Wednesday, June 9, 2021

वैक्सीन पर राजनीति

क्यों रे गोलू ! बड़ा भोलू बन रहा है। वैक्सीन लगवाया की नही? गोलू- लगवा लिया भइया अभी दूसरा डोज लेना बाकी है। वाह तू तो बड़ा चालू निकला गोलू बिल्कुल ठीक किया यही एकमात्र विकल्प है कोरोना से लड़कर जितने के लिए। कुछ लोग तो कह रहे थे की हम नही लगवाएंगे भाजपा की वैक्सीन है! अब वैक्सीन भी राजनीतिक दल वाले बनाने लग गए क्या? हद होती हैं किसी चीज की अफवाह फैलाए की इसको लगाते ही इंसान नपुंसक होय जावेगा। 
देश के वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को भी इन तथाकथित लोगो ने नही छोड़ा। जब पूरी दुनिया इस महामारी से जूझ रही है तब यही भारत देश के वैज्ञानिकों और चिकित्सको ने मोर्चा संभाला है कोई राजनीतिक दल का कार्यकर्ता इलाज नही कर रहा है। दो चार बैनर और पोस्टर लगाकर समाजवाद का नारा देने वाले लोगो के रगो में जातिवाद का जहर दौड़ता हैं। तभी तो वैक्सीन को लेकर तपाक से बोले पड़े "बीजेपी वैक्सीन लगाएगी  उसका भरोसा करू मैं ? अपनी सरकार आएगी सबको मुफ्त में वैक्सीन लगेगी। हम बीजेपी का वैक्सीन नही लगवा रहे है।" भला बताओ जरा ये उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके है  बाते मूर्खो वाली करते है।

खैर बाप ही के पास बेटे का इलाज है। पूर्व रक्षा मुलायम सिंह यादव ने टीका लगवा लिया हैं और अपने पुत्र को ये संदेश दिया है कि टीका लगवा लो जिंदा रहे तो बहुत राजनीति होगी। बाप के टीका लगवाने और प्रधानमंत्री के भाषण के बाद फिर इसपर साहब का बयान आया की- "जनाक्रोश को देखते हुए आख़िरकार सरकार ने कोरोना के टीके के राजनीतिकरण की जगह ये घोषणा करी कि वो टीके लगवाएगी। हम भाजपा के टीके के ख़िलाफ़ थे पर 'भारत सरकार' के टीके का स्वागत करते हुए हम भी टीका लगवाएंगे व टीके की कमी से जो लोग लगवा नहीं सके थे उनसे भी लगवाने की अपील करते हैं ।"
शायद इसी को थूककर चाटने वाली राजनीति कहते है। समाजवाद के नाम पर जातिवादी मानसिकता को बढ़ावा देने वाले समाजवादियों का झंडा फट कर चरर  हो चु जीका है। इनका काम नही कारनामा बोलता है। इनके युवा समर्थक कहते है "कहा हो अखिलेश यूपी बुलाती है" और तो और नारा लगाया जाता है "22 में बायसाइकिल" का जो महज एक ख्याली पुलाव है।

 इतना ही नही सपा के सांसद एसटी हसन का बेतुका बयान देते है की बीते 7 वर्षों में शरीयत में छेड़छाड़ हुई, तभी आई आसमानी आफत..! एसटी हसन ने कहा कि "इन सात सालों में जनता का जो हश्र हुआ है, वो किसी से छिपा नहीं है।पिछले सात सालों में भाजपा सरकार ने कई कानून बनाये हैं. जिनमें शरीयत के साथ छेड़छाड़ की गई। नागरिकता कानून बना दिया गया, जिसमें सिर्फ मुसलमान को नागरिकता नहीं मिलेगी। उन्होंने कहा कि इस सरकार के ऐसे कामों से जो नाइंसाफियां हुई हैं, इसके चलते ही देश में 10 दिन के अंदर दो बार बड़े तूफान आए। आसमानी आफत आई और कोरोना के चलते हजारों लोगों की मौत हो गई।" ये सब  बकवास सुनकर तो यही लगता है की समाजवादी पार्टी का नाम बदलकर नमाजवादी पार्टी कर देना चाहिए हद से हद क्या होगा सपा से नपा कहलाएंगे बाकी नप तो ये वैसे भी गए है।  

