Saturday, September 5, 2020

गदर आंदोलन की कुछ व्यथा

सितम्बर, 1927 के 'किरती' में एक बहुत महत्त्वपूर्ण लेख 'गदर लहर' की कुछ व्यथा' छपा था। यह एक अखबार से लेकर छापा गया था। लेखन-शैली और विचारों से यह लेख शहीद भगवतीचरण वोहरा का हो सकता है।
पहले मैं यह बता दूं कि विप्लववाद का क्या अर्थ है । फिर मैं आगे चलूँगा हर गिरी हुई कौम हमेशा गिरी नहीं रहती और उस कौम के वीर उसकी उन्नति का यत्न करते हैं कुर्बानियाँ देते हैं, अब यह सोचना है कि कुर्बानियाँ कई तरह से दी जाती हैं। कौमों को उठाने का यत्न भी कई-कई तरीकों और हिम्मत से किया जाता है। एक तो देश में शिक्षा का प्रचार करना। यह भी कोई छोटी-सी बात नहीं। दूसरे, लोगों को उनके हक बताने और उन्हें हासिल करने के लिए सरकार के आगे प्रार्थना करना। उसे (ऐसे दल को) हम माडरेट कहते हैं। यह शब्द उस समय इस्तेमाल होता है, जब देश उस स्थिति से कुछ ऊपर उठ जाता है। दूसरा दर्जा होता है गर्म दल का, जिस तरह 1907 में लोकमान्य तिलक जी की पार्टी थी या आजकल महात्मा गांधी जी का प्रचार कहा जा सकता है। लेकिन जिस समय इन दोनों रास्तों पर चलने से भी सफलता नहीं मिलती तो तेज नौजवानों का एक दल कुछ और आगे बढ़ता है वह हाथोहाथ काम करना चाहता है, मरना और मारना चाहता है और इस ढंग से ही जीत प्राप्त करना चाहता है। उसे (ऐसे लोगों को) अंग्रेज़ी भाषा में रिवॉल्यूशनरीज ( Revolutionaries ) कहते हैं। इस आरोप में वे गुप्त काम करते हैं और बाद में बदलकर खुल्लमखुल्ला लड़ाई करने को तैयार हो जाते हैं, जिस तरह कि आयरलैण्ड वाले अब तक लड़ते रहे हैं। यह काम जब तक गुप्त रहता है, तब तक उसे दबाने का यत्न किया जाता है। इस स्थिति में उन्हें हिन्दुस्तानी भाषा में विप्लववादी कहते हैं, उर्दू में इन्कलाबी कहा जाता है। यह शब्द इज़्ज़त और निन्दा, दोनों के लिए इस्तेमाल हो सकता है, अर्थात जब तक देश कमजोर है, तब तक वहाँ खुशामदी अधिक होते हैं, तब तक वहाँ उन्हें सभी लोग बुरा कहते हैं और शासक तो उनके दुश्मन होते ही हैं, लेकिन बाद में उन्हें ही देशभक्त कहा जाता है।

हम किसी डर के कारण चाहे उन्हें बुरा कहें, लेकिन वास्तव में वे किसी से भी कम 'देशभक्त' नहीं होते, बल्कि हम यह कह सकते हैं कि वे दूसरे शोर मचाने वालों से देश का अधिक दर्द रखने वाले होते हैं। उनकी कोई सहायता नहीं करता। अपने-पराये सभी बुरा-भला कहते हैं और शासक तो जो करते हैं उसका पूछना ही क्या है। वे वीर फिर भी डटे रहते हैं और ज़रा भी घबराते नहीं। तो क्या वे किसी से कम देशभक्त होते हैं? मैं तो कहूँगा कि दुनिया में 'End Justifies the means' अर्थात परिणाम से ही पता चल जाता है कि उनके द्वारा इस्तेमाल किये तरीके अच्छे थे या बुरे? यदि परिणाम अच्छा हो तो झूठ बोला हुआ हत्या किया गया भी ठीक हो जाता है, और यदि असफलता हो तो शान्ति से होने वाला काम भी बुरा ही कहा जाता है।

क्या वाशिंगटन को उस समय बागी कहकर दबाने की कोशिश नहीं की गयी थी? क्या यदि वह उस समय दुश्मनों के हाथ आ जाता तो उसे फाँसी न मिलती? क्या स्काटलैण्ड का वीर वालीस सच्चा देशभक्त नहीं था? क्या उसे फाँसी नहीं दी गयी? इस देश में काम ऐसे ही होता है। इटली की हालत देख लो, मैजिनी जैसों ने भी तो गुप्त सोसायटियाँ बनायीं, उनके परिश्रम का ही यह फल हुआ कि गैरीबाल्डी जैसे वीर ने दो-दो हाथ कर दिखाये दूर क्या जाना है, अभी कल की बात है कि रूस उठा है। कितने आदमी फाँसी पर चढ़े और बागी ठहराये गये। क्या ये सच्चे देशभक्त नहीं थे? इस बात का जवाब आज रूसवालों से पूछिये तो। इन बेचारों को 'निहिलिस्ट' और 'अनाकृष्ट' अर्थात दुनिया में 'अराजकता फैलाने वाले' और 'खून-खराबा करने वाले' कहा जाता था। उनके परिश्रम के फलस्वरूप ही आज वहाँ पंचायती सरकार बनी हुई है।

हाँ, ये लोग जो निराश होने से खून-खराबे पर उतारू हो जाते हैं वे पहले गुप्त सोसायटियाँ बना लेते हैं। उन्हें अंग्रेजी में Revolutionaries और हिन्दी में 'विप्लववादी' कहा जाता है। यदि संसार में देखा जाये तो यह बात कि जोरावर को सात कौडी सौ हुआ करती हैं, ठीक लगती है, क्योंकि जितनी देर एक पक्ष का जोर रहा उतनी देर तो कमजोर बागी, अनार्किस्ट, निहिलिस्ट, विप्लववादी इन्किलाब-पसंद कहलाते हैं, लेकिन जब दूसरा पक्ष ताकतवर हो जाता है तो वे सच्चे देशभक्त, कौम के परवाने हो जाते हैं और दूसरे जालिम, अत्याचारी, लालची आदि बन जाते हैं। शिवाजी मराठा यदि राज कायम न कर पाता और जालिम औरंगज़ेब के दाँत खट्टे न कर पाता तो वह डाकू ही कहलाता, लेकिन आज हम भी उसे महापुरुष कहते हैं। खैर!यह खयाल कि कोई इन्किलाब करे और खून-खराबे से न डरे, झटपट नहीं आ जाता। धीरे-धीरे शासक लोग जुल्म करते हैं और लोग दरख्वास्तें देते हैं, लेकिन अहंकारी शासक उस तरफ ध्यान नहीं देते। फिर लोग कुछ हल्ला करते हैं, लेकिन कुछ नहीं बनता। उस समय फिर आगे बढ़े हुए नौजवान इस काम को सँभालते हैं। यदि किसी देश में शान्ति हो और लोग सुख-चैन से बैठे हों तो वहाँ उतनी देर इन विचारों का प्रचार नहीं हो सकता, जब तक कि उन्हें कोई ऐसा बड़ा भारी नया विचार न दिया जाये, जिस पर कि वे परवानों की तरह कुर्बान हो जायें। या 'जुल्म' इस बात के लिए लोगों को तैयार करते हैं। यदि हम अपने देश की ओर ध्यान दें तो इस बात का स्पष्ट पता चल जाता है।

