Friday, January 27, 2023

अरे बिहार के लोगो नमस्कार...!

लौरिया विधानसभा क्षेत्र के सुधि जनों
नमस्कार 

वैसे तो मैं इस विधानसभा क्षेत्र का टैक्सपेयर निवासी हूँ और कार्यक्षेत्र की व्यस्तताओं की वजह से आमतौर पर घर आना जाना कम ही हो पाता है किंतु इस वर्ष मकर संक्रांति के सुअवसर पर घर आना संभव हुआ है।
स्वयं को ईमानदार मैंने इसलिए भी नहीं कहा क्योंकि आज के आभासी सामाजिक प्रकटीकरण के भीषण दौर में मैं स्वघोषित ईमानदारी का ढ़ोल पीटता भीड़ का हिस्सा होना नहीं चाहता जहाँ हर शख्स स्वयं को अधिक ईमानदार घोषित कर अपनी बड़ाई सुनना चाहता है।
कल एक कार्यवश फतेहपुर चौक जाना हुआ और कुछ ऐसा दृश्य दृष्टिगोचर हुआ कि मैं उसपे लिखने से रोक नहीं पा रहा हूँ।

तो आप सबको और अधिक असमंजस की स्थिति में ना रखते हुये कल की वो घटना बताता हूँ जिसने ये पोस्ट करने के लिए मजबूर कर दिया।

तो हुआ यूँ कि मैं एक व्यक्तिगत कार्य से दोपहर में घर से फतेहपुर चौक जाने के लिए निकला। लंबे अवसर के बाद घर आया था तो सोचा आज साईकिल चलाने का आनंद लिया जाये वर्ना मेट्रोसिटी की भागमभाग में ये अवसर कहाँ प्राप्त होता है। अतः मैंने साईकिल निकाली और चल पड़ा। चहुँओर भारतीय गणराज्य के 74वें गणतंत्र दिवस तथा विद्यादायिनी माँ सरस्वती के पूजनोत्सव में जुटे हर्षोल्लासित बच्चे दिख रहे थे। सुबह की धुंध के बाद मौसम भी खुशगवार हो चुका था। मच्छरगावाँ बाज़ार होते हुये मैं फतेहपुर चौक तक पहुँचा। रास्ते में मुझे दिखा कि बाज़ार से चौक तक सड़क की स्थिति कुछ ठीक नहीं है हाँ बीच बीच में यत्र तत्र अव्यवस्थित तरीके से हुआ मरम्मत का कार्य भी दिखा। (ठीक तो वैसे बाजार से शनिचरी चौक तक की भी नहीं है किंतु उसकी बात फिर कभी)। 

