Friday, April 23, 2021

ये वुहान वायरस से भी ज्यादा खतरनाक है..!

देश और दुनिया में गजब का माहौल चल रहा है। हर कदम पर मौत नजर आ रही है। कोरोना वायरस एक ऐसी महामारी जिसने लोगो की तबाह कर के रख दी है। इसे वुहान वायरस कहकर बुलाया जाए  तो ज्यादा सही है। देश एम इस वायरस को लेकर खूब राजनीति हुई कुछ ने कहा ये अफवाह है! कुछ ने कहा हम वैक्सीन नही लगवाएंगे ये लोगो को नपुंसक बना देगी! कुछ लोग तो इस वायरस के सहारे सरकार बना रहे थे कह रहे थे हमारी सरकार आएगी तब हम मुफ्त में वैक्सीन लगवाएंगे ये भाजपा की वैक्सीन पर भरोसा नही हमे। जब दूसरी लहर चली तो सबकी अकल ठिकाने आ गई।
सोशल मीडिया पर लोग मोदी विरोध में इतना गिर गए हैं की देश विरोधी गतिविधियों से भी बाज नही आ रहे है। खैर इसमें कौन सा नया बात है ये रोज का हो गया है। कई लोगो की मां 3 घंटे से तड़पकर मर गई यकीन नही होता न तो देखिए इस तस्वीर में...

 गौर से देखिए कैसे एक ही पोस्ट को  कॉपी पेस्ट करके सब छापे जा रहे है। एक बहुत बड़ा एजेंडा चलाया जा रहा है देश को नीचा गिराने की जिसका मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी हो गया है। देश में जहा भाजपा की सरकार है वहा भाजपा के मुख्यमंत्रियों की  बुराइयां निकाली जा रही है और जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकार है वहा प्रधामंत्री  मोदी जी को गलत ठहराया जा रहा है की ये कोरोना को रोकने में नाकाम साबित हुए है अगर पूरी लेफ्ट लिबरल मीडिया द्वारा । पर सत्य तो यही है कि झूठ पर झूठ बोला जा रहा है तथ्य को गलत बताया जा रहा है मोदी घृणा में कुछ मुट्ठी भर लोगों ने पूरे देश को भटकाने की कोशिश की है इस महामारी के दौर में। वुहान वायरस से भी खतरनाक वायरस तो ये तथाकथित मुट्ठी भर लोग है जिन्होंने देश को कई सालो से अंदर से खोखला करने में कोई कसर नही छोड़ी है।
लाशों पर राजनीति करने से विपक्ष तनिक संकोच नहीं कर रहा है।भले ही ये विपक्ष वाले खुद संक्रमित क्यों ना जाए पर इनकी सत्ता पाने की लालसा कभी नही जायेगी। ये घटिया लोग बस देश में आराजकता फैलाने के सिवाय और किए ही क्या है?  

Saturday, April 10, 2021

रणनीति बदलने की जरूरत

लेखक- मारूफ रजा
सामरिक विश्लेषक
        बीजापुर में सर्च ऑपरेशन - फोटो : ANI

माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर में हुई मुठभेड़ के दौरान बंधक बनाए गए सीआरपीएफ के कोबरा कमांडर राकेश्वर सिंह मनहास को सामाजिक कार्यकर्ता धर्मपाल सैनी और आदिवासी नेता तेलम बोरइया की मौजूदगी में छोड़ दिया है। तीन अप्रैल को बीजापुर के तरेम के जंगल में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में सीआरपीएफ, एसटीएफ और डीआरजी के 22 जवान शहीद हो गए थे। इस घटना के बाद क्या इस बात की समीक्षा होगी कि आखिर क्यों माओवादी मध्य भारत के जंगल में लगातार सफल होते जा रहे हैं?
बस्तर में सुरक्षा बलों के भारी-भरकम दस्ते पर घात लगाकर किया गया माओवादियों का यह हमला मध्य भारत के माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में किए गए अतीत के दूसरे हमलों जैसा ही था। अक्सर घात लगाने का उनका तरीका अतीत में किए गए हमले जैसा ही होता है। सुरक्षा बलो पर या तो तब हमला किया जाता है, जब जंगलों में थका देने वाले ऑपरेशन के बाद वे कैम्प की ओर लौट रहे होते हैं या फिर जब वह ऐसे पुलिस कैम्प में होते हैं, जिसकी पुख्ता सुरक्षा न हो। ऐसे जनसंहार को रोकने के तरीके हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए ऊपर से नीचे की ओर देखने के दृष्टिकोण की जरूरत है, न कि नीचे से ऊपर की ओर देखने वाले दृष्टिकोण की। माओवादियों ने विगत तीन दशकों में भारत के मध्य हिस्से में विस्तार किया है और वह समय-समय पर पशुपति (नेपाल) से लेकर तिरुपति (दक्षिण भारत) तक लाल गलियारे में अपनी ताकत दिखाते रहते हैं। कुछ वर्ष पूर्व अपने चरम में देश के दो सौ जिले माओवादी हिंसा से प्रभावित थे और उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आधिकारिक तौर पर कहा था कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए माओवादी हिंसा सबसे बड़ी चुनौती है)

