Thursday, March 30, 2023

कोई नही है मेरे राम सा..(भाग-1)

यदि राम सा संघर्ष हो तो 
कहा तक टिक सकूंगा 
ये सोचना जरूर
मेरे राम जैसा नग्न पैरो से चलना 
पग पग पैरो से रक्त निकलना
उस रक्त से काटो की जगह
फूल पंखुड़ियों और 
औषधियों का पनपना....!
आह धन्य हो गई धरती भी
प्रभु के चरण स्पर्श से...
कर दिया मुक्त देवी अहिल्या को
शीला से सुंदर स्त्री बन गई 
मात्र इस दिव्य आत्मा के
चरणों के धूल स्पर्श से....
         (१)

रख मान सम्मान निकले 
राज पाट को त्याग कर
"रघुकुल रीति सदा चली आई
प्राण जाई पर वचन न जाई"
सिद्ध किया इस कथन को
पांव छू माता कैकयी के
साथ में सीता लक्ष्मण
निकले वनवास को..!

पिता ने प्राण त्याग दिया
दुख से व्यथित पुत्र मोह में 
हाय रे दशा मेरे राम की
ना हाथी घोड़ा ना पालकी
पैदल ही निकल पड़े
वचन निभाने को...!
  
       (२)

 भरत खोजने निकले 
बड़े भ्राता को वन में
बुद्धि मारी गई माता की
फस गई थी मंथरा के जतन में..!
देख भरत को वन में
लिया हाल चाल राम ने
भरत ने कहा लौट चलो
भैया राज पाट तुम्हारा है 
पिता ने भी प्राण त्याग दिया
अब कौन आपके सिवाय हमारा है...!

सुन समाचार पिता का
दुख से व्याकुल हो गए 
राम ने पिता का पिंड दान कर
भरत को लौट जाने का आदेश दिया..

कुलगुरु वसिष्ठ के साथ 
माताएँ भी आ गईं
जिद पर अड़े भरत चलो भईया
हा लौट चलो राम कहती मईया..
कुलगुरु वसिष्ठ ने भी बोला-
बड़े पुत्र का धर्म निभाओ राम
वापस लौट चलो अयोध्या 
कुल परंपरा को निभाओ
देखो राज पाट का काम...!!

 रघुनाथ का मन नही माना 
पिता के वचन को तोड़कर
कैसे आखिर  लौटे चले
चौदह वर्ष के वनवास को छोड़कर...
बोले भरत जाओ संभालो 
अयोध्या का ताना बाना
मुझको है महाराज का वचन निभाना..!!
लिया वचन भरत से 
माता कैकेयी के प्रति 
कोई दुर्भाव ना रखना
भरत बोले-
देदो भईया अपनी चरण पादुका
यही हकदार है राज सिंहासन का..!
फिर परस्पर प्रेम से मिल कर 
सबने आपस में विदा लिया।।
 
क्या है कोई इस धरा पर मेरे राम सा
टिक सकेगा अगर संघर्ष हो मेरे राम सा !!

शिवम कुमार पाण्डेय

Wednesday, March 22, 2023

जमने जमाने की बात

          "चाय का ही जमाना चल रहा है आजकल"

वक्त और जमाना एक साथ चलते रहते है । वक्त के साथ जमाना भी बदल जाता है..! नया जमाना हो या पुराना जिसका किसी से जमा ही नही वो कहता फिरता है "जमाना हमसे है हम जमाने से नहीं.." जब प्रेमी प्रेमिका पीछे पड़ जाए तो प्रेमिका कहती है.. "ओहो हो छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा" तब प्रेमी कहता है "कोई कहे कहता रहे कितना भी हमको दीवाना हम है नए तो फिर अंदाज क्यों हो पुराना" राह चलते हुए बुजुर्ग कहते है एक हमारा जमाना था की साइकिल नही मिलती थी हमे जल्दी चलाने के लिए एक ये है आजकल नए लड़के जो  अभी माई के पेट से अभी निकले नहीं की  सीधा हीरो होंडा उड़ाते फिर रहे है..!  बीड़ी फूंकते हुए मजदूर अपने लड़के से कहता है पढ़ लो बचवा हम तो अपने जमाने में मास्टर साहब का मजा लेते थे  आज जिंदगी हमारा मजा ले रही है।  जमना जमाना तो चलता रहेगा पर ये मेरा जमाना तुम्हारा जमाना वाला भसड़ कभी खत्म नही होने वाला है। लोग भूल जाते है वक्त के साथ कितना परिवर्तन हुआ है।
इन सबके बीच तो एक बात तो ही भूल ही गए जो गांव देहात में स्टाइल मारने वाले हर लौंडे पर सटीक बैठता है " बाप जिए अंधेरा में लइका बने पॉवर हाउस" वाह रे जिंदगी का कवनो ठिकाना कब कौन बाजी मार जाय..! 

