Thursday, September 16, 2021

मादर-ए-वतन सब हिन्दू हैं


सभी का ख़ून हैं शामिल यहाँ की मिट्टी में, किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी हैं,
सही तो कह गए मियाँ इंदौरी, आख़िर बाप तुम्हारा ग़ज़नी, अब्दाली या क़ासिम थोड़ी है, 

जिन माताओं की अस्मतें लूटीं उन आठसौ सालों में, वो नृशंसता बादशाह या सुल्तानों की थोड़ी हैं,
कहीं मूर्ति तोड़ी तो कहीं मंदिर तोड़े, फ़िर भी ये इतिहास काला थोड़ी हैं,

गज़वा-ए-हिन्द के गाज़ी आए और निपट गए, फ़िर भी ये सोच हारी थोड़ी है,
हिन्दू से नफ़रत सीने में दबाए, आज भी आतंकी जिहादी थोड़ी हैं,

कौन-सी ग़ैरत है तुम्हें यह मानने से, की तुर्कों-अरब से तुम्हारा रिश्ता थोड़ी हैं,
जिस संस्कृति ने अपनाया, उसी को काफ़िर मानते, ये जहालत भी तुम्हारी अपनी थोड़ी हैं,

कब तक छुपाओगे अपनी पहचान, आख़िर मानने में कोई हर्ज़ थोड़ी हैं,
सभी का ख़ून एक ही हैं मियाँ इंदौरी, मादर-ए-वतन सब हिन्दू हैं!!

- गौरव राजमोहन नारायण सिंह (हृतिक सिंह)

Friday, August 6, 2021

स्वराज स्मृति

ऐसा कहा जाता है कि जब समय अपनी चलायमान गति से आगे बढ़ता है, तो लोग उन महान विभूतियों को इतिहास और यादों के किसी अस्पृश्य हिस्से में समेट लेते हैं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी 'नए भारत' के निर्माण में समर्पित कर दी।

श्रीमती स्वराज कई युवा भारतीयों के लिए एक माँ की तरह थीं, जो उन्हें मानवीय भावनाओं के विभिन्न पक्षों के प्रति संवेदनशील और अपने आदर्शों के प्रति समर्पित व्यक्तित्व के रूप में देखते थे। देश उन्हें आज भी एक मज़बूत नेत्री के रूप में देखता हैं, क्योंकि वह उस संघर्षकाल से निकली नेत्री हैं, जब राजनीति में महिलाओं के भागीदारी ना-मात्र की थी। उस काल खंड से आज के युवा भारत की सोच के बीच श्रीमती सुषमा स्वराज का जीवन एक परिवर्तनात्मक सेतुबंध हैं, जिसने समाज की दशा और दिशा बदलने में एक अकल्पनीय योगदान दिया है।

वह अपनी विचारधारा और 'अंत्योदय' को समाज में विकास का मार्ग मानती थीं। एक संघर्षरत जीवन व कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता की मिसाल बनी सुषमा स्वराज आम जन-मानस के हृदयस्पर्शी विषयों को लोकतंत्र में एक सशक्त प्रतिनिधित्व देने हेतु हमेशा जानी जाती थी, और इसीलिए जानता से उनका सीधा जुड़ाव आज भी महसूस किया जा सकता हैं। उनका स्पष्ट व संवाद कौशल राजनीतिक मतांतरों के बावजूद सभी विरोधियों कायल होने पर मजबूर कर देता था और आज भी करता हैं। यह सम्मान व सद्भाव अर्जित करना आज के राजनैतिक परिदृश्य में देख पाना बहुत मुश्किल हैं। विभिन्न भारतीय भाषाओं में उनकी विद्वत्ता व संस्कृत के प्रति उनका समर्पण आज भी याद किया जाता हैं। भारतीय संस्कृति में रमी एक ऐसी जन-नायिका शायद ही इस देश में कोई होगी, जिसका कोई राजनैतिक कुल नहीं रहा।

वे भारतीय संसद के दोनों सदनों में लंबे समय तक एक संसद सदस्य, वाजपेयी जी की सरकार में विभिन्न पदों पर मंत्री, दिल्ली के मुख्यमंत्री, लोकसभा में विपक्ष की नेता, और अंत में, मोदीजी के नेतृत्व में एक उत्कृष्ट विदेश मंत्री के रूप में उनकी राजनैतिक यात्रा बहुत शानदार और स्मरणीय रही हैं।

