाराम, जय सियाराम!!!

साथियों,

हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के समय कई-कई पीढ़ियों ने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया था। गुलामी के कालखंड में कोई ऐसा समय नहीं था जब आजादी के लिए आंदोलन न चला हो, देश का कोई भूभाग ऐसा नहीं था जहां आजादी के लिए बलिदान न दिया गया हो। 15 अगस्त का दिन उस अथाह तप का, लाखों बलिदानों का प्रतीक है, स्वतंत्रता की उस उत्कंठ इच्छा, उस भावना का प्रतीक है। ठीक उसी तरह, राम मंदिर के लिए कई-कई सदियों तक, कई-कई पीढ़ियों ने अखंड अविरत एक-निष्ठ प्रयास किया है। आज का ये दिन उसी तप, त्याग और संकल्प का प्रतीक है।

राम मंदिर के लिए चले आंदोलन में अर्पण भी था तर्पण भी था, संघर्ष भी था, संकल्प भी था। जिनके त्याग, बलिदान और संघर्ष से आज ये स्वप्न साकार हो रहा है, जिनकी तपस्या राममंदिर में नींव की तरह जुड़ी हुई है, मैं उन सब लोगों को आज नमन करता हूँ, उनका वंदन करता हूं। संपूर्ण सृष्टि की शक्तियां, राम जन्मभूमि के पवित्र आंदोलन से जुड़ा हर व्यक्तित्व, जो जहां है, इस आयोजन को देख रहा है, वो भाव-विभोर है, सभी को आशीर्वाद दे रहा है।

साथियों,

राम हमारे मन में गढ़े हुए हैं, हमारे भीतर घुल-मिल गए हैं। कोई काम करना हो, तो प्रेरणा के लिए हम भगवान राम की ओर ही देखते हैं। आप भगवान राम की अद्भुत शक्ति देखिए। इमारतें नष्ट कर दी गईं, अस्तित्व मिटाने का प्रयास भी बहुत हुआ, लेकिन राम आज भी हमारे मन में बसे हैं, हमारी संस्कृति का आधार हैं। श्रीराम भारत की मर्यादा हैं, श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।

इसी आलोक में अयोध्या में राम जन्मभूमि पर, श्री राम के इस भव्य-दिव्य मंदिर के लिए भूमिपूजन हुआ है। यहां आने से पहले, मैंने हनुमानगढ़ी का दर्शन किया। राम के सब काम हनुमान ही तो करते हैं। राम के आदर्शों की कलियुग में रक्षा करने की जिम्मेदारी भी हनुमान जी की ही है। हनुमान जी के आशीर्वाद से श्री राममंदिर भूमिपूजन का ये आयोजन शुरू हुआ है।

साथियों,

श्रीराम का मंदिर हमारी संस्कृति का आधुनिक प्रतीक बनेगा, हमारी शाश्वत आस्था का प्रतीक बनेगा, हमारी राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बनेगा, और ये मंदिर करोड़ों-करोड़ लोगों की सामूहिक संकल्प शक्ति का भी प्रतीक बनेगा। ये मंदिर आने वाली पीढ़ियों को आस्था, श्रद्धा, और संकल्प की प्रेरणा देता रहेगा। इस मंदिर के बनने के बाद अयोध्या की सिर्फ भव्यता ही नहीं बढ़ेगी, इस क्षेत्र का पूरा अर्थतंत्र भी बदल जाएगा। यहां हर क्षेत्र में नए अवसर बनेंगे, हर क्षेत्र में अवसर बढ़ेंगे। सोचिए, पूरी दुनिया से लोग यहां आएंगे, पूरी दुनिया प्रभु राम और माता जानकी का दर्शन करने आएगी। कितना कुछ बदल जाएगा यहां।

साथियों,

राममंदिर के निर्माण की ये प्रक्रिया, राष्ट्र को जोडऩे का उपक्रम है। ये महोत्सव है- विश्वास को विद्यमान से जोड़ने का। नर को नारायण से, जोड़ने का। लोक को आस्था से जोड़ने का। वर्तमान को अतीत से जोड़ने का। और स्वं को संस्कार से जोडऩे का। आज के ये ऐतिहासिक पल युगों-युगों तक, दिग-दिगन्त तक भारत की कीर्ति पताका फहराते रहेंगे। आज का ये दिन करोड़ों रामभक्तों के संकल्प की सत्यता का प्रमाण है।