जैसे ही मैं चौक पर पहुँचा वहाँ मुझे एक पहचान के मिश्रा जी और गफूर भाई मिल गये। दोनों किसी कार्य से बेतिया जाने हेतु बस का इंतजार कर रहे थे। बोले - "अरे *** जी बड़े दिनों बाद मिले हैं आइये पान खाया जाये।" मिश्रा जी थोड़े नाराज लग रहे थे और थोड़े बदले बदले से भी वहीं गफूर भाई का मिज़ाज भी थोड़ा उखड़ा हुआ था। 
इन बातों से अनभिज्ञ मैंने महज उत्सुकतावश पूछ लिया कि "आपलोगों को पता है कि ये सड़क की हालत इतनी जर्जर क्यों है? और ये मरम्मत का कार्य इतने अव्यवस्थित तरीके से क्यूँ हुआ है?" 
मेरा इतना कहना था कि मिश्रा जी भड़क गये। बोले - "*** जी आप कैसे आदमी हैं जो इतनी बड़ी अभूतपूर्व खगोलीय घटना में कमी निकाल रहे हैं? कुछ शर्म वर्म है कि नहीं? इस अखिल विश्व के अभी तक ज्ञात देशों में से सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के निवासी आप पे लानत है। बिना मामले की गंभीरता एवं कार्य संपादित कराने वाले की दूरदर्शिता को जाने आपकी ऐसी ओछी टिप्पणी उचित नहीं है। आप ऐसा कर कैसे सकते हैं?" 
मिश्रा जी के यूँ धिक्कारने के पश्चात अपनी अनभिज्ञता पर मन ही मन स्वयं को कोसते हुये बड़े ही शर्म के साथ मैंने तनिक धीरे से कहा - "मिश्रा जी आप तो जानते हैं कि मैं यहाँ नहीं रहता और घर परिवार तथा दोस्तों के लिये ही मुश्किल से समय निकाल पाता हूँ। वो तो मैंने यूँ ही उत्सुकतावश पूछ लिया था और आप इतने नाराज़ हो गये जैसे मैंने ये पूछ लिया हो कि डोनाल्ड ट्रंप चुनाव क्यों हार गया। और इसमें लोकतंत्र की बात कैसे?"
मेरे इस प्रकार विनती करने के पश्चात मिश्रा जी ने अपने गुस्से को उदरस्थ करते हुये मुझे बताया (हालांकि उनकी नाराज़गी उनके ललाट पर लालिमा के रूप में अभी भी परिलक्षित हो रही थी) - "आप जाने कहाँ रहते हैं जो आपको कुछ पता नहीं होता है। और लोकतंत्र की बात मैंने इसलिए की थी क्योंकि लोकतंत्र ने राजनीति नामक एक ऐसा सर्प दिया है जो देश के विकास पर कुंडली मारे बैठा है। अभी कुछ दिनों पहले ही यहाँ के एक करूणहृदय न्यायप्रिय अतिलोकप्रिय सत्तासीन माननीय विधायक जी से सड़क की स्थिति देखी नहीं गई और उन्होंने इसकी मरम्मत कराई है और आप हैं कि उसमें भी कमी निकाल रहे हैं। लालू जी ने बसंती के गाल जैसी सड़क की बात की थी उससे अच्छे तो हमारे विधायक जी हैं जिन्होंने बसंती की इज्ज़त का पूरा सम्मान करते हुये चिकनी सड़क नहीं बनावाई एवं एक कुशल रफूगर जैसे सिर्फ फटी हुई जगह पर रफू करता है वैसा ही सड़क के साथ किया है। कदाचित् प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का उद्देश्य यही है। पूर्व में ऐसा ही अभूतपूर्व कार्य इन्होंने शनिचरी जाने वाली सड़क पर भी कराया था। क्या करें बेचारे इतने सज्जन आदमी हैं कि सज्जनता भी हर सुबह शाम इनको अष्टांग दण्डवत प्रणाम करके जाती है। जनता का दुख इनसे देखा नहीं जाता इतने सहृदय व्यक्ति हैं और न्यायप्रिय इतने कि अपने घर के बगल में स्थित सरकारी विद्यालय के बगल की सड़क इन्होंने तीन बार बनवाई जब तक निर्माण कार्य से संतुष्ट नहीं हो गये।"(ये लाइन कहते हुये मिश्रा जी के मुखमंडल पर एक अजीब सी ना समझ में आने वाली मुस्कान थी)

उन्होंने आगे कहा -"आपको ये तो पता है कि विधायक जी एक राष्ट्रवादी राष्ट्रीय पार्टी के नेता हैं। जो पार्टी इतनी राष्ट्रवादी है कि पार्टीविरोधी बात करने वालों को राष्ट्रविरोधी बात करने वाला बता सीधा पाकिस्तान का वीजा दे देती है और यही नहीं उसके नेता वहाँ तक छोड़ के आने की बात भी कहते पाये जाते हैं ऐसी पार्टी के सत्तासीन विधायक पर आप अकर्मण्यता का आरोप लगा रहे हैं? शर्म आनी चाहिए आपको।"
मिश्रा जी के रौद्र रूप को देख मैं सहम सा गया। तभी गफूर भाई के हँसने की आवाज़ ने मेरा ध्यान उनकी ओर आकृष्ट किया। तब गफूर भाई ने मुझे समझाया कि मिश्रा जी Sarcasm के मोड में हैं और मेरे आने से पहले तक वे दोनों भी इसी विषय में बातचीत कर रहे थे।