दिल्ली से किए जाने वाले प्रयास आज भी पहले जैसे ही अनियमित हैं। एक समस्या देश की संघीय प्रकृति और राज्य सरकारों के विरोध से जुड़ी हुई है। यह चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र सरकार के समग्रता में किए जाने वाले प्रयास को बाधित कर सकता है। एक राज्य के विद्रोही किसी दूसरे राज्य के वोट बैंक नहीं हो सकते! यह दुखद है कि नागरिकों की सुरक्षा के मामले में राजनीति अक्सर अतीत की चूकों का अनुसरण करने लगती है। इस क्षेत्र में जरूरत से अधिक तनाव झेलते हुए पुलिस जवान पर्याप्त वरिष्ठ नेतृत्व के काम करते रहते हैं।

एक दशक पहले सीआरपीएफ के एक डीजीपी ने मुझे बताया था कि उनके लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि कैसे वह सीआरपीएफ के वरिष्ठ अधिकारियों (आईजी और डीआईजी) को शहरों की आरामदायक जिंदगी से बाहर निकालकर जंगलों में तैनात बल की कमान संभालने के लिए भेजें। हमारे प्रायः सारे पुलिस बल का नेतृत्व आईपीएस अधिकारी करते हैं और उनमें से अनेक पुलिस के कार्य में दक्ष है और ये नक्सलियों या उग्रवादियों से मुकाबला करने के लिए सिविल सेक से नहीं जुड़े हैं। इसके अलावा उनके पास न तो नक्सली हिंसा से लड़ने का अनुभव है और न ही वह दिलचस्पी । वे ऑपरेशनल एरिया में तैनाती के प्रति अनिच्छुक होते हैं। एक तरीका है कि सेना के उग्रवाद विरोधी ऑपरेशन के अनुभव वाले वरिष्ठ अधिकारियों (कर्नल से लेकर जनरल) को केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ के जवानों का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी जाए। यदि सेना गृह मंत्रालय या पीएमओ के अधीन आने वाले एनएसजी या एस्टेब्लिशमेंट 22' (विशेष सीमांत बल) के लिए अधिकारी उपलब्ध करा सकती है, तो फिर माओवाद विरोधी अभियान के लिए क्यों नहीं? इसी तरह से ऐसे ऑपरेशन में हेलीकॉप्टर के इस्तेमाल के बारे में भी विचार करना चाहिए।

नक्सली और चरमपंथी रोजगार और आधारभूत ढांचे से वंचित स्थानीय लोगों से समर्थन जुटाते हैं। माओवादियों से निपटने के लिए तीन स्तरीय रणनीति पर काम हो सकता है: (1) आवश्यक सैन्य बल का इस्तेमाल (2) स्थानीय लोगों की बुनियादी मुश्किलों के समाधान के साथ ही आधारभूत ढांचे का समयबद्ध निर्माण (3) जमीनी स्तर पर स्थिति के नियंत्रित होने और सैन्य ऑपरेशन के कम होने के बाद स्थानीय लोगों की राजनीतिक मांगों को सुलझाने के लिए बातचीत की पहल।

(इस लेख का स्रोत अमर उजाला  अखबार है। जिसे  राष्ट्रचिंतक ब्लॉग पर प्रकाशित किया गया है )