आज का ये दिन सत्य, अहिंसा, आस्था और बलिदान को न्यायप्रिय भारत की एक अनुपम भेंट है। कोरोना से बनी स्थितियों के कारण भूमिपूजन का ये कार्यक्रम अनेक मर्यादाओं के बीच हो रहा है। श्रीराम के काम में मर्यादा का जैसा उदाहरण प्रस्तुत किया जाना चाहिए, देश ने वैसा ही उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसी मर्यादा का अनुभव हमने तब भी किया था जब माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। हमने तब भी देखा था कि कैसे सभी देशवासियों ने शांति के साथ, सभी की भावनाओं का ध्यान रखते हुए व्यवहार किया था। आज भी हम हर तरफ वही मर्यादा देख रहे हैं।

साथियों,

इस मंदिर के साथ सिर्फ नया इतिहास ही नहीं रचा जा रहा, बल्कि इतिहास खुद को दोहरा भी रहा है। जिस तरह गिलहरी से लेकर वानर और केवट से लेकर वनवासी बंधुओं को भगवान राम की विजय का माध्यम बनने का सौभाग्य मिला, जिस तरह छोटे-छोटे ग्वालों ने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने में बड़ी भूमिका निभाई, जिस तरहमावले, छत्रपति वीर शिवाजी कीस्वराज स्थापना के निमित्त बने, जिस तरह गरीब-पिछड़े, विदेशी आक्रांताओं के साथ लड़ाई में महाराजा सुहेलदेव के संबल बने, जिस तरह दलितों-पिछ़ड़ों-आदिवासियों, समाज के हर वर्ग ने आजादी की लड़ाई में गांधी जी को सहयोग दिया, उसी तरह आज देशभर के लोगों के सहयोग से राम मंदिर निर्माण का ये पुण्य-कार्य प्रारंभ हुआ है।

जैसे पत्थरों पर श्रीराम लिखकर रामसेतु बनाया गया, वैसे ही घर-घर से, गांव-गांव से श्रद्धापूर्वक पूजी शिलाएं, यहां ऊर्जा का स्रोत बन गई हैं। देश भर के धामों और मंदिरों से लाई गई मिट्टी और नदियों का जल, वहां के लोगों, वहां की संस्कृति और वहां की भावनाएं, आज यहां की शक्ति बन गई हैं। वाकई, ये न भूतो न भविष्यति है। भारत की आस्था, भारत के लोगों की सामूहिकता की ये अमोघ शक्ति, पूरी दुनिया के लिए अध्ययन का विषय है,शोध का विषय है।

साथियों,

श्रीरामचंद्र को तेज में सूर्य के समान, क्षमा में पृथ्वी के तुल्य, बुद्धि में बृहस्पति के सदृश्य और यश में इंद्र के समान माना गया है। श्रीराम का चरित्र सबसे अधिक जिस केंद्र बिंदु पर घूमता है, वो है सत्य पर अडिग रहना। इसीलिए ही श्रीराम संपूर्ण हैं। इसलिए ही वो हजारों वर्षों से भारत के लिए प्रकाश स्तंभ बने हुए हैं। श्रीराम ने सामाजिक समरसता को अपने शासन की आधारशिला बनाया था। उन्होंने गुरु वशिष्ठ से ज्ञान, केवट से प्रेम, शबरी से मातृत्व, हनुमानजी एवं वनवासी बंधुओं से सहयोग और प्रजा से विश्वास प्राप्त किया।

यहां तक कि एक गिलहरी की महत्ता को भी उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। उनका अद्भुत व्यक्तित्व, उनकी वीरता, उनकी उदारता उनकी सत्यनिष्ठा, उनकी निर्भीकता, उनका धैर्य, उनकी दृढ़ता, उनकी दार्शनिक दृष्टि युगों-युगों तक प्रेरित करते रहेंगे। राम प्रजा से एक समान प्रेम करते हैं लेकिन गरीबों और दीन-दुखियों पर उनकी विशेष कृपा रहती है। इसलिए तो माता सीता, राम जी के लिए कहती हैं-

दीन दयाल बिरिदु संभारी

यानि जो दीन है, जो दुखी हैं, उनकी बिगड़ी बनाने वाले श्रीराम हैं।

साथियों,

जीवन का ऐसा कोई पहलू नहीं है, जहां हमारे राम प्रेरणा न देते हों। भारत की ऐसी कोई भावना नहीं है जिसमें प्रभु राम झलकते न हों। भारत की आस्था में राम हैं, भारत के आदर्शों में राम हैं! भारत की दिव्यता में राम हैं, भारत के दर्शन में राम हैं! हजारों साल पहले वाल्मीकि की रामायण में जो राम प्राचीन भारत का पथ प्रदर्शन कर रहे थे, जो राम मध्ययुग में तुलसी, कबीर और नानक के जरिए भारत को बल दे रहे थे, वही राम आज़ादी की लड़ाई के समय बापू के भजनों में अहिंसा और सत्याग्रह की शक्ति बनकर मौजूद थे! तुलसी के राम सगुण राम हैं, तो नानक और कबीर के राम निर्गुण राम हैं!