सबसे पहले यह विचार महाराष्ट्र अर्थात मराठों में किसी महापुरुष को सूझा, लेकिन इसका प्रचार नहीं हो सका। फिर बंगाल में यह विचार आया। वीर वीरेद्यश सबसे पहले इस बात का प्रचार करने लगा। यह बात 1903 की है। लेकिन लोग पूरे आराम में रहते थे तो खामखा कोई दुख में पड़े, किसी ने भी उनकी बात न मानी। वे अपना ज़ोर लगाकर असफल होकर बैठ गये। यह पूरा विवरण रोल्ट कमेटी की रिपोर्ट में दिया है।

फिर 1905 के बंग भंग हो गया। लोगों ने दरख्वास्तें दी लेकिन लॉर्ड कर्जन ने कहा, 'सूरज पश्चिम से उग जाये लेकिन मैं बंगाल का विभाजन ऐसे ही रहूंगा।' फिर स्वदेशी का प्रचार हुआ। कई बेचारे निर्दोष ही जेलों में तूंस दिये गये। कर्जन ने अपनी 'टें' नहीं छोड़ी। बताओ उस समय जब लोग दुखी बैठे हों, तब उनमें इन बातों का प्रचार झटपट हो जाना ही हुआ कि नहीं? बस बम बनने लगे। खैर, 1908 में अलीपुर षड्यन्त्र केस चला। फिर तो काम और भी जोरों पर हो गया और 1916 तक होता रहा। फिर लोगों को डकैतियाँ डालनी पड़ी। कुछ दिन पहले एक बंगाली सज्जन ने भाषण दिया था कि लोग उन्हें डाकू कहते हैं। लेकिन आप यह तो बताओ कि तुम उन्हें एक पैसा भी देते हो। वे बेचारे अपना तो सबकुछ छोड़ बैठे हैं और आप उसकी सहायता नहीं करते तो आप सोचो कि वे क्या करें, क्या अपना काम रोक दें? मैं बहुतों से मिला हूँ, वे सच्चे संन्यासी हैं, देशभक्त हैं। खैर, अब हम अपने प्रदेश की ओर आते हैं। पहले-पहले यह हल्ला सरदार अजीत सिंह जी के समय हुआ था। सन् 1907 की बात है। दो कानूनों के खिलाफ आवाज उठायी गयी। जोश बढ़ता देखकर सरकार ने उनकी बात झटपट मान ली और शोर-शराबा रुक गया। वह जमाना चला गया। कहा जाता है कि 1909 में सरकार को चिन्ता हुई कि बंगाल की बीमारी कहीं पंजाब में भी न आ फैले। उन्होंने सरदार अजीत सिंह को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वे बचकर निकल गये। उसके बाद पंजाब में सिवाय दिल्लीवाले बम केस के और कोई शिगूफ़ा नहीं दीखता। वहाँ वह विचार भी बंगाल ने ही दिया था। लेकिन उन्होंने कितने लोगों को अपने साथ मिलाया था? कुल दस-बारह आदमी होंगे। साधारण लोग जलती आग में क्यों जाने लगे। चार को फाँसी मिली, कुछ को कैद कर दिया और बात खत्म हुई।

लेकिन झटपट अगले ही बरस 1915 में फिर पंजाब में गदर की तैयारियाँ नज़र आती थीं। तब दो बातें थीं - एक तो लड़ाई छिड़ गयी (प्रथम महायुद्ध अनु.); दूसरे, सरकार ने कामागाटामारू वालों पर अत्याचार किया। वह भी अमेरिका से, बेचारे विचार ही लेकर आये थे। लेकिन पंजाब में रहने वाले कितने लोगों ने उनका साथ दिया? सिवाय 1907 के कुछ आदमियों के कितने लोग थे उनके साथ? खैर, मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार संक्षेप में क्रान्तिकारी विचारों के विकास व प्रचार का कुछ वर्णन करने का यत्न किया है और यदि मुझे समय मिला तो एक लम्बा लेख लिखकर अन्य देशों के विस्तृत हाल समेत इसका वर्णन करने का यत्न करूंगा।

(एक अखबार से)
स्रोत: भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़

Tuesday, September 1, 2020

षड्यंत्र क्यों होते हैं और कैसे रुक सकते हैं?

सितम्बर, 1928 के 'किरती' में छपा यह लेख राजनीतिक आन्दोलनकारियों पर चलने वाले मुकदमों के पौधे के विचारों पर केन्द्रित है। अग्रेज़ सरकार इन्हें षड्यन्त्र कंस कहती थी। इसमें साफ़ कहा गया कि षड्यंत्रों को रोकने का एक ही तरीका है दुनिया से गरीबी व गुलामी दूर करना। इस लेख में शान्तिपूर्ण व आतंकवादी तरीकों पर भी बड़े तर्कपूर्ण ढंग से विचार किया गया है। भगतसिंह और उनके साथियों के विचारधारात्मक विकास को जानने के लिए यह लेख महत्त्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक है। 
एक षड्यंत्र की चर्चा अभी खत्म नहीं होती कि दूसरे यड्यन्त्र की चर्चा शुरू हो जाती है। कुछ समय पूर्व हम काकोरी षड्यंत्र का हाल पढ़ रहे थे, इन दिनों देवघर के षड्यंत्र के हाल सुन रहे हैं। इससे पहले लाहौर षड्यन्त्र केस, दिल्ली षड्यन्त्र केस, बोल्शेविक षड्यंत्र केस और न जाने और कितने षड्यंत्र केस चल चुके हैं, जिनमें कि दर्जनों ही नौजवान फाँसियों पर लटकाये गये। गोलियों से उड़ा दिये गये। सैकड़ों ही नहीं, हज़ारों कालेपानी भेजे गये, असंख्य देशभक्त अभी तक जेलों में कैद काट रहे हैं।

षड्यंत्र क्या होते हैं? सरकारों का विचार है कि मनुष्य के दिमाग में यह एक बीमारी है, जो नियमित चल रही व्यवस्था को तोड़ने-फोड़ने के लिए षड्यन्त्रकारी को मजबूर कर देती है। वह इस बीमारी के वश में होकर कानून तोड़ता है, शान्ति भंग करता है, हत्याएँ करता है और डकैतियाँ डालता है और कई ऐसे तरीके इस्तेमाल करता है जोकि समाज में गड़बड़ी फैलाने और शान्ति-भंग का कारण बनते हैं। वह चल रही व्यवस्था की तोड़-फोड़ की ठान लेता है और फिर इस लक्ष्य के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता।

इसके विपरीत षड्यंत्र कारी लोगों का दावा है कि षड्यंत्र उन आदर्शवादी लोगों की कोशिश होती है जो चल रही व्यवस्था की कमियों, अन्याय और जुल्म को सहन नहीं कर पाते, जो अमीर-गरीब, बड़े-छोटे, जालिम-मज़लूम, शासक-प्रजा, पूंजीपति-मजदूर, जमींदार-किसान आदि का फर्क खत्म कर एक जैसे अधिकारों और आज़ादी का दौर लाना चाहते हैं और जो पुरानी, गन्दी और अत्याचारी व्यवस्था को समाप्त कर एक नयी व सुन्दर व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं, जिसमें कि कोई शासक-प्रजा, अमीर-गरीब, जमींदार-किसान न हों, बल्कि सभी एक जैसे भाई-भाई हों। प्रत्येक काम करे और खाये और सभी की प्रत्येक जरूरत पूरी हो। ये बातें सही हैं या गलत जोकि दोनों अपने-अपने विचार को सामने रखकर की जाती हैं, यह पाठक स्वयं ही अनुमान लगायें। गुजरे वक्त का इतिहास प्रमाण है कि सख्त सज़ाओं और फाँसियों से षड्यन्त्र नहीं रुक सकते, न ही जुल्मों और अत्याचारों से चाहे वे कितने भी भयानक क्यों न हाँ आज़ादी की चाह कुचली जा सकती है। असंख्य नौजवान, जो किसी दूसरे आजाद देश में होते तो अपने देश के लिए तोहफ़ा साबित होते, अत्याचारी और ज़ालिम शासकों के अत्याचारों का शिकार हो गये। हजारों देशभक्त टुकड़े-टुकड़े कर कृत्ल कर दिये गये ताकि लोग इससे आतंकित होकर षड्यन्त्र करने से बाज आ जायें और आजादी के लिए हाथ-पाँव न हिलायें। तमाम सजाओं, फाँसियों, कैद और बेंत मार-मारकर देख लिया गया है, लेकिन ये तमाम सजाएं भी षड्यन्त्रों को रोकने में असफल रही हैं। बल्कि  बढ़ता है शौके-शहादत हर सज़ा पाने के बाद' के अनुसार षड्यंत्रों की आग भड़कती गयी और इन सजाओं से न रुकी। यह क्यों है, आखिर इन षड्यन्त्रों को रोकने का क्या कोई इलाज भी हो सकता है? 