Tuesday, June 1, 2021

कुछ लोगो का तो काम ही है ज्ञान झाड़ना


कुछ लोगो को कुछ नही मिलता हैं तो ज्ञान झाड़ने लगते है दूसरो के सामने मानो जिस विषय के बारे में बता रहे है उसमे Phd करके बैठे हो। दुनिया में कोई भी घटना घट जाय ये हर विषय के एक्सपर्ट बनते है चाहे अर्थव्यस्था का मुद्दा हो , युद्धनीति हो या विदेश नीति हर मुद्दे पर ज्ञान झाड़ते है। ये लोग हर जगह मिल जायेंगे चाय वाले के दुकान से लेकर विश्वविद्यालय की कक्षा में यहां तक कि शादी समारोह में भी खाने के समय पूछ देते है ये जो सलाद खा रहे हो इससे कौन सा विटामिन मिलता है? मतलब जीव विज्ञान के भी जानकार बनने लग जायेंगे या कह लीजिए डॉक्टर से कम जानकार  थोड़ी न समझते है खुद को !  चावल उठाकर प्लेट में डालने ही वाला रहता हु की तभी कोई पूछ देता है धान का कटोरा किसे कहते है? अरे इस सरकार की  दाल नही गलने वाली अगले चुनाव में। पुड़िया कम  खाओ वरना वजन बढ़ जाएगा ये कहने वाले भी मिल जाते हैं मानो वो बहुत बड़े एथलीट हो।

विश्वविद्यालय में तो कहिए ही मत बहुत से छात्र अपने को क्रांतिकारी  समझने लगते है जबतक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का क्लास चलता है। खुद को भगत सिंह समझने लग जाते हैं सब भले ही उनके बारे में कुछ ना पढ़े हो। वही सुनी सुनाई बातो पर विश्वास कर लेना एक बहुत बड़ी बीमारी है। एक लेख है भगत सिंह का "मैं नास्तिक क्यों हूं?" बस इसके बारे में सब जान गए और सब खुद को जी जान से नास्तिक बनाने  में लग जाते है। कोई कह दिया भगत सिंह तो मार्क्सवादी थे तो फिर मार्क्सवादी बन गए। अरे भगत सिंह तो लेनिन की किताब पढ़ रहे थे हम भी लेनिन के सिद्धांतो पर चलेंगे और वामपंथी बनेंगे। इन मूर्खो को कौन बताए की भगत सिंह तो गीता और रामायण भी पढ़ते थे। कुछ अपने को माओ और चे ग्वेरा समझते है। स्टालिन बनने की ख्वाहिश में पूरा जिंदगी बर्बाद कर लेते है। ये सब के सब ज्ञान देते है दूसरो को की तुम सोए हुए युवा हो या नागरिक हो और खुद गांजा फूंकते हुए कैंपस में मिल जायेंगे।

अपना काम तो होता नहीं है इन लोगो से पर दुनिया भर का ज्ञान झाड़ते है। दो चार लेख और अखबारों को पढ़कर ये रक्षा
विशेषज्ञ बनते है। पूरा इतिहास और भूगोल का ऐसा ज्ञान देंगे की मानो इन्हे लड़ने के लिए भेज दिया जाए तो जीतकर आएंगे। वो अलग बात है कि सौ मीटर दौड़ने में हाफ जाते है। उलुल- जुलूल ज्ञान झाड़ना अलग बात है और काम करना अलग बात है। मुझे तो ये बात आजतक नहीं पता चला कि की इतना ज्ञान लाते कहा से है? गलत और अधूरी जानकारी को ये ग्रहण करके अपने सामने दूसरों को ये तुच्छ समझते हैं। इनकी जानकारी जाकारी और सामने वाले की महामारी!
हद है! दूसरो की सत्य बाते इनसे पचती कहा  है?  कुछ तो ऐसे इतिहास के जानकार मिलते है जिनका कहना है कि हिंदुओ ने भी नरसंहार किया है ! ज्ञान झाड़ने की इस लड़ाई में कोई किसी से पीछे नहीं रहता है। वाद-विवाद का एक अलग ही दौर चल पड़ा है इस इंटरनेट के जमाने में।कोई जानकारी लेनी है इंटरनेट पर आसानी से मिल जाता है कुछ एक क्षणों में। वही से दो चार लाइन जान जाते है और कोई मिल जाता है तो उसके सामने झाड़ने लग जाते हैं। सोशल मीडिया का नशा सबके सर चढ़ कर बोल रहा हैं जहा झूठ कपास और अफवाह सिवाय कुछ नही है। जो पक्ष में है वही सही है बाकी सब गलत है। एक दूसरे को ज्ञान देते देते बोल पड़ते हैं आप हमशे ज्यादा जानते हैं क्या? नही तू मुझसे ज्यादा जानता है! चल निकल यहां से! तुझे बोलने का शहूर नही है? जाओ पढ़ो लिखो बच्चे हो मेरे सामने! बच्चा किसको बोल रहे हो खड़े खड़े बेच दूंगा आपको! चलो जाओ रास्ता नापो अपना। बिना जानकारी के बहस नही करते!