भगवान बुद्ध भी राम से जुड़े हैं तोसदियों से ये अयोध्या नगरी जैन धर्म की आस्था का केंद्र भी रही है। राम की यही सर्वव्यापकता भारत की विविधता में एकता का जीवन चरित्र है! तमिल में कंब रामायण तो तेलगू में रघुनाथ और रंगनाथ रामायण हैं। उड़िया में रूइपाद-कातेड़पदी रामायण तो कन्नड़ा में कुमुदेन्दु रामायण है। आप कश्मीर जाएंगे तो आपको रामावतार चरित मिलेगा, मलयालम में रामचरितम् मिलेगी। बांग्ला में कृत्तिवास रामायण है तो गुरु गोबिन्द सिंह ने तो खुद गोबिन्द रामायण लिखी है। अलग अलग रामायणों में, अलग अलग जगहों पर राम भिन्न-भिन्न रूपों में मिलेंगे, लेकिन राम सब जगह हैं, राम सबके हैं। इसीलिए, राम भारत की ‘अनेकता में एकता’ के सूत्र हैं।

साथियों,

दुनिया में कितने ही देश राम के नाम का वंदन करते हैं, वहां के नागरिक, खुद को श्रीराम से जुड़ा हुआ मानते हैं। विश्व की सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या जिस देश में है, वो है इंडोनेशिया। वहां हमारे देश की ही तरह ‘काकाविन’रामायण, स्वर्णद्वीप रामायण, योगेश्वर रामायण जैसी कई अनूठी रामायणें हैं। राम आज भी वहांपूजनीय हैं। कंबोडिया में ‘रमकेर’रामायण है, लाओ में ‘फ्रा लाक फ्रा लाम’ रामायण है, मलेशिया में ‘हिकायत सेरी राम’तो थाईलैंड में ‘रामाकेन’है! आपको ईरान और चीन में भी राम के प्रसंग तथा राम कथाओं का विवरण मिलेगा।

श्रीलंका में रामायण की कथा जानकी हरण के नाम सुनाई जाती है, और नेपाल का तो राम से आत्मीय संबंध, माता जानकी से जुड़ा है। ऐसे ही दुनिया के और न जाने कितने देश हैं, कितने छोर हैं, जहां की आस्था में या अतीत में, राम किसी न किसी रूप में रचे बसे हैं! आज भी भारत के बाहर दर्जनों ऐसे देश हैं जहां, वहां की भाषा में रामकथा, आज भी प्रचलित है। मुझे विश्वास है कि आज इन देशों में भी करोड़ों लोगों को राम मंदिर के निर्माण का काम शुरू होने से बहुत सुखद अनुभूति हो रही होगी। आखिर राम सबके हैं, सब में हैं।

साथियों,

मुझे विश्वास है कि श्रीराम के नाम की तरह ही अयोध्या में बनने वाला ये भव्य राममंदिर भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत का द्योतक होगा। मुझे विश्वास है कि यहां निर्मित होने वाला राममंदिर अनंतकाल तक पूरी मानवता को प्रेरणा देगा। इसलिए हमें ये भी सुनिश्चित करना है कि भगवान श्रीराम का संदेश, राममंदिर का संदेश, हमारी हजारों सालों की परंपरा का संदेश, कैसे पूरे विश्व तक निरंतर पहुंचे। कैसे हमारे ज्ञान, हमारी जीवन-दृष्टि से विश्व परिचित हो, ये हमारी, हमारी वर्तमान और भावी पीढ़ियों की ज़िम्मेदारी है। इसी को समझते हुए, आज देश में भगवान राम के चरण जहां जहां पड़े, वहाँ राम सर्किट का निर्माण किया जा रहा है!

अयोध्या तो भगवान राम की अपनी नगरी है! अयोध्या की महिमातो खुद प्रभु श्रीराम ने कही है-

जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि

यहां राम कह रहे हैं- मेरी जन्मभूमि अयोध्या अलौकिक शोभा की नगरी है। मुझे खुशी कि आजप्रभु राम की जन्मभूमि की भव्यता, दिव्यता बढ़ाने के लिए कई ऐतिहासिक काम हो रहे हैं!