तब मिश्रा जी गंभीर हो गये और मुझसे कहने लगे - "**** जी क्या बतायें इस क्षेत्र को जाने किसकी नजर लगी है जो हमें ऐसे दिन देखने को मिल रहे हैं। ये वो विधायक जी हैं जिनका विजन आजतक कभी स्पष्ट नहीं रहा कि ये राजनीति में करने क्या आये थे, कर क्या रहे हैं और भविष्य में क्या करेंगे? राम जाने उनको स्वयं को भी यह ज्ञात है अथवा नहीं? मैं दावे से कह सकता हूँ कि ऐसा अकर्मण्य विधायक इस क्षेत्र के इतिहास में आजतक नहीं हुआ। भारतीय जनता पार्टी (हालांकि कुछ लोग इसको भारतीय जमात पार्टी भी कहते हैं) के एक अतिअतिरिक्त अतिउपेक्षित एवं थोथे विकासपुरूष के जीवंत परिचायक इस अल्पविकसित विधायक को एक वार्ड चलाने की समझ नहीं है और हम इनसे पूरे विधानसभा क्षेत्र की आस लगाये बैठे हैं तो हमसे बड़ा जाहिल और कौन होगा।
हमेशा अपने चरणलोलुपों द्वारा की जाने वाली चरणवंदना से आच्छादित रहने वाले नेताजी के लिए जनता की समस्याएं तो इनकी अधोजटाओं के घुंघराले बालों के त्याज्य गुच्छों के समान हैं। अपनी बिरादरी वालों को ठेकेदारी एवं अघोषित रौबदारी सौंपने की व्यस्तता के मध्य माननीय अपने अतिनिजी कार्यों के संपादन हेतु समय निकाल लेते हैं यही क्या कम है अन्यथा अगर कार्य प्राकृतिक नहीं होता तो अधोजटाओं सी मोहिनी मूरत वाले उनके चरणचुंबक स्वयं संपादित कर आगामी ठेकेदारी के लिये अपनी कर्तव्यपरायणता सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।"
इतना बोलते बोलते मिश्रा जी की साँस फूलने लगी फिर मैंने और गफूर भाई ने जैसे तैसे उन्हें चुप कराया और पान थूकते हुये गफूर भाई ने पनवाड़ी से पानी की बोतल माँगी। हमने मिश्रा जी को पानी पिलाया। तभी बस आ गई और मिश्रा जी तथा गफूर भाई को जाना पड़ा। मिश्रा जी जाने के मूड में तो नहीं लग रहे थे शायद उनकी बात अधूरी रह गई थी। 
फिर मैंने भी अपना काम निपटाया और घर की ओर चल पड़ा।
वापस आते हुये मैं सोच रहा था कि कह तो मिश्रा जी ठीक ही रहे थे।

(लेखक पेशे से इंजीनियर है और राष्ट्रचिन्तक से जुड़े हुए है)

Thursday, December 29, 2022

वाह रे "भइया"

बहुत भारी भरकम शब्द है "भइया" इसको बोलकर लोग डूबा देते है "नइया" काम रहता है तभी भइया सबको याद आते है वरना भइया बराबर चूतिया ही तो होते है। अगर बड़े भइया हाल चाल लेने के लिए फोन कर दे तो लोग भइया प्रणाम की जगह बोलते है "क्या काम है?" क्या ही बोला जाय जीवन में बहुत कुछ घट जाय चलेगा पर किसी लड़की ने भइया बोल दिया तो धज्जियां उड़ जाती है खासकर जब वो कॉलेज में आपके क्लास की ही हो...! भइया को कुछ आता जाता नही हैं क्योंकि वो सफलता हासिल नही कर पा रहे है कही.. जिम्मेदारियों के बोझ तले भइया दबकर संघर्ष करके आगे तो निकल जाते है पर रहते भइया ही हैं..! भइया को मईया भी बहुत मानती है पर भइया को लगता है भइया बराबर चूतिया ही होवे है...! भइया समझते है बड़े घर के वही हैं सबका ख्याल रखना उन्ही को हैं इसीलिए मईया के प्यारे भइया है..।
एक हैं राजनीति वाले भइया इनको तो इनकी पत्नी भी भइया कहकर संबोधित करती है सार्वजनिक मंचों पर। वाह..! क्या जमाना आ गया है राजनीति  ने सईया को भइया बना दिया।
एक होते है सब्जी वाले भइया ठेला लेकर एक दम सुबह ही मोहल्ले में हाजिर हो जाते है। भइया की इज्जत की धज्जियां तब उड़ जाती है जब उसी मोहल्ले में पूर्व प्रेमिका से नजरे मिल जाती है और इंतकाम लेने की सोचने वाले भइया उसके पति के थैले में धनिया मिर्च फ्री में ठेलकर निकल लेते है। हमारे एक मित्र ने क्या गजब कहा है...