Friday, May 28, 2021

कोरोना से लड़ना है तो दवाई नही ईसाई बनो!

  
तस्वीर के बारे ज्यादा जानने के लिए डूपॉलिटिक्स पर जाए

क्या हो रहा है देश में आजकल ? किसी से कुछ छिपा नहीं हैं। बड़े ही भोले और ईमानदार समझा जाता है उन्हे। वो पढ़े लिखे होते है ऐसा बोलकर सम्मान दिया जाता है। कहा ये पंडा ,पुजारी और पाखंडी ब्राह्मण लोगो लूटकर सिर्फ अपना झोला भरते है। ऐसा बोलकर हिंदुओ धर्म की बुराई बतियाने वाले लम्पटो से पूछना चाहता हू की कौन सा हिंदू संगठन आपदा को अवसर बनाकर धर्म परिवर्तन करवा रहा है ? धर्मांतरण का नंगा नाच गांव गांव गली गूचो तक चल रहा है। निशाने पर आदिवासी इलाके और दलितों की बस्ती रहती है। ये कम है ईसाई मिशनरियों का प्रचार प्रसार करने में पढ़े लिखे डॉक्टरों का नाम आ रहा है। मध्य प्रदेश में एक महिला डॉक्‍टर पर 'किल कोरोना अभियान' के दौरान ईसाई धर्म के प्रचार का आरोप लगा है। आरोप है कि वह घर-घर जाकर लोगों को दवाओं और भोजन के बारे में समझाने के साथ ईसाई धर्म का प्रचार कर रही थीं।  डाइट प्लान वाले पर्चे के पीछे हाथों से प्रभु यीशू की प्रार्थना लिख कर दे रही थीं। वह लोगों को समझा रही थीं कि ईसा मसीह की प्रार्थना करो तो कोरोना से बचे रहोगे। इस तथाकथित महिला डॉक्टर का नाम संध्या तिवारी हैै। खबरों के मुताबिक सर्वे  टीम  के साथ बाजना में जब स्थानीय लोगों ने इस पर आपत्ति जताई तो डॉ संध्या ने अपनी गलती मानने से इनकार कर दिया। हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं से उन्होंने कहा कि वे कुछ गलत नहीं कर रही हैं। उनके काम से किसी को नुकसान नहीं पहुंच रहा है। शनिवार को मामले की हिंदू संगठनों द्वारा शिकायत के बाद डॉ संध्या से थाने में पूछताछ की गई। तहसीलदार बीएस ठाकुर की जांच के बाद कलेक्टर ने सीएमएचओ को कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बाद उन्हें पद से हटा दिया गया है।
नर्स को ईसाई धर्म का प्रचार करते पकड़ा गया जो कोविड-19 ड्यूटी पर है (छवि: ट्विटर/ वायरल वीडियो का स्क्रीनग्रैब)