यदि षड्यन्त्रों के पिछले इतिहास को अच्छी तरह देखा जाये तो हमें इस बात का भली प्रकार पता चलता है कि षड्यंत्रों को रोकने के लिए जितनी अधिक कोशिशें होती हैं, उतने ही अधिक षड्यन्त्र किसी न किसी शक्ल में वजूद में आते रहते हैं। इस तरह पता चलता है कि ये सजाएँ षड्यन्त्रों की आग भड़काने में लकड़ी का ही काम करती हैं।

सैकड़ों नौजवान गोलियों से उड़ा दिये जाते हैं, लेकिन उनकी जगह भरने के लिए हज़ारों ही नौजवान हथेलियों पर सर रखकर मैदान में कूद पड़ते हैं और अपने प्राणों को खतरे में डाल उस अधूरे काम को शुरू कर देते हैं। आखिर इसका कारण क्या है?

बदला लेना इन्सानी स्वभाव है। इन्सान जब तक इन्सान है, वह अपने दुश्मनों से बदला जरूर लेगा, ख़याली पुलाव पकाने वाले चाहे कुछ भी कहें आम नौजवान जब देखते हैं कि उनके भाई सिर्फ देशप्रेम के लिए ही किस बेदर्दी और बेरहमी से जुल्मों का शिकार हो रहे हैं तो उनके दिलों में अपने भाइयों पर हुए जुल्मों का बदला लेने की आग भड़क उठती है। वे शान्ति और सन्तोष को अलविदा कह देते हैं। अपनी किश्ती ईश्वर के सहारे छोड़ लंगर तोड़ देते हैं फिर या तो वे खुद उस बदले की आग में जलकर राख हो जाते हैं या दुश्मनों को राख करके ही साँस लेते हैं। यह इन्सानी दिलेरी है। भेड़ियों, नशेबाजों का पुलाव नहीं है।

दूसरी ओर एक बुजदिल और कायर होता है। उसे अपनी जान बहुत प्यारी होती है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि उसके पास से ऐशो-आराम और सफ़ेद-स्याह करने की ताकत छीन ली जाये। पर जब उसकी जान पर हमला किया जाता है और उसके मुँह से झाग गिरने लगती है तो वह गुस्से में आकर ऐसे-ऐसे कष्ट ढहाता है कि जमीन और आसमान काँप उठते हैं। वह अत्याचार में अन्धा होकर जिस पर भी हाथ उठाता है, चाहे वह निर्दोष ही क्यों न हो, उसे पार बुलाकर ही छोड़ता है। इस तरह अक्सर गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है और हजारों ही बेगुनाह नौजवान देश पर शहीद हो जाते हैं। यह निर्दोषों का खून होता है जो अन्त में रंग लाता है। जनता में बेचैनी फैल जाती है। षड्यंत्रकारियों के हाथ मजबूत हो जाते हैं, क्योंकि यह जुल्म, अन्याय और आतंक हो षड्यन्त्र पैदा करने के कारण हैं। वे खुली घोषणाएँ कर देते हैं कि देखा, हम नहीं कहते थे कि लातों के भूत बातों से नहीं सुधरते, लेकिन तुमने हमारी बातों पर ध्यान नहीं दिया। अब खूब गत बन रही है। लेकिन यह तो

इब्तिदाए इश्क है रोता है क्या?
आगे-आगे देखिये होता है क्या?

इस तरह पड्यन्त्र का वृक्ष निर्देशों के खून से सिंचकर बढ़ता है और थोड़े ही समय में फलने-फूलने लगता है। जब तक लोग खुलेआम अपने दुख-तकलीफें व्यक्त कर सकते हैं और सरकारी अत्याचारों की पोल खोल सकते हैं, तब तक तो षड्यन्त्रों की ज़रूरत नहींपड़ती, लेकिन जब सरकार खुले आन्दोलनों को खुलने लगती है और जब
 न तड़पने की इजाज़त है, 
   न फ़रियाद की है।
  घुट-घुट के मर जाऊँ,
  यही मरज़ी मेरे सैयाद की है।

पर अमल शुरू हो जाता है तो इधर जोशीले और गर्वीले जवान भी इस बुरी स्थिति में नहीं जीना चाहते। वे सिरों की बाज़ी लगा देते हैं और ऐसे अत्याचारी (शासन) को तोड़ने की सिरतोड़ कोशिशों में व्यस्त हो जाते हैं।

जब तक शान्तिपूर्ण आन्दोलन में आजादी की माँग की छूट रही, कोई षड्यन्त्र नहीं हुआ, कोई गुप्त आन्दोलन नहीं चल सका, लेकिन ज्यों ही शान्तिपूर्ण आन्दोलन को कुचलने के आदेश जारी किये गये उसी समय गुप्त आन्दोलन शुरू हो गये और षड्यंत्रों की तैयारियाँ होने लगी सरकार की सख्ती का दौर शुरू हुआ और काले कानूनों के अधीन सैकड़ों नौजवानों को, जो खुले रूप में काम कर रहे थे, जेलों में नजरबंद कर दिया गया तो जोशीले नौजवानों को इससे आग लग गयी और वे तड़प उठे। बस फिर क्या था? किसी ओर काकोरी षड्यंत्र का तो कहीं किसी और षड्यंत्र का धुआँ निकलने लगा।

