Monday, September 28, 2020

सामाजिक परिवर्तन सदा ही ताकत और विशेष सुविधाएं मांगने वालो के लिए भय पैदा करता है।

लेखक:- शिवम कुमार पाण्डेय

क्या कह रहे हो तुम्हारी आवाज दबाई जा रही है, तुम पर जुल्म किया जा रहा है।इसीलिए जुलूस निकाल रहे हो तभी मैं कहा इतनी भीड़ क्यों है। पर ये भगत सिंह की  तस्वीर का इस्तेमाल क्यों कर रहे हो? ओ क्रांति का दूसरा नाम भगत सिंह है! सड़को पर क्रांति होगी तोड़ - फोड़ की जाएगी , वाहनों को फूंका जाएगा रेलवे ट्रैक उखाड़ा जाएगा सबकुछ अस्त - व्यस्त कर दिया जाएगा, और डीजे लगा के नाच गाना किया जाएगा। इसी को छात्र , बेरोजगारों और किसानों का आंदोलन बोला जाएगा। वाह यार वाह गजब की क्रांति है यार पर ट्रैक्टर जो किसानों का मदद करता है उसको फूंक कर भगत सिंह जिंदाबाद के नारे लगाकर उनका अपमान करना  क्या यही विचार है?
भगत सिंह के नाम पर फलनवा - ढिकनवा मोर्चा संगठन बनाके लोगो को भड़काना, महौल खराब बिगाड़ना आदि करना आम बात हो गई है। हद तो तब हो जाती है जब किसी आतंकवादी या नक्सल गतिविधियों में शामिल व्यक्ति की तुलना शहीद भगत सिंह से कर दी जाती है चंद मुट्ठी भर नेताओ और बुद्धिजीवियों द्वारा।
कोई उनका ऐसा पोस्टर लगाता है मानों ये कोई क्रांतिकारी नहीं  गुंडा या माफिया हो ! मतलब एक कट्टा खोस दिया जाता है उनके जेबा में । अरे भाई थोड़ा तो रहम करो इनपर ये कोई मामूली व्यक्ति नहीं है ये वही हैं जिसने कहा था "सामाजिक परिवर्तन सदा ही ताकत और विशेष सुविधाएं मांगने वालो के लिए भय पैदा करता है। क्रांति एक ऐसा करिश्मा हैं जिसे प्रकृति स्नेह करती है और जिसके बिना कोई प्रगति नहीं हो सकती - न प्रकृति में और न ही इंसानी कारोबार में। क्रांति निश्चय ही बिना सोची - समझी हत्याओं और आगजनी की दरिंदा मुहिम नहीं है और न ही यहां - वहां चंद बम फेंकना और गोलियां चलाना है; और न ही यह सभ्यता के सारे निशान मिटाने तथा समायोचित न्याय और समता के सिद्धांत को खत्म करना हैं। क्रांति कोई मायूसी से पैदा हुआ दर्शन भी नहीं और न ही सरफरोशों का कोई सिद्धांत हैं। क्रांति ईश्वर विरोधी हो सकती हैं लेकिन मनुष्य विरोधी नहीं।"
असेम्बली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और दत्त द्वारा बांटे गए पर्चे में लिखा था "बहरो को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की आवश्यकता। होती हैं," प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलीयां के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं। देखा जाए तो बम को वैज्ञानिक तरीके से बनाया गया था और उसे खाली जगह फेंका गया था ताकि किसी को हानि ना पहुंचे नहीं अगर ऐसा नहीं होता तो कोई जिंदा ही नहीं बचता इस पर्चे को पढ़ने के लिए।
भूख हड़ताल का भी ढकोसला आजकल बहुत चलता है भारतीय राजनीति में युवा लोग भी कोई दूध के धुले नहीं है इस मामले को लेकर आज भूख हड़ताल शुरू होती है किसी मुद्दे को लेकर और अगले दिन अनार के जूस के साथ खत्म हो जाती है। सोचिए 114 दिन के भूख हड़ताल में कितनी यातनाएं झेलनी पड़ी होंगी शहीद भगत सिंह और उनके साथियों को।