Tuesday, April 6, 2021

आतंकवादी है ये

लेखक- अवधेश कुमार

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में माओवादियों ने फिर साबित किया कि आतंकवाद की तरह खून और हिंसा के अलावा उनका कोई मानवीय उद्देश्य नहीं। पूरा देश शहीद और घायल जवानों के साथ है। करीब चार घंटे चली मुठभेड़ में 15 माओवादियों के ढेर होने का मतलब उनको भी बड़ी क्षति हुई है। साफ है कि वे भारी संख्या में घायल भी हुए होंगे। किंतु, 2223 जवानों का शहीद होना वड़ी क्षति है। 31 से अधिक घायल जवानों का अस्पताल में इलाज भी चल रहा है। इससे पता चलता है कि माओवादियों ने हमला और मुठभेड़ की सघन तैयारी की थी।
जो जानकारी है माओवादियों द्वारा षडयंत्र की पूरी व्यूह रचना से घात लगाकर की गई गोलीबारी में घिरने के बाद भी जवानों ने पूरी वीरता से सामना किया, अपने साथियों को लहूलुहान होते देखकर भी हौसला नहीं खोया, माओवादियों का घेरा तोड़ते हुए उनको हताहत किया तथा घायल जवानों और शहीदों के शव को घेरे से बाहर भी निकाल लिया। कई बातें सामने आ रही हैं। सुरक्षाबलों को जोनागुड़ा की पहाड़ियों पर भारी संख्या में हथियारबंद माओवादियों के होने की जानकारी मिली थी। छत्तीसगढ़  के माओवाद विरोधी अभियान के पुलिस उप महानिरीक्षक ओपी पाल की माने तो रात में बीजापुर और सुकमा जिले से केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के कोबरा बटालियन, डीआरजी और एसटीएफ के संयुक्त दल के दो हजार जवानों को ऑपरेशन के लिए भाजा गया था। माओवादियों ने इनमें 700 जवानों को तर्रेम इलाके में जोनागुड़ा पहाड़ियों के पास घेरकर तीन ओर से हमला कर दिया। इस घटना के बाद फिर लगता हैं मानो हमारे पास गुस्से में छटपटाना और मन मसोसना ही विकल्प है। यह प्रश्न निरंतर बना हुआ है  कि आखिर कुछ हजार की संख्या वाले 
हिंसोन्माद से ग्रस्त ये माओवादी कब तक हिंसा की ज्वाला धधकाते रहेंगे? ध्यान रखिए माओवादियों ने 17 मार्च को ही शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा था। इसके लिए उन्होंने तीन शर्ते रखी थीं - सशस्त्र बल हटे, माओवादी संगठनों से प्रतिबंध खत्म हों और जेल में बंद उनके नेताओं को बिना शर्त रिहा किया जाए। एक ओर बातचीत का प्रस्ताव और इसके छठे दिन 23 मार्च को नारायणपुर में वारूदी सुरंग विस्फोट में पांच जवान शहीद हो गए। दोपहर में सिलगेर के जंगल में घात लगाए माओवादियों ने हमला कर दिया था। ऐसे खूनी धोखेबाजों और दुस्साहसों की लंबी श्रृंखला है। साफ है कि इसे अनिश्चितकाल के लिए जारी रहने नहीं दिया जा सकता। यह प्रश्न तो उठता है कि आखिर दो दशकों से ज्यादा की सैन्य -असैन्य कार्रवाइयों के बावजूद उनकी ऐसी शक्तिशाली उपस्थिति क्यों है? निस्संदेह, यह हमारी पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यहीं से राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रश्नों के घेरे में आती है। पिछले करीब ढाई दशक से केंद्र और माओवाद प्रभावित राज्यों में ऐसी कोई सरकार नहीं रही जिसने इन्हें खतरा न बताया हो। यूपीए सरकार ने आंतरिक सुरक्षा के लिए माओवादियों को सबसे बड़ा खतरा घोषित किया था। केंद्र के सहयोग से अलग-अलग राज्यों में कई सैन्य अभियानों के साथ जन जागरूकता, सामाजिक-आर्थिक विकास के कार्यक्रम चलाए गए हैं, लेकिन समाज विरोधी, देश विरोधी, हिंसाजीवी माओवादी रक्तबीज की तरह आज भी चुनौती बन कर उपस्थित हैं। हमें यहां दो पहलुओं पर विचार करना होगा।