जब तक दुनिया में वहशी जमाने की गुलामी और गरीबी जैसी स्मृतियाँ कायम रहेंगी तब तक कोई भी ताकृत दुनिया के तख्त से षड्यन्त्रों और गुप्त आन्दोलनों को मिटा नहीं सकती। यदि जोर-जबरदस्ती और जुल्म षड्यंत्रों के रोकने का सही इलाज होता तो षड्यन्त्रों का नामो-निशान कब का मिट गया होगा लेकिन यह इलाज नहीं है। सम्भव है, जुल्म और अत्याचार कुछ समय के लिए षड्यन्त्रों को रोक सकें, लेकिन जुल्म और अत्याचार षड्यन्त्र रोकने का कोई कारगर नुस्खा नहीं है। कइयों का विचार है कि केवल आज़ादी ही षड्यन्त्रों को ख़त्म करने का असली इलाज है, लेकिन हमारा इससे मतभेद है। यह तो ठीक है कि यह आजादी ही है जो बहुत हद तक षड्यंत्रों को रोक सकती है, लेकिन फिर भी इसमें सोलह आने सच नहीं है, क्योंकि वर्तमान समय में साबित हो गया है कि केवल आज़ादी की) प्राप्ति से ही षड्यन्त्र नहीं रुक सकते। हमारे सामने अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस आजाद देशों में माने जाते हैं और वे हैं भी बिल्कुल आज़ाद किसी के गुलाम या किसी तरह से भी मोहताज नहीं हैं, लेकिन फिर भी वहाँ षड्यन्त्र होते रहते हैं, और अभी बहुत समय नहीं हुआ, जबकि 'साको' और 'वैनजिरी' को अमेरिका को पूँजीपति सरकार ने पड्यन्त्र के अपराध में बिजली की कुर्सी पर बिठाकर मार डाला था। जर्मनी में कम्युनिस्टों ने एक क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था, लेकिन वे कुब्जा बनाकर न रख सके। फ्रांस और इंग्लैण्ड में भी षड्यन्त्र होते रहते हैं। अमेरिका जैसा समृद्ध देश पूरी दुनिया के नक्शे पर भी नहीं है। वहाँ 'राक-फैलरे' जैसे तगड़े अमीर आदमी हैं। यदि वे चाहें तो अकेले ही पूरे हिन्दुस्तान को खरीद सकते हैं। लेकिन दूसरी ओर बेरोजगारी और गरीबी का यह हाल है कि हजारों ही नहीं, बल्कि लाखों अमेरिकी मजदूर ऐसे हैं जो बेराजगार भूखे दर-दर भटक रहे हैं और जिनका गुज़ारा सिर्फ सरकारी दान से ही होता है। तो क्या जब तक यह हद दर्जे को गरीबी और हद दर्जे की अमीरी दुनिया में कायम रहेगी, षड्यन्त्र दुनिया से खत्म हो सकते हैं? हमारा विचार तो 'नहीं में है। षड्यन्त्रों का हटना या न हटना रोटी के सवाल के हल होने पर निर्भर है। यदि रोटी का सवाल आज हल हो जाये तो आज ही षड्यन्त्रों को समाप्ति हो सकती है, लेकिन यदि रोटी का सवाल न निपटा तो ये पड्यन्त्र कभी भी रुक नहीं सकते, चाहे नौरू और
जहाद जैसे जालिम ही क्यों न पैदा हो जायें। शायद कुछ लोग कहें कि यदि रोटी के सवाल का हल ही षड्यन्त्रों की बीमारी के लिए अमृतधारा है तो फिर रूस में क्यों षड्यन्त्र होते हैं? हमारा जवाब स्पष्ट है कि रूस में जो षड्यन्त्र होते हैं वे सिर्फ विदेशी पूँजीपति सरकारों के छोड़े हुए कुछ भाड़े के टट्टुओं द्वारा करवाये जाते हैं और वे विदेशी सरकारें अपने एजेण्टों को धन आदि देकर उनसे षड्यन्त्र करवाती हैं, नहीं तो रूस में षड्यन्त्र करने के लिए कोई कारण ही नहीं है, ना ही रूसी लोगों को कोई तकलीफ़ है, जिससे कि उन्हें षड्यन्त्र करने की जुरूरत पड़े। कुछ ज़ार के चेले चपाटे हैं या विदेशी एजेण्ट हैं जो कभी-कभार हंगामा करते हैं, वरना रूस तो इस समय एक ऐसा देश है जो हर इन्सान को खुश देखना चाहता है और प्रत्येक इन्सान की ज़रूरतें पूरी करता है। हिन्दुस्तान का क्या कहना। पहले तो यह गुलाम है यहाँ के नौजवान जब दूसरे देशों को उन्नति करते देखते हैं तो उनके कलेजों पर छुरियाँ चल जाती हैं। वे अनुभव करते हैं कि उन्नति करना तो दूर रहा, उनका तो साँस लेने के लिए भी यहाँ जगह नहीं है। इसलिए हिन्दुस्तान का गुलाम होना ही यहाँ आजादी की कोशिशों के लिए एक अच्छा तर्क है। आजादी के लिए दो ही प्रकार की कोशिशें हो सकती हैं शान्तिपूर्ण व आतंकवादी तरीकों से। आजादी की प्राप्ति के हर तरीके को एक न एक दिन परीक्षा होती है। वह तरीका परीक्षा में खरा उतरे तो लोग उसमें विश्वास करते हैं, लेकिन यदि परीक्षा में असफल रहे तो लोगों का विश्वास उससे हट जाता है। हिंदुस्तान में भारी संख्या उन लोगों की है जो शान्तिपूर्ण तरीके के समर्थक हैं। शायद इसलिए कि उन्हें इसके सिवा और कुछ सूझता भी नहीं या यदि कुछ सूझता भी है तो वे उस पर व्यवहार करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। लेकिन यह बात अब सन्देह से परे है कि ऐसे आदमी भी हिन्दुस्तान में मौजूद हैं, जो शान्तिपूर्ण तरीकों पर विश्वास खो चुके हैं, और हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए काम भी करना चाहते हैं। जब तक ऐसे आदमी मौजूद हों तब तक षड्यन्त्रों का होते रहना अचम्भे की बात नहीं है। लेकिन एक गुलामी ही क्या? हिन्दुस्तान में इतनी गुरीबी है कि तौवा ही भली। हज़ारों नहीं, लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों ही आदमी रोटी के दो टुकड़ों के लिए तरसते मर जाते हैं। जब तक गुलामी और गुरीबी खत्म नहीं होती तब तक लोग भला कैसे आराम से बैठ सकते हैं? हो सकता है कि अमीर लोग ऐशो-आराम में आज़ादी को भूल जायें और गुलामी को पसन्द करें क्योंकि उनके लिए तो ऐश-परस्ती ही आज़ादी हो सकती है, लेकिन जो लोग भूखे मर रहे हैं, वे समझते हैं कि हमें मरना ही है, तो फिर क्यों न मर्दे-मैदान बनकर इस अन्यायपूर्ण और ज़ालिम व्यवस्था को रद्द करने में मरें, क्यों न देश के गरीबों को जगाने के लिए और भारतमाता को आजाद करवाने के लिए शीश दिये जायें? हो सकता है ऐसे विचार कुछ देर तक गरीबों के दिमाग में न आयें, लेकिन कब तक रुक सकेंगे, इस अन्याय, गुलामी और गरीबी के खिलाफ़ शुरू से ही षड्यन्त्र होते आये हैं। जब तक यह हाल रहेगा, जोशीले लोग यड्यन्त्र करते रहेंगे, क्योंकि तमाम षड्यन्त्रों की जड़ गरीबी और गुलामी ही है। चाहे सरकारें इस बात को नहीं मानतीं फिर भी यह बिल्कुल सही है कि शासक जो भी कुछ अधिकार या कुछ सुविधाएँ देते हैं वे इन षड्यन्त्रकारियों के भय से ही दिया करते हैं नहीं तो-यदि नौजवान हथेलियों पर सिर रखकर बिना किसी स्वार्थ के समाज को अच्छा बनाने के लिए बलिदान न करते तो सरकारों से जितने अधिकार अभी तक छीने जा चुके हैं, उतने भी न छीने जा सकते।

1925 में विपिनचन्द्र पाल ने एक लेख में लिखा था कि "यह पोलिटिकल कातिल ही थे, जिन्होंने कि मिण्टो-मारले योजना के लिए रास्ता साफ़ किया।" एक और माडरेट एस.आर. दास ने लिखा था कि "इंग्लिस्तान को इस मीठी नींद से जगाने के लिए कि हिन्दुस्तान के साथ अच्छा सलूक' हो रहा है, एक बम की ज़रूरत थी।"