आजकल के युवा पीढ़ी को चाहिए कि भगत सिंह के बारे में अच्छे से जाने पढ़े और समझे की कोशिश करे किसी के बहकावे आने की जरूरत नहीं है। शहीद भगत सिंह का "युवक" और "विद्यार्थी और राजनीति" नामक लेख काफी लोकप्रिय और प्रसिद्ध है जिसको एक बार अच्छे से जरूर पढ़ना चाहिए।
कितनो को तो ये भी नहीं पता होगा की 23 मार्च, 1931 को शाम सात बजे भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी देकर उनकी लाशों के टुकड़े - टुकड़े किए गए।फिर फिरोजपुर , सतलुज नदी में बहाया गया। सब बहुत जल्दबाजी में किया गया। टुकड़े करने और अधजली हालत का प्रमाण 24 मार्च ,1931 को शहीद भगत सिंह की बहिन बीबी अमर कौर व अन्य देशवासियों  द्वारा खून - सने पत्थर ,रेत और तेज धार हथियार से कटी अधजली हड्डियां हैं, जिन्हें आजकल खटकड़कलां गांव में प्रदर्शित किया गया है।भगत सिंह पर बनी तमाम फिल्मों में इस सच्चाई को कभी  दर्शाया नहीं गया और युवाओं के बीच में भी कई तरह के भ्रम उत्पन्न किए गए। इतिहास हमसे  मांग करता है कि हम अपनी सूझ बूझ से बलिदानी शहीदों को समझे और संकीर्णता का शिकार होने से बचें । युवाओं को शहीद भगत सिंह का यह कथन गांठ बांध लेना चाहिए - "पढ़ो ,आलोचना करो , सोचो व इसकी (इतिहास की) सहायता से अपने विचार बनाने का प्रयत्न करो।"

Saturday, September 26, 2020

75 वें संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) सत्र 2020 में प्रधानमंत्री के संबोधन का मूलपाठ



अध्यक्ष महोदय, 

संयुक्त राष्ट्र की 75वीं वर्षगांठ पर, मैं, भारत के 130 करोड़ से ज्यादा लोगों की तरफ से, प्रत्येक सदस्य देश को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। भारत को इस बात का बहुत गर्व है कि वो संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक देशों में से एक है।आज के इस ऐतिहासिक अवसर पर, मैं आप सभी के सामने भारत के 130 करोड़ लोगों की भावनाएं, इस वैश्विक मंच पर साझा करने आया हूं। 

अध्यक्ष महोदय, 

1945 की दुनिया निश्चित तौर पर आज से बहुत अलग थी। पूरा वैश्विक माहौल, साधन-संसाधन, समस्याएं-समाधान सब कुछ भिन्न थे। ऐसे में विश्व कल्याण की भावना के साथ जिस संस्था का गठन हुआ, जिस स्वरूप में गठन हुआ वो भी उस समय के हिसाब से ही था। आज हम एक बिल्कुल अलग दौर में हैं। २१वीं सदी में हमारे वर्तमान की, हमारे भविष्य की, आवश्यकताएं और चुनौतियां अब कुछ और हैं। इसलिए आज पूरे विश्व समुदाय के सामने एक बहुत बड़ा सवाल है कि जिस संस्था का गठन तब की परिस्थितियों में हुआ था, उसका स्वरूप क्या आज भी प्रासंगिक है? सदी बदल जाये और हम न बदलें तो बदलाव लाने की ताकत भी कमजोर हो जाती है | अगर हम बीते 75 वर्षों में संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियों का मूल्यांकन करें, तो अनेक उपलब्धियां दिखाई देती हैं। लेकिन इसके साथ ही अनेक ऐसे उदाहरण भी हैं, जो संयुक्त राष्ट्र के सामने गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता खड़ी करते हैं। ये बात सही है कि कहने को तो तीसरा विश्व युद्ध नहीं हुआ, लेकिन इस बात को नकार नहीं सकते कि अनेकों युद्ध हुए, अनेकों गृहयुद्ध भी हुए। कितने ही आतंकी हमलों ने पूरी दुनिया को थर्रा कर रख दिया, खून की नदियां बहती रहीं।

इन युद्धों में, इन हमलों में, जो मारे गए, वो हमारी-आपकी तरह इंसान ही थे। वो लाखों मासूम बच्चे जिन्हें दुनिया पर छा जाना था, वो दुनिया छोड़कर चले गए। कितने ही लोगों को अपने जीवन भर की पूंजी गंवानी पड़ी, अपने सपनों का घर छोड़ना पड़ा। उस समय और आज भी, संयुक्त राष्ट्र के प्रयास क्या पर्याप्त थे? पिछले 8-9 महीने से पूरा विश्व कोरोना वैश्विक महामारी से संघर्ष कर रहा है। इस वैश्विक महामारी से निपटने के प्रयासों में संयुक्त राष्ट्र कहां है, एक प्रभावशाली Response कहां है? 