भारत में नेताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, एक्टिविस्टों का एक वर्ग माओवादियों की विचारधारा को लेकर सहानुभूति ही नहीं रखता उनमें से अनेक इनको कई प्रकार से सहयोग करते हैं। राज्य के विरुद्ध हिंसक संघर्ष के लिए वैचारिक खुराक प्रदान करने वाले ऐसे अनेक चेहरे हमारे आपके बीच हैं। इनमें कुछ जेलों में डाले गए हैं, कुछ जमानत पर हैं। इनके समानांतर ऐसे भी हैं, जिनकी पहचान मुश्किल है। गोष्ठियों, सेमिनारों, लेखों, वक्तव्यों आदि में जंगलों में निवास करने वालों व समाज की निचली पंक्ति वालों की आर्थिक सामाजिक दुर्दशा का एकपक्षीय चित्रण करते हुए ऐसे तर्क सामने रखते हैं, जिनका निष्कर्ष यह होता है कि बिना हथियार उठाकर संघर्ष किए इनका निदान संभव नहीं है। अब समय आ गया है जब हमारे आपके जैसे शांति समर्थक आगे आकर सच्चाइयों को सामने रखें। अविकास, अल्पविकास, असमानता, वंचितों, वनवासियों का शोषण आदि समस्याओं से कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। केंद्र और राज्य ऐसे अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम चला रहे हैं, जो धरातल तक पहुंचे हैं। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए जा रहे और बने हुए आवास, स्वच्छता अभियान के तहत निर्मित शौचालय, ज्योति योजनाओं के तहत बिजली की पहुंच, सड़क योजनाओं के तहत दूरस्थ गांवों व क्षेत्रों को जोड़ने वाली सड़कों का लगातार विस्तार, किसानों के खाते में हर वर्ष 6000 भुगतान, वृद्धावस्था व विधवा आदि पेंशन, पशुपालन के लिए सब्सिडी जैसे प्रोत्साहन, आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य सेवा, कई प्रकार की इंश्योरेंस व पेंशन योजनाएं को साकार होते कोई भी देख सकता है। हर व्यक्ति की पहुंच तक सस्ता राशन उपलब्ध है। कोई नहीं कहता कि स्थिति शत प्रतिशत बदल गई है, लेकिन बदलाव हुआ है, स्थिति वेहतर होने की संभावनाएं पहले से ज्यादा मजबूत हुई हैं तथा पहाड़ों, जंगलों पर रहने वालों को भी इसका अहसास हो रहा है।

इसमें जो भी इनका हित चिंतक होगा वो इनको झूठ तथ्यों व गलत तर्कों से भड़का कर हिंसा की ओर मोड़ेगा, उसके लिए विचारों की खुराक उत्पन्न कराएगा, संसाधनों की व्यवस्था करेगा या फिर जो भी सरकारी, गैर सरकारी कार्यक्रम हैं, वे सही तरीके से उन तक पहुंचे, उनके जीवन में सुखद बदलाव आए इसके लिए काम करेगा? साफ है माओवादियों के थिंक टैंक और जानबूझकर भारत में अशांति और अस्थिरता फैलाने का विचार खुराक देने वाले तथा झन सबके लिए संसाधनों की व्यवस्था में लगे लोगों पर चारों तरफ से चोट करने की जरूरत है। निश्चित रूप से इस मार्ग की बाधाएं  हमारी राजनीति है। तो यह प्रश्न भी विचारणीय है कि आखिर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई में राजनीतिक एकता कैसे कायम हो?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विशेषज्ञ है। इनका यह लेख "राष्ट्रीय सहारा" अखबार में आज प्रकाशित हुआ है)

Saturday, March 20, 2021

युद्ध अभी जारी है...