"उसकी रकीबियत का किस्सा मुझसे मत पूछों 
महबूब के मोहल्ले की हटरी में सब्जियां बेचता है।
मासूका की बातें अब और क्या कहूँ, 
ये बात सुनो उसके पति के थैले में 
धनिया मिर्च फ्री में ठेलता है।"

इन सबके बीच यूपीएससी वाले भइया को भूल जाना महापाप होगा जो दिन भर में दसियों बार चाय और सिगरेट पी लेते है.. कहते हैं इससे कंसंट्रेशन बना रहता है। खैर ये तो तो पढ़ते भी जम के है लेकिन इनको देखकर गांव से आए कुछ नए लड़के सिर्फ पीते ही है पढ़ना तो भूल ही जाते है... भइया कही ना कही सिलेक्शन लेकर निकल लेते है और ये रह जाते है वही तथाकथित संघर्ष के जंजाल में..! भइया का बढ़िया काम कोई नही करता बुरा सब देखते है। अब छात्र नेताओं वाले भइया का कवनों भौकाल नही रह गया है आजकल हर दूसरा छात्र विश्वविद्यालय में खुद को छात्र नेता ही समझता है..। पहले के तो ठेकेदारी का काम पा भी जाते थे अब तो बस दो चार हजार भइया का पेट जाता है मुर्गा दारू लेकर अब तो गाना भी आ गया है भोजपुरी में "खाके मुर्गा पीके बियर बोला हैप्पी न्यू ईयर"।

"भइया" होना आसान काम नही है भइया...राम राम भइया...!

Thursday, November 3, 2022

सोशल मीडिया पर सब ज्ञानी है

गजब का तमाशा देखने को मिल रहा है देश में। हर दिन कोई न कोई न कोई नया बखेड़ा खड़ा हो ही जाता हैं। सोशल मीडिया के जमाने में कोई खबर किसी से छिपी नही रहती है देर सबेर गलत सही लोगो के पास पहुंच ही जाता है। तमाम फैक्ट चेकर भी है जो फैक्ट चेक करके के बताते रहते है खबर की सच्चाई अपने चैनलों के माध्यम से लेकिन क्या हो जब फैक्ट चेकर ही चोकर निकले यानी फर्जी तथ्यों को सामने रखकर उलूल जुलुल खबरों को हवा दे? 
अब जबसे से डिजिटल क्रांति हुआ है तब से देखा जाए तो लगभग हर सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भारत की जनता ने भीड़ लगाकर रखा हुआ है। सब कलाकार बनने लग गए है, घर बैठे पैसे कमाने के होड़ गंध से गंध भरी कलाकारी का प्रदर्शन कर रहे है। नाचना भी एक कला है ढंग से सीखने वाला ही कलाकार कहलाता है, वर्ना सारी जिंदगी भांड का तमगा माथे पर टिका रहना है...!
किताबें पढ़ो, अखबार पढ़ो, अपने आसपास का माहौल परखो, लोगों के दुःख सुख उनकी परेशानियों को समझो, प्रबोधन वहां से मिलेगा। तरस आता है उन लोगों की सोच पर जो सोशल मीडिया पर ज्ञान के लिए भटक रहे हैं। असल जीवन में बगल वाला पड़ोसी ही काम आने वाले है ये सोशल मीडिया के मित्र सिर्फ एक छलावा है। सोशल मीडिया पर कुछ पत्रकार भी मिल जाएंगे मोबाइल हईये कैमरा का क्या जरूरत उठाए मुंह चल दिए गांव के किसी सरकारी स्कूल में मैडम पढ़ा रही है बच्चो को इनको कोई फर्क नही पड़ने वाला ये उसी बीच में अपना अर्धज्ञान लेकर कूद पड़ेंगे और पूरे कक्षा माहौल खराब कर देंगे। इन्हे भले पत्रकारिता का "प" भी न पता हो फिर भी स्वतंत्र पत्रकार बनेंगे..! अरे इतना ही नही सरकारी अस्पतालों में भी घुसकर बकैती करने लग जाते है चिल्ला चिल्ला कर मानो वो एमबीबीएस करके बैठे डॉक्टर साहब कुछ जनबे नही करते है..! ये तथाकथित स्वघोषित स्वतंत्र पत्रकार सोशल मीडिया के गंदी नाली के कीड़े और कुछ नही हैं।