 

अध्यक्ष महोदय,

संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रियाओं में बदलाव, व्यवस्थाओं में बदलाव, स्वरूप में बदलाव, आज समय की मांग है। संयुक्त राष्ट्र का भारत में जो सम्मान है, भारत के 130 करोड़ से ज्यादा लोगों का इस वैश्विक संस्था पर जो अटूट विश्वास है, वो आपको बहुत कम देशों में मिलेगा। लेकिन ये भी उतनी ही बड़ी सच्चाई है कि भारत के लोग संयुक्त राष्ट्र के reforms को लेकर जो Process चल रहा है, उसके पूरा होने का बहुत लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। आज भारत के लोग चिंतित हैं कि क्या ये Process कभी एक logical end तक पहुंच पाएगा। आखिर कब तक, भारत को संयुक्त राष्ट्र के decision making structures से अलग रखा जाएगा? एक ऐसा देश, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, एक ऐसा देश, जहां विश्व की 18 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या रहती है, एक ऐसा देश, जहां सैकड़ों भाषाएं हैं, सैकड़ों बोलियां हैं, अनेकों पंथ हैं, अनेकों विचारधाराएं हैं, जिस देश ने सैकड़ों वर्षों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करने और सैकड़ों वर्षों की गुलामी, दोनों को जिया है  

अध्यक्ष महोदय,

जब हम मजबूत थे तो दुनिया को कभी सताया नहीं, जब हम मजबूर थे तो दुनिया पर कभी बोझ नहीं बने। 

अध्यक्ष महोदय,

जिस देश में हो रहे परिवर्तनों का प्रभाव दुनिया के बहुत बड़े हिस्से पर पड़ता है, उस देश को आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा? 

अध्यक्ष महोदय,

संयुक्त राष्ट्र जिन आदर्शों के साथ स्थापित हुआ था और भारत की मूल दार्शनिक सोच बहुत मिलती जुलती है, अलग नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के इसी हॉल में ये शब्द अनेकों बार गूंजा है- वसुधैव कुटुम्बकम। हम पूरे विश्व को एक परिवार मानते हैं। यह हमारी संस्कृति, संस्कार और सोच का हिस्सा है। संयुक्त राष्ट्र में भी भारत ने हमेशा विश्व कल्याण को ही प्राथमिकता दी है। भारत वो देश है जिसने शांति की स्थापना के लिए लगभग 50 peacekeeping missions में अपने जांबाज सैनिक भेजे। भारत वो देश है जिसने शांति की स्थापना में सबसे ज्यादा अपने वीर सैनिकों को खोया है। आज प्रत्येक भारतवासी, संयुक्त राष्ट्र में अपने योगदान को देखते हुए, संयुक्त राष्ट्र में अपनी व्यापक भूमिका भी देख रहा है। 

अध्यक्ष महोदय, 

02 अक्टूबर को ‘International Day of Non-Violence’ और 21 जून को ‘International Day of Yoga’, इनकी पहल भारत ने ही की थी। Coalition for Disaster Resilient Infrastructure और International Solar Alliance, ये भारत के ही प्रयास हैं। भारत ने हमेशा पूरी मानव जाति के हित के बारे में सोचा है, न कि अपने निहित स्वार्थों के बारे में। भारत की नीतियां हमेशा से इसी दर्शन से प्रेरित रही हैं। भारत की Neighbourhood First Policy से लेकर Act East Policy तक, Security And Growth for All in the Region की सोच हो या फिर Indo Pacific क्षेत्र के प्रति हमारे विचार, सभी में इस दर्शन की झलक दिखाई देती है। भारत की Partnerships का मार्गदर्शन भी यही सिद्धांत तय करता है। भारत जब किसी से दोस्ती का हाथ बढ़ाता है, तो वो किसी तीसरे के खिलाफ नहीं होती। भारत जब विकास की साझेदारी मजबूत करता है, तो उसके पीछे किसी साथी देश को मजबूर करने की सोच नहीं होती। हम अपनी विकास यात्रा से मिले अनुभव साझा करने में कभी पीछे नहीं रहते। 