फाँसी पर लटकाये जाने से 3 दिन पूर्व - 20 मार्च, 1931 को - भगतसिंह. सुखदेव और राजगुरु ने पंजाब के गवर्नर को यह पत्र भेजकर माँग की थी कि उन्हें युद्धबन्दी माना जाये तथा फाँसी पर लटकाये जाने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये।

हमें फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये।

20 मार्च, 1931 प्रति, गवर्नर पंजाब, शिमला

महोदय,

उचित सम्मान के साथ हम नीचे लिखी बातें आपकी सेवा में रख रहे हैं भारत की ब्रिटिश सरकार के सर्वोच्च अधिकारी वायसराय ने एक विशेष अध्यादेश जारी करके लाहौर षड्यन्त्र अभियोग की सुनवायी के लिए एक विशेष न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) स्थापित किया था, जिसने 7 अक्टूबर, 1930 को हमें फाँसी का दण्ड सुनाया। हमारे विरुद्ध सबसे बड़ा आरोप यह लगाया गया है कि हमने सम्राट जॉर्ज पंचम के विरुद्ध युद्ध किया है। न्यायालय के इस निर्णय से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं- पहली यह कि अंग्रेज़ जाति और भारतीय जनता के मध्य एक युद्ध चल रहा है। दूसरे यह कि हमने निश्चित रूप में इस युद्ध में भाग लिया है, अतः हम युद्धबन्दी हैं।

यद्यपि इनकी व्याख्या में बहुत सीमा तक अतिशयोक्ति से काम लिया गया है, तथापि हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि ऐसा करके हमें सम्मानित किया गया है। पहली बात के सम्बन्ध में हम तनिक विस्तार से प्रकाश डालना चाहते हैं। हम नहीं समझते कि प्रत्यक्ष रूप में ऐसी कोई लड़ाई छिड़ी हुई है। हम नहीं जानते कि युद्ध छिड़ने से न्यायालय का आशय क्या है? परन्तु हम इस व्याख्या को स्वीकार करते हैं और साथ ही इसे इसके ठीक सन्दर्भ में समझाना चाहते हैं।

                    युद्ध की स्थिति

हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज़ पूँजीपति और अंग्रेज़ या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है। चाहे शुद्ध भारतीय पूँजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तो भी इस स्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता । यदि आपकी सरकार कुछ नेताओं या भारतीय समाज के मुखियों पर प्रभाव जमाने में सफल हो जायें, कुछ सुविधाएँ मिल जायें, अथवा समझौते हो जायें, इससे भी स्थिति नहीं बदल सकती, तथा जनता पर इसका प्रभाव बहुत कम पड़ता है। हमें इस बात की भी चिन्ता नहीं कि युवकों को एक बार फिर धोखा दिया गया है और इस बात का भी भय नहीं है कि हमारे राजनीतिक नेता पथ-भ्रष्ट हो गये हैं और वे समझौते की बातचीत में इन निरपराध, बेघर और निराश्रित बलिदानियों को भूल गये हैं, जिन्हें दुर्भाग्य से क्रान्तिकारी पार्टी का सदस्य समझा जाता है। हमारे राजनीतिक नेता उन्हें अपना शत्रु समझते हैं, क्योंकि उनके विचार में वे हिंसा में विश्वास रखते हैं। हमारी वीरांगनाओं ने अपना सबकुछ बलिदान कर दिया है। उन्होंने अपने पतियों को बलिवेदी पर भेंट किया, भाई भेंट किये, और जो कुछ भी उनके पास था सब न्योछावर कर दिया। उन्होंने अपनेआप को भी न्योछावर कर दिया। परन्तु आपकी सरकार उन्हें विद्रोही समझती है। आपके एजेण्ट भले ही झूठी कहानियाँ बनाकर उन्हें बदनाम कर दें और पार्टी की प्रसिद्धि को हानि पहुँचाने का प्रयास करें, परन्तु यह युद्ध चलता रहेगा।


                   युद्ध के विभिन्न स्वरूप

हो सकता है कि यह लड़ाई भिन्न-भिन्न दशाओं में भिन्न-भिन्न स्वरूप ग्रहण करे। किसी समय यह लड़ाई प्रकट रूप ले ले, कभी गुप्त दशा में चलती रहे, कभी भयानक रूप धारण कर ले, कभी किसान के स्तर पर युद्ध जारी रहे और कभी यह घटना इतनी भयानक हो जाये कि जीवन और मृत्यु की बाज़ी लग जाये चाहे कोई भी परिस्थिति हो, इसका प्रभाव आप पर पड़ेगा। यह आपकी इच्छा है कि आप जिस परिस्थिति को चाहें चुन लें, परन्तु यह लड़ाई जारी रहेगी। इसमें छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं दिया जायेगा। बहुत सम्भव है कि यह युद्ध भयंकर स्वरूप ग्रहण कर ले। पर निश्चय ही यह उस समय तक समाप्त नहीं होगा जब तक कि समाज का वर्तमान ढाँचा समाप्त नहीं हो जाता, प्रत्येक में परिवर्तन वस्तु या क्रान्ति समाप्त नहीं हो जाती और मानवी सृष्टि में एक नवीन युग का सूत्रपात नहीं हो जाता।