एक फिल्मबाज चचा मिल गए राह चलते हुए लगे अपनी कहानी बया करने की एक जमाना था जब सिनेमा हॉल में कवनो फिलम नही छोड़ता था आज देखो दो वक्त की रोटी के लिए जद्दो-जेहद करना पड़ रहा है। मास्टर जी कहते थे बेटा पढ़ लो लेकिन हमको हमारे बड़का घराने के होने का घमंड था लेकिन जमाना एक सा नही रहता बदल जाता है। हमहु बोले अरे चचा छोड़ो सब ना तो वो अब सिनेमा हाल ही रहा वो पार्टी का दफ्तर बन गया दुकान खुल गई  और और ना ही मास्टर साहब मास्टर रह गए मास्टर साहब तो अब प्रिंसिपल बन गए है। बाकी आप अपने बाप दादाओं की जायदाद पाकर अय्याशी किए जिंदगी भर और अभी कौन सा आप किसी से कम खेत परती छोड़कर और अधिया देकर नल्ले घूमेंगे तो भूखे ही मरेंगे न.... इतना कहना ही था कि चचा ताव में बोल पड़े का जमाना आ गया है आजकल का लड़का सब जबान लड़ाने लग गए है बात करने का लहजा भुला गए है..। अब सच तो कड़वा ही लगता है लोगो को चाहे इस जमाने के हो या उस जमाने के अपनी काली हकीकत सबको बुरी लगती है। चचा तो फिलमबाज थे पर आजकल के लौंडो को क्या हो गया है वो तो एक दम से "चिलमबाज" हो गये है और जाते फिरते है "दम मारो दम मिट गए हम, लगाओ सुबह शाम दस बोतल रम" जमाना है भइया जमाना क्या सकते है ..! एक जमाना तो "पुरब के ऑक्सफोर्ड" का भी था जब यहां से कलेक्टर निकलते थे लेकिन आज चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बनने की होड़ लगी हुई है..! पहले कहा पीसीएस का फॉर्म भरना ही बेइज्जती मानते थे सब भरते भी तो तो छुप छिपाकर आईएएस से नीचे बात ही नही होती थी। लेकिन तब का ऑक्सफर्ड अब खस्ताहाल हो गया है। मरे हुए शहर की रंगत थी तो यूनिवर्सिटी से ही वर्तमान में तो विरान हो चला है। ये भी एक जमाना है जहां छात्रों को सिर्फ सरकारी नौकरी से ही कमाना है। हमारा क्या है हमे तो पहले से ही जमाने ने ठुकराया है बाकी बचा खुचा जो उससे था उसने भी औकात दिखा दी बोली दूर रहो मुझसे मैने भी कह दिया अगर तुम मिल जमाना छोड़ दूंगा मैं....!


Tuesday, February 21, 2023

कोटली के अमर बलिदानी

'हंस के लिया है पाकिस्तान, लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान' की पूर्ति के लिए नवनिर्मित पाकिस्तान ने 1947 में ही कश्मीर पर हमला कर दिया। देश रक्षा के दीवाने संघ के स्वयंसेवकों ने उनका प्रबल प्रतिकार किया। उन्होंने भारतीय सेना, शासन तथा जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह को इन षड्यन्त्रों की समय पर सूचना दी। इस गाथा का एक अमर अध्याय 27 नवम्बर, 1948 को कोटली में लिखा गया, जो इस समय पाक अधिकृत कश्मीर में है। युद्ध के समय भारतीय वायुयानों द्वारा फेंकी गयी गोला-बारूद की कुछ पेटियां शत्रु सेना के पास जा गिरीं। उन्हें उठाकर लाने में बहुत जोखिम था। वहां नियुक्त कमांडर अपने सैनिकों को गंवाना नहीं चाहते थे, अतः उन्होंने संघ कार्यालय में सम्पर्क किया। उन दिनों स्थानीय पंजाब नैशनल बैंक के प्रबंधक श्री चंद्रप्रकाश कोली में नगर कार्यवाह थे। उन्होंने कमांडर से पूछा कि कितने जवान चाहिए ? कमांडर ने कहा- आठ से काम चल जाएगा। चंद्रप्रकाश जी ने कहा एक तो मैं हूं, बाकी सात को लेकर आधे घंटे में आता हूं।