अध्यक्ष महोदय, 

Pandemic के इस मुश्किल समय में भी भारत की pharma industry ने 150 से अधिक देशों को जरूरी दवाइयां भेजीं हैं।   विश्व के सबसे बड़े वैक्सीन उत्पादक देश के तौर पर आज मैं वैश्विक समुदाय को एक और आश्वासन देना चाहता हूं। भारत की Vaccine Production और Vaccine Delivery क्षमता पूरी मानवता को इस संकट से बाहर निकालने के लिए काम आएगी। हम भारत में और अपने पड़ोस में phase 3 clinical trials की तरफ बढ़ रहे हैं। Vaccines की delivery के लिए Cold Chain और Storage जैसी क्षमता बढ़ाने में भी भारत, सभी की मदद करेगा।   

अध्यक्ष महोदय, 

अगले वर्ष जनवरी से भारत, सुरक्षा परिषद के अस्थाई सदस्य के तौर पर भी अपना दायित्व निभाएगा। दुनिया के अनेक देशों ने भारत पर जो विश्वास जताया है, मैं उसके लिए सभी साथी देशों का आभार प्रकट करता हूं। विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र होने की प्रतिष्ठा और इसके अनुभव को हम विश्व हित के लिए उपयोग करेंगे। हमारा मार्ग जन-कल्याण से जग-कल्याण का है। भारत की आवाज़ हमेशा शांति, सुरक्षा, और समृद्धि के लिए उठेगी। भारत की आवाज़ मानवता, मानव जाति और मानवीय मूल्यों के दुश्मन- आतंकवाद, अवैध हथियारों की तस्करी, ड्रग्स, मनी लाउंडरिंग के खिलाफ उठेगी। भारत की सांस्कृतिक धरोहर, संस्कार, हजारों वर्षों के अनुभव, हमेशा विकासशील देशों को ताकत देंगे। भारत के अनुभव, भारत की उतार-चढ़ाव से भरी विकास यात्रा, विश्व कल्याण के मार्ग को मजबूत करेगी।  

अध्यक्ष महोदय,

बीते कुछ वर्षों में, Reform-Perform-Transform इस मंत्र के साथ भारत ने करोड़ों भारतीयों के जीवन में बड़े बदलाव लाने का काम किया है। ये अनुभव, विश्व के बहुत से देशों के लिए उतने ही उपयोगी हैं, जितने हमारे लिए। सिर्फ 4-5 साल में 400 मिलियन से ज्यादा लोगों को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ना आसान नहीं था। लेकिन भारत ने ये करके दिखाया। सिर्फ 4-5 साल में 600 मिलियन लोगों को Open Defecation से मुक्त करना आसान नहीं था। लेकिन भारत ने ये करके दिखाया। सिर्फ 2-3 साल में 500 मिलियन से ज्यादा लोगों को मुफ्त इलाज की सुविधा से जोड़ना आसान नहीं था। लेकिन भारत ने ये करके दिखाया। आज भारत Digital Transactions के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में है। आज भारत अपने करोड़ों नागरिकों को Digital Access देकर Empowerment और Transparency सुनिश्चित कर रहा है। आज भारत, वर्ष 2025 तक अपने प्रत्येक नागरिक को Tuberculosis से मुक्त करने लिए बहुत बड़ा अभियान चला रहा है। आज भारत अपने गांवों के 150 मिलियन घरों में पाइप से पीने का पानी पहुंचाने का अभियान चला रहा है। कुछ दिन पहले ही भारत ने अपने 6 लाख गांवों को ब्रॉडबैंड ऑप्टिकल फाइबर से कनेक्ट करने की बहुत बड़ी योजना की शुरुआत की है।

 अध्यक्ष महोदय, 

Pandemic के बाद बनी परिस्थितियों के बाद हम “आत्मनिर्भर भारत” के विजन को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। आत्मनिर्भर भारत अभियान, Global Economy के लिए भी एक Force Multiplier होगा। भारत में आज ये सुनिश्चित किया जा रहा है कि सभी योजनाओं का लाभ, बिना किसी भेदभाव, प्रत्येक नागरिक तक पहुंचे। Women Enterprise और Leadership को Promote करने के लिए भारत में बड़े स्तर पर प्रयास चल रहे हैं। आज दुनिया की सबसे बड़ी Micro Financing Schemes का सबसे ज्यादा लाभ भारत की महिलाएं ही उठा रही हैं। भारत दुनिया के उन देशों में से एक है जहां महिलाओं को 26 Weeks की Paid Maternity Leave दी जा रही है। भारत में Transgenders के अधिकारों को सुरक्षा देने के लिए भी कानूनी सुधार किए गए हैं।  