                       अन्तिम युद्ध

निकट भविष्य में अन्तिम युद्ध लड़ा जायेगा और यह युद्ध निर्णायक होगा। साम्राज्यवाद व पूँजीवाद कुछ दिनों के मेहमान हैं। यही वह लड़ाई है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप में भाग लिया है और हम अपने पर गर्व करते हैं कि इस युद्ध को न तो हमने प्रारम्भ ही किया है और न यह हमारे जीवन के साथ समाप्त ही होगा। हमारी सेवाएँ इतिहास के उस अध्याय में लिखी जायेंगी जिसको यतीन्द्रनाथ दास और भगवतीचरण के बलिदानों ने विशेष रूप में प्रकाशमान कर दिया है । इनके बलिदान महान हैं। जहाँ तक हमारे भाग्य का सम्बन्ध है, हम जोरदार शब्दों में आपसे यह कहना चाहते हैं कि आपने हमें फांसी पर लटकाने का निर्णय कर लिया है । आप ऐसा करेंगे ही, आपके हाथों में शक्ति है और आपको अधिकार भी प्राप्त है। परन्तु इस प्रकार आप जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला सिद्धान्त ही अपना रहे हैं और आप उस पर कटिबद्ध हैं। हमारे अभियोग की सुनवाई इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि हमने कभी कोई प्रार्थना नहीं की और अब भी हम आपसे किसी प्रकार की दया की प्रार्थना नहीं करते। हम आपसे केवल यह प्रार्थना करना चाहते हैं कि आपकी सरकार के ही एक न्यायालय के निर्णय के अनुसार हमारे विरुद्ध युद्ध जारी रखने का अभियोग है इस स्थिति में हम युद्धबन्दी हैं, अंत: इस आधार पर हम आपसे माँग करते हैं कि हमारे प्रति युद्धबन्दियों जैसा ही व्यवहार किया जाये और हमें फाँसी देने के बदले गोली से उड़ा दिया जाये।

अब यह सिद्ध करना आपका काम है कि आपको उस निर्णय में विश्वास है जो आपकी सरकार के एक न्यायालय ने किया है । आप अपने कार्य द्वारा इस बात का प्रमाण दीजिये। हम विनयपूर्वक आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप अपने सेना-विभाग को आदेश दे दें कि हमें गोली से उड़ाने के लिए एक सैनिक टोली भेज दी जाये।

भवदीय,

भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव


Friday, March 19, 2021

संकल्प सिद्धि से बदल गया यूपी

आत्मनिर्भरता के पथ पर तेजी से आगे बढ़ता हुआ यह वही उत्तर प्रदेश आ है जिसके बारे में लोगों ने धारणा बना रखी थी कि इसका कुछ नहीं हो सकता है। उन्नति की अनत सभावनाओं वाले भारत के सबसे बड़े राज्य की 24 करोड़ जनाकाक्षाओं को साकार करने का हमारा व्रत आज चार वर्ष पूर्ण कर रहा है। लक्ष्य अत्योदय, प्रण अंत्योदय, पथ अंत्योदय के सकल्प को आत्मसात करते हुए उत्तर प्रदेश की सेवा करते चार वर्ष कैसे बीते इसका क्षण भर भी भान न हो सका, और अब यह विश्वास और दृढ़ हो चला है कि साफ नीयत और नेक इरादे से किए गए सद्प्रयास सुफलित अवश्य होते हैं। इस प्रयास से लोगों की धारणा बदलने में मदद मिल रही है।