उनके जीवन की उपलब्धियों से पता चलता है कि जब आप अपने आपको सार्वजनिक सेवा के लिए समर्पित करते हैं, तो निश्चित ही आपका संकल्प अपने निहित लक्ष्यों को प्राप्त करेगा, जो आपने समाज कल्याण हेतु परिलक्षित किया है। श्रीमती स्वराज का जीवन अनुभव हम जैसे कई हिंदुस्तानियों को हमेशा वाजपेयी जी और डॉ कलाम की तरह एक मूल्यवान सबक देता है, जो यह हैं कि, लोक सेवा एक महान आह्वान है, जिसका सम्मान राष्ट्रीय हित व विकास में बेहद महत्वपूर्ण हैं।

आज लोग सार्वजनिक पद और लोक सेवा के बीच रेखित अंतर नहीं समझ पाते हैं, लेकिन जब हम स्वराज जी जैसे दिग्गजों व्यक्तित्व को याद करते हैं, तो हमें अपनी आस्था और निष्ठा को नेक और आवश्यक सार्वजनिक सेवा के लिए दोहराना चाहिए और राष्ट्र निर्माण में जीवन आहूत करने हेतु संकल्प लेना चाहिए।

सुषमा जी की स्मृति में

लेखक
गौरव राजमोहन नारायण सिंह

Wednesday, July 7, 2021

इस्लामिक कट्टरपंथियों को मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी है

बहुत दिनों से लिखने का कुछ मन ही नही कर रहा था क्या लिखूं क्या नही लिखूं? बड़ा ही गजब का माहौल चल रहा है देश में। श्रीराम को काल्पनिक कहने वाले उन्हे न्याय दिलाने का झूठा ढकोसला करने लगे है।  तरह-तरह के प्रपंच रचे जा रहे है। सत्ता की तड़प इतनी है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता को तहस नहस करने की साजिश रची जा रही है। देश के विकास मार्ग में बाधा बन रहे शत्रुओं का विनाश जरूरी हो गया है। आखिर कब तक भारत विरोधी एजेंडा चलता रहेगा और मौन होकर देखते रहेंगे? कोई आदिल आदित्य बनकर लव जिहाद करता है हिंदू लड़कियों की जिंदगी बर्बाद हो जाती है इसके खिलाफ किसी ने बोला तो पूरा विपक्ष हाय हाय करके लोकतंत्र की दुहाई देने लग जाता है और सेक्युलरिज्म का ढोंग रचता है। इन तथाकथित लोगो को एक लड़की की इज्जत नहीं दिखती है ये सिर्फ अपना मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने में लगे हुए है। धर्मांतरण का नंगा नाच चल रहा है जहा हिन्दू लड़कियों के साथ आए दिन लव जिहाद हो रहा है। पहले नाम छिपाकर शादी की जाती है और बाद में जबरन इस्लाम कबूल करवाया जाता है।
मदरसों में क्या कम धूमगजड़ मची है वहा तो आए दिन खबर निकलती है की 45 साल मौलवी ने 12 साल के बच्चे या बच्चियों का रेप किया। यह कैसी मजहबी  शिक्षा दी जा रही है मदरसो में जहा ये  हैवान मासूमों की जिंदगी बर्बाद कर रहे है। यहां कोई लिबरल क्रांतकारी पत्रकार  क्यों नही दिख रहे है ? क्यों नही इनकी सच्चाई दुनिया के सामने ला रहे है? वैसे देखा जाय तो मदरसों में बम बनाने ट्रेनिंग दी जाती है। सांप्रदायिक शिक्षा के नाम पर देशभर में संचालित मदरसे केवल अपनी कट्टरवादी तालीम के लिए ही बदनाम नहीं है, बल्कि हिंसक गतिविधियों एवं विस्फोटक सामग्री के भंडारण केंद्र होने के आरोप पहले भी मदरसों पर लगते रहे हैं। खबरों में सत्य तो दिख ही जाता है जब बम बनाते हुए मदरसे में ब्लास्ट हो जाता है जिसकी गूंज सबको सुनाई और चीथड़ो में पड़ी जिहादियो की लाश दिखाई देती है और । इन अवैध प्रयोगशालाओं के ऊपर जितना जल्दी हो  प्रतिबंध लगा देना चाहिए सरकार को  नही तो ये इसी तरह की आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते रहेंगे।