अध्यक्ष महोदय,

भारत विश्व से सीखते हुए, विश्व को अपने अनुभव बांटते हुए आगे बढ़ना चाहता है। मुझे विश्वास है कि अपने 75वें वर्ष में संयुक्त राष्ट्र और सदस्य सभी देश, इस महान संस्था की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए और प्रतिबद्ध होकर काम करेंगे। संयुक्त राष्ट्र में संतुलन और संयुक्त राष्ट्र का सशक्तिकरण, विश्व कल्याण के लिए उतना ही अनिवार्य है। आइए, संयुक्त राष्ट्र के 75वें वर्ष पर हम सब मिल कर अपने आपको विश्व कल्याण के लिए, एक बार फिर समर्पित करने का प्रण लें।    

धन्यवाद। 

Tuesday, September 22, 2020

उन्होने अपने इसी आचरण से महामना के मूल्यों और उद्देश्यों का यथोचित प्रतिनिधित्व किया है।

लेखक:- गौरव राजमोहन नारायण सिंह

आज जिस पत्र के आलोक में मेरी भावनाओं ने मुझे इस संदेश को लिखने पर मजबूर किया है, उसके बारे में जहां एक तरफ मुझे पीड़ा हो रही है तो दूसरी तरफ गर्व की अनुभूति। आज माननीय उपसभापति, राज्यसभा, श्री हरिवंश नारायण जी का माननीय राष्ट्रपति व उप-राष्ट्रपति जी को लिखा गया वह मार्मिक पत्र विभिन्न संचार-माध्यमों द्वारा जब प्रकाशित हुआ तो मेरी भावनाओं आकस्मिक रूप से प्रतिस्फुटित हो गई। मानवीय संवेदनाओं से संदर्भित इस पत्र में उन्होने गत 20 सितंबर को राज्यसभा की कारवाई में हुई उस अशोभनीय घटना के बारे में बेहद संयम और सहनशीलता के साथ मार्मिक वर्णन किया है।

यह पत्र एक बार पुनः उनके सरल, सहज और सौम्य व्यक्तित्व को दर्शाता है। उनके इस गांधीवादी आचरण और आदर्शों ने राज्यसभा की उस महान उदारवादी परंपरा को भी जीवंत किया है, जो हमारे लोकतंत्र में बसी उस निष्ठा व आस्था को और मज़बूत करने का काम करती है। गत 20 सितंबर को हुई उसी घटना में पूरे देश ने देखा की किस प्रकार पीठ और आसंदी पर कुछ विपक्षी सांसदों ने वो किया जिसकी कल्पना सभ्य समाज में नहीं की जा सकती। देश ने देखा की किस प्रकार की अभ्रद्रता सदन में उप-सभापति और राज्यसभा कर्मचारियों के साथ कुछ सांसदों द्वारा की गई, जिससे पूरा देश शर्मसार है।   

लेकिन जेपी और अटल जैसे आदर्शवादियों के अनुयायी श्री हरिवंश ने जिस प्रकार से लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के माध्यम से न सिर्फ अपनी आपत्ति, पत्र के माध्यम से जताई बल्कि अपने स्वभाव के अनुरूप उन विपक्ष के प्रदर्शंकारी सांसदों से आज सुबह संसद परिसर में अपने घर से चाय के साथ मिलने भी पहुंचे और उनके स्वास्थ्य की जानकारी भी ली। यही घटना उनकी सादगी और समवेशी आचरण का प्रतिबिंब है। मुझे खुद इस बात का गर्व है की श्री हरिवंश, जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मेरी यही संकाय के अर्थशास्त्र विभाग के पुरा छात्र है, उन्होने अपने इसी आचरण से महामना के मूल्यों और उद्देश्यों का यथोचित प्रतिनिधित्व किया है।

मैं उनकी सादगी को नमन करता हूं और आपसे आग्रह करता हूं की आप सभी कृपया श्री हरिवंश जी का पत्र  पढ़े।

उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखा।



माननीय राष्ट्रपति जी

भारत सरकार

नई दिल्ली

आदरणीय महामहिम जी,

कल दिनांक 20 सितंबर 2020 को राज्यसभा में जो कुछ हुआ, उससे पिछले दो दिनों से गहरी आत्मपीड़ा, आत्मतनाव और मानसिक वेदना में हूं। 
मैं पूरी रात सो नहीं पाया। जेपी के गांव में पैदा हुआ. सिर्फ पैदा नहीं हुआ, उनके परिवार और हम गांव वालों के बीच पीढ़ियों का रिश्ता रहा, गांधी का बचपन से गहरा असर पड़ा। गांधी, जेपी, लोहिया और कर्पूरी ठाकूर जैसे लोगों के सार्वजनिक जीवन ने मुझे हमेशा प्रेरित किया, जयप्रकाश आंदोलन और इन महान विभूतियों की परंपरा में जीवन में सार्वजनिक आचरण अपनायामेरे सामने 20 सितंबर को उच्च सदन में जो दृश्य हुआ, उससे सदन, आसन की मर्यादा को अकल्पनीय क्षति पहुंची है। सदन के माननीय सदस्यों द्वारा लोकतंत्र के नाम पर हिंसक व्यवहार हुआ। आसन पर बैठे व्यक्ति को भयभीत करने की कोशिश हुई। उच्च सदन की हर मर्यादा और व्यवस्था की धज्जियां उड़ायी गयी। सदन में माननीय सदस्यों ने नियम पुस्तिका फाड़ी। मेरे ऊपर फेंका। सदन के जिस ऐतिहासिक टेबल पर बैठकर सदन के अधिकारी, सदन की महान परंपराओं को शुरू से आगे बढ़ाने में मूक नायक की भूमिका अदा करते रहे हैं, उनकी टेबल पर चढ़कर सदन के महत्वपूर्ण कागजात-दस्तावेजों को पलटने , फेंकने व फाड़ने  की घटनाएं हुई। नीचे से कागज को रोल बनाकर आसन पर फेंके गये, नितांत आक्रामक व्यवहार, भद्दे और असंसदीय नारे लगाये गये। हृदय और मानस को बेचैन करने वाला लोकतंत्र के चीरहरण का दृश्य पूरी रात मेरे मस्तिष्क में छाया रहा। सो नहीं सका, स्वभावतः अंतर्मुखी हूं। गांव का आदमी हूं. मुझे साहित्य, संवेदना और मूल्यों ने गढ़ा है।
सर मुझसे गलतियां हो सकती है, पर मुझमें इतना नैतिक साहस है कि सार्वजनिक जीवन में खुले रूप से स्वीकार करूं।जीवन में किसी के प्रति कटु शब्द शायद ही कभी इस्तेमाल किया हो।क्योंकि मुझे महाभारत का यक्ष प्रश्न का एक अंश हमेशा याद रहता है. यक्ष ने युधिष्ठिर से पूजा, जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि हम रोज कंधों पर शव लेकर जाते हैं, पर हम कभी नहीं सोचते हैं कि अंततः जीवन की यही नियति है. मेरे जैसे मामूली गांव और सामान्य पृष्ठभूमि से निकले इंसान, आयेंगे और जायेंगे। समय और काल के संदर्भ में उनकी न कोई स्मृति होगी, न गणना । पर लोकतंत्र का यह मंदिर 'सदन' हमेशा समाज और देश के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा। अंधेरै में रोशनी दिखाने वाला लाइट हाउस बनकर संस्थाएं ही देश और समाज की नियति तय करती हैं. इसलिए राज्यसभा और राज्यसभा का उपसभापति का पद ज्यादा महत्वपूर्ण और गरिमामय है, मैं नहीं। इस तरह मैं मानता हूं कि मेरा निजी कोई महत्व नहीं है. पर इस पद का है। मैंने जीवन में गांधी के साधन और साध्य से हमेशा प्रेरणा पायी है।

बिहार की जिस भूमि से मेरा रिश्ता है, वहीं गणतंत्र का पहला स्वरूप विकसित हुआ. वैशाली का गणतंत्र। चंपारण के संघर्ष ने गांधी को महात्मा गांधी बनाया। भारत की नयी नियति लिखने की शुरुआत वहीं से हुई, जेपी की संपूर्ण क्रांति ने देश को दिशा दी। उसी धरती के लाल कर्पूरी ठाकुर के सामाजिक न्याय का रास्ता, सदियों से वंचित और पिछड़े लोगों के जीवन में नयी रोशनी लेकर आया. उस धरती, माहौल, संस्कार और परिवेश से निकले मेरे जैसे गांव के मामूली इंसान की कोई पृष्ठभूमि नहीं है। हमारी परवरिश किसी अंग्रेजी स्कूल में नहीं हुई। खुले मैदान में पेड़ के नीचे लगने वाले पाठशाला से संस्कार का प्रस्फुटन हुआ। न पांचसितारा जीवन संस्कृति, न राजनीतिक दाव पैच से रिश्ता रहा। पर कल की घटनाओं से लगा कि जिस गंगा और सरयू के बीच बसे गांव के उदात संस्कारों, संयमित और शालीन व्यवहार के बीच पला, बढ़ा. गांधी, लोहिया, जेपी, कर्पूरी ठाकुर, चंद्रशेखर जैसे लोगों के विचारों ने मुझे मूल्य और संस्कार दिये। उनकी ही हत्या मेरे सामने कल उच्च सदन में हुई।