यों आमतौर पर नेता लोग इन षड्यन्त्रकारियों के खिलाफ ही रहा करते हैं तो भी हमारे नेता साहिब बब्बर अकाली दल की तारीफ़ यह कहकर किया करते हैं कि सिखों को गुरुद्वारा बिल इसी आन्दोलन ने दिलवाया है, नहीं तो गुरुद्वारा बिल कभी भी न मिलता। यह लेख लिखने से न तो हमारा यह आशय है कि बम फेंकने की प्रेरणा दी जाये और न ही यह कि षड्यन्त्रकारियों की तारीफ के बड़े-बड़े पुल बाँध दिये जायें, चाहे हम समझते हैं कि वे सच्चे देशभक्त होते हैं और अपने भीतर सच्ची राष्ट्रीय और देशभक्ति की स्पिरिट रखते हैं और अपने विश्वास के अनुसार काम करते हैं, वे इसी में देश और कौम की बेहतरी समझते हैं इस लेख को लिखने का आशय तो यह है कि जनता को यह बताया जाये कि जहाँ भी गुलामी और गरीबी मौजूद है वहाँ कुछ जोशीले लोग उठते ही रहेंगे और गुलामी और गुरीबी के जुए को उतार फेंकने के यत्न करते रहेंगे, चाहे वे सफल हों या नहीं। हम समझते हैं कि इतिहास हमें यही बताता है कि इन षड्यन्त्रों को रोकने और हमेशा के लिए खत्म करने का एक ही तरीका है कि दुनिया से गरीबी और गुलामी दूर की जाये और प्रत्येक देश में आज़ादी के साथ रोटी के सवाल का भी पूरा समाधान हो। जब तक यह नहीं होता, षड्यंत्रों का बन्द होना मुश्किल है।

Tuesday, August 25, 2020

ट्रेड यूनियन बिल

1927 में पूँजीवादी विश्व आर्थिक मन्दी को चपेट में आ रहा था. और मज़दूर वर्ग के जनवादी अधिकारों पर हमले शुरू हो गये थे। इंग्लैण्ड में जब ट्रेड यूनियन बिल पास हो रहा था तो 'किरती'ने (मई, 1927 में) एक लेख इस सम्बन्ध में प्रकाशित किया। लेख के लेखक के सम्बन्ध में जानकारी हासिल नहीं है, लेकिन यह उस समय क्रान्तिकारियों की सोच के बारे में बताता है। 1929 में जब ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल भारत में लागू करने की कोशिश की गयी थी तो भगतसिंह और बी.के. दत्त ने असेम्बली हॉल, दिल्ली में बम फेंका था।

इंग्लिस्तान के एक जगह टिके (Conservative) गुट के लोग कब से इस बात की ताक में थे कि कैसे मज़दूरों में बढ़ती हुई ताकत को रोका जाये उनको यह बात स्पष्ट नजर आती थी कि यदि मज़दूरों की बढ़त को अभी न रोका गया तो मजदूर देखते ही देखते राज के मालिक बन जायेंगे और इस तरह उन्हें राज की बागडोर छोड़नी पड़ेगी। उन्हें यह स्पष्ट पता था कि नाम मात्र स्वतन्त्र (Liberal) गुट तो किसी काम का नहीं है और न ही अभी जल्दी उनके ताकृत में आने की उम्मीद है। इसलिए यदि उन्हें खतरा था तो मजदूरों से ही था और मजदूरों की मुश्कें बाँधना ही उन्होंने सबसे पहले ठीक समझा।

इस काम के लिए उन्होंने ट्रेड यूनियन बिल का आविष्कार किया, जिसके सम्बन्ध में पिछले अंक में बताया गया था वे मजदूरों के सब करे-घरे को यह बिल पास कर कुएँ में डालना चाहते हैं। मज़दूरों ने इस बिल के खिलाफ़ बड़ी जोरदार आवाज बुलन्द की है। उन्होंने कहा है कि यह बिल एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग को मटियामेट करने के लिए लाया गया वर्ग-बिल है। मि. रामजे मैकडानल्ड जैसे मजदूर भी इस बिल को वर्ग-युद्ध की घोषणा समझते हैं और श्रमिक-संसार में सब जगह इस बिल से तूफ़ान मच गया है। मजदूर फिर एक दिन के लिए बड़ा आम हड़ताल करने की सोच रहे हैं। वे विरोध में मीटिंग कर रहे हैं। ख्याल किया जाता है कि संसद में इस बिल पर घमासान बहस होगी, और मजदूर-नेता यदि खरीद न लिये गये तो जी-तोड़कर लड़ेंगे।

आजकल जो लोग अंग्रेजी अखबार पढ़ते हैं उन्हें पता है कि इस बिल का किस तरह अंग्रेजी श्रमिक प्रेस में विरोध हो रहा है। इस बिल को वर्ग-कानून कहा जाता है। । मजदूर समझते हैं कि बाल्डविन की सरकार ने उनके बुनियादी अधिकारों पर धावा बोल दिया है। इस बिल से उनके संगठन के बिखर जाने का भारी खतरा है। मजदूरों का अपना दैनिक अखबार 'डेली हेराल्ड' (Daily Herald) लिखता है कि यह बिल मजदूरों को मानसिक रोगी समझता है और सख़्त अपराधियों के लिए इसने सज़ा भी नियत कर दी है। एक और मजदूर नेता इसे मुसोलिनी जैसा कानून कहा है।

बड़ी हड़ताल के समय से ही एक जगह खड़े (अनुदार) गुट के लोग यह माँग कर रहे थे कि सरकार कोई बिल संसद में पेंश करे, जिससे कि सबके सब मजदूर हड़ताल ही न कर सकें। और यदि एक यूनियन के मजदूर किसी दूसरी यूनियन की हमदर्दी में हड़ताल कर दें तो वह हड़ताल गैर-कानूनी मानी जाये इस समय यदि कोई यूनियन हड़ताल करती है तो वे मजदूर जो हड़ताल में शामिल नहीं होंगे, उन्हें यह समझाया नहीं जा सकेगा कि वे भी इसमें शामिल हों, क्योंकि यदि मजदूर पिकेटिंग आदि के जरिये ऐसा करेंगे तो उन्हें सजा दी जा सकेगी। इस बिल से सिविल सर्विस के कर्मचारियों के लिए किसी पार्टी में शामिल होना मना हो गया है और सबसे बड़ी चोट मजदूरों की राजनीतिक पार्टी पर की गयी है। वह यह है कि कोई मज़दूर राजनीतिक कामों के लिए तब तक चन्दा नहीं दे सकता, जब तक कि वह लिखकर न दे कि वह राजनीतिक कामों के लिए चन्दा इकट्ठा कर सकते हैं, लेकिन जो लोग चन्दा नहीं देना चाहते, वे लिखकर दें कि वे चन्दा नहीं देना चाहते। अब स्थिति उलटी हो गयी है ।

इस आखिरी अंक से श्रमिकों के संगठन को बड़ी भारी चोट पड़ेगी और इस जमाने में जबकि कोई पार्टी रुपयों के बगैर चल ही नहीं सकती तो यह स्पष्ट है कि श्रमिक पार्टी का रुपयों के बगैर गला दबाने के लिए यह चाल चली गयी है। अन्य पार्टियों की तरह लेबर पार्टी को भी संसद में अपने उम्मीदवार खड़े करने और उन्हें सफल बनाने के लिए रुपयों की जरूरत है। जब दूसरी पार्टियाँ जैसे चाहे रुपये इकट्ठा कर सकती हैं और उन्हें कभी पूछा तक नहीं गया है तो कोई वजह नहीं कि मजदूरों की पार्टी के भीतर कार्यों में खामखाह टाँग अड़ायी जाये।