वहा कश्मीर में बैठा अब्दुल गजवा ए हिन्द की साजिश रचता है। रेहड़ी लगाने वाला अब्दुल खुद को बॉम्ब से उड़ा देने का
दम भरता है क्योंकि उसे यकीन है कि मरने के बाद  जन्नत नसीब होगी और बहत्तर हूरो से मुलाकात। अब्दुल का लड़का भी इसी नक्शे कदम पर चलता है और इनका जो लीडर होता है वातानुकूलित कमरे में बैठकर मजा लेते है। इनके बच्चे विदेश घूमते है और अब्दुल का लड़का सड़क पर पंचर ही बनाता है जिन्दगी भर जबतक उसे आका का फरमान ना आ जाय की कुर्बनी देनी है। अब्दुल जिहाद करता है उसके जीवन का एक ही मकसद है सिर्फ जिहाद और जिहाद! कहा जाता है की आतंकवाद का कोई धर्म या मजहब नहीं होता है तो फिर आंतकियो को मरने के बाद दफनाया क्यों जाता है ? क्या इनको समुद्र में नही फेंक देना चाहिए ताकि ये जलजीवो का निवाला बन सके ! 

 जब से अनुच्छेद 370 और 35A निष्क्रिय हुआ है जम्मू कश्मीर में तब से कुछ लोगो का दुकान ही बंद हो गया है। ऐसा लग रहा है कि भूखों मर रहे है और कोई पानी तक ना दे रहा है इनको। कुछ दो कौड़ी के नेता 370 को वापस लागू करने की बात करते है जिसकी जितनी कड़ी भर्त्सना की जाए कम है। सिर्फ निंदा करने से कुछ नही होगा इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए । कुछ तो ऐसे है जो चीन की मदद से 370 की बहाली की बात कर रहे थे क्या ऐसे लोगो का मुंह नही तोड़ देना चाहिए? कुछ रद्दी लोग 370 को रद्द करने से नाराज है और पाकिस्तान से बात करने की बाते करते है। इनकी छटपटाहट साफ देखी जा सकती है जो लूट मचाकर रखा था इन लोगो सब बंद हो गया। पत्थरबाजी और आगजनी कश्मीर में खुलेआम होती थी सुरक्षा बलो पर और हाथ में राइफल होते हुए भी जवान पत्थर का जवाब गोली से नहीं दे सकता था। पत्थरबाजो को भटका हुआ नौजवान कहा जाता था जो पैसे लेकर ये सब करते थे। जब से 370 हटा है इन पत्थरबाज जिहादियों नामो निशान मिट गया है।तथाकथित लेफ्ट विंग मीडिया ,पत्रकार और विपक्ष के नेताओ ने कोई कसर नही छोड़ी है भारत और भारतीय सेना को बदनाम करने में। क्या-क्या आरोप नही लगा सुरक्षा बलो और सेना के जवानों पर कोई हत्यारा कहता तो कोई बलात्कारी। चुल्लू भर पानी डूब मरना चाहिए ऐसे नीच लोगो को जो देश के रक्षकों के ऊपर सवाल उठाते रहे है ऐसे लोगो के जीने का कोई अधिकार नही है।

सांप फुफकार रहा है तो उसके फन कुचल देना चाहिए वरना ऐसा विष फैलेगा की सांस लेने का भी वक्त नही मिलेगा और प्राण पखेरू उड़ जायेंगे। जैसे तो तैसा करने में ही भलाई है। बहुत हो चुकी है शांति और अमन की आशा वाली बाते। जो बोली से नही सुधरेगा उसे गोली से जवाब से देना चाहिए।