कोविड-19 की विभीषिका से संघर्ष का एक वर्ष बीत चुका है। मुझे याद आता है जनता कप का वह दिन जब कोरोना के गहराते सकट के बीच महामहिम राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति महोदय ने फोन पर बातचीत कर मुझसे प्रदेश की तैयारी के सबंध में जानकारी ली थी। उन्हें चिता थी कि कमजोर हेल्थ इफ्रास्ट्रक्चर, सघन जनघनत्व व भू-क्षेत्रीय विविधता और बड़े क्षेत्रीय विस्तार वाला उत्तर प्रदेश इस महामारी का सामना कैसे करेगा? मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कि उत्तर प्रदेश इस आपदा में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेगा और अतत हुआ भी यही हमने आदरणीय प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी जी के टैस्टिंग और ट्रेसिंग के मत्र को आत्मसात किया और इसे व्यावहारिक धरातल पर उतारने की चुनौती को स्वीकार किया, इसका नतीजा यह है कि सरकार ने लोगों के जीवन और जीविका दोनों को सरक्षित करने में सफलता प्राप्त की। निवासी हों या प्रवासी सबका ध्यान रखा गया। दूसरे प्रदेशों में रह रहे उत्तर प्रदेश के लोगों की कोई समस्या हो, बाहर से आए श्रमिकों व कामगारों की चुनौतिया अथवा प्रदेश में निवासरत लोगों की जरूरतें, सब पर सीधी नजर रखी गई। मुझे आज यह कहते हुए आत्मिक संतोष की अनुभूति हो रही है कि समाज के हर तबके ने एकजुट होकर इस महामारी से लड़ाई लड़ी। उत्तर प्रदेश के कोविड प्रबधन की वैश्विक स्तर पर सराहना हुई।निसंदेह इस आपदाकाल में राष्ट्रीय पटल पर एक नया उत्तर प्रदेश उभर कर आया है। प्रधानमंत्री जी देश को पाच ट्रिलियन यूएस डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनाने का महान लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। उन्होंने हमें आत्मनिर्भरता का मंत्र दिया है।

उत्तर प्रदेश इस लक्ष्य का संधान कर उनके स्वप्न को साकार करने में अग्रणी भूमिका निभाने को अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। बुदेलखड में महिलाओं के सतत प्रयासों से निर्मित बलनी मिल्क प्रोड्यूसर्स समूह ने दुग्ध उत्पादन में जिस प्रकार से 46 करोड़ वार्षिक का टर्नओवर कर दो करोड़ रुपए का लाभ प्राप्त किया है, वह वास्तव में प्रेरणास्पद है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में युवाओं और महिलाओं द्वारा किए जा रहे ऐसे अनेक नवाचारी प्रयास 'आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश' के स्वप्न को साकार करने की आधारशिला बन रहे हैं। कहा भी जाता है  "उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथैः"।

आत्मनिर्भरता के पथ पर तेजी से आगे बढ़ता हुआ यह वही उत्तर प्रदेश है जहा मात्र चार वर्ष में 40 लाख परिवारों को आवास मिला, एक करोड़ 38 लाख परिवारों को बिजली कनेक्शन मिला, हर गांव की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाया गया तथा गांव-गांव तक ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाने का कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है। हम विश्वस्तरीय कनेक्टिविटी स्थापित कर विकास को रफ्तार देकर आत्मनिर्भर प्रदेश बनाने की दिशा में अग्रसर है। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस, पारदर्शी एवं स्पष्ट कार्य संस्कृति, सुदृढ़ कानून-व्यवस्था से व्यवसाय व विकास के लिए अनुकूल माहौल तैयार हुआ है। इस बदलते वातावरण का परिणाम है कि आज निवेशकों की पहली पसंद उत्तर प्रदेश है। चार साल के भीतर ' ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' की राष्ट्रीय रैंकिंग में 12 पायदान ऊपर उठकर नम्बर दो पर आना कोई सरल कार्य नहीं था, पर हमने यह कर दिखाया। यह वही प्रदेश है जहां वर्ष 2015-16 में प्रति व्यक्ति आय मात्र 47,116 रुपए थी, जबकि आज यह 94,495 रुपए है। जीएसडीपी के आधार पर यह देश की दूसरे नम्बर की अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है।