इस समय तक मज़दूरों की राजनीतिक पार्टी अपने फण्ड ट्रेड यूनियनों से इकट्ठा करती रही है। उदारवादी गुट का यह विचार है कि इस तरह यदि मज़दूर पार्टी के फ़ण्ड हो बन्द कर दिये गये तो मज़दूरों का संगठन स्वयं ही दोफाड़ हो जायेगा और इनके घरों में घी के दिये जल जायेंगे। इस तरह श्रमिक संगठन के टूट जाने से यह सदा ही इंग्लिस्तान के राज पर कब्जा जमाये रखेंगे। पर कौन-सी पार्टी टूटेगी और कौन-सी सत्ता में आयेगी, इस बात का पता तो अनुभव और भविष्य ही बतायेगा।
यदि यह बिल पास हो गया तो मजदूर फिर उन्हीं जूंजीरों में जकड़े जायेंगे जिनमें से कि यत्न से अभी वे निकले ही थे फिर उन जुंजीरों को तोड़ना आसान नहीं होगा। इसलिए श्रमिकों को अब वक्त सँभालना चाहिए और ऐसा जोरदार आंदोलन करना चाहिए कि इस पूंजीपति गुट को, जो भी मज़दूरों को गुलामी से छूटने नहीं देना चाहता, नानी याद आ जाये। पर यह नानी भी तभी याद आ सकती है, यदि आने वाली संसद में इनकी ऐसी हार हो कि याद कर-कर आँखें मला करें। इस समय संसद में इन पूँजीपतियों का बहुमत है। इस बहुमत के अभियान में ही ये लोग अकड़े फिर रहे हैं और मजदूरों को नज़रों में भी नहीं लाते।

हम चाहते हैं कि मजदूर नाम मात्र स्वतन्त्र (उदार) गुट में भी प्रचार करें और उनमें से बहुत-से सदस्यों को अपनी ओर कर लें, ताकि यह बिल पास ही न हो सके। और न सिर्फ यह बिल ही असफल करा दें वरन इस मौजूदा सरकार को भी उलट दें। इसने यह कानून पेश कर राज करने के सभी अधिकार गवाँ दिये हैं।

इस समय जरूरत है कि मजदूरों के अपने घर में भी किसी तरह की फूट न हो और मज़दूरों के नरम और गरम गुटों के सब लोग एकजुट हो जायें ताकि साझे ज़ोर से इस मौजूदा सरकार का डटकर मुकाबला किया जा सके और इसे ऐसे चने चबाये जायें कि सारी उम्र ही इस वक़्त को याद कर-कर हाथ मला करें।

Saturday, August 15, 2020

अखण्ड भारत पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता

यह सुविदित है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी एक कुशल राजनेता के साथ-साथ लब्धप्रतिष्ठ कवि भी थे। समय-समय पर अपनी रचनाओं के माध्यम से वे राष्ट्र की चुनौतियों के विरूध्द सिंहगर्जना करते रहते हैं। स्वतंत्रता दिवस और अखण्ड भारत पर केन्द्रित अटलजी की निम्न कविता बेहद लोकप्रिय रचना है और यह आज भी सामयिक है।

पन्द्रह अगस्त का दिन कहता,
आजादी अभी अधूरी है।

सपने सच होने बाकी हैं,
रावी की शपथ न पूरी है।
लाशों पर पग धर कर,
आजादी भारत में आई।
अब तक हैं खानाबदोश,
गम की काली बदली छाई॥
कलकत्ता के फुटपाथों पर, जो आंधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥
हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते, यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो, सभ्यता जहां कुचली जाती॥
इन्सान जहां बेचा जाता, ईमान खरीदा जाता है।
इस्लाम सिसकियां भरता है, डालर में मुस्काता है॥
भूखो को गोली, नंगों को हथियार पिन्हाये जाते हैं।
सूखे कण्ठों से, जेहादी नारे लगवाये जाते हैं॥

लाहौर, कराची, ढाका पर, मातम की है काली छाया।
पख्तूनों पर, गिलगित पर है, गमगीन गुलामी का साया॥

बस इसीलिए तो कहता हूं, आजादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊं मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥

दूर नहीं खण्डित भारत को, पुन: अखण्ड बनायेंगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक, आजादी पर्व मनायेंगे।

उस स्वर्ण दिवस के लिए, आज से कमर कसें, बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएं, जो खोया उसका ध्यान करें॥

Sunday, August 9, 2020

काकोरी के वीरों से परिचय'

9 अगस्त, 1925 को शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला और उनकेअन्य क्रान्तिकारी साथियों ने क्रान्तिकारी पार्टी के लिए धन इकट्ठा करने के उद्देश्य से लखनऊ के करीब काकोरी के पास रेलगाड़ी रोक सरकारी खजाना लूटा। इसके बाद चन्द्रशेखर आजाद के अलावा बाकी सभी क्रान्तिकारी पकड़े गये। भगतसिंह भी तब कानपुर निवास के समय हिन्दुस्तान रिपब्लिकन पार्टी में भर्ती हो चुके थे। 'विद्रोही' नाम से मई, 1927 में भगत सिंह ने 'काकोरी के वीरों से परिचय' शीर्षक लेख पंजाबी में छपवाया। उस लेख के छपते ही भगतसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। चारपाई पर हथकड़ी लगे बैठे भगतसिंह का प्रसिद्ध चित्र इसी गिरफ्तारी के समय लिया गया। 
इससे पहले भगत सिंह पंजाब लौटकर शचीन्द्रनाथ सान्याल की पुस्तक 'बन्दी जीवन' का पंजाबी अनुवाद छपवा चुके थे।