Wednesday, June 9, 2021

वैक्सीन पर राजनीति

क्यों रे गोलू ! बड़ा भोलू बन रहा है। वैक्सीन लगवाया की नही? गोलू- लगवा लिया भइया अभी दूसरा डोज लेना बाकी है। वाह तू तो बड़ा चालू निकला गोलू बिल्कुल ठीक किया यही एकमात्र विकल्प है कोरोना से लड़कर जितने के लिए। कुछ लोग तो कह रहे थे की हम नही लगवाएंगे भाजपा की वैक्सीन है! अब वैक्सीन भी राजनीतिक दल वाले बनाने लग गए क्या? हद होती हैं किसी चीज की अफवाह फैलाए की इसको लगाते ही इंसान नपुंसक होय जावेगा। 
देश के वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को भी इन तथाकथित लोगो ने नही छोड़ा। जब पूरी दुनिया इस महामारी से जूझ रही है तब यही भारत देश के वैज्ञानिकों और चिकित्सको ने मोर्चा संभाला है कोई राजनीतिक दल का कार्यकर्ता इलाज नही कर रहा है। दो चार बैनर और पोस्टर लगाकर समाजवाद का नारा देने वाले लोगो के रगो में जातिवाद का जहर दौड़ता हैं। तभी तो वैक्सीन को लेकर तपाक से बोले पड़े "बीजेपी वैक्सीन लगाएगी  उसका भरोसा करू मैं ? अपनी सरकार आएगी सबको मुफ्त में वैक्सीन लगेगी। हम बीजेपी का वैक्सीन नही लगवा रहे है।" भला बताओ जरा ये उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके है  बाते मूर्खो वाली करते है।

खैर बाप ही के पास बेटे का इलाज है। पूर्व रक्षा मुलायम सिंह यादव ने टीका लगवा लिया हैं और अपने पुत्र को ये संदेश दिया है कि टीका लगवा लो जिंदा रहे तो बहुत राजनीति होगी। बाप के टीका लगवाने और प्रधानमंत्री के भाषण के बाद फिर इसपर साहब का बयान आया की- "जनाक्रोश को देखते हुए आख़िरकार सरकार ने कोरोना के टीके के राजनीतिकरण की जगह ये घोषणा करी कि वो टीके लगवाएगी। हम भाजपा के टीके के ख़िलाफ़ थे पर 'भारत सरकार' के टीके का स्वागत करते हुए हम भी टीका लगवाएंगे व टीके की कमी से जो लोग लगवा नहीं सके थे उनसे भी लगवाने की अपील करते हैं ।"
शायद इसी को थूककर चाटने वाली राजनीति कहते है। समाजवाद के नाम पर जातिवादी मानसिकता को बढ़ावा देने वाले समाजवादियों का झंडा फट कर चरर  हो चु जीका है। इनका काम नही कारनामा बोलता है। इनके युवा समर्थक कहते है "कहा हो अखिलेश यूपी बुलाती है" और तो और नारा लगाया जाता है "22 में बायसाइकिल" का जो महज एक ख्याली पुलाव है।

 इतना ही नही सपा के सांसद एसटी हसन का बेतुका बयान देते है की बीते 7 वर्षों में शरीयत में छेड़छाड़ हुई, तभी आई आसमानी आफत..! एसटी हसन ने कहा कि "इन सात सालों में जनता का जो हश्र हुआ है, वो किसी से छिपा नहीं है।पिछले सात सालों में भाजपा सरकार ने कई कानून बनाये हैं. जिनमें शरीयत के साथ छेड़छाड़ की गई। नागरिकता कानून बना दिया गया, जिसमें सिर्फ मुसलमान को नागरिकता नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि इस सरकार के ऐसे कामों से जो नाइंसाफियां हुई हैं, इसके चलते ही देश में 10 दिन के अंदर दो बार बड़े तूफान आए। आसमानी आफत आई और कोरोना के चलते हजारों लोगों की मौत हो गई।" ये सब  बकवास सुनकर तो यही लगता है की समाजवादी पार्टी का नाम बदलकर नमाजवादी पार्टी कर देना चाहिए हद से हद क्या होगा सपा से नपा कहलाएंगे बाकी नप तो ये वैसे भी गए है।  