ये महिला चिकित्सक अकेले थोड़ी है इस काम में IMA प्रमुख डॉ. जॉनराज ऑस्टिन जयलाल खुलेआम ईसाई धर्म का प्रचार कर रहे है। स्वास्थ मंत्री हर्षवर्धन जी इनपर कार्यवाही नहीं किए पर बाबा रामदेव से माफी मंगवाने पर अड़ गए। जयलल ने 1000 हजार करोड़ का मानहानि का दावा ठोका है। सच में IMA का  फुलफॉर्म अब इंडियन मिशनरी एसोसिएशन कर दिया जाय तो कुछ गलत नही है। आपदा को अवसर बनाना कोई इनसे सीखे। आयुर्वेद से डॉ जयलाल इतना चिढ़ते है की पूछिए मत। सरकार ने कुछ आयुर्वेद वालो को सर्जरी करने के लिए मंजूरी दे दी थी तो ये अनाप-शनाप बकने लगे थे। जबकि आयुर्वेद के ज्ञाता बनारस में जन्मे आचार्य सुश्रुत को शल्य (सर्जरी) चिकित्सा का जनक माना जाता है। काशिराज दिवोदास धन्वंतरि के सात शिष्यों में प्रमुख आचार्य सुश्रुत को 'फादर आफ प्लास्टिक सर्जरी' यानी प्लास्टिक सर्जरी का पितामह भी कहते हैैं। उन्हें 2500 वर्ष पहले भी प्लास्टिक सर्जरी एवं इसमें इस्तेमाल होने वाले यंत्रों की जानकारी थी।

 डॉ.जयलाल ने क्रिश्चियनिटी टुडे के साथ अपने साक्षात्कार में बिल्कुल चौंकाने वाले और विचित्र बयान दिए, जब उन्होंने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को और अधिक ईसाई डॉक्टरों को लगाने की अपनी योजना के बारे में बात की।
इस इंटरव्यू में डॉ. जयलाल द्वारा की गई कुछ चौंकाने वाली टिप्पणियों में शामिल हैं:

‘वास्तविक विज्ञान’ की वकालत करने के लिए एक अभियान चलाने वाले डॉक्टर ने कहा, “यह केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर की कृपा है जो हमें संकट से उबरने और सुरक्षित रहने में मदद करती है और यह उनकी कृपा थी जिसने हमारी रक्षा की।”

उन्होंने क्रिश्चियनिटी टुडे को बताया, “मैं देख सकता हूँ, उत्पीड़न के बीच, कठिनाइयों के बीच, यहाँ तक कि सरकार के नियंत्रण के बीच, खुले तौर पर अपने संदेश की घोषणा करने में हमारे सामने आने वाले प्रतिबंधों के बीच भी ईसाई धर्म बढ़ रहा है।” क्रिश्चियनिटी टुडे ने बाद में इस हिस्से को एडिट किया।
जयलाल ने कहा कि सरकार आयुर्वेद में आस्था रखती है क्योंकि उसका सांस्कृतिक मूल्य और हिंदुत्व में पारंपरिक विश्वास है। डॉ. जयलाल ने कहा, “भारत सरकार, हिंदुत्व में अपने सांस्कृतिक मूल्य और पारंपरिक विश्वास के कारण, आयुर्वेद नामक एक प्रणाली में विश्वास करती है। पिछले तीन-चार सालों से उन्होंने आधुनिक चिकित्सा को इससे बदलने की कोशिश की है। अब 2030 से आपको आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी, योग और प्राकृतिक चिकित्सा के साथ इसका अध्ययन करना होगा।”

जयलाल का तर्क है कि संस्कृत भाषा पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करना एक ऐसा तरीका है जिसके माध्यम से सरकार हिंदुत्व की भाषा को लोगों के दिमाग में लाना चाहती है। डॉ. जयलाल ने क्रिश्चियनिटी टुडे को दिए एक साक्षात्कार में कहा था, “यह (आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी, योग आदि) भी संस्कृत भाषा पर आधारित है, जो हमेशा पारंपरिक रूप से हिंदू सिद्धांतों पर आधारित होती है। यह सरकार के लिए लोगों के मन में संस्कृत की भाषा और हिंदुत्व की भाषा को पेश करने का एक अप्रत्यक्ष तरीका है।”
एक इंटरव्यू में, जब पूछा गया कि ईसाई समुदाय का हिंदू राष्ट्रवादियों के साथ क्या संबंध है, तो डॉ. जयलाल ने सुझाव दिया कि हिंदुओं को यीशु और मुहम्मद को अपने भगवान के रूप में स्वीकार करना चाहिए क्योंकि उनका धर्म बहुदेववाद पर आधारित है। चूँकि हिंदू कई भगवानों में विश्वास करते हैं, इसलिए डॉ. जयलाल का मानना ​​है कि उनके लिए सहिष्णुता प्रदर्शित करना और ईसाई एवं इस्लामी प्रथाओं को आत्मसात करना मुश्किल नहीं है।