पहले 'किरती' (पंजाबी पत्रिका) में काकोरी से सम्बन्धित कुछ लिखा जा चुका है। आज हम काकोरी षड्यन्त्र और उन वीरों के सम्बन्ध में कुछ लिखेंगे जिन्हें उस सम्बन्ध में कड़ी सजा मिली हैं।
9 अगस्त, 1925 को एक छोटे-से स्टेशन काकोरी से एक पैसेंजर ट्रेन चली। यह स्टेशन लखनऊ से आठ मील की दूरी पर है ट्रेन मील-डेढ़ मील चली होगीकि सेकेण्ड क्लास में बैठे हुए तीन नौजवानों ने गाड़ी रोक ली और दूसरों ने मिलकर गाड़ी में जा रहा सरकारी खजाना लूट लिया। उन्होंने पहले ही जोर से आवाज देकर सभी यात्रियों को समझा दिया था कि वे डरें नहीं, क्योंकि उनका उद्देश्य यात्रियों को तंग करने का नहीं, सिर्फ सरकारी खजाना लूटने का है खैर, वे गोलियाँ चलाते रहे। वह (कोई यात्री) आदमी गाड़ी से उतर पड़ा और गोली लग जाने से मर गया।
सरकारी अधिकारी हार्टन, सी. आई.डी. इसकी जाँच में लगा। उसे पहले से ही यकीन हो गया था कि यह डाका क्रान्तिकारी जत्थे का काम है। उसने सभी सन्दिग्ध व्यक्तियों की छानबीन शुरू कर दी। इतने में क्रान्तिकारी जत्थे की राज्य परिषद की एक बैठक मेरठ में होनी तय हुई। सरकार को इसका पता चल गया। वहाँ खूब छानबीन की गयी।
फिर सितम्बर के अन्त में हार्टन ने गिरफ्तारियों के वारण्ट जारी किये और 26 सितम्बर को बहुत-सी तलाशियाँ ली गयीं और बहुत-से व्यक्ति पकड़ लिये गये। कुछ नहीं पकड़े गये। उनमें से एक श्री राजेन्द्र लाहिड़ी दक्षिणेश्वर बम केस में पकड़े गये और वहीं उन्हें दस वर्ष कैद हो गयी और श्री अशफ़ाकउल्ला और शचीन्द्र बख्शी बाद में पकड़े गये, जिन पर अलग मुकदमा चला।
जज के फैसले से यह पता चलता है कि असहयोग आन्दोलन दब जाने से देशभक्त युवकों का शान्ति से विश्वास उठ गया और उन्होंने युगान्तर दल स्थापित किया। श्री जोगेश चन्द्र चट्टोपाध्याय बंगाल से इस दल का संगठन बनाने यू.पी. आये और पक्का काम कर सितम्बर, 1924 में लौट गये। उस समय बंगाल में आर्डिनेंस पास हो चुका था और आप लौटते ही हावड़ा पुल पर पकड़े गये। तलाशी लेने पर आपकी जेब से एक कागज मिला, जिस पर यू.पी. की राज्य परिषद की किसी बैठक का और यू.पी. में अपने दल के संगठन का हाल लिखा हुआ था। खैर, फिर काम चल पड़ा और काम चलाने की खातिर कई डरकैतियाँ भी की गयीं। जज के विचार में इस दल के नेता हैं श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल। श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल का नाम किससे छिपा है। आप ही 'बन्दी जीवन जैसी प्रसिद्ध व शानदार पुस्तक के लेखक हैं। बनारस के निवासी हैं और 1915 के गदरर आन्दोलन में आपने खूब काम किया था। आप बनारस षड्यन्त्र के नेता व श्री रासबिहारी जी का दायाँ हाथ थे। तब उम्रकैद हुई थी लेकिन 1920 में छूट गये थे। फिर आप अपने पिछले काम पर ही जुट गये और सन् 1925 के शुरू में 'दि रेवल्यूशनरी' परचा एक ही दिन में सारे हिंदुस्तान में बँटा। उसकी भाषा व अच्छे विचारों की अंग्रेजी अखबारों ने भी खूब तारीफ़ की थी। आप फ़रवरी में पकड़े गये। आप पर उस सम्बन्ध में मुकदमा चलाया गया और आपको दो साल कैद की सजा मिली। वहीं से आपको काकोरी के मुकदमे में घसीट लिया गया। आप बड़े जिन्दादिल हैं। कोर्ट में स्वयं खुश रहना और दूसरों को खुश रखना ही आपका काम था। आप ने अपना मामला स्वयं लड़ा। जज आपको ही सबका गुरु कहता है। 'बन्दी जीवन' का गुजराती व पंजाबी में अनुवाद हो है। चुका आप अंग्रेज़ी और बंगाली के उत्त्व कोटि के लेखक हैं। अब आपको दो उम्रकैद हो गयी है। आपके साथ आपका छोटा भाई भूपेन्द्रनाथ सान्याल भी घसीट लिया गया वह क़रीब बी.ए. में पढ़ता था। पकड़ा गया और उसे पाँच साल की कैद हो गयी। श्री शचीन्द्र के बाद अत्यन्त प्रसिद्ध वीर श्री रामप्रसाद हैं। आप जैसा सुन्दर, मजबूत जवान खोजने से मिलना भी मुश्किल है बहुत योग्य आदमी है। हिन्दी का बड़ा लेखक है। आपने कैथराइन', 'बोल्शेविकों के काम', 'मन की लहर' आदि अनेक पुस्तकें लिखीं। आप उर्दू के माने हुए शायर हैं आपकी उम्र 28 बरस की है। पहले 1919 में मैनपुरी षड्यन्त्र में आपके वारण्ट निकले और आपके गुरु श्री गेंदालाल जी आदि पकड़े गये, लेकिन आप नेपाल की ओर चले गये और वहाँ बड़ी मुश्किल सहन कर गुजारा करते रहे। पूरा दिन हल चलाना, कुदाल चलाना, मेहनत-मशक्कत करना और रात में सिर्फ डेढ़ आना पाना, जिससे पेटभर रोटी भी नहीं खा सकते थे। कई बार तो घास तक खाना पड़ा। लेकिन मज़ा यह, फिर भी बैठकर कविता लिखना, और भारतमाता की याद और प्रेम में आँसू बहाने और गीत गाने। ऐसे नौजवान कहाँ से मिल सकते हैं? आप युद्ध-विद्या में बड़े कुशल हैं और आज उन्हें फाँसी का दण्ड मिलने का कारण भी बहुत हद तक यही है। इस वीर को फाँसी का दण्ड मिला और आप हँस दिये ऐसा निर्भीक वीर, ऐसा सुन्दर जवान, ऐसा योग्य और उच्चकोटि का लेखक और निर्भय योद्धा मिलना मुश्किल है।

तीसरे वीर श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी हैं। 24 वर्ष का अत्यन्त सुन्दर जवान एम.ए., बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था। जज कहता है कि यह युगान्तर दल का एक मजबूत स्तम्भ है। आप गाड़ी रोकने वालों में थे। बाहर से था – कमजोर सूखा-सा। कलकत्ते के पास दक्षिणेश्वर बम फैक्टरी में पकड़ा गया, वहीं दस साल कैद हुई। खुशी में मोटा होने लगा। काकोरी के मुकदमे में तो शरीर खूब भर गया था और अब फाँसी की सज़ा हो गयी है।

वीर रोशन सिंह को भी फाँसी की सजा हुई है आप पहले पुलिस की मदद करते थे और बहुत-से डकैत आपने पकड़वाये थे आप भी फँस गये। लेकिन कोई डकैत तो नहीं है। जज भी कहता है, यह नौजवान सच्चे देशसेवक थे! अच्छा! इस वीर को भी बार-बार नमस्कार।

इसके बाद श्री मन्मथनाथ गुप्त की बारी है। आप काशी विद्यापीठ के बी.ए. के विद्यार्थी थे। 18 बरस की उम्र है। बंगाली, गुजराती, मराठी, उड़िया, हिन्दी, अंग्रेजी और फ्रेच आदि अनेक भाषाएँ आपने सीख ली थीं। जज ने आपको भी डकैतियों में शामिल कर 14 साल की सख्त सजा दी है। आप बड़े निर्भय हैं और यह सजा सुनकर हँस दिये। आजकल जेल में भूख हड़ताल किये बैठे हैं। आपसे गैर-सरकारी सदस्य ने जेल में आकर पूछा कि खाना क्यों नहीं खाते, तो आपने उत्तर दिया कि हम मनुष्य हैं। हमारे साथ मनुष्यों जैसा व्यवहार होना चाहिए। मैं नहीं समझता कि इस पशुओं जैसे व्यवहार को सहन कर मैं 14 साल तक जी सकूँगा। तिल-तिल कर मरने से एक बार मर जाना अच्छा है। आप पहले असहयोग में भी जेल जा चुके हैं।