चंद्रप्रकाश जी ने जब स्वयंसेवकों को यह बताया, तो एक-दो नहीं, 30 युवक इसके लिए प्रस्तुत हो गये। कोई भी देश के लिए बलिदान होने के इस सुअवसर को गंवाना नहीं चाहता था। चंद्रप्रकाश जी ने बड़ी कठिनाई से सात को छांटा; पर बाकी भी जिद पर अड़े थे। अतः उन्हें 'आज्ञा' देकर वापस किया गया। सबने अपने आठों साथियों को सजल नेत्रों से विदा किया। सैनिक कमांडर ने उन आठों को पूरी बात समझाई। भारतीय और शत्रु सेना के बीच में एक नाला था, जिसके पार वे पेटियां पड़ी थीं। शाम का समय था। सर्दी के बावजूद स्वयंसेवकों ने तैरकर नाले को पार किया तथा पेटियां अपनी पीठ पर बांध लीं। इसके बाद वे रेंगते हुए अपने क्षेत्र की ओर बढ़ने लगे, पर पानी में हुई हलचल और शोर से शत्रु सैनिक सजग हो गये और गोली चलाने लगे। इस गोलीवर्षा के बीच स्वयंसेवक आगे बढ़ते रहे।

इसी बीच श्री चंद्रप्रकाश और श्री वेदप्रकाश को गोली लग गयी। उस ओर ध्यान दिये बिना बाकी छह स्वयंसेवक नाला पारकर सकुशल अपनी सीमा में आ गये और कमांडर को पेटियां सौंप दी। अब अपने घायल साथियों को वापस लाने के लिए वे फिर नाले को पार कर शत्रु सीमा में पहुंच गये। उनके पहुंचने तक उन दोनों वीर स्वयंसेवकों के प्राण पखेरू उड़ चुके थे। स्वयंसेवकों ने उनकी लाश को अपनी पीठ पर बांधा और लौट चले। यह देख शत्रुओं ने गोलीवर्षा तेज कर दी। इससे एक स्वयंसेवक और मारा गया।

उसकी लाश को भी पीठ पर बांध लिया गया। तब तक एक अन्य गोली ने चौथे स्वयंसेवक की कनपटी को बींध दिया। वह भी मातृभूमि की रक्षा हित बलिदान हो गया। इस दल के वापस लौटने का दृश्य बड़ा कारुणिक था। चार बलिदानी स्वयंसेवक अपने चार घायल साथियों की पीठ पर बंधे थे। जब उन्हें चिता पर रखा गया, तो 'भारत माता की जय' के निनाद से आकाश गूंज उठा। नगरवासियों ने फूलों की वर्षा की।

इन स्वयंसेवकों का बलिदान रंग लाया। उन पेटियों से प्राप्त सामग्री से सैनिकों का उत्साह बढ़ गया। वे भूखे शेर की तरह शत्रु पर टूट पड़े। कुछ ही देर में शत्रुओं के पैर उखड़ गये और चिता की राख ठंडी होने से पहले ही पहाड़ी पर तिरंगा फहराने लगा। सेना के साथ प्रातःकालीन सूर्य ने भी अपनी पहली किरण चिता पर डालकर उन स्वयंसेवकों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

स्रोत: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ 

Friday, January 27, 2023

अरे बिहार के लोगो नमस्कार...!

लौरिया विधानसभा क्षेत्र के सुधि जनों
नमस्कार 

वैसे तो मैं इस विधानसभा क्षेत्र का टैक्सपेयर निवासी हूँ और कार्यक्षेत्र की व्यस्तताओं की वजह से आमतौर पर घर आना जाना कम ही हो पाता है किंतु इस वर्ष मकर संक्रांति के सुअवसर पर घर आना संभव हुआ है।
स्वयं को ईमानदार मैंने इसलिए भी नहीं कहा क्योंकि आज के आभासी सामाजिक प्रकटीकरण के भीषण दौर में मैं स्वघोषित ईमानदारी का ढ़ोल पीटता भीड़ का हिस्सा होना नहीं चाहता जहाँ हर शख्स स्वयं को अधिक ईमानदार घोषित कर अपनी बड़ाई सुनना चाहता है।
कल एक कार्यवश फतेहपुर चौक जाना हुआ और कुछ ऐसा दृश्य दृष्टिगोचर हुआ कि मैं उसपे लिखने से रोक नहीं पा रहा हूँ।