डॉ. जयलाल ने कहा, “हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि हिंदू धर्म या हिंदुत्व, बहुदेववाद के कारण अन्य धर्मों से अलग है। वे विभिन्न देवताओं को स्वीकार करते हैं। उन्हें यह स्वीकार करने या घोषित करने में कोई कठिनाई नहीं है कि यीशु देवताओं में से एक हैं या मुहम्मद देवताओं में से एक हैं। इसलिए अन्य देशों की प्रणालियों के साथ तुलना करने पर धार्मिक प्रतिबंध कम होते हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि भारत में यह उतना मुश्किल नहीं है।”

क्या ऐसे लोगों का पद पर बना रहना कही से भी उचित है। क्या इन जैसो को तत्काल बर्खास्त नही करना चाहिए सरकार को? ये सरकार की नौकरी कर रहे है या इसाई मिशनरी का प्रचार? ये डॉक्टर है या पादरी? इन जैसे का इलाज करना बहुत जरूरी है।
ज्यादा जानने के लिए क्लिक करे HAGGAI Internationl  पर ।

फंडिंग कहा से होती है?
देखा जाए तो गांव गांव में झोला लेकर घूमने वाले ये मिशनरी वाले पैसा देकर तो कभी इंडिया गेट बासमती चावल का बोड़ीया देकर धर्म परिवर्तन करवा देते है। आंध्र प्रदेश का की स्थिति किसी से छिपी नहीं है की वहा किस तरह धर्मांतरण का नंगा नाच हो रहा हैं। इन सबमे वहा के मुख्यमंत्री जगमोहन रेड्डी जो मिशनरीयो को बढ़ावा दे रहे है। सुनने में तो ये भी आ रहा है की मंदिरों का लूटा हुआ धन ये मिशनरी के मिशन में लगा रहे है। 
चर्च को मिल रहे पैसा कहां से आ रहा है, किस लिए आ रहा है तथा इसका उपयोग कैसे हो रहा है इस बात की पूरी जांच होनी चाहिए। विदेश से जो आर्थिक सहायता दे रहे हैं उनका राजनीतिक उद्देश्य क्या है इस बात की भी जांच होनी चाहिए। इस जांच रिपोर्ट के आधार पर सरकार को चर्च के राष्ट्रविरोधी गतिविधि पर आवश्यकीय रोक लगाने चाहिए। सरकार को यह कार्य जल्द से जल्द करना चाहिए, अन्यथा काफी देर हो सकती है। 

(स्रोत: डूपॉलिटिक्स, आप इंडिया, नवभारत टाइम्स आदि )

Tuesday, May 25, 2021

नेपाल: संसद भंग के बाद किस राह पर सियासत

जनसत्ता संवाद
भारत के लिए राहत: ओली की अपनी पार्टी के ही लोग जिस तरह उनका इस्तीफा चाहते थे, उसे देखते हुए चीन के लिए भी ओली के पक्ष में हस्तक्षेप करना संभव नहीं रह गया था । नेपाल का यह नाटकीय राजनीतिक घटनाक्रम जहां चीन के लिए बड़ा झटका है, वहीं भारत के लिए यह राहत का अवसर है, क्योंकि भारत विरोधी ओली सत्ता से बाहर हो चुके हैं।

नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने वहां की संसद भंग कर दी है और इसी साल नवंबर में चुनाव कराने का फैसला किया है। नेपाली कांग्रेस ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का एलान किया है। इससे पहले राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा था कि न तो प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली कार्यवाहक सरकार और न ही विपक्ष यह साबित कर पाया कि सरकार बनाने के लिए उनके पास बहुमत है। राष्ट्रपति ने इसी तरह का कदम पिछले साल दिसंबर में भी उठाया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द  कर दिया था। भारत के पड़ोसी देश में इस बड़ी सियासी कवायद को लेकर कोई टिप्पणी नहीं आई है,लेकिन 
कूटनीतिज्ञ समूचे घटनाक्रम पर निगाह रख रहे है।
चीन के समर्थन व भारत विरोधी एजंडे के जरिए नेपाल की सत्ता संभालने वाले ओली के तीन साल के प्रधानमंत्री काल का 21 मई को तब अचानक अंत हो गया, जब राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने संसद भंग कर दी। मध्यावधि चुनाव कोविड संकट के बीच होंगे। टीकाकरण न कर पाने के कारण नेपाल में कोरोना की स्थिति पहले ही सरकार के नियंत्रण के बाहर है। संविधान विशेषज्ञों ने राष्ट्रपति के फैसले की आलोचना की है। विपक्ष ने उनके निर्णय को असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक, निरंकुश और प्रतिगामी बताया है। 149 विपक्षी सांसदों ने राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाने का फैसला किया है, जो कि 275 सदस्यीय संसद में बहुमत के लिए जरूरी 137 की संख्या से कहीं अधिक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति को तीन दलों वाले विपक्ष यानी नेपाली कांग्रेस, प्रचंड के नेतृत्व वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) और उपेंद्र यादव के नेतृत्व वाली जनता समाजवादी को सरकार बनाने का अवसर देना चाहिए था। सीपीएन-यूएमएल के माधव नेपाल व झलानाथ खनाल धड़े का भी विपक्ष को समर्थन था । नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व में विपक्ष ने राष्ट्रपति के सामने बहुमत के लिए जरूरी सांसदों के दस्तखत के साथ सरकार बनाने का दावा भी पेश किया, लेकिन भंडारी ने उस पर विचार नहीं किया । विपक्ष के दावे को ध्वस्त करने के लिए ओली ने राष्ट्रपति के सामने 153 सांसदों के समर्थन का दावा किया था, इसके बावजूद वह विश्वास मत नहीं जीत पाए। हालांकि राष्ट्रपति का कहना है कि चूंकि ओली और विपक्ष-किसी के भी पास बहुमत नहीं है, इसलिए उन्हें संसद भंग करने का फैसला लेना पड़ा । नेपाल में 2023 में आम चुनाव प्रस्तावित है।

विश्वास मत खोने के बाद ओली खुद संसद भंग कर मध्यावधि चुनाव कराने की बात कर रहे थे। हिंदू वोट पाने के लिए ओली पहले ही भगवान राम और सीता के जन्मस्थान के बारे में टिप्पणी कर विवाद खड़ा कर चुके हैं। ओली ने अयोध्या के नेपाल में होने का भी दावा किया है, जिसका भारत ने हालांकि तीखा विरोध किया, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान ओली नेपाल के हिंदुओं को अपने पाले में करने के लिए एक बार फिर अपना यह दावा दोहराएंगे। इसके अलावा नेपाल के नए और विवादित नक्शे का प्रचार करते हुए ओली खुद को आक्रामक राष्ट्रवादी के रूप में पेश करते हुए जताएंगे कि भारत विरोधी रुख के लिए ही उन्हें जाना पड़ा।

( स्रोत: प्रस्तुत लेख  जनसत्ता  अखबार  से  साभार)

Friday, May 21, 2021

जीवन का सार है वंदेमातरम!


                 (1)  
 मातृभूमि पर मेरा सबकुछ अर्पण 
इससे ही होगा मेरे पूर्वजों का तर्पण
निश्चल प्रेम छिपा है राष्ट्र की माटी में
लहराएगा भगवा तिब्बत की आज़ादी में
लाहौर कराची में परचम फहरा देंगे
सिंधु की प्यास रक्त से बुझा देंगे।।
गिलगिट से गारो पर्वत तक सिर्फ
भारत माता की जय के नारे होंगे...
खंडित भारत माता,स्वतंत्रता अधूरी है
महादेव का रुद्र अवतार जरूरी है।।

                (2)
हिंदू हु राजनीति का केंद्रबिंदु हु...
सदियों से लहूलुहान मेरे मां का आंचल..
क्या उत्तरांचल क्या हिमाचल...
खूनी संघर्षों से जूझता हिमालय
क्या मंदिर क्या देवालय...
काकोरम से कन्याकुमारी!
किसने पूछी हालत हमारी...
वो देखो रोती रक्त के 
आंसू माता हमारी...

          (3)
 हम कोई वक्त नहीं जो बदल जाएंगे
हे भारत माता तेरे ही गीत गाएंगे।
रक्त की एक-एक बूंद है वंदेमातरम
जीवन का सार है वन्देमातरम।।