Tuesday, June 1, 2021

कुछ लोगो का तो काम ही है ज्ञान झाड़ना


कुछ लोगो को कुछ नही मिलता हैं तो ज्ञान झाड़ने लगते है दूसरो के सामने मानो जिस विषय के बारे में बता रहे है उसमे Phd करके बैठे हो। दुनिया में कोई भी घटना घट जाय ये हर विषय के एक्सपर्ट बनते है चाहे अर्थव्यस्था का मुद्दा हो , युद्धनीति हो या विदेश नीति हर मुद्दे पर ज्ञान झाड़ते है। ये लोग हर जगह मिल जायेंगे चाय वाले के दुकान से लेकर विश्वविद्यालय की कक्षा में यहां तक कि शादी समारोह में भी खाने के समय पूछ देते है ये जो सलाद खा रहे हो इससे कौन सा विटामिन मिलता है? मतलब जीव विज्ञान के भी जानकार बनने लग जायेंगे या कह लीजिए डॉक्टर से कम जानकार  थोड़ी न समझते है खुद को !  चावल उठाकर प्लेट में डालने ही वाला रहता हु की तभी कोई पूछ देता है धान का कटोरा किसे कहते है? अरे इस सरकार की  दाल नही गलने वाली अगले चुनाव में। पुड़िया कम  खाओ वरना वजन बढ़ जाएगा ये कहने वाले भी मिल जाते हैं मानो वो बहुत बड़े एथलीट हो।

विश्वविद्यालय में तो कहिए ही मत बहुत से छात्र अपने को क्रांतिकारी  समझने लगते है जबतक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का क्लास चलता है। खुद को भगत सिंह समझने लग जाते हैं सब भले ही उनके बारे में कुछ ना पढ़े हो। वही सुनी सुनाई बातो पर विश्वास कर लेना एक बहुत बड़ी बीमारी है। एक लेख है भगत सिंह का "मैं नास्तिक क्यों हूं?" बस इसके बारे में सब जान गए और सब खुद को जी जान से नास्तिक बनाने  में लग जाते है। कोई कह दिया भगत सिंह तो मार्क्सवादी थे तो फिर मार्क्सवादी बन गए। अरे भगत सिंह तो लेनिन की किताब पढ़ रहे थे हम भी लेनिन के सिद्धांतो पर चलेंगे और वामपंथी बनेंगे। इन मूर्खो को कौन बताए की भगत सिंह तो गीता और रामायण भी पढ़ते थे। कुछ अपने को माओ और चे ग्वेरा समझते है। स्टालिन बनने की ख्वाहिश में पूरा जिंदगी बर्बाद कर लेते है। ये सब के सब ज्ञान देते है दूसरो को की तुम सोए हुए युवा हो या नागरिक हो और खुद गांजा फूंकते हुए कैंपस में मिल जायेंगे।

अपना काम तो होता नहीं है इन लोगो से पर दुनिया भर का ज्ञान झाड़ते है। दो चार लेख और अखबारों को पढ़कर ये रक्षा
विशेषज्ञ बनते है। पूरा इतिहास और भूगोल का ऐसा ज्ञान देंगे की मानो इन्हे लड़ने के लिए भेज दिया जाए तो जीतकर आएंगे। वो अलग बात है कि सौ मीटर दौड़ने में हाफ जाते है। उलुल- जुलूल ज्ञान झाड़ना अलग बात है और काम करना अलग बात है। मुझे तो ये बात आजतक नहीं पता चला कि की इतना ज्ञान लाते कहा से है? गलत और अधूरी जानकारी को ये ग्रहण करके अपने सामने दूसरों को ये तुच्छ समझते हैं। इनकी जानकारी जाकारी और सामने वाले की महामारी!
हद है! दूसरो की सत्य बाते इनसे पचती कहा  है?  कुछ तो ऐसे इतिहास के जानकार मिलते है जिनका कहना है कि हिंदुओ ने भी नरसंहार किया है ! ज्ञान झाड़ने की इस लड़ाई में कोई किसी से पीछे नहीं रहता है। वाद-विवाद का एक अलग ही दौर चल पड़ा है इस इंटरनेट के जमाने में।कोई जानकारी लेनी है इंटरनेट पर आसानी से मिल जाता है कुछ एक क्षणों में। वही से दो चार लाइन जान जाते है और कोई मिल जाता है तो उसके सामने झाड़ने लग जाते हैं। सोशल मीडिया का नशा सबके सर चढ़ कर बोल रहा हैं जहा झूठ कपास और अफवाह सिवाय कुछ नही है। जो पक्ष में है वही सही है बाकी सब गलत है। एक दूसरे को ज्ञान देते देते बोल पड़ते हैं आप हमशे ज्यादा जानते हैं क्या? नही तू मुझसे ज्यादा जानता है! चल निकल यहां से! तुझे बोलने का शहूर नही है? जाओ पढ़ो लिखो बच्चे हो मेरे सामने! बच्चा किसको बोल रहे हो खड़े खड़े बेच दूंगा आपको! चलो जाओ रास्ता नापो अपना। बिना जानकारी के बहस नही करते!