तो आप सबको और अधिक असमंजस की स्थिति में ना रखते हुये कल की वो घटना बताता हूँ जिसने ये पोस्ट करने के लिए मजबूर कर दिया।

तो हुआ यूँ कि मैं एक व्यक्तिगत कार्य से दोपहर में घर से फतेहपुर चौक जाने के लिए निकला। लंबे अवसर के बाद घर आया था तो सोचा आज साईकिल चलाने का आनंद लिया जाये वर्ना मेट्रोसिटी की भागमभाग में ये अवसर कहाँ प्राप्त होता है। अतः मैंने साईकिल निकाली और चल पड़ा। चहुँओर भारतीय गणराज्य के 74वें गणतंत्र दिवस तथा विद्यादायिनी माँ सरस्वती के पूजनोत्सव में जुटे हर्षोल्लासित बच्चे दिख रहे थे। सुबह की धुंध के बाद मौसम भी खुशगवार हो चुका था। मच्छरगावाँ बाज़ार होते हुये मैं फतेहपुर चौक तक पहुँचा। रास्ते में मुझे दिखा कि बाज़ार से चौक तक सड़क की स्थिति कुछ ठीक नहीं है हाँ बीच बीच में यत्र तत्र अव्यवस्थित तरीके से हुआ मरम्मत का कार्य भी दिखा। (ठीक तो वैसे बाजार से शनिचरी चौक तक की भी नहीं है किंतु उसकी बात फिर कभी)। 

जैसे ही मैं चौक पर पहुँचा वहाँ मुझे एक पहचान के मिश्रा जी और गफूर भाई मिल गये। दोनों किसी कार्य से बेतिया जाने हेतु बस का इंतजार कर रहे थे। बोले - "अरे *** जी बड़े दिनों बाद मिले हैं आइये पान खाया जाये।" मिश्रा जी थोड़े नाराज लग रहे थे और थोड़े बदले बदले से भी वहीं गफूर भाई का मिज़ाज भी थोड़ा उखड़ा हुआ था। 
इन बातों से अनभिज्ञ मैंने महज उत्सुकतावश पूछ लिया कि "आपलोगों को पता है कि ये सड़क की हालत इतनी जर्जर क्यों है? और ये मरम्मत का कार्य इतने अव्यवस्थित तरीके से क्यूँ हुआ है?" 
मेरा इतना कहना था कि मिश्रा जी भड़क गये। बोले - "*** जी आप कैसे आदमी हैं जो इतनी बड़ी अभूतपूर्व खगोलीय घटना में कमी निकाल रहे हैं? कुछ शर्म वर्म है कि नहीं? इस अखिल विश्व के अभी तक ज्ञात देशों में से सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के निवासी आप पे लानत है। बिना मामले की गंभीरता एवं कार्य संपादित कराने वाले की दूरदर्शिता को जाने आपकी ऐसी ओछी टिप्पणी उचित नहीं है। आप ऐसा कर कैसे सकते हैं?" 
मिश्रा जी के यूँ धिक्कारने के पश्चात अपनी अनभिज्ञता पर मन ही मन स्वयं को कोसते हुये बड़े ही शर्म के साथ मैंने तनिक धीरे से कहा - "मिश्रा जी आप तो जानते हैं कि मैं यहाँ नहीं रहता और घर परिवार तथा दोस्तों के लिये ही मुश्किल से समय निकाल पाता हूँ। वो तो मैंने यूँ ही उत्सुकतावश पूछ लिया था और आप इतने नाराज़ हो गये जैसे मैंने ये पूछ लिया हो कि डोनाल्ड ट्रंप चुनाव क्यों हार गया। और इसमें लोकतंत्र की बात कैसे?"
मेरे इस प्रकार विनती करने के पश्चात मिश्रा जी ने अपने गुस्से को उदरस्थ करते हुये मुझे बताया (हालांकि उनकी नाराज़गी उनके ललाट पर लालिमा के रूप में अभी भी परिलक्षित हो रही थी) - "आप जाने कहाँ रहते हैं जो आपको कुछ पता नहीं होता है। और लोकतंत्र की बात मैंने इसलिए की थी क्योंकि लोकतंत्र ने राजनीति नामक एक ऐसा सर्प दिया है जो देश के विकास पर कुंडली मारे बैठा है। अभी कुछ दिनों पहले ही यहाँ के एक करूणहृदय न्यायप्रिय अतिलोकप्रिय सत्तासीन माननीय विधायक जी से सड़क की स्थिति देखी नहीं गई और उन्होंने इसकी मरम्मत कराई है और आप हैं कि उसमें भी कमी निकाल रहे हैं। लालू जी ने बसंती के गाल जैसी सड़क की बात की थी उससे अच्छे तो हमारे विधायक जी हैं जिन्होंने बसंती की इज्ज़त का पूरा सम्मान करते हुये चिकनी सड़क नहीं बनावाई एवं एक कुशल रफूगर जैसे सिर्फ फटी हुई जगह पर रफू करता है वैसा ही सड़क के साथ किया है। कदाचित् प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का उद्देश्य यही है। पूर्व में ऐसा ही अभूतपूर्व कार्य इन्होंने शनिचरी जाने वाली सड़क पर भी कराया था। क्या करें बेचारे इतने सज्जन आदमी हैं कि सज्जनता भी हर सुबह शाम इनको अष्टांग दण्डवत प्रणाम करके जाती है। जनता का दुख इनसे देखा नहीं जाता इतने सहृदय व्यक्ति हैं और न्यायप्रिय इतने कि अपने घर के बगल में स्थित सरकारी विद्यालय के बगल की सड़क इन्होंने तीन बार बनवाई जब तक निर्माण कार्य से संतुष्ट नहीं हो गये।"(ये लाइन कहते हुये मिश्रा जी के मुखमंडल पर एक अजीब सी ना समझ में आने वाली मुस्कान थी)