भगवान बुद्ध मेरे जीवन के प्रेरणा सोत रहे हैं। बिहार की धरती पर ही आत्मज्ञान पाने वाले बुद्ध ने कहा था- आत्मदीपो भव।
 मुझे लगा है कि उच्च सदन के मर्यादित पीठ पर मेरे साथ जो अपमानजनक व्यवहार हुआ, उसके लिए मुझे एक दिन का उपवास करना चाहिए। शायद मेरे इस उपवास से सदन में इस तरह के आचरण करनेवाले माननीय सदस्यों के अंदर आत्मशुद्धि का भाव जागृत हो।

यह उपवास इसी भावना से प्रेरित है. बिहार की धरती पर पैदा हुए राष्ट्रकवि दिनकर, दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे। कल 23 सितंबर को उनकी जन्मतिथि है। आज 22 सितंबर सुबह से कल 23 सितंबर सुबह तक, इस अवसर पर चौबीस घंटे का उपवास मैं कर रहा हूं. काम काज की गति न रुके, इसलिए उपवास के दौरान भी राज्यसभा के कामकाज में नियमित व सामान्य रूप से भाग लूंगा।

पिछले सोमवार (14 सितंबर) को दोबारा मुझे उपसभापति का दायित्व दिया गया, तो मैंने कहा था- इस सदन में पक्ष एवं विपक्ष में एक से एक वरिष्ठ जिम्मेदार, प्रखर वक्ता एवं जानकार लोग मौजूद हैं. हम सब लोग उनके योगदान को समय-समय पर देखते हैं, मेरा मानना है कि वर्तमान में हमारा सदन प्रतिभावान एवं कमिटेड सदस्यों से भरा है। इस सदन में आदर्श सदन बनने की पूरी क्षमताएं हैं, जब-जब बहसे हुई, हमने देखा है. पर महज एक सप्ताह में मेरा ऐसा कटु अनुभव होगा, आहत करने वाला, कल्पना

नहीं की थी. दिनकर की कविता से अपनी भावना को विराम दे रहा हूं।

वैशाली । इतिहास-पृष्ठ पर अंकन अंगारों का, 
वैशाली! अतीत गहवर में गुंजन तलवारों का। 
वैशाली। जन का प्रतिपालक, गण का आदि विधाता, 
जिसे ढूँढता देश आज उस प्रजातंत्र की माता।
रुको, एक क्षण पथिका यहाँ मिट्टी को शीश नवाओ,
 राजसिद्धियों की समाधि पर फूल चढ़ाते जाओ।

अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए. आदर के साथ।

सादर,

हरिवंश

Monday, September 21, 2020

ना खाता न बही हम जो करे वही सही


विपक्ष के नेता तो सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करने में लगे रहते हैं। जब संसद में बोलने की बात आती है किसी भी मुद्दे पर तो हल्ला हु मचाने लग जाते हैं और ऐसी ऐसी हरकतें करते हैं कि पूछिए मत ऐसा तो स्कूल में बच्चे लोग भी नहीं करते होंगे अपने क्लास में। रविवार के दिन जो कुछ भी हुआ संसद में इसकी जितनी निंदा की जाए उतना कम है। इतिहास में इस तरह की घटना कभी नहीं घटी। टीएमसी के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने उपसभापति के पास जाकर उनके माई को तोड़ दिया और उनके सामने ही रूल बुक को  फाड़ दिया। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह जी कहां पीछे रहने वाले थे उन्होंने भी जमकर हंगामा किया और मार्शल से धक्का-मुक्की भी की। जिस तरह सांसदों ने सदन में हंगामा किया तोड़फोड़ और धक्का-मुक्की की उससे राज्यसभा की मर्यादा तार-तार हो गई। इन दो कौड़ी के नेताओं के भारी हंगामे और शोरगुल के बीच ही कृषि से जुड़े विधेयक पारित हो गए। 
संविधान की बात करने वाले ने संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए यह दर्शा दिया कि ना खाता न बही हम जो करे वही सही। कानून बनाने वालों ने कानून की जबरदस्त खेल लिया उड़ाई नजारा तो यह था कि गैलरी और लोकसभा से विपक्षी सदस्य राज्यसभा में आकर हंगामा करने लग गए। करुणा महामारी को लेकर जो प्रोटोकॉल बनाया गया था उसको भी लोगों ने तोड़ कर रख दिया वह भी उस समय जब 40 के करीब सांसद कोविड-19 संक्रमित पाय गए हैं। मत पूछिए ऐसी भषण मची हुई थी कि किसी को कुछ होश या ख़बर ही नहीं था कि जो वो कर रहे है उससे देश की जनता पर क्या असर पड़ेगा? हर मुद्दे को लेकर भटकाने की कोशिश हमेशा से विपक्ष की चाल रही है। जब कुछ नहीं मिलता है तो शोर - शराबा करके संसद का समय और जनता का पैसा दोनों ही बर्बाद कर देते है। भारतीय संसद के लिए कोई नई बात नहीं है अभी हाल ही में देख सकते हैं 2019 अगस्त में जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाए जाने पर पीडीपी के दो सांसदों नजीर अहमद लवे और एमएम फैयाज़ ने संसद में ही अपने कपड़े फाड़ दिए थे।  पीडीपी के सांसदों द्वारा संसद में कपड़े फाड़ने पर सभापति वेंकैया नायडू ने दोनों सांसदों को सदन से बाहर भेज दिया था। इतना ही नहीं इन दोनों ने संविधान की प्रतिलिपि को भी फाड़ दिया था। एआईएमआईएम के  नेता असदुद्दीन ओवैसी ने लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 की कॉपी फाड़ दी थी इसको लेकर काफी हंगामा भी हुआ था। 
समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान की काली करतूत को कैसे भुला जा सकता है जब तीन तलाक के मुद्दे की चर्चा के दौरान लोकसभा में उन्होंने बीजेपी सांसद रमा देवी पर अभद्र टिप्पणी कर दी थी। रमा देवी स्पीकर की जगह पर बैठी हुई थी और आजम खान बोल रहे थे "तू इधर उधर की बात ना कर...", बाकी जो हुआ वह तो संसद का काला इतिहास है और इससे आप भली-भांति वाकिफ होंगे। 

13 फरवरी 2014 को तेलंगाना राज्य के मुद्दे को लेकर लोकसभा में जो हुआ उसने पूरे देश का सिर शर्म से झुका दिया था। भारतीय संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले अभूतपूर्व घटनाक्रम में  लोकसभा में माइक तोड़े गए और मिर्ची स्प्रे किया गया, जिससे तीन सांसदों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा तथा बाद में सीमांध्र क्षेत्र के 16 सदस्यों को निलंबित कर दिया गया। हंगामे के बीच ही सदन में तेलंगाना विधेयक भी पेश कर दिया गया था। उस समय की लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा था कि ,"इससे देश एवं संसद शर्मसार हुई तथा यह एक धब्बा है।" सदन में अप्रत्याशित हंगामा और अफरातफरी उस समय मच गई जब कांग्रेस से निष्कासित सदस्य एवं आंध्र प्रदेश के विभाजन का विरोध कर रहे उद्योगपति एल राजगोपाल ने काली मिर्ची स्प्रे करना शुरू कर दिया था ।लोकसभा के 16 सांसदों को पांच दिनों के लिए सिर्फ निलंबित किया गया था । इन सांसदों में तेलुगू देशम के पांच, कांग्रेस के पांच, वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष वाई. एस. जगनमोहन रेड्डी सहित दो सांसद और कांग्रेस से निष्कासित छह में से पांच सांसद शामिल थे। तेलंगाना बिल के विरोध के नाम पर लोकसभा में जमकर बवाल हुआ था । सांसदों ने बिल की कॉपियां फाड़ दी थी। स्पीकर का माइक तोड़ने की कोशिश की गई इतना ही नहीं सांसदों ने लोकसभा की कई मेजें और शीशे भी तोड़ दिए थे। ना जाने क्या क्या हो गया था  उस दिन संसद की गरिमा को तार तार कर दिया था जैसा की वर्तमान में भी देख सकते है।
इन  नेताओं की दो कौड़ी हरकतों की वजह से हमेशा से संसद की आत्मा को ठेस पहुंचता रहा है बाकि सब समझदार है क्या गलत क्या सही है का निर्णय लेने का।