अब जिस नौजवान का जिक्र होगा उसे यदि हम महापुरुष कह दें तो कुछ झूठ न होगा। वह वीर श्री राजेश चंद्र चटर्जी हैं। आप कोमिल्ला (ढाका) के रहने वाले हैं। वह बी.ए. में फिलासफी के विद्यार्थी थे। प्रोफ़ेसर आप पर बहुत खुश थे और 
कहते थे कि लड़का बड़ा होनहार है। लेकिन आपने कॉलेज तो क्या, पूरी दुनिया की फिलॉसफी पर लात मार दी और सबकुछ छोड़कर युगान्तर दल में जा मिले। आपको डिफेंस ऑफ इण्डिया एक्ट के अनुसार गिरफ्तार किया गया और अकथनीय व असहनीय कष्ट दिये गये एक दिन आपके सर पर पाखाना डाल दिया गया और चार दिन तक कोठरी में बन्द रखा गया। मुँह धोने तक के लिए पानी नहीं दिया गया और बुरी तरह मार-मारकर पूरा बदन जुख़्मी कर दिया गया। लेकिन आपके पास चुप से अधिक क्या रखा था। 1920 में छूटे तो एक मामूली कार्यकर्ता की तरह कांग्रेस में काम करते रहे। घर से गरीब हैं, लेकिन अपना घर तबाह करके भी दुनिया में सेवा होती है। आप 1923 में यू.पी. आये और फिर 'युगान्तर' दल की नींव रखी। 1924 में बंगाल लौट गये और पकड़े गये। पहले आपको आर्डिनेंस के तहत पकड़ा था, फिर यहाँ काकोरी लाया गया। आपको दस बरस कैद हुई है। बेहद खूबसूरत नौजवान हैं। जज ने आपकी बड़ी तारीफ़ की है। श्री गोविन्द चरणकार उर्फ डी.एन. चौधरी लखनऊ से पकड़े गये थे आप बहुत पुराने क्रान्तिकारी हैं। 1918 या 1919 में ढाका में पुलिस आपको पकड़ने आये। आपने गोलियों का जवाब गोलियों से दिया और गोलियों में से लड़ते-लड़ाते भाग निकले, लेकिन गोलियाँ खत्म हो चुकी थीं और आप घायल हो गये थे। पकड़े गये, कालापानी मिला। 1922 में बहुत बीमार हो गये थे, तब छोड़े गये। 1925 में फिर पकड़े गये और अब 10 साल कैद हो गयी है। अब श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य सम्बन्धी कुछ लिखेंगे। आप भी बनारस के रहने वाले थे। बनारस षड्यन्त्र के समय आपकी उम्र 16 बरस की थी, पकड़े गये। लेकिन कुछ प्रमाणित न होने से छूट गये और फिर नजरबन्द कर बुन्देलखण्ड में रखे गये। आप हिन्दी के बड़े प्रसिद्ध लेखक हैं। कानपुर के प्रताप' जैसे प्रसिद्ध अखबार के सहायक सम्पादक थे। आप बनारस से पकड़े गये और अब आपको सात साल कैद हुई है। आप बहुत सुन्दर गाते हैं। जेल में आप योगाभ्यास करते थे।
श्री राजकुमार कानपुर के रहने वाले हैं। आप बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बी.ए. में पढ़ते थे। पकड़े गये। आपके कमरे से दो रायफ़लें निकलीं। बहुत सुन्दर गाने वाले और देखने में भी आप काफ़ी सुन्दर हैं। जोशीले बहुत हैं। श्री दामोदर स्वरूप जब बहुत बीमार होने पर भी कोर्ट में बुलाये गये तो आपको जोश आ गया और आपने जज को खूब सुनायी। जज ने कहा कि फैसले के समय तुम्हें इसका मज़ा चखाया जायेगा। वीर युवक को दस साल की सजा हो गयी! जीवन एक तरह से तबाह हो गया, लेकिन आप हँस दिये। धन्य हैं ये वीर और इन्हें जन्म देने वाली वीर माताएँ।
श्री विष्णु शरण दुर्बल मेरठ के रहने वाले हैं वैश्य अनाथालय के अधीक्षक थे। बी.ए. में असहयोग कर दिया गया था और मेरठ को उन्होंने दूसरा बारदोली बना दिया था। सिविल नाफरमानी के लिए तैयार हो गये थे। बड़े सुन्दर वक्ता थे। आपके घर युगान्तरकारियों की बैठक हुई थीं। आपको सात साल की सजा हो गयी है। श्री रामदुलारे को भी 7 साल की सजा हुई है। आप कानपुर निवासी थे। स्काउट मास्टर, कांग्रेस के जोशीले सेवक थे। 6 अप्रैल को फैसला सुनाया गया, उस दिन सभी वीर गाते आये थे- 

सरफ़रोशी की तमन्ना, 
अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना 
बाजु-ए-कातिल में है।
सजाएँ लापरवाही से सुनीं और हँस दिये। उसके बाद दुख की घड़ी आ गयी। जिन वीरों ने एक साथ समुद्र में किश्तियाँ डाली थीं, उनके ही अलग होने का पल आ गया। "क्रान्तिकारी लोगों में जो अगाध और गम्भीर प्रेम होता है, उसे साधारण दुनियादार आदमी अनुभव नहीं कर सकते " श्री रासबिहारी के इस वाक्य का अर्थ भी हम लोग नहीं समझ सकते। जिन लोगों ने 'सिर रख तली प्रेम की गली' में पैर रख दिया हो, उनकी महिमा को हमारे जैसे निकृष्ट आदमी क्या समझ सकते हैं? उनका परस्पर प्रेम कितना गहन होता है, उसे हम सपने में भी नहीं जान सकते। डेढ़ साल से अपने जीवन के अन्धकारमय भविष्य के इन्तजार में मिलकर बैठे थे। वह पल आया, तीन को फांसी, एक को उम्रकैद, एक को 14 बरस कैद, 4 को दस वर्ष कैद व बेटियों को 5 से 10 साल की सख्त केद सुनाकर जज उन्हें उपदेश देने लगा, "आप सच्चे सेवक और त्यागी हो। लेकिन गृलत रास्ते पर चले हो।" गरीब भारत में ही सच्चे देशभक्तों का यह हाल होता है। जज उन्हें अपने कामों पर पुनर्विचार करने की बात कह चलता बना और फिर...फिर क्या हुआ? क्या पूछते हैं? जुदाई के पल बड़े बुरे होते हैं। जिन्हें फाँसी की सजा मिल गयी, जिन्हें उम्रभर के लिए जेल में बन्द कर दिया गया, उनके दिलों का हाल हम नहीं समझ सकते। कदम-कदम पर रोने वाले हिन्दुस्तानी, यों ही थर-थर काँपने लग जाने वाले कायर हिन्दुस्तानी, उन्हें क्या समझ सकते हैं? छोटों ने बड़ों के पैरों पर झुककर नमस्कार किया। उन्होंने छोटों को आशीर्वाद दिया, जोर से गले मिले और आह भरकर रह गये भेज दिये गये। जाते हुए श्री रामप्रसाद जी ने बड़े दर्दनाक लहजे में कहा-
 दरो-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं।
खुश रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते हैं।

 यह कहकर वह लम्बी, बड़ी दूर की यात्रा पर चले गये। दरवाजे से निकलते समय उस अदालत के बड़े भारी रैंकन थियेटर हाल की भयावह चुप्पी की एक आह भरकर तोड़ते हुए उन्होंने फिर कहा-

हाय, हम जिस पर भी तैयार थे मर जाने को।
जीते जी हमसे छुड़ाया उसी काशाने को।

हम लोग एक आह भरकर समझ लेते हैं कि हमारा फूर्ज पूरा हो गया। हमें आग नहीं लग उठती, हम तड़प नहीं उठते, हम इतना मुर्दे हो गये हैं। आज वे भूख-हड़ताल कर बैठे हैं और तड़प रहे हैं और हम चुपचाप सब तमाशा देख रहे हैं। ईश्वर उन्हें बल व शक्ति दे कि वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों के बलिदान रंग लायें।

लेखक

'विद्रोही'