चार वर्ष पूर्व अन्नदाता किसान के ऋण माफी से वर्तमान सरकार की लोक कल्याण की यात्रा प्रारंभ हुई थी। राज्य सरकार ने अपनी पहली ही कैबिनेट में लघु व सीमान्त किसानों के लिए ऋणमाफी का निर्णय लिया। आज प्रदेश में किसान उन्नत तकनीक से जुड़ कर कृषि विविधीकरण की ओर अग्रसर हो रहे हैं। उनकी लागत को कम करने और आय को दोगुनी करने की दिशा में हम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। प्रदेश सरकार ने दशकों से लबित पड़ी सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने का कार्य किया है। किसान के प्रति यह हमारी प्राथमिकता और प्रतिबद्धता ही है कि प्रदेश में अब तक 1 27 लाख करोड़ रुपए का रिकॉर्ड गन्ना मूल्य भुगतान किसानों को किया जा चुका है। किसानों की उम्मीद और खुशहाली हमारी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है और हम इस पर पूरी तरह खरे उतरने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं।

"आस्था और अर्थव्यवस्था दोनों के प्रति हमारा समदर्शी भाव है। हमारी नीतियों में दोनों भाव समानातर गति करते हैं। बीते चार वर्षों में उत्तर प्रदेश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जो ज्योति प्रज्वलित हुई है, उसने हर सनातन आस्थावान व्यक्ति के हृदय को आलोकित किया है । 'गंगा यात्रा के माध्यम से आस्था और आर्थिकी दोनों के उद्देश्य पूरे हुए। श्रीराम जन्मभूमि पर सकल आस्था के केंद्र प्रभु श्रीराम के भव्य-दिव्य मंदिर के निर्माण के शिलान्यास की सदियों पुरानी बहुप्रतीक्षित साधना वर्ष 2020 में पूरी हुई। वर्तमान राज्य सरकार अयोध्या को वैदिक और अधुनातन सस्कृति के समन्वित नगर की प्रतिष्ठा से विभूषित करने के लिए नियोजित प्रयास कर रही है। प्रभु श्रीराम के आशीष से हमारा यह प्रयास भी अवश्य सफल होगा।

प्रधानमंत्री जी ने हमें 'सबका साथ-सबका विकास सबका विश्वास का पाथेय प्रदान किया है। आज जबकि वर्तमान प्रदेश सरकार चार वर्ष पूरे कर रही है तो मुझे व्यक्तिगत प्रसन्नता है कि हम इसी पाथेय के अनुरूप अपनी नीतियों को क्रियान्वित करने में सफल रहे हैं। हमारे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी इस बात को मानते हैं कि बीते चार सालों में एक भी ऐसी योजना नही शुरू हुई जो किसी जाति, धर्म, पथ, मजहब के आधार पर विभेद करती हो। कुछ समय पूर्व जब हम उत्तर प्रदेश को संभावनाओं वाला प्रदेश कहते थे तो कुछ लोग कहते थे यहा कुछ नहीं हो सकता, लेकिन लोक कल्याण के सकल्प की शक्ति के बूते आज उतर प्रदेश के सपने साकार हो रहे हैं। पिछले चार साल में नए भारत के नए उत्तर प्रदेश का सृजन हुआ है। चार साल पहले जिस प्रदेश को देश और दुनिया में बीमारू कहा जाता था, जहां युवा पलायन को मजबूर था, आज उसकी प्रगति और उसकी नीतिया अन्य राज्यों के लिए उदहारण बन रही हैं। राज्य वही है, संसाधन वही हैं, काम करने वाले वही हैं, बदली है तो बस कार्यसंस्कृति। यही प्रतिबद्धतापूर्ण, समर्पित भावना वाली पारदर्शी कार्यसस्कृति इस नए उतर प्रदेश की पहचान है।

चुनौतिया कितनी बड़ी क्यों न हों, मार्ग कितना भी दुष्कर क्यों न हो, लोक कल्याण के सकल्प पथ पर सिद्धि की ओर यह यात्रा इसी प्रकार गतिमान रहेगी।
सागर की अपनी क्षमता है
पर मांझी भी कब थकता है
जब तक सांसों में स्पन्दन है
उसका हाथ नहीं रुकता है

मां भारती हमारा पथ प्रशस्त करे...

 -योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश

(यह लेख आज राष्ट्रीय सहारा अखबार में  प्रकाशित हुआ था)