उन्होंने आगे कहा -"आपको ये तो पता है कि विधायक जी एक राष्ट्रवादी राष्ट्रीय पार्टी के नेता हैं। जो पार्टी इतनी राष्ट्रवादी है कि पार्टीविरोधी बात करने वालों को राष्ट्रविरोधी बात करने वाला बता सीधा पाकिस्तान का वीजा दे देती है और यही नहीं उसके नेता वहाँ तक छोड़ के आने की बात भी कहते पाये जाते हैं ऐसी पार्टी के सत्तासीन विधायक पर आप अकर्मण्यता का आरोप लगा रहे हैं? शर्म आनी चाहिए आपको।"
मिश्रा जी के रौद्र रूप को देख मैं सहम सा गया। तभी गफूर भाई के हँसने की आवाज़ ने मेरा ध्यान उनकी ओर आकृष्ट किया। तब गफूर भाई ने मुझे समझाया कि मिश्रा जी Sarcasm के मोड में हैं और मेरे आने से पहले तक वे दोनों भी इसी विषय में बातचीत कर रहे थे।

तब मिश्रा जी गंभीर हो गये और मुझसे कहने लगे - "**** जी क्या बतायें इस क्षेत्र को जाने किसकी नजर लगी है जो हमें ऐसे दिन देखने को मिल रहे हैं। ये वो विधायक जी हैं जिनका विजन आजतक कभी स्पष्ट नहीं रहा कि ये राजनीति में करने क्या आये थे, कर क्या रहे हैं और भविष्य में क्या करेंगे? राम जाने उनको स्वयं को भी यह ज्ञात है अथवा नहीं? मैं दावे से कह सकता हूँ कि ऐसा अकर्मण्य विधायक इस क्षेत्र के इतिहास में आजतक नहीं हुआ। भारतीय जनता पार्टी (हालांकि कुछ लोग इसको भारतीय जमात पार्टी भी कहते हैं) के एक अतिअतिरिक्त अतिउपेक्षित एवं थोथे विकासपुरूष के जीवंत परिचायक इस अल्पविकसित विधायक को एक वार्ड चलाने की समझ नहीं है और हम इनसे पूरे विधानसभा क्षेत्र की आस लगाये बैठे हैं तो हमसे बड़ा जाहिल और कौन होगा।
हमेशा अपने चरणलोलुपों द्वारा की जाने वाली चरणवंदना से आच्छादित रहने वाले नेताजी के लिए जनता की समस्याएं तो इनकी अधोजटाओं के घुंघराले बालों के त्याज्य गुच्छों के समान हैं। अपनी बिरादरी वालों को ठेकेदारी एवं अघोषित रौबदारी सौंपने की व्यस्तता के मध्य माननीय अपने अतिनिजी कार्यों के संपादन हेतु समय निकाल लेते हैं यही क्या कम है अन्यथा अगर कार्य प्राकृतिक नहीं होता तो अधोजटाओं सी मोहिनी मूरत वाले उनके चरणचुंबक स्वयं संपादित कर आगामी ठेकेदारी के लिये अपनी कर्तव्यपरायणता सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।"
इतना बोलते बोलते मिश्रा जी की साँस फूलने लगी फिर मैंने और गफूर भाई ने जैसे तैसे उन्हें चुप कराया और पान थूकते हुये गफूर भाई ने पनवाड़ी से पानी की बोतल माँगी। हमने मिश्रा जी को पानी पिलाया। तभी बस आ गई और मिश्रा जी तथा गफूर भाई को जाना पड़ा। मिश्रा जी जाने के मूड में तो नहीं लग रहे थे शायद उनकी बात अधूरी रह गई थी। 
फिर मैंने भी अपना काम निपटाया और घर की ओर चल पड़ा।
वापस आते हुये मैं सोच रहा था कि कह तो मिश्रा जी ठीक ही रहे थे।