सोशल मीडिया पर लोग बहस करते हुए मोबाइल नंबर तो ऐसे मांगते है मानो पांच मिनट में पूरी राजनीति और अर्थव्यवस्था समझा देंगे..! एक से एक विद्वान मिल जाते है क्या ही बोला जाय जब गलत खबरों को पढ़े लिखे लोग ही हवा देने लग जाय तो..!  हद तो तब हो जाती है जब वही सोशल मीडिया का ज्ञान भोले भाले बच्चो के ऊपर थोपी जाती है। खैर बच्चों के हाथ में भी स्मार्ट फोन आ ही गया है तो क्या फर्क पड़ता है आने वाली नस्ले बिगड़े या बने किसी कोई फर्क नही पड़ता है। सब अपने घिसे-एजेंडे को लेकर चल रहे है जो बहुत ही घातक है। सोचने समझने की शक्तियों का प्रयोग बंद हो चुका है लोगो द्वारा अब जो होता है वो गूगल बाबा के माध्यम से होता है। अब किसी के पास जानकारी की कमी नही हैं। किसी भी मुद्दे पर चर्चा हो रही हो लोग घुस जाते है भले उसके बारे में रत्ती भर ना पढ़े हो पर सोशल मीडिया का ज्ञान उन्हे एक्सपर्ट बना ही देता है..! अब जैसे एक लड़का मेरे ख्याल से हाई स्कूल में रहा होगा वो मेरे मित्र के पोस्ट पर कॉमेंट करता है की "भईया जी आपको क्या पता है मुलायम सिंह यादव जी का देन है सेना के जवानों को पेंशन मिल रहा है" अब इसका क्या ही जवाब दिया जाय ? उदहारण के तौर पर भारत- चीन सीमा विवाद को लेकर बस ये पाँच सात नाम याद करने हैं गलवान, पैंगोंग सो, दौलत बेग ओल्दी, हॉटस्प्रिंग्स,श्योक रिवर,फिंगर 4-8, शिरिझप ओर आप भी इधर 'स्ट्रेटेजिक अफेयर एक्सपर्ट' ओर 'लीडिंग डिफेंस एंड सिक्योरिटी एनालिस्ट' बन जाएंगे..! बाकी सोशल मीडिया एक ऐसा रंगमंच बन चुका है जहा सब नंगा नाच कर रहे है और उसी में बुलबुल है। 

Tuesday, September 6, 2022

आराम

आराम= आम ,राम और आरा 
यानी इस शब्द से फल भगवान और एक जिला निकलता है.... गर्मियों में घाम चाहे जितना लगे लोग आम दबाकर चूसते है खाते है बिना रुके थके .... हापुस चौसा लंगड़ा दशहरी, खाईब पूरा दोपहरी...

रही बात आरा जिला की तो एक नवयुवती के "लिपस्टिक" लगाने पर हिलने लगती है ... भोजपुरी के महान कलाकार पवन सिंह के गाएं है "जब लगावे लू लिपिस्टिक हिलेला आरा डिस्ट्रिक" इतना ही नही पूरा जिला हिलेगा तो भूकंप आ जाएगा न लेकिन फिर भी उस नवयुवती को जिला टॉपर बनाया जाता है... आदरणीय नीतिश कुमार जी को "लिपिस्टिक" पर प्रतिबंध लगाना चाहिए था ना की शराब पर....... इस बात को लेकर झूमने और चूमने वाले युवा क्रांतिकारियों में जबरदस्त भिड़ंत देखी गई है.....

एक आते है "राम" भगवान इनको कवनो फर्क ही नही पड़ा काटे कंकड़ पत्थर जंगल झाड़ी नग्न पैर चलते रहे है , जहा जहा गए छाप अपनी छोड़ते रहे ... बिना रुके बिना थके समुद्र से याचना किया , चाहते तो पहले ही तीर निकालकर चीर देते समुद्र को... लेकिन दिव्य शक्तियों का प्रयोग हर वक्त करने से मनुष्य "मरा" सिद्ध होता है, "राम" बनने के लिए पौरुष बल ही बड़ा होता है....सब्र और प्रतीक्षा बांध टूट गया जब "राम" के सामने तो ...प्रश्न उठता है यहां हम क्यों चले "आराम" करने।

ये शब्द "आराम" सुनने में ही अच्छा लगता है अब तो🙂


©शिवम कुमार पाण्डेय

Friday, August 19, 2022

इनकी हैवानियत का कोई अंतिम बिंदु नही है

क्या हो रहा है भारत में? जो हो रहा है वो बिलकुल भी सही नही हो रहा है। सिर तन से जुदा करने वाले कठमुल्लों ने देश में अशांति और अराजकता का माहौल पैदा कर दिया है। हाथ में छुड़ा चाकू लेकर निकल पड़ते है काफिरों का गर्दन उड़ाने के लिए। धमकी या चेतावनी क्या ये खुल्लमखुल्ला घोषणा कर के अपने घृणित कार्य को अंजाम दे रहे है। अभी हाल ही की घटना है कर्नाटक में उर्दू न बोल पाने के चलते की गयी थी हिंदू युवक की हत्या। उदयपुर  में 2 और हिंदू व्यापारियों को मिली जान से मारने की धमकी। बरेली में सातवी कक्षा में पढ़ने वाली हिंदू बालिका का उवैस, नदीम और उनके 2 और साथियों ने किया था बलात्कार । प्रधानमंत्री के आगामी बिहार दौरे में गड़बड़ी फैलाने की तैयारी कर रहा नूरुद्दीन गिरफ्तार हुआ। और नाटक ऐसा बना रखा है कि इनको हिंदुस्तान में रोज प्रताड़ित किया जा रहा हो।