साथियों,


हमारे यहां शास्त्रों में कहा गया है-“न्राम सदृशो राजा, प्रथिव्याम् नीतिवान् अभूत”॥ यानि कि, पूरी पृथ्वी पर श्रीराम के जैसा नीतिवान शासक कभी हुआ ही नहीं! श्रीराम की शिक्षा है-“नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना”॥ कोई भी दुखी न हो, गरीब न हो। श्रीराम का सामाजिक संदेश है- “प्रहृष्ट नर नारीकः,समाज उत्सव शोभितः”॥ नर-नारी सभी समान रूप से सुखी हों। श्रीराम का निर्देश है- “कच्चित् ते दयितः सर्वे, कृषि गोरक्ष जीविनः”। किसान, पशुपालक सभी हमेशा खुश रहें। श्रीराम का आदेश है-“कश्चिद्वृद्धान्चबालान्च, वैद्यान् मुख्यान् राघव। त्रिभि: एतै: वुभूषसे”॥ बुजुर्गों की,बच्चों की, चिकित्सकों की सदैव रक्षा होनी चाहिए। श्रीराम का आह्वान है- “जौंसभीतआवासरनाई।रखिहंउताहिप्रानकीनाई”॥ जो शरण में आए,उसकी रक्षा करना सभी का कर्तव्य है। श्रीराम का सूत्र है- “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”॥ अपनी मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है। और भाइयों और बहनों, ये भी श्रीराम की ही नीति है- “भयबिनुहोइन प्रीति”॥ इसलिए हमारा देश जितना ताकतवर होगा, उतनी ही प्रीति और शांति भी बनी रहेगी।


राम की यही नीति और रीति सदियों से भारत का मार्गदर्शन करती रही है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने, इन्हीं सूत्रों, इन्हीं मंत्रों के आलोक में, रामराज्य का सपना देखा था। राम का जीवन, उनका चरित्र ही गांधीजी के रामराज्य का रास्ता है।


साथियों,


स्वयं प्रभु श्रीराम ने कहा है-

देशकाल अवसर अनुहारी। बोले बचन बिनीत बिचारी॥

अर्थात, राम समय, स्थान और परिस्थितियों के हिसाब से बोलते हैं, सोचते हैं, करते हैं।

राम हमें समय के साथ बढ़ना सिखाते हैं, चलना सिखाते हैं। राम परिवर्तन के पक्षधर हैं, राम आधुनिकता के पक्षधर हैं। उनकी इन्हीं प्रेरणाओं के साथ, श्रीराम के आदर्शों के साथ भारत आज आगे बढ़ रहा है!

साथियों,

प्रभु श्रीराम ने हमें कर्तव्यपालन की सीख दी है, अपने कर्तव्यों को कैसे निभाएं इसकी सीख दी है! उन्होंने हमें विरोध से निकलकर, बोध और शोध का मार्ग दिखाया है! हमें आपसी प्रेम और भाईचारे के जोड़ से राममंदिर की इन शिलाओं को जोड़ना है। हमें ध्यान रखना है,जब जबमानवता ने राम को माना है विकास हुआ है, जब जब हम भटके हैं विनाश के रास्ते खुले हैं! हमें सभी की भावनाओं का ध्यान रखना है। हमें सबके साथ से, सबके विश्वास से, सबका विकास करना है। अपने परिश्रम, अपनी संकल्पशक्ति से एक आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना है।


साथियों,

तमिल रामायण में श्रीराम कहते हैं-

“कालम् ताय, ईण्ड इनुम इरुत्ति पोलाम्”॥

भाव ये कि, अब देरी नहीं करनी है, अब हमें आगे बढ़ना है!

आज भारत के लिए भी, हम सबके लिए भी, भगवान राम का यही संदेश है! मुझे विश्वास है, हम सब आगे बढ़ेंगे, देश आगे बढ़ेगा! भगवान राम का ये मंदिर युगों-युगों तक मानवता को प्रेरणा देता रहेगा, मार्गदर्शन करता रहेगा! वैसे कोरोना की वजह से जिस तरह के हालात हैं,प्रभु राम का मर्यादा का मार्ग आज और अधिक आवश्यक है।


वर्तमान की मर्यादा है, दो गज की दूरी- मास्क है जरूरी। मर्यादाओं का पालन करते हुए सभी देशवासियों को प्रभु राम स्वस्थ रखें, सुखी रखें, यही प्रार्थना है। सभी देशवासियों पर माता सीता और श्रीराम का आशीर्वाद बना रहे।

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ, सभी देशवासियों को एक बार फिर बधाई!

बोलो सियापति रामचंद्र की…जय !!!