(लेखक पेशे से इंजीनियर है और राष्ट्रचिन्तक से जुड़े हुए है)

Thursday, December 29, 2022

वाह रे "भइया"

बहुत भारी भरकम शब्द है "भइया" इसको बोलकर लोग डूबा देते है "नइया" काम रहता है तभी भइया सबको याद आते है वरना भइया बराबर चूतिया ही तो होते है। अगर बड़े भइया हाल चाल लेने के लिए फोन कर दे तो लोग भइया प्रणाम की जगह बोलते है "क्या काम है?" क्या ही बोला जाय जीवन में बहुत कुछ घट जाय चलेगा पर किसी लड़की ने भइया बोल दिया तो धज्जियां उड़ जाती है खासकर जब वो कॉलेज में आपके क्लास की ही हो...! भइया को कुछ आता जाता नही हैं क्योंकि वो सफलता हासिल नही कर पा रहे है कही.. जिम्मेदारियों के बोझ तले भइया दबकर संघर्ष करके आगे तो निकल जाते है पर रहते भइया ही हैं..! भइया को मईया भी बहुत मानती है पर भइया को लगता है भइया बराबर चूतिया ही होवे है...! भइया समझते है बड़े घर के वही हैं सबका ख्याल रखना उन्ही को हैं इसीलिए मईया के प्यारे भइया है..।
एक हैं राजनीति वाले भइया इनको तो इनकी पत्नी भी भइया कहकर संबोधित करती है सार्वजनिक मंचों पर। वाह..! क्या जमाना आ गया है राजनीति  ने सईया को भइया बना दिया।
एक होते है सब्जी वाले भइया ठेला लेकर एक दम सुबह ही मोहल्ले में हाजिर हो जाते है। भइया की इज्जत की धज्जियां तब उड़ जाती है जब उसी मोहल्ले में पूर्व प्रेमिका से नजरे मिल जाती है और इंतकाम लेने की सोचने वाले भइया उसके पति के थैले में धनिया मिर्च फ्री में ठेलकर निकल लेते है। हमारे एक मित्र ने क्या गजब कहा है...

"उसकी रकीबियत का किस्सा मुझसे मत पूछों 
महबूब के मोहल्ले की हटरी में सब्जियां बेचता है।
मासूका की बातें अब और क्या कहूँ, 
ये बात सुनो उसके पति के थैले में 
धनिया मिर्च फ्री में ठेलता है।"

इन सबके बीच यूपीएससी वाले भइया को भूल जाना महापाप होगा जो दिन भर में दसियों बार चाय और सिगरेट पी लेते है.. कहते हैं इससे कंसंट्रेशन बना रहता है। खैर ये तो तो पढ़ते भी जम के है लेकिन इनको देखकर गांव से आए कुछ नए लड़के सिर्फ पीते ही है पढ़ना तो भूल ही जाते है... भइया कही ना कही सिलेक्शन लेकर निकल लेते है और ये रह जाते है वही तथाकथित संघर्ष के जंजाल में..! भइया का बढ़िया काम कोई नही करता बुरा सब देखते है। अब छात्र नेताओं वाले भइया का कवनों भौकाल नही रह गया है आजकल हर दूसरा छात्र विश्वविद्यालय में खुद को छात्र नेता ही समझता है..। पहले के तो ठेकेदारी का काम पा भी जाते थे अब तो बस दो चार हजार भइया का पेट जाता है मुर्गा दारू लेकर अब तो गाना भी आ गया है भोजपुरी में "खाके मुर्गा पीके बियर बोला हैप्पी न्यू ईयर"।

"भइया" होना आसान काम नही है भइया...राम राम भइया...!