नूपुर शर्मा के बयान को लेकर किस तरह का बवाल हुआ था देश भर में ये तो किसी से छिपा हुआ नही है। जगह- जगह आगजनी और पत्थरबाजी की गई थी जिहादियों द्वारा। इतना ही नही नुपुर शर्मा के समर्थको के ऊपर जानलेवा हमला किया जा रहा है। नूपुर जी को खुद जान से मारने की धमकी दी जा रही है। ऐसे अपशब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है एक स्त्री के लिए मैं उसको यहां लिख नही सकता बाकी आप सब खुद ही समझदार है। भारत की भूमि पर जो बीज जहर का बोया जा रहा है उसको नष्ट करना ही पड़ेगा वरना पनपते ही पूरी हिंदू सभ्यता और संस्कृति का विनाश निश्चित है। 
स्वतंत्रता दिवस से दो दिन पहले यूपी एटीएस ने आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद और अन्य आतंकवादी संगठनों से जुड़े आतंकी मोहम्मद नदीम को शुक्रवार को सहारनपुर से गिरफ्तार किया था। एटीएस के मुताबिक नदीम किसी बड़े फिदायीन हमले की तैयारी कर रहा था। उसे भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा की हत्या का टास्क भी सौंपा गया था। 
इससे पहले आजमगढ़ से आईएसआईएस का आतंकी एटीएस के हत्थे चढ़ा था। यूपी पुलिस के आतंकी निरोधक दस्ते ने आगामी 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आतंकी हमला करने के मकसद से विस्फोट करने की योजना बना रहे एक जिहादी धर दबोचा था।  इसने बहुत खुलासे किए है। कितने बड़े स्तर पर ये योजना बनकर अंजाम देने की कोशिश करते है और लोग सेकुलर बनने के चक्कर में कहते है आतंकियो का कोई धर्म या मजहब नही होता..!

अरे अमेरिका में जो हुआ वो कम है क्या? या किसी से छिपा हुआ है  लेखक सलमान रुश्दी को 12 अगस्त को उस समय चाकू मार दिया गया, जब वह अमेरिका के न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम में बोलने के लिए तैयार थे। वह जीवन और मृत्यु के बीच जूझ रहे हैं।  सलमान रुश्दी  अपने उपन्यास 'मिडनाइट्स चिल्ड्रेन' (1981) के लिए बुकर पुरस्कार से सम्मानित किए जा चुके हैं। 1983 में उनकी किताब 'शेम' आ आई थी और फिर पांच साल बाद 1988 में आई 'द सैटेनिक वर्सेज़' ने पूरे इस्लामिक जगत में हलचल मचा दी थी । 1989 में उनके उपन्यास, सैटेनिक वर्सेज के प्रकाशन के बाद, जिसे कुछ मुसलमानों ने ईशनिंदा माना, तत्कालीन  ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी ने रुश्दी की हत्या के द लिए एक फतवा जारी किया था। उस दुनिया भर में दंगा भी हुआ था रुश्दी के ऊपर करोड़ो का इनाम तक रखा गया।  अब सोचिए जरा 32-33 साल बाद जब रुश्दी जैसे लोग नही बख्से जा रहे है तो नूपुर शर्मा की जान तो हमेशा के लिए आफत में ही रहेगी। सिर तन से जुदा वाले घृणित मानसिकता वालों को पनपने से पहले खत्म करना होगा। ये जिसे चाहे जो बोल दे इनके बारे में कुछ बोल दो तो इनके भीतर आग आग लग जाती है और वो उस आग में लोगो को लपटने से नही कतराते है। इनके लिए इनका जिहाद ही सबकुछ है ये मानवता वाली बाते कचड़े के ढेर में ये हैवान है जिनकी हैवानियत का कोई अंतिम बिंदु नही है।

(तस्वीर का श्रोत: DNA हिंदी )